लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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islamइस्लाम का दुष्प्रभाव

इस्लाम ने भारत में पदार्पण किया तो उसने भारत की प्राचीन ऐतिहासिक धरोहर और ऐतिहासिक संपदा को विनष्ट करने में किसी प्रकार की कमी नही छोड़ी। उसने भारत पर अपने आतंक और अत्याचारों की काली छाया डालकर ‘मां भारती’ के वैभव को पूर्णत: मिटाने का प्रयास किया। इस प्रकार भारत पर इस्लाम का कोई अच्छा प्रभाव न पडक़र दुष्प्रभाव ही पड़ा।

अरब वालों ने भारत से बहुत कुछ सीखा

भारत और अरब के लोग जब एक दूसरे के संपर्क में आये तो अरब वालों ने भारत से बहुत कुछ सीखा। इतना कुछ सीखा कि उस सीख को स्पष्ट करने के लिए यह आलेख ऊंट के मुंह में जीरा ही सिद्घ होगा। इसके उपरांत भी हम संक्षेप में कुछ चर्चा करना चाहेंगे, क्योंकि सामान्यत: ऐसा प्रचारित किया गया है कि भारत के हिंदू धर्म या वैदिक धर्मी हिंदुओं के पास ऐसा कुछ भी नही था, जिसे अरब के लोग अपने लिए अनुकरणीय मानते। इसलिए भारत ने अरब से बहुत कुछ सीखा है।

ईश्वर एक अनुपम ज्योति है

ईश्वर को वैदिक वांग्मय में परमज्योति कहा गया है। हृदय से उस ज्योतियों की ज्योति को जाना जाता है क्योंकि वह परमज्योति हृदय की ज्योति आत्मा में निवास करती है।

ऋग्वेद (3 / 26 / 8) में कहा गया है कि-‘उस परम ज्योति को हृदय से, ज्ञान से, अनुकूलता से तीन पवित्र कारकों (यज्ञ, तप, दान ) से (प्राप्त कर) आत्मा को पवित्र करता है।’ ऐसे और भी बहुत से स्थल हैं, जहां वेद ने ईश्वर को परम ज्योति स्वप्रकाशस्वरूप कहा है।

कुरान ने अल्लाताला को जमीनों और आसमानों का नूर कहा है। जिस प्रकार यज्ञ, तप और दान से पवित्र आत्माओं को जीवन-मरण से छुटकारा मिल जाता है, या जीवात्मा द्युलोक में निवास करने लगती है वैसे ही इस्लाम में भी नूर को तीन श्रेणियों का माना गया है जमाल, जलाल और अनवर।

ईश्वर के दर्शन

वह ईश्वर जो हमारे आत्मा को अपना शरीर बनाकर उसमें निवास करता और परमात्मा कहलाता है, उसे देखा कैसे जाय? उस परम ज्योति की अनुभूति कैसे हो? यह प्रश्न भी सामान्यतया हर व्यक्ति के हृदय में उठता रहता है। पर वह प्यारा प्रभु तो हमारे अंतर्मन में ही रहता है हृदय गुहा में रहता है।

ऋग्वेद (1-23-14) में कहा गया है:-

‘सब प्रकार से प्रकाशमय, पुष्टिकारक, मार्गदर्शक, भगवान अत्यंत गुप्त हृदय गुहा में रहने वाले, कमनीय आसन वाले राजा आत्मा को प्राप्त होता है।’

ईश्वर को चर्म-चक्षुओं से नही देखा जा सकता

ईश्वर को चर्म-चक्षुओं से नही देखा जा सकता वेदधर्म ने हृदय गुहा के निवासी उस परमात्मा को इन चर्म चक्षुओं से देखने का विषय नही माना है, अपितु उसे अन्तश्चक्षुओं से देखने, समझने का विषय माना है। इसी बात को इस्लाम में दीदार कहा गया है। वेद धर्म की मान्यता है कि संसार की विषय वासनाओं और भोग विलासों को त्यागो और उसकी प्राप्ति के लिए अंतर्मन की आंखों को खोलकर आगे बढ़ो, आनंद आएगा। यार का दीदार हो जाएगा।

मोक्ष की प्राप्ति

मोक्ष मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य है। उसे प्राप्त करना ही जीवन की साधना है, या ये कहिये कि जीवन की संपूर्ण साधना का उद्देश्य ही मोक्ष की प्राप्ति है।

मोक्ष विषयक अथर्ववेद के एक मंत्र (4 / 11 / 6) की व्याख्या करते हुए स्वामी वेदानंद तीर्थ कहते हैं :-‘‘मोक्ष का जहां भी वर्णन आता है, उसमें प्रकाश तथा आनंद की चर्चा अवश्य आती है…तीनों (आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक) दुखों से रहित, तीनों (पारमात्मिक, आत्मिक तथा धार्मिक) प्रकाशों से युक्त जिस अवस्था में आत्मा को इच्छापूर्वक विचरना होता है, कर्मफल जहां प्रकाशमय है उस अवस्था में मुझको मुक्त कीजिए। हे आनंददायक! ऐश्वर्याभिलाषी पर कृपा दृष्टि कीजिए।’’

मुक्तिदशा को या मुक्त को अमृत इसलिए कहते हैं कि वहां से वापसी मृत्यु के द्वारा नही होती, वरन जन्म के द्वारा होती है। वेद में मुक्ति के लिए ‘स्व:’ शब्द का प्रयोग भी बहुत बार आता है। जिसका अर्थ है प्रकाश, आनंद। उसका मूल अर्थ है-सू+अस्=उत्तम अवस्था। मोक्ष से बढक़र उत्तम अवस्था कोई नही हो सकती। इस अवस्था में जीव प्रकृति के संसर्ग से छूट चुका होता है, और परमात्मा का पूर्ण संसर्ग प्राप्त कर चुका होता है। प्रकृति का संसर्ग न होने से दुखों का अभाव और परमात्मा से संसर्ग में ज्ञान और आनंद चरम सीमा पर होते हैं।’’

इस्लाम में मोक्ष

इस्लाम में मोक्ष का समानार्थक शब्द ‘फना’ को माना गया है। सईद नफीसी का कहना है :-‘‘इस सिलसिले में सबसे पहला प्रमाण ईरानी तसव्वुफ के सैर-ओ-सुलूक के सिद्घांत में पाया जाता है, जो हमारे तसव्वुफ के तमाम फिरकों में मौजूद है। यह सिद्घांत वस्तुत: तरीका-ए-मानी में मिलता है और थोड़े बहुत अंतर के साथ बौद्घ मत में भी पाया जाता है। हमारे तसव्वुफ का अंतिम सोपान यह है कि सालिक (साधक) सुलूक (साधना) की मंजिलों से गुजर कर अपने खालिक (परमेश्वर=ब्रह्म ) से मिल जाए और फना फिल्लाह (ब्रह्मलीन) हो जाए। साधना की यह सर्वोच्च स्थिति है। तसव्वुफ के उन तमाम सिद्घांतों की पृष्ठभूमि में बौद्घ धर्म की निर्वाण से संबंधित शिक्षायें हैं। जिनकी चरम परिणति फना फिल्लाह है।’’

किसी मुस्लिम शायर ने कहा है :-

‘महसूस हो रहे हैं बादे फना के झोंके,
खुलने लगे हैं मुझ पर असरार जिंदगी के।’

ज्योति की कल्पना, ज्योति के दर्शन और अंत में उस ज्योतियों की ज्योति-परमज्योति ब्रह्म=खालिक में लीन हो जाना हिन्दुत्व और इस्लाम दोनों की विचारधाराओं का उद्देश्य जान पड़ता है। विश्व में शांति की कामना करने वाला हर व्यक्ति चाहे वह किसी भी दीन-धर्म को मानने वाला हो-यदि इसी रास्ते पर चलकर विश्वशांति का संवाहक बनना चाहता है, तो उससे बड़ा विश्व मानस का धनी और पंथनिरपेक्ष (आर्य) कोई नही हो सकता।

ऐसे पंथ को आप चाहे जो नाम दें, वह सर्वस्वीकृत और सर्वग्राही ही माना जाएगा-क्योंकि उस पंथ में सबको साथ लेकर चलने की एक ऐसी अनुपम दिव्यता छिपी है जो सबके साथ चलने के लिए प्रेरित कर सकती है।

संसार का श्रेय मार्ग आर्यत्व अथवा हिन्दुत्व

संसार का यही मार्ग है-जो श्रेष्ठ मार्ग कहलाता है, श्रेय मार्ग कहाता है। इसी मार्ग के लिए मानवता युग-युगों से तरस रही है और वह चाहती है कि मानव समाज इस मार्ग का पथिक बने।

चूक कहां होती है ….

इतना सुंदर संसार बनाने में बाधक होती हैं-साम्प्रदायिक मान्यतायें और साम्प्रदायिक लोगों की साम्प्रदायिक सोच। उस सोच से जन्मता है-दारूल-हरब और दारूल इस्लाम का सिद्घांत। उसी सोच से जन्मता है-जेहाद और उसी से जन्मी है साम्प्रदायिक संघर्ष की वह कहानी जो मुल्कों को विनष्ट कर मानवता की हत्यारी बन नरसंहारों से विश्व को पाट देती है।

यह मानव और मानवता के पतन की पराकाष्ठा है कि जो मानव उच्चतमावस्था के मानदण्ड लेकर चला था और ईश्वर की ज्योति, ज्योति के दर्शन और ज्योति में लीन हो जाने को जीवनादर्श बनाकर चला था वह धरती पर ज्योति या नूर का नही, अपितु अंधेरे का उपासक बन गया और उसके क्रूर कृत्यों से नगर के नगर नही, अपितु राष्ट्र के राष्ट्र ‘उलूक नगर’ बनकर रह गये।

‘अंधेरों’ के उपासकों को मोक्ष नही मिलता

अंधेरों के उपासकों को कभी मोक्ष नही मिल सकता। क्योंकि अंधेरों के उपासक दिव्यता के मार्ग के पथिक न होकर दुष्टता के मार्ग के पथिक होते हैं। विश्व का प्रत्येक संवेदनशील और मानवीय भावनाओं की समझ रखने वाला विवेकशील व्यक्ति संसार में दिव्यता का प्रसारक बनना चाहता है, इसलिए वह मजहबी होकर भी मजहबी मान्यताओं से ऊपर होकर चलता है। वह मजहबी मान्यताओं का विरोध नही कर सकता, केवल इसलिए कि लोग उसे ‘काफिर’ ना कहने लगें, अन्यथा कहीं पर भी मानवता के विरूद्घ आचरण होता देखकर उसकी आत्मा रोती है।

इस्लाम के वास्तविक स्वरूप के व्याख्याकार

इस्लाम के भीतर कुछ ऐसे स्वर हैं जो इस्लाम की प्रचलित व्यवस्था और व्याख्या से दुखी हैं। उनका मानना है कि इस्लाम की प्रचलित व्यवस्था और व्याख्या मूल इस्लाम के शांतिवादी स्वरूप के सर्वथा विपरीत है। इसलिए देश, काल, परिस्थितियों के अनुसार इस्लाम की इस व्यवस्था और व्याख्या में समय के अनुसार परिवर्तन करने की पहल होनी चाहिए।

ऐसे उदारवादी मुसलमानों की इस मांग के पवित्र उद्देश्य हैं, वह विश्व में मानवतावाद को लाना चाहते हैं, और मानवतावादी विश्व व्यवस्था के अंतर्गत विश्व को चलाना चाहते हैं। उनकी इस प्रकार की मांग को बल मिलना चाहिए। पर कई बार ऐसे लोगों को बाहर से समर्थन नही मिलता। दाराशिकोही परंपरा की उपेक्षा घातक रही है

हमने जितना अन्याय देश के हिंदू स्वतंत्रता सैनानियों की उपेक्षा करके उनके साथ किया है उतना ही हमने इस्लामिक पक्ष की दाराशिकोही परंपरा के नररत्नों की उपेक्षा करके भी किया है। एक हिंदूवादी यदि इस प्रकार की उपेक्षा वृत्ति का प्रदर्शन करे तो बात समझ आ सकती है, क्योंकि उस पर तो सहजता से साम्प्रदायिक होने का आरोप जड़ दिया जाएगा, परंतु देश के प्रगतिशील और अपने आपको धर्मनिरपेक्षता के मुख्य संरक्षक मानने वाले लोग या इतिहासकार भी ऐसा करें तो बात समझ नही आती। उन्हें तो देश में साम्प्रदायिक सदभाव की सबसे अधिक चिंता रहती है-इसलिए उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे देश में साम्प्रदायिक सदभाव को बढ़ावा देने वाले सच्चे देशभक्त लोगों को सम्मान देंगे और इस्लाम की ओर से इस दिशा में पहल करने वाली दाराशिकोही परंपरा को पंख लगायेंगे। पर उन्होंने भी ऐसा किया नही।

एक पक्षीय सहिष्णुता राष्ट्रधर्म नही बन सकती

आज का प्रचलित इतिहास हमें चाहे जो पढ़ाये या समझाये पर मध्यकालीन इतिहास में हमारे हिंदू वीरों के स्वातंत्र्य समर का अर्थ स्पष्ट है कि एक पक्षीय सहिष्णुता कभी भी राष्ट्रधर्म नही बन सकती। इस मिथ्या धारणा को हम पर थोपकर उसे हमारा राष्ट्र धर्म बनाने का षडय़ंत्र यद्यपि इस देश में किया गया है, और हम उस षडय़ंत्र के शिकार भी बने हैं, परंतु इसके उपरांत भी यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि एक पक्षीय सहिष्णुता को हमने अपना राष्ट्रधर्म ही माना। निरंतर प्रतिकार और हिंदू प्रतिरोध की भावना इस बात को स्वत: स्पष्ट कर देती है। हां, हिंदू प्रतिरोध का अनवरत क्रम यह भी स्पष्ट करता है कि जो व्यक्ति इस देश को अपनी पुण्यभूमि और पितृभूमि मानता है वह हमारा मित्र है और जो नही मानता वह स्वाभाविक रूप से हमारा शत्रु है। यदि कहीं हमने एक पक्षीय सहिष्णुता को अपना राष्ट्रधर्म बनाया भी तो उसके परिणाम घातक ही आये। राष्ट्रधर्म बनने बनाने के लिए आवश्यक है कि जिस गुण या संस्कार को आप राष्ट्र धर्म की श्रेणी में लाना चाहते हो उसके पीछे बहुमत के सर्वमत की स्वीकृति हो। उसे दोनों पक्ष मानें और उसके अनुसार हर पक्ष आचरण करें तो उसके परिणाम सुखदायी आएंगे।

कई बार ऊंची बातें खोखले आदर्श सिद्घ होती हैं

हम बातें ऊंची-ऊंची और व्यवहार में छोटी-छोटी बात पर तलवार निकाल लें, तो ऐसी बातें खोखले आदर्श होकर रह जाती हैं। जब से इस्लाम ने भारत में पग रखा था तभी से हिंदू समाज यही देखता आ रहा था कि यहां खोखले आदर्शों ने तलवारों से वास्तविक आदर्शों की हत्यायें की हैं। इसलिए विवशतावश कई राष्ट्रवादी और मानवतावादी मुस्लिम विद्वानों और लेखकों को भी इस्लाम के व्यावहारिक स्वरूप को देखकर ग्लानि हुई और उन्हें इस्लाम के घृणित स्वरूप की स्पष्ट शब्दों में निंदा करनी पड़ी।

मुशीरूल हक कहते हैं-…..

ऐसे लोग इस्लाम में कुछ संशोधन की बात करते हैं। पर इनकी स्थिति के विषय में मुशीरूल हक का कहना है कि :-‘‘इसमें कोई संदेह नही है कि मुसलमानों में एक सूक्ष्म वर्ग ऐसे विद्वानों का भी है जो धर्मनिरपेक्ष मुसलमान होते हुए भी यह विश्वास करते हैं कि शरीय: में संशोधन की केवल अनुमति ही नही है, अपितु वह आवश्यक भी है, जिससे उसे भारत की वर्तमान सामाजिक व्यवस्थाओं के अनुरूप बनाया जा सके। किंतु यह वर्ग अल्पसंख्यक है और इसको तिरस्कारपूर्वक सेक्यूलरिस्ट (धर्मनिरपेक्ष) मुसलमान कहा जाता है। इसमें अधिकांश मुस्लिम आधुनिक शिक्षा प्राप्त हैं, और उनका विश्वास यह है कि विश्वास के धर्म का धर्मनिरपेक्षता के साथ सह अस्तित्व संभव है। दूसरे वर्ग का मत जिसका नेतृत्व उलेमा करते हैं, यह है कि धर्म केवल विश्वास ही नही है, अपितु शरीय: भी है। विश्वास का सहअस्तित्व धर्मनिरपेक्षता के साथ भले ही संभव हो, किंतु शरीय: के साथ नही।’’

यही है इस्लामिक मूल तत्ववाद

बस यही वह बात थी जिसने सल्तनत काल में मुस्लिमों को भारतवासियों के साथ मिल जुलकर चलने से रोका और स्वयं को शासक से शोषक बनाकर अत्याचारी के रूप में प्रस्तुत किया। उन अत्याचारों का सामना हिंदू समाज ने प्रतिदिन किया, इसलिए हमारी मान्यता है कि यह संघर्ष खोखले आदर्शों और उच्चादर्शों के मध्य का संघर्ष था। यह सर्वमान्य सत्य है कि उच्च आदर्शों के लिए संघर्ष करना ऐसे व्यक्ति और राष्ट्र को उच्च आत्मिक बल से भरे रखता है।

एम.आर.ए. बेग साहब स्पष्ट स्वीकार करते हैं-

मुसलमान इस्लाम के अतिरिक्त दूसरे धर्म के अध्ययन की सोच भी नही सकते। इसलिए (हिंदू धर्मशास्त्रों के एकेश्वरवादी सिद्घांतों से अपरिचित होने के कारण) हिंदू धर्म का बहुदेवतावादी बाह्य पूजा स्वरूप देखकर हिंदुओं को काफिर समझने लगते हैं जिसके प्रति शरीय: में घृणा ही घृणा व्यक्त की गयी है। स्वाध्याय के अभाव और कट्टरवाद के कारण ही हिंदू धर्म के अध्ययन की अल्बेरूनी और दारा की परंपरा आगे नही चल पायी। उच्च हिंदू दर्शन के गांभीर्य और अगाधता के आगे तो सभी को नतमस्क होना चाहिए ….

इसलिए धार्मिक वैमनस्य रूपी खाई को पाटने के लिए विद्यार्थियों को दूसरी पुस्तकों के अध्ययन से विरत करने के स्थान पर उपनिषद-गीता जैसे ग्रंथों में एकेश्वरवाद से विरोध नही है और न ईसाई मत की मान्यताओं से। पश्चिमी देशों में धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन धार्मिक शिक्षा का अनिवार्य अंग है।’’

बेग साहब जिस सत्य को बड़े स्पष्ट शब्दों में रख रहे हैं उसी के कारण यहां कितने ही ‘नालंदा विश्वविद्यालय’ जैसे पुस्तकालय इसलिए जला दिये गये कि उनमें रखी हुए पुस्तकों से जलाने वालों का साम्प्रदायिक वैमनस्य था।

लंगड़ी लूली राष्ट्रीयता की संकल्पना की हमने

इस प्रकार जो लोग ज्ञान-विज्ञान को भी साम्प्रदायिक दृष्टि से देखते हैं या उसका साम्प्रदायिकीकरण करके देखते हैं या जिनका मजहब शुद्घ-ज्ञान विज्ञान से भी बैर रखना सिखाता है उनसे राष्ट्रीय एकता के प्रति निष्ठावान होने या मानवतावादी होने की प्रत्याशा नही की जा सकती। सल्तनत काल में या उसके आगे-पीछे हमारे हिन्दू वीर इस्लाम के इस सच को समझ गये थे, इसलिए वह उसके विरूद्घ उठ खड़े हुए। इतने दूरदर्शी पूर्वजों की दूरदृष्टि को भी हमने उपेक्षित कर दिया और लग गये एक लंगड़ी लूली राष्ट्रीयता की संकल्पना के आधार पर राष्ट्र निर्माण करने में।

इतिहासकार का दायित्व

हमें स्मरण रखना चाहिए कि जैसे एक साहित्यकार व्याकरण विरूद्घ शब्दों को अपने लेखन के माध्यम से (जैसे वधू के स्थान पर बहू, युक्ति के स्थान जुगती, यज्ञ के स्थान जग्ग, सप्ताह के स्थान पर हफ्ता इत्यादि लिखकर ) प्रचारित-प्रसारित कर भाषा का नाश करता है वैसे ही एक इतिहासकार लेखनी बेचकर या किसी व्यक्ति के प्रभाव में आकर, या किसी के प्रति पूर्वाग्रह ग्रस्त होकर, या तथ्यों को अतार्किक रूप से प्रस्तुत करके इतिहास का नाश करता है।

इतिहासकारों की पहली पीढ़ी

ऐसे इतिहासकारों की पहली पीढ़ी ‘सफेद या पीली धातु’ से बिक जाती है, उन्हें उसके आगे का कुछ नही दिखता। वह वही लिखते हैं जिसे उनसे लिखवाया जाता है, या जिसके लिए उन्हें मुंह मांगा पुरस्कार मिलने की आशा होती है। ये लोग इतिहासकार न होकर ‘नाशकार’ होते हैं, इतिहासकार तो इन्हें घोषित किया जाता है, ये स्वभावत: पेशेवर लोग होते हैं और चाटुकारिता इनका धर्म होता है।

स्वाभिमान इनसे दूर होता है और उसे बेच-बेचकर ये सुखानुभूति करते हैं। ये लोग इतिहास की धमनियों में विष चढ़ा जाते हैं और उस विष चढ़ाने का इन्हें पारितोषिक या पुरस्कार मिलता है। एक सच्चे इतिहासकार को या इतिहास के जिज्ञासु विद्यार्थी को ऐसे इतिहासकारों के लेखन को बड़ी सावधानी से छान-छानकर पीना पड़ता है।

उसका शोधन और संशोधन कर-करके एक-एक शब्द को नापना-तोलना पड़ता है। क्योंकि ये लोग काल को अपनी लेखनी का चेरा बनाकर चले जाते हैं और काल के विषय में यह सत्य है कि वह किसी का चेरा नही होता है। इसलिए देखना पड़ता है कि जो लिखा गया है वह कितना तार्किक, कितना तात्विक और कितना मार्मिक हो सकता है?

इतिहासकारों की दूसरी पीढ़ी

इतिहासकारों की दूसरी पीढ़ी सामान्यत: इस पहली पीढ़ी की अनुव्रती होती है। वह किसी सुल्तान, बादशाह या राष्ट्रपिता के समकालीन चाटुकार इतिहासकार की लेखनी को अपना आधार बना बनाकर लिखती है, सत्ता सोपानों पर बैठे चेहरों की मुस्कान को प्राप्त कर अपना काम चलाती है। यहंा तक आते-आते सत्य कुछ और धुंधला पडऩे लगता है। इतिहासकारों की दूसरी पीढ़ी के दौरान अपनी बात की पुष्टि पिछली पीढ़ी के उस चाटुकार इतिहासकार के असत्य वर्णन से की जाने लगती है, जो स्वयं प्रमाणिक नही था।

इतिहासकारों की तीसरी पीढ़ी

इसके पश्चात आती है इतिहासकारों की तीसरी पीढ़ी। यह किसी पीढ़ी परंपरानुसार लिखने में विश्वास करती है जो पहले और दूसरे ने लिख दिया, उसी के अनुसार लिखा और अपनी आजीविका चलाते हुए विद्वत्ता प्रदर्शित की।

एक चौथी श्रेणी भी होती है इतिहासकारों की

इसके अतिरिक्त एक चौथी पीढ़ी (श्रेणी) का इतिहासकार भी होता है जो दूर बैठा देखता रहता है कि इतिहास की गंगा में कब, कहां, कैसे और किसके द्वारा कितना प्रदूषण किया गया है? इतने सारे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए जब कोई व्यक्ति खड़ा होता है तो उसे कितना उद्यम, कितना पुरूषार्थ करना होता है, यह वही जानता है। इस चौथी पीढ़ी के इतिहासकार को पुरस्कार के स्थान पर सत्ता प्रतिष्ठानों का बहिष्कार या तिरस्कार भी झेलना पड़ता है। पर वह ‘भगीरथ’ सब कुछ झेलता है, और हंसते-मुस्कराते हुए अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है। वह राष्ट्रसेवक होता है, भ्रष्ट सेवक नही।

इतिहास मंथन से करें अमृत प्राप्त

हमारे प्रचलित इतिहास की विडंबना ही यह है कि इसे सत्य और तथ्य कहने से रोका गया है, इसलिए इतिहास मंथन से अमृत प्राप्त करने का पुरूषार्थ कभी हमने किया नही। हमने अतीत के काले पृष्ठों को छिपाया, उन्हें खुले में पढऩे से बचे। इसलिए ‘काले पृष्ठों’ का इतिहास अपने आपको दोहराता रहा, और हम अपने अतीत के वैभव वीरता और विजय के इतिहास की अनदेखी कर देश के टुकड़े कराते चले गये।

अपने इतिहास पर हंसो नही, उसे खोजो और सहेजो

इतिहास के सच से मुंह छिपाते लोग यह नही समझ पाये कि इस हिंदू जाति के पूर्वजों ने कभी इस देश की एक-एक इंच भूमि की स्वतंत्रता के लिए कितना मर्मस्पर्शी संघर्ष किया था। आज जो लोग इस बात पर भी हंसते हैं कि हमने कभी एक-एक भूमि के लिए संघर्ष भी किया था? उन्हें प्रचलित इतिहास यह सच समझाने में असफल रहा है, इसलिए उन्हें ऐसा कहना हास्यास्पद और काल्पनिक लगता है। जो देश अपने इतिहास पर हंसने लगता है वह इतिहास नही बना पाता है, अपितु इतिहास बनकर रह जाता है।

पर भारत की आत्मा निरंतर चेतनशील रहने वाली है। इसलिए इसकी आत्मा की चेतनशीलता से हमें आज भी अपेक्षा करनी चाहिए कि वह हमें निश्चय ही मार्ग दिखाएगी।

मध्यकालीन भारत में हमारे पूर्वजों ने जिस भावना, कामना, राष्ट्रीय प्रार्थना और याचना के वशीभूत होकर दीर्घकालीन अपना स्वतंत्रता संग्राम जारी रखा, उसको सही ढंग से निरूपित करने का समय आ गया है। इससे पूर्व कि इतिहास हमें समझने का प्रयास करे हम इतिहास को समझ लें।

राष्ट्रवादी मुस्लिम विद्वानों का सहयोग भी अपेक्षित है

इतिहास को समझने में राष्ट्रवादी मुस्लिम विद्वानों का सहयोग भी अपेक्षित है। क्योंकि हमने जिस ईश्वरीय ज्योति, ज्योति के दर्शन और अंत में मुक्ति की बात इस लेख के प्रारंभ में की है उसे हम शास्त्रार्थ परंपरा के माध्यम से सत्यार्थ, यथार्थ और तथ्यार्थ के उपासक बनकर व मानवतावाद को बलवती कर प्राप्त कर सकेंगे।

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