लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-मनीष सिंह-

poetry

नाव भँवरों की बाहों में है फंस गयी ,

उस पार पर हमको जाना ही है।

घिर गए हैं तूफ़ान में गर तो क्या ,

पार पाने जा जज़्बा दिखाना ही है।

 

अँधियारा है घना बुझ रहे हैं दिये ,

हैं खड़ी मुश्किलें सामने मुँह किये।

रास्तों में जो काँटे पड़े हों तो क्या ,

हौंसलों से मंज़िल को पाना ही है।

 

जाएँगे हम कहाँ सूझता ही नहीं ,

चल रहे हैं मगर रास्ता ही नहीं।

जिंदगी लग रही एक पहेली सी है ,

डोर उलझी है उसको सुलझाना ही है ।

 

है घड़ी ये कठिन पर जगी आस है ,

दर्दों से पार पाने का विश्वास है।

ज़िन्दगी की हर एक जंग जीतेंगे हम ,

मुश्किलों को भी अब ये दिखाना ही है।।

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