लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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अशोक “प्रवृद्ध”

savarkar

अनुपम त्याग, अदम्य साहस, महान वीरता एवं उत्कट देशभक्ति के पर्यायवाची बन चुके  असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी प्रथम प्रात: स्मरणीय वीर सावरकर आधुनिक भारत के निर्माताओं की अग्रणी पंक्ति के ऐसे चमकते नक्षत्र हैं , जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन अर्थात जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत जीवन का एक-एक क्षण राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रसेवा, साहित्य-सेवा, समाज सेवा और हिन्दू समाज के पुनरुत्थान के लिए संघर्ष में व्यतीत कर दिया और भारतीय स्वाधीनता संग्राम का जन्मजात योद्धा, हिन्दू हृदय सम्राट स्वातन्त्र्यवीर सावरकर के नाम से इतिहास में अमर हो गये । हिन्दुस्तान को ‘अखण्ड राष्ट्र’ के रूप में पुनर्स्थापित – प्रतिष्ठित कराने का महान स्वप्न देखते-देखते ही वे इस नश्वर संसार से विदा हो गये। हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा (हिन्दुत्व) को विकसित करने का बहुत बडा श्रेय सावरकर को जाता है।

प्रथम प्रात: स्मरणीय वीर सावरकर भारत के इतिहास के ऐसे व्यक्तित्व हैं , जिन्हें सत्य ही कई मायने अर्थात अर्थों में प्रथम होने का सौभाग्य प्राप्त है । इतिहास के अनुसार वीर सावरकर भारत के प्रथम ऐसे छात्र थे, जिन्हें देशभक्ति के आरोप में कोलेज से निष्कासित कर दिया गया। वे प्रथम ऐसे युवक थे, जिन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का साहस पहली बार दिखाया। वे प्रथम ऐसे बैरिस्टर थे, जिन्हें वकालत की परीक्षा पास करने के बाद भी प्रमाण पत्र नहीं दिया गया। वे पहले ऐसे भारतीय थे, जिन्होंने लंदन में 1857 के तथाकथित गदर को भारतीय स्वाधीनता अर्थात स्वातंत्र्य संग्राम का नाम दिया। असाधारण व्यक्तित्व और महान कृतित्व के स्वामी सावरकर विश्व के प्रथम ऐसे लेखक हैं जिनकी पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ प्रकाशन के पूर्व ही जब्त कर ली गयी थी । सावरकर ऐसे प्रथम भारतीय हैं, जिनका अभियोग हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में चला। संसार के इतिहास में वे प्रथम महापुरुष हैं, जिनके बंदी विवाद के कारण फ्रांस के प्रधानमंत्री एम बायन को त्याग-पत्र देना पड़ा। वे पहले ऐसे कैदी थे, जिन्होंने अण्डमान में जेल की दीवारों पर कील की लेखनी से साहित्य सृजन किया। महान राष्ट्रपुरुष स्वातन्त्र्य वीर सावरकर प्रथम ऐसे मेधावी व्यक्ति हुए हैं, जिन्होंने कोल्हू में बैल की जगह जुतने , चूने की चक्की चलाने , रामबांस कूटने , कोड़ों की मार सहने आदि की क्रूरतम प्रताड़ना झेलकर काले पानी की सजा काटते हुए भी दश-सहस्र पंक्तियों को कठस्थ कर के यह सिद्ध कर दिया कि सृष्टि के आदि काल में आर्यों ने वाणी (कण्ठ) के द्वारा बीस हजार से अधिक मन्त्रों वाले वेदों को किस प्रकार जीवित रखा। वे प्रथम राजनीतिक नेता थे, जिन्होंने समस्त संसार के समक्ष भारत देश को हिन्दू राष्ट्र सिद्ध करके मोहनदास करमचन्द गाँधी को चुनौती दी थी। वे प्रथम क्रान्तिकारी थे, जिन पर स्वतंत्र भारत की सरकार ने झूठा मुकदमा चलाया और बाद में निर्दोष साबित होने पर माफी माँगी । इस प्रकार कई अर्थों में प्रथम रहने वाले वीर सावरकर सत्य ही नित्य नमनीय व प्रथम प्रातः स्मरणीय हैं ।

वीर भूमि महाराष्ट्र के नासिक जिले के एक छोटे से ग्राम भगूर में चितपावन वंशीय ब्राह्मण श्री दामोदर पंत सावरकर के घर 28 मई 1883 ई. को विनायक सावरकर का जन्म हुआ । बालक विनायक को बचपन में तात्या के नाम से भी पुकारा जाता था। विनायक के पिता दामोदर सावरकर एवं माता राधाबाई दोनों ही श्रीराम कृष्ण के परम भक्त एवं दृढ़ हिन्दुत्वनिष्ठ विचारों वाले दम्पति थे। बचपन से ही विनायक को उनके माता-पिता रामायण, महाभारत आदि की कथा के साथ हिन्दू सूर्य महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी तथा गुरु गोविन्दसिंह जी आदि की शौर्यगाथाएँ सुनाया करते थे।  बालक विनायक का मन व हृदय हिन्दू जाति के गौरवमयी भारतीय इतिहास को सुनकर प्रफुल्लित  व पुलकित हो उठता था और  वे भी छत्रपति शिवाजी और महाराणा प्रताप की भांति वीर बनकर हिन्दू-पदपादशाही की स्थापना करने, विदेशी शासकों की सत्ता को चकनाचूर करके स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र का नव निर्माण करने की प्रेरणा ग्रहण कर प्रण लेते । बड़ा होने के साथ ही विनायक के हृदय में राष्ट्रीयता के बीजांकुर प्रस्फुटित हो पल्लवित व पुष्पित होते चले गये। विनायक के  नौ वर्ष की आयु पूरी करते-करते विनायक की माँ राधाबाई स्वर्गवासी हो गयीं। इस पर भी पिता दामोदर पंत ने दूसरा विवाह नहीं किया। राधाबाई के घरेलू कामों में रसोई तो उन्होंने स्वयं संभाल ली और शेष कार्य तीन पुत्रों में वितरित कर दिये। तात्या (विनायक) के जिम्मे कुलदेवी सिंहवाहिनी दुर्गा की उपासना, सेवा का काम आया। तात्याराव बड़ी श्रद्धा भक्ति से कुल देवी माँ की पूजा-आराधना करने लगे । वे देवी की स्तुति में मराठी पद रचते और देवी की प्रतिमा के सम्मुख श्रद्धानत होकर माँ भारती को विदेशी साम्राज्य के जंजीर से मुक्त करा कर स्वतंत्र हिन्दूराष्ट्र की स्थापना कराने का वरदान  मांगते थे ।

समय पर बालक तात्या अर्थात विनायक को गाँव के विद्यालय में नामांकन करा दिया गया। विनायक ने छोटे-छोटे बालकों का समूह बनाकर धनुषबाण चलाना, तलवार चलाना सीखना प्रारम्भ कर दिया। बालक एकत्रित होकर दो समूह बना लेते और फिर छद्म अर्थात नकली युद्ध करते। बालक स्वयं ही नकली दुर्ग बनाकर उन पर आक्रमण -प्रत्याक्रमण करने , धनुष बनाकर पेड़ों के फल-फूलों पर निशाना साधने , लिखने की कलमों को भाला बनाकर युद्ध करने आदि युद्ध कौशल विद्याओं की शिक्षण,  प्रशिक्षण प्राप्त करते और आपसी प्रतियोगिता करते थे। शीघ्र ही विनायक सभी बालकों का नेता बन गया। पाँचवी श्रेणी तक की पढ़ाई गाँव में कर लेने पर विनायक को अंग्रेजी पढ़ने के लिए नासिक भेज दिया गया। नासिक में विनायक ने अपनी आयु के छात्रों की एक मित्र-मण्डली बनाकर उनमें राष्ट्रीय भावनाएँ भरनी प्रारम्भ कर दीं। उन्हीं दिनों विनायक ने मराठी में देशभक्ति पूर्ण कविताएं लिखीं, जो मराठी की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।

सम्पूर्ण भारत की तरह महाराष्ट्र में भी इन दिनों महाराष्ट्र में अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध एक लहर दौड़ रही थी। युवकों में भीं अंग्रेजी शासन के विरुद्ध एक रोष फैला हुआ था। ऐसे वातावरण में सन् 1897 में पूना में भयंकर प्लेग की बीमारी फैल जाने से लोगों में चिन्ता की लहर दौड़ गयी। बाल-वृद्ध, नर-नारी काल के ग्रास बनने लगे।अंग्रेज अधिकारियों के द्वारा प्लेग की रोकथाम के लिए विशेष उपाय नहीं किये जाने के कारण जनता में अंग्रेजों के विरुद्ध दौड़ रही क्षोभ की लहर और भी बेकाबू हो चली। चाफेकर बंधुओं ने जान हथेली पर रखकर अंग्रेज प्लेग कमिश्नर व एक अन्य अधिकारी को गोली का निशाना बना दिया । अंग्रेज अधिकारियों की हत्या से समस्त देश में तहलका मच गया। चाफेकर बंधुद्वय को फाँसी पर लटका दिया गया। इस समाचार से समस्त देश में रोष की लहर दौड़ गयी।

 

समाचार-पत्र में इस समाचार को पढ़ विनायक राव सावरकर का देशभक्त बाल हृदय क्रोध से कांप उठा और उनके हृदय में इस घटना ने अंग्रेजी साम्राज्य के अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह के बीज बो दिये। विनायक ने कुलदेवी दुर्गा की प्रतिमा के सम्मुख जाकर देश की स्वाधीनता के लिए जीवन के अन्तिम क्षणों तक सशक्त क्रांति का झंडा लेकर जूझते रहने की कठोर व दृढ़ प्रतिज्ञा की ।अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा की पूर्ति के लिए तात्याराव सावरकर ने योजनाएँ बनाकर सर्वप्रथम छात्रों को एकत्रित करके मित्र मेला नामक संस्था बनायी और उसके तत्वावधान में गणेशोत्सव, शिवजी महोत्सव आदि के कार्यक्रम आयोजित करके युवकों में राष्ट्रभक्ति की भावनाएँ भरनी प्रारम्भ कर दीं। सावरकर ने ओजस्वी भाषणों द्वारा युवकों को प्रभावित करके अपने दल का वृहत सदस्य बना लिया।22 जनवरी, 1901 को महारानी विक्टोरिया का देहान्त होने पर समस्त देश में शोक सभाएँ हो रहीं थीं । मित्र मेला की बैठक में सावरकर ने इन शोकसभाओं का विरोध करते हुए कहा कि इंग्लैड की महारानी हमारे दुश्मन देश की रानी है, अत: हम शोक क्यों मनाएं?

 

सन् 1901 में सावरकर के मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् उन्हें पूना के फर्ग्युसन कालेज में दाखिल करा दिया गया। वहाँ भी सावरकर ने राष्ट्रभक्त छात्रों का एक दल बनाया। उन्होंने वहाँ भी कविताएँ एवं लेख लिखकर युवकों में राष्ट्रीय भावनाएँ भरनी प्रारम्भ कर दीं। उनकी रचनाएँ अनेक मराठी पत्रों में प्रकाशित हुई और कई कविताओं पर उन्हें पुरस्कार भी मिले। काल के सम्पादक श्री परांजपे सावरकर की रचनाओं से अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्होंने सावरकर का परिचय राष्ट्रभक्त बाल गंगाधर तिलक जी से करा दिया। अब सावरकर श्री तिलक एवं श्री परांजपे के निकट संपर्क में आने लगे। उनकी मानसभूमि में राष्ट्रभक्ति के बीज तो पहले से विद्यमान थे ही, अब वे इन व्यक्तियों की तेजस्वी वाणी से अपने अनुकूल जलवायु पाकर अंकुरित एवं पुष्पित हो उठे। उनकी रचनाओं में युवकों के लिए देश पर मर-मिटने का आह्वान प्रति-ध्वनित होने लगा।

सन् 1905 में सावरकर बी.ए. की तैयारी कर रहे थे। इसी बीच उन्होंने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का जोरदार आंदोलन चला दिया। उन्होंने सबसे पहले पुणे के बीच बाजार में सार्वजनिक रूप से विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वयं श्री लोकमान्य तिलक ने की। तिलक जी सावरकर जी की इस सफलता पर भारी प्रसन्न हुए। विदेशी वस्त्रों की होली जलाने की घटना बिजली की तरह समस्त विश्व में फैल गयी। समाचार पत्रों में इस घटना की काफी आलोचना-प्रत्यालोचनाएं हुई। परिणामस्वरूप फर्ग्युसन कालेज के अधिकारियों ने सावरकर को कालेज से निष्कासित कर दिया। इस पर भी उनको मुंबई विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा देने की अनुमति मिल गयी और उन्होंने बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।

बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् सावरकर जी ने अपने विश्वस्त साथियों को एकत्रित करके एक गुप्त बैठक में भारत की स्वाधीनता के लिए सशस्त्र क्रांति को मूर्त रूप रूप देने के लिए ‘अभिनव भारत’ नामक एक संस्था की स्थापना की।सावरकर ने स्थान-स्थान पर जाकर युवकों को संगठित किया और उनमें देशभक्ति की भावना भरी। सावरकर के ओजस्वी भाषणों ने महाराष्ट्र में तहलका मचा दिया। उन्होंने पुणे की एक सभा में भाषण देते हुए भारत माँ को दासता के बेड़ियों में जकड़ने वाले अंग्रेजों के अत्याचारी साम्राज्य को चकनाचूर करके स्वाधीन राष्ट्र की स्थापना करने का आह्वान करते हुए कहा कि  सशस्त्र क्रांति के बल पर इस विदेशी साम्राज्य का तख्ता पलटना है।

उन्हीं दिनों लंदन में ‘इंडियन सोशियालाजिस्ट’ नामक पत्र निकालने वाले सुप्रसिद्ध देशभक्त पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा ने अपने पत्र में प्रतिभाशाली छात्रों को इंग्लैड में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्तियाँ देने की घोषणा प्रकाशित की। लोकमान्य तिलक ने श्यामजी कृष्ण वर्मा को पत्र लिखकर शिवाजी छात्रवृत्ति सावरकर को देने की सिफारिश की। इस प्रकार विनायक दामोदर सावरकर कानून का अध्ययन करने के लिए इंग्लैड जाने की तैयारी करने लगे। इंग्लैड के लिए वह 9 जून, 1906 को बम्बई बंदरगाह से रवाना हुए। इंग्लैड में सावरकर वहाँ रहकर भारत की स्वाधीनता के लिए वे प्रयत्नशील पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा संचालित इंडिया हाउस में ठहरे ।

सन् 1906 में सावरकर ने भारत की स्वाधीनता के संग्राम लिए फ्री इंडिया सोसायटी की स्थापना की। जिसके सदस्य भाई परमानंद, सेनापति बापट, मदनलाल ढींगरा, लाला हरदयाल बाबा जोशी, महेशचरण सिन्हा, कोरगांवकर हरनाम सिंह आदि भारतीय देशभक्त युवक बन गये। सावरकर ने सोसायटी की पहली बैठक में अपना ओजस्वी भाषण देते हुए कहा- अंग्रेजी साम्राज्य को भारत से तभी समाप्त किया जा सकता है, जब भारतीय युवक हाथों में शस्त्र लेकर मारने-मरने को कटिबद्ध हो जायें । सशस्त्र क्रांति के द्वारा ही भारत की स्वाधीनता संभव है। अत: हमें भारतीयों को इसके लिए तैयार करना है, उनकी शस्त्रास्त्रों से सहायता करनी है।

सावरकर ने लंदन विश्वविद्यालय में कानून के अध्ययन के लिए प्रवेश तो लिया हुआ था, लेकिन वे विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए नाममात्र को जाते थे। अपना अधिकतर समय वे ब्रिटिश लाइब्रेरी में बैठकर विभिन्न देशों की राजनीतिक स्थिति के अध्ययन करने में लगाया करते थे । इटली के क्रांतिवीर मैजिनी के जीवन से वह बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने मैजिनी का जीवन चरित्र लिखा। सन् 1906 में उन्होंने विभिन्न ग्रंथों का अध्ययन करने के पश्चात् सिखों का स्फूर्तिदायक इतिहास नामक ग्रंथ लिखा। इंग्लैड की विशाल लायब्रेरी में ही अथक अध्ययन करने के पश्चात् उन्होंने 1857 का प्रथम स्वातन्त्र्य समर नामक ऐतिहासिक ग्रंथ लिखा। सावरकर ने सर्वप्रथम अपने इस ग्रंथ में पूर्ण तथ्य देकर यह सिद्ध किया कि 1857 की क्रांति गदर या लूट नहीं अपितु वीर मंगलपांडे, वीरांगना लक्ष्मीबाई, बिहार केसरी बाबू कुंवरसिंह, तात्या टोपे आदि सैकड़ों राष्ट्र वीरों द्वारा बलिदान देकर भारतीय स्वाधीनता के लिए किया गया पहला महान् युद्ध था। इससे अंग्रेजों में तहलका मच गई ।

1857 का प्रथम स्वातन्त्र्य समर सन् 1908 में सबसे पहले मराठी में लिखा गया। ब्रिटिश सरकार ने इस महान ऐतिहासिक पुस्तक को गैर कानूनी घोषित करके प्रकाशित होने से पूर्व ही जब्त कर लिया था।मराठी से अंग्रेजी में अनुवाद करके उसे सबसे पहले हालैंड में प्रकाशित किया गया। पुस्तक की हजारों प्रतियाँ फ्रांस भेज दी गयीं। पुस्तक प्रकाशित हुई तो इसकी कुछ प्रतियाँ भारत सहित अन्य  सभी देशों में गुप्त रूप से पहुँचा दी गयीं।ऐसे महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता 26 फरवरी 1966 को बम्बई में भारतीय समयानुसार प्रातः दस बजे अपने पार्थिव शरीर छोड़कर परमधाम को प्रस्थान कर गये ।

 

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