आचार्य चाणक्य और कूटनीति

——   राकेश कुमार आर्य
आचार्य चाणक्य ने राजा के संबंध में कहा है कि राजा शक्तिशाली होना चाहिए, तभी राष्ट्र उन्नति करता है। राजा की शक्ति के तीन प्रमुख स्रोत हैं – मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक। चाणक्य हमारे देश के बहुत बड़े  राजनीतिक मनीषियों में से एक हैं । जिनके राजनीतिक चिंतन और कूटनीतिक दर्शन का सारा विश्व आज भी लोहा मानता है । अपनी मृत्यु के हजारों वर्ष पश्चात भी यदि भारतवर्ष का कोई कूटनीतिज्ञ इतना अधिक चर्चित है तो वह केवल चाणक्य ही हैं । सचमुच चाणक्य नीति कालजयी है , जो आज भी हमारा  अंतरराष्ट्रीय संबंधों  के क्षेत्र में भी मार्गदर्शन कर रही है। आचार्य चाणक्य का कहना है कि राजा के लिए उसकी मानसिक शक्ति उसे सही निर्णय के लिए प्रेरित करती है, शारीरिक शक्ति युद्ध में वरीयता प्रदान करती है और आध्यात्मिक शक्ति उसे ऊर्जा देती है ।इस प्रकार मानसिक ,शारीरिक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार की शक्तियों का उचित समन्वय ही किसी राजा को शासन करते हुए उच्चता प्रदान करती हैं । प्राचीन काल में हमारे राजाओं का अपनी इन्हीं तीनों शक्तियों को साधने का भरपूर प्रयास रहा करता था । जिससे वह चक्रवर्ती सम्राट बनते थे और बहुत ही समन्वयात्मक बुद्धि रखते हुए  प्रजाहित में  उचित से उचित निर्णय लेने में सक्षम हो पाते थे । इनकी साधना राजा को प्रजाहित में काम करने की प्रेरणा देती है। आचार्य चाणक्य का कहना है कि कमजोर और विलासी प्रवृति के राजा शक्तिशाली राजा से डरते हैं। शक्तिशाली शत्रु राजा को निर्बल करने के लिए विषकन्याओं का उपयोग भी किया जा सकता है। जो उन्हें विलासिता में डुबाकर निर्बल कर दें। इस प्रकार की नीतियों को आज भी देश अपनाते हैं और अपने शत्रु को निर्बल करने के लिए चाणक्य को अपना आदर्श मानते हैं।आचार्य चाणक्य ने कहा है कि मित्रता उन राज्यों से बढ़ाई जानी चाहिये जो विश्वास योग्य हों। यदि अपने से अधिक शक्तिशाली राज्य से मित्रता की जाती है तो इसे स्थायी मानकर नहीं चलना चाहिए। स्थायित्व देश की सैन्य और आर्थिक शक्ति के विकास में सिद्ध हो सकती है। पाकिस्तान ने अमेरिका और चीन से मित्रता करके देख ली है । उसका परिणाम अब हम सबके सामने हैं । उसने अपनी विदेश नीति के संदर्भ में गलती ही यह की थी कि अमेरिका को अपना  सच्चा  मित्र मान लिया था । इसी प्रकार उसने चीन को भी अपना परमहितैषी माना । माना जा सकता है कि कुछ बिंदुओं पर चीन आज भी  पाकिस्तान को सहायता करता है , परंतु यह केवल चीन के अपने राजनीतिक हित हैं । जिन्हें साधने के लिए वह पाकिस्तान को केवल मोहरा बनाता है । मित्रता नाम की कोई भावना चीन के भीतर  किसी भी देश के लिए नहीं है , क्योंकि वह साम्राज्यवादी  सोच का देश है। दुहरी नीति उन परिस्थितियों में अपनायी जानी चाहिए जब एक शत्रु से युद्ध का मन हो और दूसरे को न छेडऩे या मित्र बनाने की सोच हो। मित्र राष्ट्र ऐसी स्थिति में सहयोगी हो सकते हैं। जैसा कि भारत ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बारे में अभी कुछ दिनों पहले करके भी दिखाया है । जब पाकिस्तान से दो-दो हाथ करने का मन भारत ने बनाया तो उससे पहले भारत की कूटनीतिक सफलता इस बात में देखी गई कि उसने अफगानिस्तान को पहले अपना मित्र बनाया। आज अफगानिस्तान हमारे साथ है तो यह हमारी दोहरी नीति का ही परिणाम है। चाणक्य के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में निरपेक्षता का भी महत्त्व है। जब शान्ति के लिये संधि या युद्ध करने का अवसर न हो तो निरपेक्ष रहना ही श्रेयस्कर होता है। मंडल में मध्यमा और उदासीन राजा निरपेक्ष रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं।युद्ध करने की स्थिति पैदा होने पर समय, स्थान और सैन्य शक्ति, आन्तरिक सुरक्षा आदि पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। युद्ध की तैयारी में मित्र देशों को साथ लेना, शत्रु पर पीछे से हमला करवाना, सामने से स्वयं अपनी सेना के बल पर लोहा लेना, अभेद्य चक्रव्यूह की रचना, बहाने से हमला करने की योजना की आवश्यकता पड़ सकती है । जिसके लिये पूरी तैयारी होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के क्षेत्र में इस प्रकार की चाल हम बड़े बड़े देशों को नित्य प्रति चलते हुए देखते हैं ।जिनको देखने से पता चलता है कि आचार्य चाणक्य समस्त भूमंडल के देशों का किसी न पर किसी प्रकार से मार्गदर्शन कर रहे हैं ।आचार्य चाणक्य ने कूटनीति के चार प्रमुख अस्त्र माने हैं । जिनका प्रयोग राजा को समय और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर करना चाहिए- साम, दाम, दण्ड और भेद। आचार्य चाणक्य के यह चारों  सोपान हर क्षेत्र में  हमारा मार्गदर्शन करते हैं । इन चारों  सोपानों को न केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के क्षेत्र में अपितु हम अपने व्यक्तिगत संबंधों में भी कहीं ना कहीं लागू करते हुए  देखे जा सकते हैं ।जब मित्रता दिखाने (साम) की आवश्यकता हो तो आकर्षक उपहार आतिथ्य, समरसता और सम्बन्ध बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए , जिससे दूसरे पक्ष में विश्वास उत्पन्न हो। शक्ति का प्रयोग, शत्रु के घर में आग लगाने की योजना, उसकी सेना और अधिकारियों में फूट डालना, उसके निकटस्थ संबंधियों और उच्च पदों पर स्थित कुछ लोगों को प्रलोभन देकर अपनी ओर खींचना कूटनीति के अंग हैं। इस प्रकार की नीति के अपनाने से शत्रु पक्ष में फूट पड़ जाती है और उस फूट का लाभ हम अपने राष्ट्रीय हितों को साधने में भरपूर मात्रा में कर सकते हैं । इस प्रकार की नीति को अपना कर ही श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्री काल में बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग करवा दिया था । इससे हमारा परंपरागत शत्रु देश पाकिस्तान दुर्बल पड़ा ।विजिगीषु अर्थात विजय की आकांक्षा रखने वाला राजा एकक्षत्र राज्य कर सके, इसके लिये विदेश नीति ऐसी होनी चाहिए जिससे राष्ट्र का हित सबसे ऊपर हो । देश शक्तिशाली हो, उसकी सीमाएं और साधन बढ़ें, शत्रु निर्बल हों और प्रजा की भलाई (योगक्षेम) हो। ऐसी नीति के 6 प्रमुख अंग है-संधि, समन्वय(मित्रता) द्वैधीभाव (दुहरी नीति) आसन (ठहराव), यान (युद्ध की तैयारी) एवं विग्रह (कूटनीतिक युद्ध)। युद्ध भूमि में लड़ाई अन्तिम स्थिति है । जिसका निर्णय अपनी और शत्रु की शक्ति को तौलकर ही करनी चाहिए। वर्तमान विषम परिस्थितियों में भारत ने अपने चाणक्य की इसी नीति का पालन करते हुए विश्व मंचों पर सम्मान प्राप्त किया है । अब अच्छे-अच्छे शत्रु हमारा मित्र बनने में ही अपना कल्याण समझते हैं । परिस्थितियों में आमूलचूल परिवर्तन आया है ,और लोग समझने लगे हैं कि हम बिना युद्ध के भी युद्ध जीत सकने की स्थिति में हैं । यह सब चाणक्य नीति का ही चमत्कार है । निश्चित रूप से इस को स्वीकार्य बनाकर वर्तमान सरकार ने भी प्रशंसनीय कार्य किया है ।जब शत्रु की और अपनी स्थिति एक जैसी हो, तो शान्ति बनाये रखने में ही भलाई है। सन्धि अनेक प्रकार की हो सकती है जो शान्ति और समृृद्धि में सहायक होती है जैसे हिरण्य संधि (देश को शान्ति मिले) कर्मसंधि (सेना और खजाना दोनों का लाभ) भूमि संधि (भूमि प्राप्ति)। हार की स्थिति में ऐसी संधियां भी हो सकती हैं , जिनमें राज्य का कुछ भाग देकर देश को बचाया जा सके। बड़ी धन राशि देकर देश को बचाया जाय (कपाल संधि)। उद्देश्य है विवशता में संधि जिसे अवसर पाते ही तोड़ दिया जाय। संधि सीधे दो देशों के बीच हो सकती है या आवश्यकता पडऩे पर किसी तीसरे देश को मध्यस्थ बनाया जा सकता है। सन्धि में शपथ की व्यवस्था भी हो सकती है कौटिल्य के मत में इस व्यवस्था का सम्मान तभी तक करना चाहिए जब तक अपनी स्थिति दूसरे पक्ष की अपेक्षा दुर्बल हो। गुप्त संधि भी की जा सकती है। जिससे दोनों पक्षों में आपसी विश्वास हो और मिलकर महत्त्वपूर्ण कदम उठाने हों। सन्धि को एक तात्कालिक व्यवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए न कि स्थायी व्यवस्था के रूप में। देश हित में संधि तोड़ देना भी विदेशी नीति का हिस्सा होता है।फ़ूट डालो और राज्य करो, कूटनीति का एक महत्त्वपूर्ण अस्त्र है।  जिसे अपनाकर अंग्रेज  यहां पर  लंबे समय तक शासन करते रहे । इस प्रकार की कूटनीति को अपनाकर दूसरे देशों पर अपना वर्चस्व स्थापित करने में सहायता मिल सकती है।  देश , काल , परिस्थिति के अनुसार आज चाहे  उपनिवेशवादी व्यवस्था समाप्त हो गई है , परंतु आर्थिक रूप से  कई देश एक दूसरे पर  अपना इसी प्रकार नियंत्रण रखते हैं ।शत्रु को बिना युद्ध के जीतने का एक अच्छा साधन है। युगों से शासक इसका प्रयोग अपनी शक्ति में वृद्धि करने और शत्रु को निर्बल करने के लिए करते आये हैं। कूटनीतिक युद्ध में उचित क्या है और अनुचित क्या है , शासक इस पर ध्यान नहीं देते, जोर इस बात पर होता है कि अपने राष्ट्र की शक्ति कैसे बढ़े शत्रु कैसे टूटे । इसके लिये षड्यन्त्र करना, शत्रु को हर प्रकार से क्षति पहुंचाना सब कुछ उचित है।शत्रु पर हमला करने का अच्छा अवसर तब होता है जब उससे भी अधिक शक्तिशाली राष्ट्र सामने से उसे ललकारता है । ऐसी परिस्थिति में शत्रु जिस चक्रव्यूह में फंस जाता है उससे निकलना उसके लिए कठिन होता है। जब हमला अन्य राष्ट्रों को साथ लेकर करते हैं तो जीतने पर जो लाभ होता है उसके बंटवारे के बारे में समझौता पहले से करना चाहिए ,जिससे कि युद्ध के उपरांत परस्पर  झगड़े की स्थिति न बने।अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के संदर्भ में अर्थशास्त्र में जो विशद व्याख्या की गई है, उसका लोहा राजनीति के पंडित, नेता, शासक सभी मानते हैं। चाणक्य नीति को अनीति कहने वालो की भी कमी नहीं है क्योंकि उनका सिद्धान्त व्यावहारिक है। मूल्य परक नहीं, क्या जायज है क्या नाजायज इसका फैसला राजा (आधुनिक संदर्भ में राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री जो सत्ता का कर्णधार होता है) को करना होता है, जिसके लिए राष्ट्र हित सर्वोपरि है। जो राजा राष्ट्रहित की जगह अपना और अपने सम्बन्धियों, सहयोगियों और सलाहकारों के हित को राष्ट्रहित के आगे कर देते हैं, वे स्वयं भी नष्ट होते हैं और राष्ट्र के पतन का भी कारण बनते हैं। चाणक्य ने राजा को अपनी इंद्रियों पर नियन्त्रण की सलाह दी और इसी में राष्ट्रहित का बीज मंत्र दिया-‘ राज्यस्य मूलम् इन्द्रिय जय:। सचमुच हमें अपने इस महानायक और कूटनीति के परम विद्वान चाणक्य पर गर्व होना चाहिए। इसका जितना महिमामंडन किया जा सकता है उतना ही किया जाए । मध्यकाल में हम कई बार राजनीति में इसलिए गच्चा खा गए कि हमने चाणक्य को भुला दिया था । स्वतंत्रता के उपरांत भी हम कई अवसरों पर विदेशों में राजनीतिक रूप से पराजित हुए। परंतु अब जिस प्रकार हमने चाणक्य को अपनी कूटनीति और राजनीति में प्रवेश दिला कर उसे सम्मान दिया है उसके निश्चय ही हमारे देश के लिए अच्छे दूरगामी परिणाम मिलने संभावित है।

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