लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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निर्मल रानी

दिन-प्रतिदिन निरंतर बढ़ती जा रही मंहगाई के बोझ तले जहां आम लोग दबते जा रहे हैं तथा उनका जीना मुहाल हो गया है वहीं यह आम उपभोक्ता मंहगाई के अतिरिक्त और भी तरह-तरह की ठगी का शिकार होते देखे जा सकते हैं। परंतु ज़ाहिर है जो सरकार या प्रशासन उत्पादकों व व्यापारियों को आए दिन तमाम दैनिक उपयोगी वस्तुओं की मंहगाई बढ़ाए जाने से नहीं रोक पा रहा है वह इस प्रकार की दूसरी ठगी व उपभोक्ताओं से जबरन अधिक पैसे वसूलने को कैसे रोक सकता है। नतीजतन ऐसे लुटेरे प्रवृति के तमाम दुकानदारों, व्यापारियों, रेहड़ी-ठेलों वालों के हौसले बढ़ते जा रहे हैं। और इसी प्रकार की लूट व ठगी को ही धीरे-धीरे वे आज के दौर की दुकानदारी या व्यापार का ढर्रा समझ बैठे हैं।

उदाहरण के तौर पर मिठाई के साथ मिठाई के डिब्बों का वज़न न किए जाने के प्राय: सरकार द्वारा निर्देश जारी किए जाते हैं। परंतु आज शायद ही कोई ऐसा मिठाई विक्रेता हो जो डिब्बों का वज़न मिठाई के साथ न करता हो। यही नहीं बल्कि गत्ते के डिब्बे के दोनों भाग एक साथ जोडक़र उसमें मिठाई रखी जाती है। यानी एक ओर तो मिठाई की कीमतें आसमान छू रही हैं दूसरी ओर आपको मिठाई के रेट में ही गत्ते के डिब्बे को भी खरीदना पड़ रहा है। यह बात यहीं $ख्त्म नहीं होती। बल्कि अब तो मिठाई के डिब्बों का वज़न बढ़ाने के लिए डिब्बों के भीतर भी तरह-तरह की कलाकारियां की जा रही हैं। डिब्बों में बाकायदा अलग-अलग भाग बनाए जाते है तथा उनमें अलग-अलग तरह की मिठाई प्रत्येक भाग में रखी जाती है। इसके लिए अतिरिक्त गत्ता डिब्बे में रखा जाता है। कई बार ऐसा भी हुआ कि मिठाई के डिब्बे के निचले हिस्से में काफी मोटे गत्ते का बड़ा टुकड़ा बेवजह रखा पाया गया। सवाल यह है कि प्रशासन की नाक तले पूरे देश में हर वक्त चलने वाले इस लूट के धंधे से क्या प्रशासन बेखबर है? आखर सरकार व प्रशासन की अनदेखी का ही परिणाम है कि आज असंगठित उपभोक्ता कभी मिलावटी, नक़ली व ज़हरीली मिठाई खरीदने को मजबूर रहता है तो कभी उसे उसकी अदा की हुई क़ीमत के बराबर के वज़न की मिठाई भी मयस्सर नहीं हो पाती।

इसी प्रकार तमाम फल व सब्ज़ी वालों ने आजकल ग्राहकों को लूटने का एक नया तरीका निकाल रखा है। उदाहरण के तौर पर पचास रुपये किलो बिकने वाला आम यदि दुकानदार एक किलो का मूल्य पचास रुपये मांगता है तो वह उसी आम को दो किलो लेने पर ग्राहक को 90 रुपये देने की बात करता है। परंतु यदि ग्राहक दुकानदार से पैंतालिस रुपये का एक किलो आम देने को कहता है तो वह दुकानदार मना कर देता है। अब पांच रुपये बचाने की लालच में आकर ग्राहक दुकानदार से दो किलो आम मांग बैठता है। उधर दुकानदार जानबूझ कर ऐसे आकार के आम तराज़ू पर रखता है जिनका वज़न दो किलो से भी थोड़ा सा ऊपर हो जाए। अब यदि सौ या डेढ़ सौ ग्राम आम दो किलो से ज़्यादा हुआ तो दुकानदार पूरे सौ रुपये ग्राहक से मांग लेता है। और वह असंगठित उपभोक्ता जोकि 40-45 या पचास रुपये तक का अधिकतम बजट बनाकर आम खरीदने आया था वह पचास रुपये किलो के बजाए 45 रुपये किलो की दर से आम खरीदने के चक्कर में अपने सौ रुपये खर्च कर आता है। यही हाल ज़्यादातर सब्ज़ी व फल बेचने वालों की दुकानों पर देखा जा सकता है। कोई भी वस्तु अगर आप बारह या पंद्रह रुपये की खरीदें तो दुकानदार कहता है कि पूरे 20 रुपये की कर दें? केवल रेहड़ी वाले ही नहीं बल्कि अच्छी-भली व बड़ी दुकानों वाले भी आजकल पांच-सात, दो-चार यहां तक कि दस रुपये बकाया होने पर ग्राहक को पैसे लौटाने के बजाए उन्हें टाफ़ी,गोली या माचिस आदि थमाकर चलता कर देते हैं। यह उपभोक्ताओं के साथ होने वाली खुली लूट नहीं तो और क्या है?

अंसगठित उपभोक्ता को लूटने में केवल मिठाईयों वाले या रेहड़ी वाले ही सक्रिय नहीं हैं बल्कि जानी-मानी बड़ी से बड़ी राष्ट्रीय व बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर स्थानीय उत्पादक तक मंहगाई की आड़ में उपभोक्ताओं को दोनों हाथों से लूटने का ज़बरदस्त हथकंडा अपनाए हुए हैं। उदाहरण के तौर पर यदि साबुन या डिटर्जेंट या इस प्रकार की और तमाम वस्तुओं को लिया जाए तो हम यह देखेंगे कि कंपनियों ने मंहगाई के नाम पर ऐसी वस्तुओं की कीमतें तो बढ़ाई ही हैं साथ-साथ उन्होंने अपने इन उत्पादों की पैकिंग का वज़न भी कम कर दिया है। यानी उपभोक्ताओं पर दोहरी मार पड़ रही है। गोया वह किसी एक वस्तु की कीमत इसलिए ज़्यादा दे रहा है क्योंकि बाज़ार में चीज़ें मंहगी होती जा रही हैं। परंतु साथ-साथ उत्पादक उसी वस्तु का वज़न भी धीरे-धीरे घटाता जा रहा है। आखर ऐसा क्यों? क्या इन कंपनियों को मात्र मूल्य बढ़ाने भर से संतुष्टि नहीं होती जोकि यह देश के असंगठित उपभोक्ताओं को वस्तु का वज़न भी कम देते हैं? साबुन,पेस्ट,शैंपू, डिटर्जेंट, वाशिंग पाऊडर, रूह अफ़ज़ा जैसे और भी कई उत्पाद इसी श्रेणी में गिने जा सकते हैं जिनके मूल्य भी बढ़ रहे हैं और वज़न भी कम होते जा रहे हैं।

जबसे मंहगाई बढऩे का सिलसिला शुरु हुआ है तबसे टेलीविज़न पर प्रसारित होने वाली खबरों पर आम दुकानदार भी खासतौर पर नज़रें रखने लगा है। टीवी चैनल्स के मध्य चल रही प्रतिस्पर्धा के वर्तमान दौर में टी वी पत्रकार भी जनता में सनसनी फैलाने के लिए कोई न कोई निराली व ध्यान आकर्षित करने वाली खबरें ढंढते रहते हैं। और इसी कड़ी में यदि किसी टीवी चैनल पर मान लीजिए यह ख़बर प्रसारित हो गई कि लखनऊ में टमाटर 60 रुपये किलो की दर से बिक रहा है तो लखनऊ से सात-आठ सौ किलोमीटर दूर हरियाणा व पंजाब का सब्ज़ी विक्रेता भी लखनऊ की इस ख़बर से प्रभावित होकर अपने 20-30 रुपये प्रतिकिलो बिकने वाले टमाटर का मूल्य भी 50-60 रुपये प्रतिकिलो कर देता है। और यदि असंगठित उपभोक्ता उससे यह पूछे कि सुबह तो यही टमाटर तीस रुपये प्रतिकिलो था और अब शाम होते-होते यह पचास व साठ रुपये किलो कैसे हो गया तो इसके जवाब में सब्ज़ी बेचने वाला लखनऊ की मंडी का टमाटर का भाव व उसके टीवी पर प्रसारित होने का हवाला दे बैठता है। गोया अब मंहगाई बढऩे का आधार ख़रीद के लिए दिया जाने वाला अधिक मूल्य नहीं बल्कि सुनी-सुनाई बातें, अफवाहें तथा रेडियो व टीवी के समाचार आदि हो कर रह गए हैं।

अधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए दुकानदार ग्राहाकों के साथ एक और अन्याय यह कर रहे हैं कि वे सस्ती, घटिया व अधिक मुनाफ़ा देने वाली तमाम वस्तुओं को ग्राहकों के हाथों बेचकर ख़ुश नज़र आते हैं। जबकि टिकाऊ, अच्छी, ब्रांडेड वस्तुएं ऐसे दुकानदार बेचना इसलिए पसंद नहीं करते क्योंकि इनमें मुनाफ़ा कम मिलता है। मिसाल के तौर पर एक माचिस की डब्बी को ही ले लीजिए। इस समय देश में सबसे प्रतिष्ठित माचिस निर्माता कंपनी विम्को ही मानी जाती है। उत्तर भारत में इसके दो ब्रांड होमलाईट व शिप अत्यधिक लोकप्रिय हैं। परंतु अधिकांश दुकानदार माचिस मांगने पर ग्राहक को इस ब्रांड की माचिस देने के बजाए दूसरे घटिया ब्रांड की माचिस थमा देते हैं। हालांकि उनकी कीमत भी दुकानदार वही वसूलते हैं जो शिप या होमलाईट माचिस की होती है। परंतु चूंकि विम्को जैसी कंपनियां दुकानदार को कमीशन कम देती हैं और ग्राहक की सुविधा व ज़रूरत के अनुसार अपना अच्छा उत्पाद तैयार करती हैं इसलिए दुकानदार इन्हें कम बेचता है व घटिया उत्पाद अधिक। इसका नतीजा यह होता है कि दूसरी माचिस जल्दी खत्म हो जाती है। कभी-कभी एक तीली इस्तेमाल करने की जगह चार-पांच तीलियां इस्तेमाल करनी पड़ती हैं तो कभी घटिया माचिस को इस्तेमाल करते समय इसकी चिंगारी छिटककर माचिस जलाने वाले व्यक्ति पर या उसके पास बैठे किसी अन्य व्यक्ति के कपड़ों पर जा गिरती है। और सस्ती माचिस प्रयोग करने के ‘इनाम स्वरूप’ उपभोक्ता के कीमती कपड़े तक जल जाते हैं।

मगर ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की चाहत रखने वाले दुकानदारों का इन बातों से क्या वास्ता? उन्हें तो महज़ अपनी ज़्यादा कमाई से ही मतलब होता है न कि भगवान का रूप समझे जाने वाले ग्राहकों की सुविधा या उसकी संतुष्टि से। इसी प्रकार और भी तमाम हथकंडे ऐसे हैं जिन्हें अपनाकर दुकानदारों द्वारा असंगठित उपभोक्ताओ को लूटने का खुला प्रयास किया जा रहा है। इनमें कम तौलना,मिलावटी सामान बेचना, सड़ी-गली व बासी चीज़ें ग्राहकों के हाथों बेच देना, ज़रूरत से अधिक कीमत वसूलना, मांगी गई वस्तु से अधिक वस्तु ग्राहक को ज़बरदस्ती लेने के लिए मजबूर कर देना जैसी तमाम बातें शामिल हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मंहगाई के वर्तमान दौर में असंगठित उपभोक्ता दोनों हाथों से लूटा जा रहा है और सरकार,शासन व प्रशासन मूक दर्शक बना सबकुछ देख रहा है।

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