लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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गंगानन्द झा

जानकारों से हमने सुना है, नियति पूर्वनिर्धारित रहती है, जन्मलेख होती है। कुछ दूसरे जानकार कहते हैं कि नियति की रूपरेखा व्यक्ति के बाल्यावस्था के प्रारम्भिक चरणों में तय हुआ करती है, परिवेश में निवेश के द्वारा। पुपुल जयकर श्रीमती इन्दिरा गाँधी के संस्मरण लिखती हुई बताती हैं कि एक बार इन्दिराजी ने कहा था, “मैं लोगों से सहमति की अपेक्षा नहीं करती, पर यह अपेक्षा अवश्य रखना चाहती हूँ कि वे मुझे समझने का जतन करें।“ जीवन के जटिल समीकरण को समझने का एक विनम्र प्रयास।

संयुक्त परिवार के विघटन की प्रक्रिया के झञ्झावात से जूझकर एकल परिवार के उभड़ने की प्रक्रिया-जन्य यन्त्रणा के साथ अवदमित व्यक्तित्व की हिंसक अभिव्यक्ति से क्षत-विक्षत तथा विकृत भुक्तभोगी के रूप में जो व्यक्ति मेरे सामने उभड़ता है वह है हमारा नुनदा।

नुनदा हमारे बड़े भाई थे पाँच भाइयों और तीन बहनों में, बस केवल एक दीदी से छोटे। हमारे पिता आदर्शवादी आधुनिक विचारों से युक्त व्यक्ति थे जिन्होंने आधुनिक शिक्षा का आलोक फैलाने का व्रत ले रखा था। उन्होंने अपने विचारों को प्रतिष्ठापित एवं सम्मानित करने का व्रत लिया था, साधनों की कृच्छता एवम् अभाव की निरन्तरता के जीवन का वरण किया था। उन्होंने सोचा था कि उनकी सन्तानों को इस स्थिति से उद्दीपन मिलेगा अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं को उपलब्धियों में रूपान्तरित करने का। ऐसा हुआ भी। पर नुनदा की संवेदनशील चेतना पर इस उद्दीपन की प्रतिक्रिया परिवार की आय और व्यवस्था में तात्कालिक योगदान करने की रही होगी कदाचित्। फलतः अपने को आगे की चुनौतियों के लिए सुसज्जित करने की प्रवृत्ति से वञ्चित कर लिया था उन्होंने। पिताजी के भोलेपन ने अगली पीढ़ी के लिए उनके स्वयम् के उच्च शिक्षा के एजेण्डा को धूमिल कर दिया था।

पिताजी मास के आरम्भ में अपना वेतन लाकर माँ के हाथ में दे देते और व्यवस्था की उलझन से अपने को निश्चिन्त रखा करते। माँ उस सीमित अल्प राशि में दैनिक व्यय-भार के साथ भविष्य को सँजोने का भी प्रयास करती होतीं। उनके एकमात्र सहयोगी, या सँवाग की भूमिका में रहते नुनदा, जो अभी किशोरावस्था में आए ही होंगे। माँ ने पिताजी के द्वार कोई उत्साह नहीं दिलाने के बावजूद उनका ही हाथ पकड़कर घर बनवाने के काम की शुरुआत कर दी थी । तब नुनदा हाई स्कूल की प्रारम्भिक कक्षाओं के छात्र रहे होंगे। पढ़ाई की अपेक्षा गृह कार्य में उनकी अधिक रूचि एवं झुकाव की नींव कदाचित तभी पड़ गई थी।

हाई स्कूल की परीक्षा में सफलता पाने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा से इनकार कर दिया। इसकी वजह शायद घर की आर्थिक अवस्था में योगदान देने का ख्याल भी रहा हो। पिताजी ने उन्हें बहुत समझाया, पर वे नहीं माने। इसके पहले हमारे मँझले भाई, जो अत्यन्त मेधावी तथा संभावनामय थे तथा इण्टर कक्षा में पढ़ रहे थे, का देहान्त हो चुका था। मेरी समझ है कि उन दोनों भाइयों में पारस्परिक स्नेह और निर्भरता का संबंध था। वे उस मानी में नुनदा की शक्ति एवं प्रकाश-स्तम्भ रहे होंगे। तब पिताजी ने नुनदा को अपने मित्र पंडित महेश्वर प्रसाद झा, जो जिले के प्रतिष्ठित एवं ख्यात वकील थे, के पास लॉ-क्लर्क के रुप में काम पर लगा दिया था। यहाँ उन्होंने बर्षों तक काफी मनोयोगपूर्वक तथा सफलता के साथ काम किया। वे दुमका में महेश्वर बाबू के घर पर ही बतौर पारिवारिक सदस्य रहते, और हर शनिवार की शाम को घर आते। सप्ताह भर की कमाई माँ के हाथों में दे देते और सोमवार की सुबह फिर दुमका काम पर वापस लौट जाते। इस बीच उनका विवाह हो चुका था। भाभी सबों के साथ घर पर ही रहती थीं। परम्परागत परिवार के विशुद्ध सैद्धान्तिक रूप में हमारा परिवार काम कर रहा था। नुनदा और पिताजी –दो व्यक्ति कमाऊ थे और हम भाई-बहन विद्यार्थी के रूप में थे। माँ के जिम्मे घर की व्यवस्था का भार था और उनकी सहायता भाभी किया करतीं।

ताराबाद की हमारी पैतृक खेतीबारी जो महाजन के पास गिरवी पड़ी थी, देना चुका कर वापस ले ली गई और हमलोग खेती बारी वाले बन गए थे।

वे दिन थे जब नुनदा का स्नेहशील, उदार और विनोदी रूप पूरे परिवेश पर उभड़ा रहा करता था। हमारी जरूरतों के प्रति हमेशा सजग और सक्रिय, साथ ही हमसे चुहल करना उनके लिए सहज सी बात थी। घर में गाय रखते थे वे, गाय के चारे का जुगाड़ करने, उसकी सेवा करने में मुझे मन लगता था, याद है अभी भी मुझे। एक बछड़ा रोग-ग्रस्त हो गया था, तो उसे मवेशी अस्पताल ले जाकर इलाज की व्यवस्था के साथ उसके घाव की ड्रेसिंग मैं करता था।

नुनदा की शादी उनकी नौकरी शुरु होने के पहले ही हो चुकी थी। भाभी सामान्य परम्परागत संयुक्त परिवार के वधु के प्रारूप में आदर्श आचरण की थीं। अपने समवयस्क एवम् अपने से छोटे देवरों ननदों के बीच वे घुलमिल गई थीं। सबों का ख्याल रखना, सुबह घर में सबसे पहले उठकर काम में लग जाना, रात में सबों के बाद बिस्तर पर जाना इत्यादि उनके लिए सहज दिनचर्या थी।

लग रहा था कि सब कुछ ठीक –ठाक चल रहा है। पर इस व्यवस्था में दरार थी। महेश्वर बाबू के घर पर रहते हुए नुनदा को अस्वस्तिकर स्थितियों से अक्सर साबिका पड़ा करता। उन्हें लगा करने लगा जैसे उस घर में उनकी हैसियत सदस्य की न होकर कर्मचारी की है। इधर हमारी भाभी दुमका पति के साथ रहना चाहती थीं। इस आशय का प्रस्ताव परोक्ष रूप से लाया भी गया , पर यह स्वीकार्य नहीं हुआ।

अब पिताजी की प्रबल असहमति के बावजूद नुनदा ने तय कर लिया कि वे दुमका का काम छोड़ देंगे, और ताराबाद की खेती देखने के साथ स्वतन्त्र व्यवसाय करेंगे। ऐसा निर्णय ले पाने में उन्हें भाभी की ओर से प्रभावकारी प्रेरणा मिली। वे अपने लिए अलग पहचान एवम् कृतित्व स्थापित करने को उद्यत हो उठी थीं। पिताजी की समझ थी कि खेती का काम हमलोगों के लिए निर्भर-योग्य तथा लाभदायी नहीं हो सकता, इसमें अनिश्चितताएँ सन्निहित थीं। यों भी बिना सिंचाई की व्यवस्था के खेती तो जीविका का निर्भर योग्य साधन नहीं ही हो सकता था उन दिनों।एक तो कृषि की अल्प जमीन, वह भी सिंचाई की कोई सुविधा नहीं , फिर ब्राह्मण होने के कारण स्वयम् हल नहीं पकड़ने की स्थिति।

समय बीतने के साथ हम अन्य भाई लोग भी कमाऊ हुए, पर नुनदा से एक महत्वपूर्ण फर्क हममें था कि हम सब बँधी-बँधाई नौकरियों में थे, जिसमें मास के अन्त में वेतन का मिलना निश्चित था; दूसरी ओर नुनदा खेतीहर एवं काठ के व्यवसाई ; जिसमें सब कुछ अनिश्चित। दूसरी महत्वपूर्ण बात थी कि हमारी आय पर माँ का आंशिक दावा ही रहा करता था। नुनदा में व्यवसायिक चतुराई के संस्कार नहीं थे ; वे न तो सफल खेतीहर हो पाए न सफल व्यवसाई, यद्यपि उन्होंने अनवरत परिश्रम तथा लगन कायम रखा था। उनकी सारी कमाई खेती में लगती रहती , फिर भी सुरसा का मुँह नहीं भरता। संयुक्त परिवार का ढाँचा कायम था, पर उसकी यह काया निष्प्राण हो चुकी थी। नुनदा इस संक्रमण के बावजूद संयुक्त परिवार के प्रोटोकॉल से ही सीमाबद्ध रह गए थे। अपने लिए कोई शौक नहीं, शरत् चन्द्र के विप्रदास की भाँति अपनों में एकात्म, एकल परिवार की व्यावहारिक संकीर्णताओं एवं प्रैग्मैटिज़्म को सम्मानित करने में असमर्थ रह गए थे वे। संयुक्त परिवार के एकल स्वरूप में संक्रमण, सहोदर की प्रतिद्वन्द्विता(sibling rivalry), आर्थिक असफलता एवं इन सबके साथ अपनों के अवदमित व्यक्तित्व नुनदा को अपदस्थ करने के आक्रामक और हिंसक प्रयास उन्हें लहूलुहान करते रहे थे।

बेटे-बेटियों के वैवाहिक संबंधों को अञ्जाम देने के मामले में भी वे विडम्बना की स्थिति में रहे थे। बेटियों की शादियों की जिम्मेदारी उन्हें खुद निभानी पड़ी थी, जब कि उनके बेटों की शादियों में गणेशजी कर्त्ता की असरदार भूमिका में रहे। एक समानान्तर तस्वीर रही, जब बुत्तुदा ने अपनी बेटी की शादी के समय गणेशजी को दिया गया अभिभावकत्व अपने बेटे का विवाह संबंध तय तथा संपादित करते वक्त वापस ले लिया था।

वे नितान्त अकेले रहे थे। मुझे याद है तब मैं पटना में काम करता था, नियमित छुट्टियों में देवघर आया था। मित्र के बीच बैठा हुआ था मैं, तभी नुनदा उधर से गुजरे। उनके बदन पर धोती के साथ एक गञ्जी मात्र थी, कमीज या कुर्ता नहीं। मुझे ग्लानि सी हुई। घर पर आकर माँ से मैंने कहा कि नुनदा कमीज क्यों नहीं पहनते। माँ ने कहा कि उसके पास पैसे नहीं होते। मुझे यह बात जँची नहीं , मैंने उससे कहा कि मेरे पास तो हैं। तो माँ ने कहा कि उसको पैसे मिलेंगे तो वह कमीज सिलवाने के बजाय किसी काम में लगा देगा। तुम बनवा दो उसकी कमीज। मैंने कहा कि मैं अपने बड़े भाई को नहीं कह सकता कि मैं आपकी कमीज सिलवा दूँगा। तुमको मैं पैसे दे देता हूँ, तुम सिलवा देना। मुझे याद है मैंने दस रूपए माँ को दिए थे , तब दस रूपयों में एक कमीज बन जा सकती थी। एक सप्ताह बाद जब पटना से वापस आया तो माँ ने बतलाया कि नुनदा को जब उनसे सारी बातें मालूम हुईं तो जिद्द करके पैसे ले लिए और ताराबाद जाकर किसी मजदूर को दे दिया। कमीज नहीं ही बनी।

एक और तस्वीर। नुनु अपनी इकाई के साथ देवघर से टाटा जा रहा था। घर से निकलकर रिक्शे की प्रतीक्षा कर रहे थे वे सब। उन्हें घेरे हुए उसके चाचा-चाची और बच्चे तथा उसकी माँ थीं। मैं भी वहाँ था, तभी मैंने देखा सड़क के दूसरी ओर कुछ दूरी पर नुनदा खड़े होकर इधर ही देख रहे थे। किसीका ध्यान उन पर नहीं था, वे भी जैसे अपनी उपस्थिति छिपा रहे थे। रिक्शा आया, नुनु , बहू एवं बच्चे चढ़ गए, रिक्शा चल दिया , हम सब घर की और मुड़ गए और नुनदा उलटी तरफ। अपनी कोमल भावनाओं को परोक्ष रूप से भी अभिव्यक्त करने के अवसर ग्रहण करने की सुविधा से जैसे अपने आपको वञ्चित किया हुआ था उन्होंने।

एक बार उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम सब भाई मुझे नियमित रूप से एक निर्दिष्ट राशि दिया करो। मैंने उनके इस प्रस्ताव पर हैरानी व्यक्त की तो उन्होंने कहाथा, “ इसमें ग़लत क्या है? अगर मेरी कमाई पर तुम सब का हक हो सकता है तो तुम्हारी कमाई पर मेरा हक तो बनता ही है।” मैं उनके भोलेपन के सामने निरूत्तर रह गया था। यद्यपि उनसे मैंने कहा था कि विघटित होते हुए परिवार में बड़ा भाई होना एक विडंबना है। मेरी उनके साथ समानुभूति (empathy) थी। मैं अपनी सीमाओं के अन्दर उन्हें अपने सम्मान, स्नेह, स्वीकृति और समानुभूति के एहसास दिलाते रहना चाहता था , किन्तु विधि का परिहास हमारे साथ चलता रहा था। भाभी तथा उनके बच्चे मेरे साथ संबंध के मामले में गणेशजी से सहमति रखते थे कि यथासंभव मुझे अप्रतिष्ठित किया जाए।

बहुत साल पहले हमारे बड़े बहनोई (दीदी के पति) बाबू ने जमीन का एक प्लॉट नुनदा के नाम से खरीदा हुआ था। दीदी का देहान्त हो गया, फिर बाबू का भी। आज से पाँच-छः साल पहले हमारे भगिना लोगों ने नुनदा को कहा कि वे जमीन को उनके नाम स्थानान्तरित कर दें। नुनदा के बेटे इसका विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि जब यह जमीन नुनदा के नाम से खरीदी गई है तो इस पर उनके बेटों का अधिकार है। नुनदा से तब मुझे उनकी बात सुनने का इत्तिफाक़ हुआ ता, “ मेरे बेटा कहता है कि अगर आप जमीन लिख देंगे तो आपका खाना-पीना और अन्य सेवा बंद हो जाएगी। तुम ही बताओ यह जमीन तो बाबू की है, अगर मैंने उनके बेटों के हवाले नहीं किया तो ऊपर जाने पर दीदी- बाबू को क्या जवाब दूँगा ?” बहुत बाद में भगिना लोगों से मुझे मालूम हुआ कि नुनदा ने जमीन भगिना लोगों के नाम स्थानान्तरित कर दिया था अपने बेटों के तमाम अवरोधों के बावजूद।

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