लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-
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असम दंगों का ठींकरा नरेंद्र मोदी पर फोड़ना हकीकत से मुंह मोड़ना है। इन दंगों की असली वजह बांग्लादेश से मुस्लिमों की अवैध घुुसपैठ है। यदि इस घुसपैठ को रोकने के लिए असम की चुनावी सभा में मोदी कहते हैं कि बांग्लादेशी नागरिकों को पहचान करके वापसी भेजना देशहित में जरूरी है तो इसमें गलत क्या है? केंद्र सरकार को यही निर्देश सवोच्च न्यायालय भी दे चुकी है। लेकिन मनमोहन सिंह सरकार इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी। लिहाजा घुुसपैठ से बिगड़े जन-संख्यात्मक घनत्व व उपजी दीगर समस्याओं के चलते पिछले ढाई दशक से हिंसा-प्रतिहिंसा का दौर जारी है। इस सच्चाई से आंखें चुराते हुए, कपिल सिब्बल कह रहे हैं कि ‘हिंदुस्तान में आज जो सांप्रदायिक वातावरण पैदा हुआ है, उसका श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है। इसी से मिलता-जुलता अनर्गल बयान जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने देकर केंद्र और असम की राज्य सरकार की कमजोरियों पर पर्दा डालने की कोशिश की है। यहां यह भी गौरतलब है कि इस ताजा घटनाक्रम के लिए मोदी दोषी हैं तो 2012 में बड़े पैमाने पर फैली हिंसा के लिए कौन दोषी था? इस हिंसा से सबक लेते हुए क्या सावधांनियां बरती गई? क्या इसका जवाब केंद्र व असम सरकार और उनके तथाकथित रहनुमाओं के पास है?

असम में बोडो और घुसपैठी मुस्लिम एक चुंबक के दो विपरीत ध्रुव हैं। जाहिर है, इन दंगों को सशस्त्र सेना-बल से तत्काल तो थाम ही लिया जाएगा, लेकिन कोई गारंटी नहीं की हिंसा की ज्वाला फिर कभी नहीं भड़केगी? क्योंकि समस्या का स्थायी हल खोजने की कोई पहल सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद नहीं की गई। दरअसल, केंद्र ने पूर्वोत्तर के इन राज्यों को गंभीरता से लिया ही नहीं। यहां के कठिन हालातों को समझने की कोशिश प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी नहीं की, जबकि वे इसी राज्य से पिछले 22 साल से राज्यसभा के सदस्य हैं और इसी बूते देश के प्रधानमंत्री पद पर पदारूढ़ हैं।

दरअसल, बांग्लादेशी घुसपैठियों की तदाद बक्सा, चिरांग, धुबरी और कोकराझार जिलों में सबसे ज्यादा है। और इन्हीं जिलों में बोडो आदिवासी हजारों साल से रहते चले आ रहे हैं। लिहाजा बोडो और मुस्लिमों के बीच रह-रहकर हिंसक वारदातें होती रही हैं। पिछले 12 साल में ही 12 हिंसा की बड़ी घटनाएं घटी हैं, जिनमें साढ़े पांच सौ से भी ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। घटनाएं घटने के बावजूद इस हिंसा का प्रशंसनीय पहलू यह है कि हिंसा के मूल में हिंदू, ईसाई बोडो आदिवासी और आजादी के पहले से रह रहे पुश्तैनी मुसलमान नहीं है। विवाद की जड़ में स्थानीय आदिवासी और घुसपैठी मुसलमान हैं। दरअसल, बोडोलैंड स्वायत्तता परिशद क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गैर बोडो समुदायों ने बीते कुछ समय से बोडो समुदाय की अलग राज्य बनाने की दशकों पुरानी मांग का मुखर विरोध शुरू कर दिया है। इस विरोध में गैर-बोडो सुरक्षा मंच और अखिल बोडोलैंड मुस्लिम छात्र संघ की प्रमुख भूमिका रही है। जाहिर है, यह पहल हिंदू, ईसाई और बोडो आदिवासियों को रास नहीं आ रही है। इन पुश्तैनी बासिंदों की नाराजी का कारण यह भी है कि सीमा पार से घुसपैठी मुसलमान उनके जीपनयापन के संसाधनों को लगातार हथिया रहे हैं। यह सिलसिला 1950 के दशक से जारी है। अब तो आबादी के घनत्व का स्वरूप इस हद तक बदल गया है कि इस क्षेत्र की कुल आबादी में मुस्लिम बहुसंख्यक हो गए हैं।

इन घुसपैठियों को भारतीय नागरिकता देने के काम में असम राज्य कांग्रेस की राष्ट्र विरोधी भूमिका रही है। घुसपैठियों को अपना वोट बैंक बनाने के लिए कांग्रेसियों ने इन्हें बड़ी संख्या में मतदाता पहचान पत्र एवं राशन कार्ड तक हासिल कराए हैं। नागरिकता दिलाने की इसी पहल के चलते घुसपैठिये कांग्रेस को झोली भर-भर के वोट दे रहे हैं। कांग्रेस के तरूण गोगाई इसी बूते लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री हैं। लेकिन बदले हालात कालांतर में कांग्रेस को भी परेशानी का सबब बनने जा रहे हैं। जिन्हें कांग्रेस तात्कालिक लाभ के लिए नजरअंदाज किए हुए है। घुसपैठियों के बूते कांग्रेस को बड़ी चुनौती कोलकत्ता के इत्र व्यवसायी बदररूद्दीन अजमल ने पेश कर दी है। 2009 में वह धुबरी से सांसद चुने गए है। 2006 के विधानसभा चुनाव में उनकी ऑल इंठिया यूनाईटेड डेमोक्रेटिक पार्टी के 10 विधायक चुने गए थे। 2011 में उनके विधायकों की संख्या बढ़कर 18 हो गई है। इस नाते यूडीपी विधानसभा में सबसे बड़ा विपक्षी दल बन गया है। 2012 में कोकराझार में जो दंगे हुए थे,उस परिप्रेक्ष्य में अजमल ने कांग्रेस की तरूण गोगोई सरकार भंग करने तक की मांग कर डाली थी। जाहिर है, कांग्रेस घुसपैठियों को सरंक्षण देकर अपने ही पैरों पर कुलहाड़ी मारने का काम कर रही है।

बांग्लादेश से हो रही अवैध घुसपैठ के दुष्प्रभाव पहले अलगाववाद के रूप में देखने में आ रहे थे और अब राजनीति में प्रभावी हस्तक्षेप के रूप में देखने में आ रहे है। इन दुष्प्रभावों को केंद्रीय व प्रांतीय नेतृत्व जानबूझकर वोट बैंक बनाए रखने की दृश्टि से अनदेखा कर रहा है। लिहाजा धुबरी जिले से सटी बांग्लादेशी की जो 134 किलोमीटर लंबी सीमा-रेखा है उस पर कोई चौकसी नहीं है। नतीजतन घुसपैठ आसानी से जारी है। असम को बांग्लादेश से अलग ब्रह्मपुत्र नदी करती है। इस नदी का पाट इतना चौड़ा और दलदली है कि इस पर बाड़ लगाना या दीवार बनाना नामुमकिन है, लेकिन नावों पर सशस्त्र पहरेदारी के जरिए घुसपैठ को रोका ही जा सकता है, क्योंकि कोकराझार के बांग्लादेष की जमीनी सीमा नहीं जुड़ी है। अलबत्ता ब्रह्मपुत्र की जलीय सतह ही दोनों देशों को अलग करती है।

बांग्लादेश के साथ भारत की कुल 4,097 किलोमीटर लंबी सीमा-पट्टी है, जिस पर जरूरत के मुताबिक सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। इस कारण गरीबी और भूखमरी के मारे बांग्लादेशी असम में घुसे चले आते हैं, क्योंकि यहां इन्हें कांग्रेसी और यूडीपी अपने-अपने वोट बैंक बनाने के लालच में भारतीय नागरिकता का सुगम आधार उपलब्ध करा देती है। मतदाता पहचान पत्र जहां इन्हें भारतीय नागरिकता का सम्मान हासिल करा देता है, वहीं राशन कार्ड की उपलब्धता इन्हें बीपीएल के दायरे में होने के कारण रूपैया किलो में रोटी के संसाधन उपलब्ध करा देती है। बहुउद्देशीय पहचान वाले आधार कार्ड भी घुसपैठियों ने बड़ी मात्रा में हासिल कर लिए हैं। भारत में नागरिकता और आजीविका हासिल कर लेने के इन लाभदायी उपायों के चलते ही, देष में घुसपैठियों की तादाद तीन करोड़ से भी ज्यादा हो गई है।

दरअसल, बांग्लादेशी घुसपैठिये शरणार्थी बने रहते, तब तक तो ठीक था, लेकिन भारतीय गुप्तचर संस्थाओं को जो जानकारियां मिल रही हैं, उनके मुताबिक, पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था इन्हें प्रोत्साहित कर भारत के विरूद्ध उकसा रही है। सऊदी अरब से धन की आमद इन्हें धार्मिक कट्टरपंथ का पाठ पढ़ाकर आत्मघाती जिहादियों की नस्ल बनाने में लगी है। बांग्लादेश इन्हें हथियारों का जखीरा उपलब्ध करा रहा है। जाहिर है, ये जिहादी उपाय भारत के लिए किसी भी दृश्टि से शुभ नहीं हैं। लिहाजा घुसपैठियों को वापस भेजने की जरूरत जताकर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने कोई अपराध नहीं किया है। कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी का अपने भाषणों में बार-बार यह कहना कि ‘भाजपा धर्म के नाम पर बांट रही है, जबकि कांग्रेस सबको साथ लेकर चल रही है‘। सबको साथ लेकर चलने में घुसपैठियों का साथ भारत के भविष्य के लिए शुभ लक्षण नहीं है। लिहाजा घुसपैठ पर अंकुश लगाने और घुसपैठियों को खदेड़ने के उपाय तलाशने ही होंगे?

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1 Comment on "असम दंगों को मोदी से जोड़ना गलत"

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mahendra gupta
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अपने को तो आरोप लगाने हैं चाहे वे झूठे क्यों न हो. यदि ऐसा कुछ होता तो कांग्रेस बवाल मचा देती, पर केवल सिब्बल ने यह कहा पर गृह मंत्रालय द्वारा कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई स्पष्ट है चुनाव में लाभ उठाने के लिए ऐसा सब किया गया लेकिन उनका यह खोटा सिक्का नहीं चल पाया व पार्टी चुप हो कर रह गयी

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