लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

हिन्दुत्ववादी संगठनों और उनके अनुयायियों की मुझे लेकर सबसे बड़ी आलोचना यह है कि मुझे हिन्दुत्व में कोई अच्छी बात नजर क्यों नहीं आती? मैं हमेशा उनकी आलोचना ही क्यों करता हूँ।

ऐसा नहीं है बंधुओं कि मुझे आपके गुणों के बारे में मालूम नहीं है, आप सभी के पास व्यक्तिगत गुण-अवगुण हैं। हो सकता है आपमें से अनेक कई बेहतरीन गुणों से भरे इंसान हों। गुणों का संबंध व्यक्तिगत स्थिति से है। मैं आपमें से किसी को भी व्यक्तिगत तौर पर जानता नहीं हूँ इसलिए कुछ कह पाना मुश्किल है।

मैं जब भी संघ परिवार की आलोचना करता हूँ तो एक राजनीतिक विचार के रूप में आलोचना करता हूँ। मैं निजी तौर पर अनेक संघी नेताओं का मित्र हूँ। आपलोग जानते हैं कि आदरणीय स्व. विष्णुकांतशास्त्री मेरे सहकर्मी थे, वे मेरे विभाग में हिन्दी के प्रोफेसर थे, संघ के बड़े नेता थे, बाद में यू-पी .के राज्यपाल भी रहे।

मेरे मथुरा में हिन्दी के शिक्षक आदरणीय मथुरानाथ चतुर्वेदी संघ के मथुरा में संस्थापकों में से एक थे। उनसे मैंने वर्षों हिन्दी पढ़ी है और वे निजी तौर पर बेहद अच्छे व्यक्ति थे। मजेदार बात यह है कि मैं उनके प्रभाव के कारण मार्क्सवाद की ओर आकर्षित हुआ, वे बड़े ही अचरज के साथ सोवियत संघ में हो रहे परिवर्तनों को देख रहे थे। वे सोवियत साहित्य और सोवियत राजनीतिक पत्रिकाओं के नियमित पाठक थे ।

मैं उस समय मथुरा के एक संस्कृत कॉलेज में पढ़ता था।मेरी सारी शिक्षा-दीक्षा संस्कृत माध्यम से हुई है ,माथुर चतुर्वेद संस्कृत संस्कृत महाविद्यालय में मैंने संस्कृत के विभिन्न विषयों पर संस्कृत के उद्भट विद्वानों से पढ़ा है। मथुरानाथ चतुर्वेदी इसी कॉलेज में हिन्दी शिक्षक थे और बेहद ईमानदार व्यक्ति थे। उनका सादगीभरा जीवन था। उनसे ही मुझे सबसे पहले सोवियत संघ में हो रहे समाजवादी परिवर्तनों की जानकारी मिली थी।

आप लोगों को जानकर आश्चर्य होगा कि उन्होंने कभी संघ में शामिल होने के लिए नहीं कहा उलटे मुझे पढ़ने के लिए मार्क्सवादी साहित्य मुहैय्या कराया था। कहने का मेरा तात्पर्य यह है कि मैंने अपने जीवन में जिस आरएसएस वाले को देखा है और जिसका मेरे ऊपर गहरा असर था वह अंदर से सोवियत संघ में घट रहे परिवर्तनों से बेहद प्रभावित था।

मैं 1967-68 में संस्कृत कॉलेज में भर्ती हुआ था और वहां 1979 तक पढता रहा और इस दौरान मेरा मथुरानाथजी से घनिष्ठतम संपर्क बना रहा। उनके ही कारण मुझे संघ और भाजपा के अनेक बड़े नेताओं को करीब से जानने का मौका मिला, अनेक से मिला भी हूँ, क्योंकि मथुरा में मेरे घर के पास ही एक धर्मशाला है कव्वीबाई धर्मशाला। उसमें ज्यादातर संघ ने नेता आकर रूकते थे। मैंने व्यक्तिगत तौर पर दीनदयाल उपाध्याय, अटलबिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख आदि के साथ मथुरानाथजी के साथ ही खुलकर बातें की हैं। इसके कारण मैं जानता हूँ कि संघ के लोगों में अनेक लोग बेहद अच्छे होते हैं, मुश्किल है उनकी विचारधारा के साथ।

हिन्दुत्व की विचारधारा मूलतः विभाजनकारी है, यह बात मैंने मार्क्सवादियों से नहीं जानी, इसे मैंने सबसे पहले संघ के जिम्मेदार कर्मठ कार्यकर्ताओं से ही जाना। मथुरा में हमारे पास कई मंदिर हैं,उनमें एक महत्वपूर्ण देवीमंदिर भी है जहां सभी लोग दर्शन-पूजा को आते हैं। मथुरा शहर के अधिकांश संघी भी यहां आते हैं। उनके निजी आचरण को देखकर ही मैंने यह जाना था कि संघ के लोग कट्टर जातिवादी और घनघोर मुस्लिम विरोधी होते हैं। यह मेरा किताबी ज्ञान नहीं है। व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित ज्ञान और समझ है।

मुझे हिन्दुत्ववादियों की एक बात बहुत अच्छी लगती थी उनकी सामाजिकता और मित्रता। वे जिसे मित्र बनाते थे उसका ख्याल रखते थे और अपने व्यवहार और दैनंदिन जीवन में मदद करने के कारण मित्रों को संघ में ले जाते थे। मैं संघियों का मित्र तो था लेकिन कभी शाखा में नहीं गया। मैं उनके विचारों को जानता था और उनके कामकाज की दूर से समीक्षा किया करता था और जैसा भी समझता था वैसा अपने दोस्तों को बताता भी था।

मैं निजी तौर पर बाबू जयप्रकाशनारायण और अनेक स्थानीय भाकपा और माकपा के कॉमरेडों के संपर्क में 1973-74 में आया और उनका व्यवहार, विचार और आचरण मुझे संघ के लोगों से कई मायनों में श्रेष्ठ लगा और आपात्काल में मैं संघ की ओर न जाकर मार्क्सवादियों और बाबू जयप्रकाश नारायण के लोगों के करीब रहा। मुझे आपातकाल में संघ का दोगलापन अच्छा नहीं लगा। लेकिन संघ के मित्रों से अच्छे संबंध बने रहे।

मेरे सैंकड़ों मित्र थे जो संघ में थे और उनमें से ढ़ेर सारे लोग हमारे मथुरा में होने वाले कार्यक्रमों में सुनने नियमित आते थे, इसका व्यापक असर भी देखा गया कि अनेकों ने संघ को छोड़ दिया। जबकि मथुरा में गिनती के एक दर्जन कॉमरेड नहीं थे। कहने का तात्पर्य यह है कि जो लोग इन दिनों मेरे संघ के प्रति आलोचनात्मक लेखन को लेकर परेशान हैं, मैं उनसे यही कहना चाहता हूँ कि राजनीतिक तौर पर संघ कोई अच्छा काम करेगा तो मैं उसकी प्रशंसा जरूर करूँगा लेकिन मेरी जानकारी में संघ ने एक भी अच्छा राजनीतिक काम नहीं किया है।

संघ बहुत बड़ा संगठन है। करोड़ों लोग उसके साथ हैं। लेकिन उसके पास हिन्दू समाज के लिए समाजसुधार का कोई कार्यक्रम नहीं है। वे सिर्फ हिन्दुत्व-हिन्दुत्व करके अप्रासंगिक एजेण्डे पर जनता को बांटकर व्यस्त रखते हैं। जबकि वे सकारात्मक कार्यक्रम बनाकर हिन्दुओं का भला कर सकते हैं। लेकिन ऐसा करना उनका लक्ष्य नहीं है। वे हिन्दुत्व के नाम पर लगातार आक्रामक होते गए हैं। वे नरमदिल थे लेकिन उनके हिन्दुत्ववादी विचारों ने नरमदिल को शैतानीदिल का बना दिया है। मुझे संघ से नहीं उसके शैतानी दिल-दिमाग से शिकायत है। इसने समाज का व्यापक अहित किया है।

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10 Comments on "संघ की राजनीति विभाजनकारी"

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श्रीराम तिवारी
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शुकल जी तो पटरी से उतर गए ….उनसे यही निवेदन है की श्री चतुर्वेदीजी का प्रस्तुत आलेख और नाचीज की तत्संबंधी टिप्पणी द्वारा पढ़ें …. दिनेश गौर ने संघ के सामाजिक और राजनेतिक सरोकारों को शिद्दत से रखा बधाई …किन्तु उन्होंने भी जल्दबाजी में प्रकारांतर से संघ पर लगे आरोपों को स्वीकार कर लिया जैसे कोई बच्चा अपनी नई ड्रेस पर स्याही के दाग लगाकर ,शान से बोले देखो दोस्तों में बहादुर हूँ…ऐसे ही संघ के अधकच्चे स्वयमसेवक जरा ज्यादा ही उत्साहीलाल हो जाया करते हैं …उनकी इन्ही हलकट नादानियों से संघ को फासीवाद से नवाजा गया है ….फासीवाद याने… Read more »
om prakash shukla
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जगदीश जी आज आपका लेख पढ़ केर आपके बारे में मेरी कई गलतफहमिया दूर हो गयी अपेक ऐसे संगठन से प्रभावित है जिसका इस दुनिया से लोप हो गया है रूस और चीन भी इससे किनारे केर चुके है लेकिन फिर भी कुछ कुत्ते की दम की तरह टेढ़े है और उसके सीधे होने की कोई संभावना नहीं है आपभी किसी अभिनेता की तरह लीक तोडू का तमगा चाहते है या फिर कांग्रेस से कोई जुगाड़ तभी आप लगातार संघ पैर हमला बोल रहे है इसके निहितार्थ जरुर है नहीं तो इतने बड़े संघियो से मिलाने के बाद भी संघ… Read more »
दिवस दिनेश गौड़
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तिवारी जी ने प्रश्न का स्मरण कराया है तो तिवारी जी और चतुर्वेदी जी के लिए उत्तर प्रस्तुत है| आपने कहा की संघ एक सामाजिक संगठन है तो राजनीति में टांग क्यों अड़ा रहा है? चतुर्वेदी जी आप ये बताइये कि क्या सामाजिक संगठन का देश से कोई लेना देना नहीं है? क्या सामाजिक संगठनों के अधिकार देश की जनता से कम हैं? जब जनता को यह अधिकार है कि वह राजनीति में हस्तक्षेप कर सकती है तो सामाजिक संगठन क्यों नहीं? क्या यह देश सामाजिक संगठन का नहीं है? और जब देश के राजनेता देश को ही बेचने पर… Read more »
श्रीराम तिवारी
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श्री चतुर्वेदीजी ने संघ से उसके बारे में बहुत सम्मान से प्रश्न किया है की यदि वो सामाजिक संगठन है तो फिर राजनीती में टांग अडाने की लगातार कोशिश क्यों ?अपने अनुषंगी संगठनों पर परोपजीवी सत्तात्मक अमरवेल की तरह छाये रहने का मूल उद्देश्य क्या है ?कथनी और करनी में अंतर क्या है? भारतीय चिंतन का निष्कर्ष क्या यह नही है की – अयं निजः परोवेति गणना लघु चेतसाम …. उदार चरितानाम तू वसुधेव कुटुम्बकम …. एक सिद्धांत ये है की सिर्फ अपनी माँ का आदर करो …दूसरों पर बुरी नज़र रखो ….चतुर्वेदीजी का सिद्धांत ये है की -अपनी माँ… Read more »
श्रीराम तिवारी
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yh ek sadharan aalekh nahin apitu etihasik dastavej hai…chaturvedi ji aapki or meri kahani bilkul ek jaisi hai.bhopal men mere kai ristedar jo purane the ve to imandari or charitrik nirmaan ki achchhi baten kiya karte the kintu doosri peedi ke unke uttradhikari khule aam kahte hain ki hmen jo bhi post bhajpa ya sangthan men milti hai uska rate hota hai..jo 5-6 saal pahle tk sirf khaki nekar or kali topi ki okat rkhte the ve ab karodon ki haveliyon or bade bade krushi farmo ke maalik hain .jb men unhe yaad dilata hun ki rss ka naam mat… Read more »
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