लेखक परिचय

डॉ नीलम महेन्द्रा

डॉ नीलम महेन्द्रा

समाज में घटित होने वाली घटनाएँ मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।भारतीय समाज में उसकी संस्कृति के प्रति खोते आकर्षण को पुनः स्थापित करने में अपना योगदान देना चाहती हूँ।

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अगर रहीमदास के इस दोहे को हम समझ लेते जिसे हमें बचपन में पढ़ाया गया था तो आज न हमारी धरती प्यासी होती न हम ।जल हरियाली और खुशहाली दोनों लाता है।
लेकिन आज हमारे देश का अधिकांश हिस्सा पिछले चालीस सालों के सबसे भयावह सूखे की चपेट में है।महाराष्ट्र का मराठवाड़ा आन्ध्र का रायलसीमा उत्तरप्रदेश का बुन्दुलखण्ड मध्यप्रदेश का टीकमगढ़ एवं शिवपुरी झारखंड ऐसे अनेकों इलाकों की धरती की सूखी मिट्टी सूखे तालाब खाली कुँए हमारे खोखले विकास की गाथा गा रहे हैं।आजादी के 70 साल बाद भी हमारे गांव ही नहीं देश की राजधानी दिल्ली तक में पेयजल की उपलब्धता एक चुनौती है।गाँवों की स्थिति तो यह है कि पहले खेत सूखे फिर पेट सूखे अब हलक सूखने लगे हैं।टीकमगढ़ में तो पानी की सुरक्षा के लिए बाकायदा बंदूकधारी तैनात किए गए हैं
इस महीने की 12 ता० को जब दस वैगनों से भरी पानी की ट्रेन लातूर पहुँची तो स्थानीय लोगों के चेहरे उनके सूखे गलों की दास्ताँ बयाँ कर रहे थे।गांव के बुजुर्गों का पटरियों पर रात की शांति में जाग कर पानी के आने का इंतजार उनके खाली बर्तनों का शोर सुना रहा था।पानी से भरे डब्बों को देखकर स्त्रियों की आँखों में आने वाला पानी उनके सूखे हलक की प्यास की कहानी सुना रहा था।अभी इस पानी के इस्तेमाल के लिए उन्हें और इंतजार करना था लेकिन पानी को मात्र देख कर उनके चेहरों की खुशी क्या हमें कुछ समझा नहीं रही? हम ऐसे क्यों सोचते हैं कि आज हमारे नलों में पानी आ रहा है तो कल भी आयेगा?क्या हमने पानी के प्रबंधन की दिशा में कोई कदम उठाया है यदि नहीं तो हमारे नल हमेशा यूँ ही हमें पानी परोसते रहेंगे ऐसा हम कैसे सोच सकते हैं?
वातानुकूलित कमरों में बैठकर मिनरल वाटर से अपनी प्यास बुझाने वाले क्या इस सच्चाई से वाकिफ हैं कि गाँव में लोगों का पूरा दिन पानी की व्यवस्था करने में निकलता है महिलाएं आधी रात से जाग कर पानी भरने में लग जाती हैं ताकि दिन की धूप में नहीं जाना पड़े ! सुधा (परिवर्तित नाम) उम्र 22 वर्ष, दो बार गर्भपात हो चुका है डाक्टर ने भारी वजन उठाने से मना किया है लेकिन पानी भरने लगभग चार किलोमीटर की दूरी तय करती है!
महाराष्ट्र की बात करें तो मराठवाढ़ा के सूखाग्रस्त इलाकों से किसानों एवं खेतीहर मजदूरों का पलायन शुरू हो चुका है।2016 में हर महीने करीब 90 किसानों ने आत्महत्या की।खरीफ के मौसम में पूरे महाराष्ट्र में लगभग 15750 गांव सूखे से बुरी तरह प्रभावित हैाकई तालाबों और नदियों का पानी 4% से भी कम बचा है।महाराष्ट्र लगातार चौथी बार सूखे की चपेट में है सबसे ज्यादा असर औरंगाबाद लातूर और विदर्भ में पड़ा है।लातूर में तो पानी को लेकर धारा 144 लगी है।केंद्र सरकार ने 3049 करोड़ रुपये सूखा राहत के लिए मंजूर किए हैं।
18 घंटों का सफर तय करके दस वैगन पानी से भरी ट्रेन 342 कि मी चलकर राजस्थान के कोटा से चलकर पश्चिमी महाराष्ट्र के मिराज से 2.75 लाख लीटर पानी लेकर लातूर पहुँची “पानी एक्सप्रेस” पानी लाने वाली पहली ट्रेन बनी ।इस पूरे प्रोजेक्ट में 1.84 करोड़ रुपए का खर्च आया ।इसमें कोई संशय नहीं कि लातूर को केन्द्र सरकार के इस कदम ने बहुत राहत दी है।लेकिन समस्या को जड़ से मिटाकरउसके स्थाई समाधान में वक्त लगेगा। यह सूखा एक साल की अल्पवर्षा की देन नहीं है।लगातार चार पांच सालों के खराब मौनसून से इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न हुई है अगर समय रहते पूर्ववर्ती सरकारें ने इस विषय को गंभीरता से लेकर ठोस कदम उठाए होते तो आज लातूर ही नहीं पूरे देश में स्थिति बेहतर होती।लातूर की बात करें तो भौगोलिक कारणों से यह इलाका अल्पवर्षा का क्षेत्र हैऔर न ही इसमें कोई नदी प्रवाहित होती है।लगातार दोहन के फलस्वरूप भू जल स्तर गिरता जा रहा है।शहर को पानी की आपूर्ति मन्जारा डैम से होती है जो कि अपनी जलापूर्ति के लिए अच्छे मौनसून पर निर्भर है किन्तु लगातार चार सालों के खराब मौनसून से लातूर का यह जलस्रोत भी सूख चुका है।
लातूर की यह स्थिति किसी भी सरकार से छिपी नहीं थी इसलिए 1972 में जब इस क्षेत्र ने सूखे का सामना किया था तब यहाँ पर गन्ने की खेती पर रोक लगा दी गई थी।यह सर्वविदित है कि गन्ने की खेती में पानी बहुत लगता है तो तत्कालीन सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि लोगों को पीने का पानी मिलता रहे गन्ने की खेती पर रोक लगाने का कदम उठाया था।जब 2014 से लातूर सूखे की मार झेल रहा है तो इस साल फिर से गन्ना क्यों बोया गया? क्या उससे उत्पादित गुड़ शक्कर और अलकोहोल की उपयोगिता हमारे किसानों के जीवन से अधिक है?इस सब का सबसे दुखद पहलू यह है कि इस बार की गन्ने की फसल भी पानी के अभाव में बरबादी की कगार पर है और अब शायद जानवरों के चारे के काम आए।
यह जानकारी भी आपको आश्चर्य में डाल देगी कि 2005 मे”महाराष्ट्र वाटर रिसोर्स रुगुलेटरी ओथोरिटी ”
का निर्माण हुआ था जो कि महाराष्ट्र में भूमिगत जल एवं नदियों के जल एवं तालाबों के जल के प्रबंधन एवं आपूर्ति के लिए बनाया गया था।अगर इस संस्था ने जल प्रबंधन की ओर थोड़ा भी ध्यान दिया होता तो खेती न सही महाराष्ट्र के गाँवों को कम से कम पीने का पानी तो उपलब्ध होता।इससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह तथ्य है कि 2005 में बनने के बावजूद इनके बोर्ड की पहली बैठक 2013 में हुई थी वो भी बाहरी दबाव में।क्या यह संस्था 2014 में गन्ने की खेती पर रोक नहीं लगा सकती थी पानी के प्रबन्धन की दिशा में ठोस कदम समय रहते नहीं उठा सकती थी?
इजरायल जैसे देश ने जल संकट को विज्ञान से हरा दिया एक समय था जब इजरायल के नल सूखे थे वहाँ लोग पानी की एक एक बूँद को तरसते थे लेकिन वहाँ की सरकार की जल प्रबंधन नीतियों ने समस्या की जड़ पर प्रहार करके आज अपने देश को सम्पूर्ण विश्व के लिए एक मिसाल के रूप में पेश किया है।भले ही आज हम इजरायल की तर्ज पर समुद्री जल का विलवणीकरण करने की स्थिति में नहीं हैं लेकिन घरेलू अपशिष्ट जल को पुनः चक्रित करके कृषि के उपयोग में लेने जैसी पानी प्रबंधन की नीतियाँ अवश्य बना सकते हैं।
किन्तु हमारी विकास नीति के केंद्र में पानी प्रबंधन न हो कर मुआवजा प्रबन्धन है इसीलिए पी सांई नाथ को किताब लिखनी पढ़ी “एवरीबडी लव्स अ गुड डौट”(सभी को सूखे से प्रेम है) उनके अनुसार सूखा राहत भारत का सबसे बड़ा विकास उद्योग है।
क्या इस देश में आज जो पानी की स्थिति है उसके लिए कहीं न कहीं हम सभी जिम्मेदार नहीं हैं!विकास के नाम पर जो अर्थव्यवस्था की रचना हुई उसमें हमने अपने परम्परागत जलस्रोतों जैसे तालाब बावड़ी कुंओं के विकास की न सिर्फ उपेक्षा की अपितु उन्हें खत्म कर कान्क्रीट के जंगल उगा दिए जो पानी वर्षा के दिनों में यहां इकट्ठा हो कर साल भर ठहर कर उस इलाके के भूजल स्तर को ऊपर उठाने का काम करता था उसे हमने नष्ट कर दिया।भारतीय किसान यूनियन के शिवनारायण परिहार कहते हैं कि बुन्देलखण्ड पाँच नदियों का क्षेत्र रहा है जिसे पंचनद के नाम से जाना जाता था इस क्षेत्र में कई छोटी नदियाँ और काफी संख्या में पोखर हुआ करते थे लेकिन अवैध बालू उत्खनन से छोटी नदियों का गला घोंटा गया और भू माफिया ने पोखरों को मारकर इमारतें खड़ी कर दी।पर्यावरणविदों का कहना है कि दिल्ली जैसे शहर में सैकड़ों तालाब थे जो वहाँ के भू जल स्तर को बनाए रखते थे लेकिन हमने विकास की अन्धी दौड़ में विनाश का रास्ता पकड़ लिया।भले ही हम जल संकट की सारी जिम्मेदारी कृषि क्षेत्र पर डालें लेकिन हकीकत यह है कि जल संकट गहराने में उद्योगों की अहम भूमिका है कई बार फैक्टरियाँ एक ही बार में उतना पानी खींच लेती हैं जितना पूरा गाँव एक महीने में भी नहीं खींचता।
हमारा समाज बहुत रचनात्मक समुदाय है एवं इसमें सामाजिक बदलाव लाने की अद्भुत क्षमता है हम सभी ने मिलकर बड़ी से बड़ी आपदाओं का सफलतापूर्वक सामना किया है।राजस्थान के गाँवों की सफलता की कहानी समाज की सफलता की कहानी है।आसमान से गिरने वाली बूंदों को सहेज कर धरती की गोद भरकर जिस प्रकार राजस्थान जैसे इलाके की नदियों को पुनर्जीवित किया गया वह यह बताता है कि पर्यावरण को सहेज कर, बेहतर बनाकर ही हम पर्यावरण का लुत्फ़ उठा पाएंगे।समाज में बदलाव भाषणों से नहीं जमीनी स्तर पर काम करने से आता है।।पानी से ही धरती का पेट भरता हैं जिस दिन हम उसका पेट भरने के उपाय खोज लेंगे हमारी नदियाँ हमारे खेत सब भर जाँएगे ।हम धरती को जितना देते हैं वह उसे कई गुना कर के लौटाती है इस बात को उस किसान से बेहतर कौन समझ सकता है जो कुछ बीज बोकर कई गुना फसल काटता है।जब हम धरती का ख्याल नहीं रखेंगे तो धरती हमारा ख्याल कैसे रखेगी?
@डॅा नीलम महेंद्र

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