लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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लिमटी खरे

भारत गणराज्य पर आधी सदी से ज्यादा समय तक राज करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस का बुराड़ी में संपन्न हुआ 83वां पूर्ण महाधिवेशन कई मायनों में अहम करार दिया जा सकता है। वस्तुतः इस महाधिवेशन में कांग्रेस को अपनी नीतियां, भविष्य की योजनाओं, कार्यकर्ताओं की स्थिति, कमजोरियों पर विचार करना था, जो नहीं हुआ। नेताओं की भाषणबाजी देखकर लग रहा था मानो वे अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं के बजाए किसी चुनावी सभा या रैली को संबोधित कर रहे हों। पूरे समय नेताओं ने अपने प्रतिद्वंदी भारतीय जनता पार्टी को कोसा। एसा प्रतीत हो रहा था मानो यह कांग्रेस का अधिवेशन न होकर भाजपा को गरियाने के लिए आहूत आयोजन हो।

अमूमन पार्टियों के अधिवेशन इसलिए आहूत किए जाते हैं ताकि पार्टी की रीतियों नीतियां आदि से कार्यकर्ताओं को रूबरू करवाया जा सके। भाजपा को धमकाने से एसा प्रतीत हो रहा था मानो कांग्रेंस के आला दर्जे के नेता अपने कार्यकर्ताओं के बजाए देशवासियों को भाजपा की कारगुजारियों से आवगत करा रहे हों। अगर एसा था तो इस तरह के आयोजन का क्या ओचित्य था। बेहतर होता किसी सरकारी कार्यक्रम में जाकर नेतागण अपनी अपनी भड़ास निकाल देते।

राष्ट्रमण्डल खेलों में घपला घोटाला होता है, टू जी स्पेक्ट्रम का घोटाला होता है, नीरा राडिया के टेप जारी होते हैं, यह सब भाजपा की वजह से हुआ। कांग्रेस शतुर्मुग के मानिंद रेत में सर गड़ाकर यह संदेश देना चाह रही है कि कोई उसे देख नहीं रहा है। कांग्रेस के राजनैतिक प्रबंधकों को सोचना होगा कि कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार पिछले छः सालों से केंद्र में सत्ता की मलाई चख रही है, इन परिस्थितियों में घपलों घोटालों के लिए वही जिम्मेदार है, न कि भाजपा। देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में देश की सबसे बड़ी पंचायत (संसद) में जनादेश प्राप्त पंचों (सांसदों) के सामने कामन वेल्थ, टूजी जैसे घोटाले होते रहे और वे सभी मुंह बंदकर सब कुछ देख सुन रहे हैं। कांग्रेस में अगर लेश मात्र भी नैतिकता बची होती तो वह इस मामले की निष्पक्ष जांच से किनारा नहीं करती। नीरा राडिया मामले में जब मामला प्रधानमंत्री की ओर मुड़ा तब सीबीआई ने दनादन छापे मारना आरंभ कर दिया।

वैसे भी कांग्रेस का यह कहना कि दूरसंचार मंत्री के घोटाले के मामले में वह जांच को तो तैयार है किन्तु जांच भाजपा के शासनकाल से की जाएगी। जनता को इस बात से क्या लेना देना कि आप कब से जांच कराना चाह रहे हो। जनता तो कह रही है कि भारत गणराज्य की स्थापना के साथ से ही जांच करवा ली जाए हर मामले की। जनता जनार्दन के गाढ़े पसीने की कमाई को दोनों हाथों से उड़ाने वालों को सजा तो मिले। देखा जाए तो यह बात कहकर कांग्रेस द्वारा भाजपा पर दबाव बनाने का कुत्सित प्रयास ही किया गया है। हालात देखकर लगता है मानो कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं सहित देशवासियों को यह बताने का प्रयास किया है कि देश में जो सुनहरा दिख रहा है वह कांग्रेस के कारण है, और जहां अंधकार है उसके लिए भाजपा जिम्मेवार है।

समय के साथ नैतिक पतन होना स्वाभाविक ही है, किन्तु कांग्रेस जैसी अनुभवी और सदगी पसंद पार्टी में अगर इस तरह की बात हो तो कुछ अचरज सा लगता है। यह सोलह आने सत्य है कि अब कांग्रेस के पास पंडित जवाहर लाल नेहरू, स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी जैसा नेतृत्व नहीं बचा है। वस्तुतः कांग्रेस नेतृत्व को चाहिए था कि इस अधिवेशन में सरकार और संगठन की कमजोरियों, प्रदेशों में गिरते जनाधार, जनता से दूरी के बारे में आत्म चिंतन करने के एजेंडे को रखना था, किन्तु लगता है मानो कांग्रेस ने खुद पर कम भाजपा पर ज्यादा चिंतन किया हो।

कांग्रेस नेतृत्व के कान तो तब ही खड़े हो जाने चाहिए थे, जब बिहार से आए कार्यकर्ताओं ने मुकुल वासनिक के खिलाफ नारेबाजी की। नेतृत्व को समझ जाना चाहिए था कि बिहार में चुनाव तो हो चुके हैं पर वहां अभी भी सब कुछ सामान्य नहीं है। इसी तरह युवा तुर्क ज्योतिरादित्य सिंधिया के कथन पर आलाकमान को गौर अवश्य ही फरमाना चाहिए। एक तरफ तो गणेश परिक्रमा न करने की हिदायतें दी जाती हैं, वहीं दूसरी ओर सिंधिया का कहना था कि विधानसभा और स्थानीय निकायों की टिकिट का फैसला दिल्ली में क्यों लिया जाता है। जाहिर है कि प्रदेश की इकाई द्वारा अपनी खाल बचाने के लिए मामले को दिल्ली ढकेल दिया जाता है। दिल्ली में जो जिस नेता की चौखट चूमता है उसका भला करने में लग जाता है उसका आका। इस तरह कांग्रेस के अंदर भी प्रजातंत्र बचा ही कहां है। कांग्रेस के अंदर तो हिटलरशाही और परिवारवाद हावी हो चुका है। आजादी के उपरांत नेहरू गांधी परिवार के इर्दगिर्द ही चक्कर लगा रही है कांग्रेस। कांग्रेस के नेताओं को लगता है मानो राहुल सोनिया के नाम पर वे 2014 में एक बार फिर केंद्र में सत्ता की मलाई चख पाएंगे।

देखा जाए तो कांग्रेस को अब आत्मचिंतन की आवश्यक्ता है। कांग्रेस को सोचना होगा कि आजादी के उपरांत तीस सालों तक उसने देश पर लगातार राज किया है। उसके बाद उपजी परिस्थितियों ने कांग्रेस के रसातल में जाने के मार्ग प्रशस्त किए हैं। सोनिया गांधी का कहना है कि आतंकवाद चाहे अल्पसंख्यक वर्ग का हो या बहुसंख्यक वर्ग का दोनों की देश के लिए घातक हैं। सोनिया गांधी के भाषण लेखक (स्पीच राईटर) को यह ज्ञात होना चाहिए कि देश में नफरत फैलाने का बीजारोपण कांग्रेस ने ही काश्मीर से किया था। यह वही कांग्रेस है जिसने अलगाववादी ताकतों को सर उठाने के मार्ग प्रशस्त किए हैं। रही सही कसर आरक्षण के जिन्न ने पूरी कर दी। जब संविधान बनाया गया था तब आरक्षण को महज दस सालों के लिए लागू किया गया था। कांग्रेस का कार्यकाल इतना अधिक नकारात्मक रहा है कि उसने साठ सालों में भी आरक्षित वर्ग के लोगों को समाज और देश की मुख्यधारा में लाने का जतन नहीं कर पाया है।

कांग्रेस के लिए सबसे चिंताजनक बात तो यह है कि वह आम लोगों का भरोसा ही खोती जा रही है। यह सच है कि राजनैतिक दलों की सांसें ही वोट होती है, और वोट बैंक के बिना वह मृतप्रायः ही है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि कल तक अपनी एक अलग पहचान बनाने वाली कांग्रेस वोट बैंक की संजीवनी के चक्कर में अपने आदर्श, रीतियों नीतियों, परंपराओं का शमन ही करती जा रही है। एक जमाना था जब अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, सर्वहारा वर्ग कांग्रेस का वोट बैंक होता था, जो आज रीतने की कगार पर ही है। वोट बैंक को बढ़ाने के लिए कांग्रेस ने सांप्रदायिक राजनीति का आगाज किया है जिसे अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता है। कांग्रेस के लिए मंजिल (सत्ता पाना) ही अहम होगा, किन्तु नैतिकता का तकाजा यही है कि हम इस बात पर मनन अवश्य ही करें कि मंजिल पाने के लिए हम कौन सा रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। 2009 के आम चुनावों में राजग के पीएम इन वेटिंग एल.के.आड़वाणी की लाल किले की प्रचीर पर तिरंगा फहराने की बलवती इच्छा ने कांग्रेस के सत्ता में लौटने के मार्ग प्रशस्त किए वरना उसी वक्त कांग्रेस धाराशाई हो जाती।

कांग्रेस के तीन दिनी अधिवेशन में अगली पंक्ति के नेताओं की दहाड़ से साफ हो गया है कि कांग्रेस ने यह महाधिवेशन आत्म चिंतन करने के लिए नहीं वरन् देश के कोने कोने से आए अपने कार्यकर्ताओं को यह संकेत देने के लिए बुलाया था कि वे तैयार रहें मध्यावधि चुनाव की रणभेरी कभी भी बज सकती है। आज कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी कांग्रेस के अलावा सरकार को भी जवाहर लाल नेहरू ट्रस्ट के मानिंद मानकर चल रही हैं, उससे साफ हो जाता है कि कांग्रेस के राज में भारत गणराज्य के अंदर भ्रष्टाचार, अनाचार, व्यभिचार सब कुछ जायज ही है।

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