लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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GandhiJIअब ऐसा स्वीकार किया जाने लगा है कि विश्व में मानवीय मूल्यों के हो रहे ह्रास, नकारात्मक वृत्तियों के विकास का कारण ग्राम संस्कृति और ग्राम की स्वायतता का नष्ट हो जाना ही है। यह बात केवल भारत के संदर्भ में ही नहीं कही जा रही बल्कि इसे पूरे विश्व के संदर्भ में भी कहा जा सकती है। आज यूरोप में इस बात पर सर्वाधिक चिंता व्यक्त की जा रही है कि वहां हिंसा बढ रही है। छोटी उम्र के बच्चे ही अपराध कार्यों में फंस रहे हैं। परिवारों में आपसी रिश्ते टूट रहे हैं जिसके कारण परिवारों के अस्तित्व पर ही संकट की स्थिति आ गई है। भोगवादी प्रवृत्ति बढ रही है तमाम तकनीकी उन्नति के बावजूद व्यक्ति पशुता की ओर जा रहा है। यूरोप में तो नगरीकरण की प्रक्रिया इतनी तेजी से बढी है कि वहां ग्रामों के लोप होने का खतरा पैदा हो गया है। उसके देखा-देखी एशिया के अनेक देशों में भी नगरीकरण की प्रक्रिया ग्रामों को लीद रही है। थाईलैण्ड में तो मानो सारे देश की आबादी राजधानी बेंकॉक में ही सिमटने का प्रयास कर रही है। यही स्थिति मलेशिया की है। अब ये तमाम प्रवृत्तियां भारत में भी दिखाई देने लगी हैं। इसलिए भारत में अनेक प्रबुद्ध लोग देश के सांस्कृतिक भविष्य को लेकर चिंता प्रकट कर रहे है।

यूरोप में ग्राम और परिवार के विघटन व नगरों के असमाजिक जीवन की शुरूआत औद्योगिक क्रान्ति से मानी जा सकती है। इस प्रक्रिया को तेज करने में प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की इन युद्धों से यूरोप के लोगों को जीवन के क्षण भंगुर होने का अहसास बहुत तेजी से हुआ और भय की इस काली छाया में भोग की पाश्विक वृत्तियां जागृत हुईं। औद्योगिकरण की यह प्रक्रिया ज्यों-ज्यों भारत में फैलती गई त्यों-त्यों उससे जुडी तमाम बिमारियों का यहां आना भी स्वाभाविक ही था। कृषि प्रधान आर्थिक व्यवस्था में ग्राम एक ईकाई के रूप में सुरक्षित ही नहीं रहता बल्कि परिवार की संस्था भी अपनी उपयोगिता बनाए रखता है। कृषि आधारित व्यवस्था में संयुक्त परिवार ज्यादा उपयोगी माने जाते हैं और सामाजिक संस्कृति के मूलाधार सुरक्षित रहते हैं। कृषि आर्थिकता में गाय की उपयोगिता सर्वाधिक होती है। यदि इसको और व्यापकता में कहा जाए तो कृषि और पशु परस्पर आधारित है और दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। फिर गाय तो भारत में केवल आर्थिकता से जुडी हुई नहीं है, बल्कि देश के सांस्कृतिक परिवेश में भी उसका गहरा स्थान है। परन्तु जब धीरे-धीरे छोटे किसान समाप्त होने लगे और उनके स्थान पर हजारों एकड के जमींदार या उद्योगपति आ गए तो उन्होंने कृषि करण को ही मशीनों और मजदूरों के प्रयोग से एक बडे उद्योग में ही बदल दिया। इससे कृषि कार्य में से सृजन का आनन्द समाप्त हो गया। गाय और अन्य पशु अनुपयोगी हो गए और गांव की आर्थिकता की रीढ की हड्डी टूट गई। यूरोप में बडे स्तर पर पशु वध शुरू हो गया और भारत में गोवंश की दुर्दशा सबके सामने है। गोग्राम की प्रासांगिता पर प्रश्नचिह्न लग जाने से भारत का मंगल या फिर विश्व मंगल की कल्पना भला कैसे की जा सकती थी?

महात्मा गांधी ने शायद इस स्थिति को बहुत पहले ही पहचान लिया था वे भविष्यद्रष्‍टा थे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में ही हिन्द स्वराज लिख कर इस बात पर जोर देना शुरू कर दिया था कि भविष्य के भारत के विकास का मूलाधार ग्राम स्वराज ही हो सकता है। गऊ के बारे में गांधी की चिंता तो सर्वज्ञात ही है गौरक्षा के लिए वे किसी भी सीमा तक जाने को तैयार थे गांधी के सपनों का भारत वह था जिसमें स्वावलंबी गांव सबसे छोटी ईकाई हो नगरीकरण का गांधी जी विरोध करते थे, यही कारण था कि वे बडी मशीनों के खिलाफ थे। वे जानते थे कि बडी मशीन गांव को खाएगी और नगरों में झुग्गी-झोपडियों का जंगल खडा करेगी गांधी जी का मानना था कि मशीन मानव मंगल के लिए है न के मानव को गुलाम बनाने के लिए। गांधी जी ऐसा मानते थे कि भारत का सांस्कृतिक प्रवाह ग्राम से होकर जाता है। यदि ग्राम उजड गया या फिर स्वावलंबी न रहा तो संस्कृति की यह अविछिन्न धारा अपने आप सूखने लगेगी। दीन-हीन ग्राम या फिर याचक की मुद्रा में खडा ग्राम भारत का आधार नहीं बन सकता। भारत का आधार तो स्वावलंबी ऊर्जा वान ग्राम ही बन सकता है। दुर्भाग्य से गांधी के उत्तराधिकारी पण्डित जवाहर लाल नेहरू की इस ग्राम स्वराज्य में कोई आस्था नहीं थी इसलिए नेहरू ने हिन्द स्वराज को गांधी के सामने ही अप्रासांगिक करार दिया था नेहरू मानते थे आधुनिक युग में जिस मशीनी क्रान्ति की शुरूआत हुई है उसमें ग्राम स्वराज्य की कल्पना करना ही दखियानूसी है। गौरक्षा की बात उनकी ह्ष्टि में मजहबी कट्टरता से ज्यादा कुछ नहीं थी।

लेकिन इसे अजब संयोग मानना होगा कि यूरोप के कई देशों ने तथाकथित आधुनिकता की बिमारियों से छुटकारा पाने के लिए हिन्द स्वराज पर गंभीरता से चर्चा हो रही है। यूरोप में वैकल्पिक अर्थशास्त्र की तलाश में जुटे विद्वानों ने हिन्द स्वराज को विश्व मंगल के लिए प्रासांगिक माना है। यह वर्ष हिन्द स्वराज के सौ साल पूरे होने का वर्ष है। और यह अजीव संयोग है कि इसी वर्ष भारत के लोग देश भर में विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा का आयोजन कर रहे हैं। इस यात्रा का मूलाधार भी ग्राम का स्वराज्य और गौवंश की रक्षा ही है। एक बात और ध्यान में रखनी होगी कि इस यात्रा ने गौ और ग्राम को आधार बनाकर भारत मंगल की कामना नहीं कि है बल्कि विश्व मंगल की कामना की है। यहां एक और मुद्दे पर भी ध्यान देना होगा नए अर्थशास्त्र में बडी मशीन उत्पादन को बढाती है और आधुनिकता की अधकचरी समझ इस उत्पादन के ज्यादा से ज्यादा भोग को ही सुख और मंगल का कारण मानती है। जबकि सुख और मंगल की यह अवधारण वास्तविकता से कोसों दूर है। भोग सुख का एक कारक हो सकता है लेकिन वह एकमात्र कारक नहीं है । सुख के अनेक अन्य कारक भी हैं लेकिन आधुनिक अर्थशास्त्र के विद्वान इन अन्य कारकों का नोटिस लेने के लिए तैयार नहीं है। उनका तर्क यह है कि इन कारकों को किसी भी ढंग से नापा नहीं जा सकता। लेकिन यह तर्क भीतर से खोखला है आप किसी चीज को नाप नहीं सकते इसका अर्थ यह नहीं है कि उसका अस्तित्व ही नहीं है। यह मनुष्य जीवन की, उसके सुख और मंगल की एक पक्षीय विवेचना है। दीन दयाल उपाध्याय और महात्मा गांधी ही समग्र एकात्म विकास की चर्चा करते थे। उसी से विश्व मंगल की अवधारण उत्पन्न होती है।

आज जबकि पूरा विश्व चौराहे आ खडा हुआ है भौतिक उन्नति ने उसे विनाश के रास्ते पर मोड दिया है। ग्राम का विनाश तो हो ही चुका है अब मानव अपने विनाश की राह पर चल रहा है। ऐसे मौके पर भारत में शुरू होने वाली यह विश्व मंगल गौ ग्राम (यह यात्रा 30 सितम्बर को कुरूक्षेत्र से प्रारम्भ होगी।) यात्रा सम्पूर्ण विश्व में एक नई बहस को जन्म देगी ऐसा माना जा सकता है। ‘चलो ग्राम की ओर’ का यह नारा वास्तव में एक बार फि र मंगलमय, सुख-समृद्धि और सम्पन्न भारत की कामना करता है। इस कामना के दो ही मूल स्तम्भ है गौ और ग्राम और दोनों एक-दूसरे से गर्भनाल से बंधे हुए हैं। पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध में जयप्रकाश नारायण ने समग्र क्रान्ति का उद्धोष किया था उस उद्धोष के चलते सत्ता परिवर्तन तो हुआ लेकिन समग्र क्रान्ति का सपना टूट गया। विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा यह आह्वान भी एक नई क्रान्ति का द्योतक है। परन्तु यह क्रान्ति समग्र क्रान्ति से भी गहरी क्रान्ति होगी। क्योंकि इसमें भारतीय संस्कृति के मूलाधारों को प्रस्थापित करने का प्रयास होगा।

– कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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