लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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प्रवीण दुबे

maalda

अब तो शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब देश में किसी न किसी स्थान से मुस्लिमों द्वारा हिंसाचार किए जाने का समाचार सुर्खियों में न रहता हो। यह स्थिति मुहर्रम जुलूसों के रूप में निकलने वाले ताजियों से लेकर आज तक लगातार जारी है।  ऐसा प्रतीत होता है जैसे मुस्लिम समाज द्वारा किसी न किसी विषय को लेकर एक सुनियोजित शक्ति-प्रदर्शन की रणनीति का उपयोग किया जा रहा है जो एकत्रीकरण, प्रदर्शन से प्रारंभ होती है और फिर हिंसा, तोडफ़ोड़ में बदल जाती है। हो सकता है इस देश के कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों, छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों को हमारी बात पसंद नहीं आए, लेकिन पिछले कुछ माह से देश में जो कुछ घटित हो रहा है वह हमारी बात का तथ्यात्मक प्रमाण है। यहां जिस हिंसा के तांडव की हम बात कर रहे हैं उसके पीछे हमारा उद्देश्य किसी वर्ग, सम्प्रदाय या जाति पर लांछन लगाना कतई नहीं है, हमारी चिंता तो इस बात को लेकर है कि आखिर इस देश के मुस्लिम चाहते क्या हैं? क्या भारत से उन्हें प्यार नहीं है? क्या इस देश का बहुसंख्यक हिन्दू समाज उनका अपना नहीं है? जब इस देश का हवा, पानी, अन्न, भूमि व सारे संसाधनों का मुस्लिम समाज समान रूप से बिना किसी भेदभाव के इस्तेमाल करता है तो फिर इस माटी के प्रति इतनी अश्रद्धा क्यों पैदा हो रही है? किसी एक व्यक्ति ने मोहम्मद साहब को लेकर कोई गलत टिप्पणी कर दी तो उसको लेकर पूरे देश में हिंसा का तांडव फैलाना आखिर क्या संदेश देता है? वह भी तब जब कि गलत टिप्पणी करने वाले अविनाश तिवारी को उत्तरप्रदेश सरकार ने तुरंत ही रासुका जैसी गम्भीर धारा के अन्तर्गत जेल में डाल रखा है। चलो पेगम्बर मोहम्मद साहब पर टिप्पणी को लेकर गुस्सा जायज भी मान लिया जाए तो फिर ईद जैसा पवित्र त्योहार हो या फिर जुमे की नमाज हो अथवा मोहर्रम के दौरान निकाले जाने वाले ताजिए जुलूस हों, इन सबके दौरान मुस्लिमों द्वारा खूनी हिंसा लगातार प्रदर्शित होती रहती है। कश्मीर घाटी में तो आए दिन प्रदर्शन, पत्थरबाजी का खेल जारी रहता है। वहां राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करना तो जैसे आम बात हो गई है। कल की ही बात करें तो मध्यप्रदेश के धार स्थित मनावर में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा शान्तिपूर्ण ढंग से निकाली जा रही शौर्ययात्रा पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अचानक पथराव शुरु कर दिया जिससे हालात बिगड़ गए। अकेले मनावर ही नहीं इससे पूर्व भी इसी धार नगरी में बसंत पंचमी पर हिन्दुओं के ही एक धार्मिक स्थल को मस्जिद बताकर वहां मुस्लिम हिंसा होती रही है। रामनवमी  का जुलूस हो, गणेश विसर्जन जुलूस सहित दुर्गापूजा आदि के अवसरों पर भी देश के तमाम शहरों से हिन्दुओं के धार्मिक जुलूसों पर मुस्लिमों द्वारा पथराव व जुलूस को एक रास्ते विशेष से न निकलने देने की जिदद के चलते हिंसाचार होता रहा है। आखिर इस हिंसक मानसिकता के पीछे देश के शांतिपूर्ण माहौल में जहर घोलने का कोई षड्यंत्र तो काम नहीं कर रहा है। बिहार चुनाव से पहले पूरे देश ने यह देखा है कि किस प्रकार देश का माहौल असहिष्णु बताकर कुछ कथित वामपंथी विचार-धारा से प्रेरित कलाकारों, साहित्यकारों आदि ने अपने सम्मान लौटाने की मुहिम चलाई थी। जैसे ही बिहार चुनाव समाप्त हुआ यह मुहिम समाप्त हो गई। साफ है इसके पीछे केन्द्र में सत्तासीन राष्ट्रीय विचारों की मोदी सरकार और उसके कामकाज को बदनाम करने का षड्यंत्र था ताकि बिहार जैसे बड़े व प्रतिष्ठित चुनाव में राष्ट्रवादी विचार धारा परास्त हो जाए। बड़े दुख की बात है कि तथाकथित लोगों का यह षड्ंयत्र सफल भी रहा। आज पाकिस्तान हमारे ऊपर हमले कर रहा है। पाक में छुपे बैठे आतंकी खुलेआम भारत को धमकी दे रहे हैं। ऐसे हालात में देश के भीतर एक वर्ग विशेष द्वारा हिंसा, पथराव व वातावरण को बिगाडऩा बहुत सारे सवाल खड़े करता है। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि बिहार चुनाव के समय छाती पीट-पीट कर असहिष्णुता का विधवा विलाप करने वाले आज गांधी जी के बंदर क्यों बन गए हैं? क्यों उन्हें मालदा, पूर्णिया, धार, कानपुर, लखनऊ, हैदराबाद सहित देश के अनेक हिस्सों में लगातार जारी मुस्लिम हिंसा दिखाई नहीं दे रही, क्यों उनके मुंह पर ताला लग गया है? वैसे इस देश में तथाकथित धर्मनिरपेक्षता वादियों और बुद्धिजीवियों की कभी कमी नहीं रही है, दुख तो इस बात का है कि अब इस कतार में देश का एक बड़ा मीडिया वर्ग भी शामिल हो गया है। यह वही लोग हैं जिन्हें इस देश में गोधरा दिखाई नहीं देता लेकिन गुजरात के दंगों पर गला-फाड़ फाड़कर चिल्लाते हैं, इन्हें बाबर, गजनी, गौरी और औरंगजेब से लेकर मुलायम, ओवैसी, आजम जैसे नेताओं के  हिन्दू विरोधी कारनामें दिखाई नहीं देते लेकिन बाबरी विध्वंस पर यह लगातार विधवा विलाफ करते है। इन्हें कश्मीर समस्या और धारा 370 का पाकिस्तान में जाकर समर्थन करना तो अच्छा लगता है लेकिन इन लोगों को कश्मीर से मार पीटकर भगाए गए और देशभर में शरणार्थी बनकर जीवन यापन करने को मजबूर लाखों कश्मीरी पंडितों की पीड़ा दिखाई नहीं देती। ऐसी न जाने कितनी बातें हैं जिन्हें इस देश में नजर अंदाज करके, राष्ट्रवादी शक्तियों पर शाब्दिक, वैचारिक और हिंसक आक्रमण करने का षड्यंत्र लगातार चल रहा है। केन्द्र सरकार और हमारे खुफिया तंत्र को इस षड्यंत्र का सच पता लगाने की कोशिश करना चाहिए। यदि समय रहते इसका पर्दाफाश नहीं हुआ तो विपत्ति के समय देश में प्रदूषित मानसिकता के ये लोग भारत के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकते हैं।

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1 Comment on "आखिर क्या है मुस्लिम हिंसा का सच?"

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Himwant
Guest

सच तो यह है की पहले अंग्रेजो ने फुट डाल कर राज किया और फिर नेहरू और जिन्ना ने इस विरासत को सम्भाला। वास्तविकता यह है की किन्ही कारणों से इस्लाम में हिंसा को मजहब के लिए जायज ठहराने की परम्परा रही है, ईसका उपयोग आज भी उनके धर्म गुरु निहित स्वार्थवाश करते है। भारतीय मुस्लिम समाज में भी हिंसा बढ़ाने की कोशीस हो रही है। लेकिन इस प्रकार के हिंसक व्यवहार से न तो देश का भला होगा और न मुस्लिम समाज का भला होगा।

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