“ऋषि दयानन्द की मानवतावादी वेदानुकूल मान्यताओं को न अपनाकर उनसे न्याय नहीं किया गया”

मनमोहन कुमार आर्य

देश का पतन महाभारत काल युद्ध के बाद से हुआ है। इस पतन को हम धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक पतन सहित राजनीतिक पतन भी कह सकते हैं। महाभारत काल तक पूरे विश्व में केवल एक वैदिक धर्म था। सभी लोग वैदिक धर्म का ही पालन करते हैं। वैदिक धर्म से तात्पर्य है कि ईश्वरीय ज्ञान वेद की शिक्षाओं का पालन-व्यवहार-आचरण ही वैदिक धर्म कहलाता है। महाभारत काल के बाद सनातन वैदिक धर्म में आई विकृतियों ने बौद्ध व जैन मत को जन्म दिया। इसके बाद स्वामी शंकाराचार्य का अद्वैत मत चला। महाभारत काल के बाद से विश्व में आर्यों का आवागमन व व्यापार आदि बन्द हो गया था। अतः विश्व के सभी देशों में भी वैदिक धर्म विलुप्त हो गया। कालान्तर में वहां ईसाई और इस्लाम मतों का आविर्भाव हुआ। इन मतों का इतिहास सबको विदित ही है। भारत में अद्वैत मत के बाद पुराणों की रचना हुई और इसके परिणाम से शैव, वैष्णव तथा शाक्त आदि नवीन मतों की स्थापना सहित अनेक वाममार्गी तथा शैव आदि मतों की शाखायें भी उत्पन्न हुई। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें से चौदहवें समुल्लासों में मत-मतान्तरों की उत्पत्ति पर प्रकाश डाला है। दिनांक 10 अप्रैल सन् 1875 को ऋषि दयानन्द ने मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की। इसका उद्देश्य वेदों के मत व वैदिक धर्म का प्रचार व प्रसार करना था। ऋषि दयानन्द द्वारा आर्यसमाज स्थापित करने सहित वेदों के सत्यार्थ उपलब्ध कराने से वेदों का ज्ञानरूपी-सूर्य अपनी पूरे प्रकाश व चमक के साथ चमकने लगा। वेदों के सत्यार्थ उपलब्ध हो जाने पर अब अवैदिक मतों की आवश्यकता नहीं थी। धर्म विषयक सभी मान्यताओं व सिद्धान्तों का आधार वेद की मान्यतायें एवं तर्क-युक्तियों पर आधारित धर्म था जिसमें अज्ञान, अन्धविश्वास, कुरीतियों, पाखण्डों व अमानवीय कृत्यों, कर्मकाण्डों व परम्पराओं का कोई स्थान नहीं था। ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति के सत्य स्वरूप का प्रचार भी ऋषि दयानन्द ने अपने व्याख्यानों एवं सत्यार्थप्रकाश सहित अनेक ग्रन्थों का लेखन कर किया। उन्होंने ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना की विधि सहित वायु मण्डल को शुद्ध करने के लिए अग्निहोत्र यज्ञ का विधान भी उपलब्ध कराया जिससे ईश्वर से सुख-शान्ति सहित ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। वेद वा वैदिक धर्म ही ज्ञान-विज्ञान सम्मत होने के कारण सत्य व यथार्थ हैं और इनकी शिक्षाओं के पालन करने से ही मनुष्य इहलोक व परलोक में सुख व उन्नति को प्राप्त हो सकता है।

 

महर्षि दयानन्द ने 22 वर्ष की अवस्था में गृहत्याग कर ईश्वर के सच्चे स्वरूप व उसकी प्राप्ति के उपायों को जानने के लिए अपूर्व पुरुषार्थ किया। वह अपने उद्देश्य में सफल हुए। उनको ज्ञान हुआ कि सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने चार ऋषियों को वेदों का ज्ञान दिया था। वेद सभी सत्य विद्याओं अर्थात् ज्ञान व विज्ञान का भण्डार हैं। वेदों के सत्य अर्थ जानकर मनुष्य किसी भी ज्ञान व विद्या की खोज कर उसे प्राप्त करने में सफलता प्राप्त कर सकता है। ऋषि दयानन्द सच्चे व सफल योगी भी थे। वह संस्कृत भाषा एवं वैदिक साहित्य के महाभारतकाल के बाद अपूर्व विद्वान सहित सुन्दर व आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। वह संस्कृत व हिन्दी भाषा के मधुवर्षी वक्ता, अपराजेय शास्त्रार्थकर्ता एवं बहुत बड़े तार्किक थे। विश्व के विद्वानों ने उनकी विद्वता वा विद्या का लोहा माना है। ऋषि दयानन्द सच्चे मानवतावादी थे। वह संसार के सभी मनुष्यों का कल्याण करना चाहते थे और सभी को ईश्वर के सच्चे स्वरूप का ज्ञान कराकर उन्हें ईश्वर से मिलाना चाहते थे। उन्होंने जो ज्ञान दिया है वह किसी एक समुदाय व कुछ लोगों के लिए नहीं दिया अपितु उसे वह जन-जन तक पहुंचाना चाहते थे। उन्होंने अपने जीवन काल में देश भर में घूम-घूम कर उसे आम जनता तक पहुंचाने का प्रशंसनीय प्रयत्न किया। वेदों की प्रत्येक शिक्षा अन्य मतों की तरह किसी एक समुदाय व उनके अनुयायियों तक ही सीमित नहीं थी अपितु वह मानवमात्र के लिए थी। ईसाई व मुसलमान आदि सभी समुदायों के सज्जन लोग उनके मित्र थे। उन्होंने अपनी कोई मान्यता व सिद्धान्त विश्व के विद्वानों से छुपाया नहीं। उन्होंने इंग्लैण्ड में रहने वाले प्रो. मैक्समूलर तक को अपने ऋग्वेद व यजुर्वेद भाष्य के मासिक अंकों को समालोचना के लिए भेजा। प्रो. मैक्समूलर ने स्वामी दयानन्द के वेदविषयक विचारों को पढा और वह उनसे प्रभावित भी हुए। ऋषि दयानन्द के विचार पढ़ने के बाद उनके विचारों में उल्लेखनीय परिवर्तन आया। वह एक प्रकार से वेदों के प्रशंसक बन गये। इसी प्रकार सन्त रोमा रोला सहित अनेक विदेशी विद्वान भी ऋषि दयानन्द के प्रशंसक थे। वह केवल धार्मिक व सामाजिक विषयों के विद्वान ही नहीं अपितु राजधर्म के प्रस्तोता व आचार्य भी थे। उन्होंने ही देश की आजादी का मूल मंत्र देते हुए सबसे पहले स्वराज्य को सर्वोपरि उत्तम बताया था और अच्छे से अच्छे विदेशी राज्य के भी पूर्ण सुखदायक न होने की घोषणा की थी। अब धार्मिक व सामाजिक जगत को ऋषि दयानन्द की देन विषयक चर्चा करते हैं।

 

ऋषि दयानन्द ने लुप्त प्रायः वेदों को न केवल सर्वसुलभ कराया अपितु वेदों के सत्य अर्थ भी सुलभ करायें। उन्होंने वैदिक धर्म को आधुनिक रूप में प्रस्तुत करते हुए सत्यार्थप्रकाश नामक एक धर्मग्रन्थ भी दिया है जिसकी सभी मान्यतायें ज्ञान व विज्ञान पर खरी हैं। यह ग्रन्थ संसार में प्रचलित सभी मतों जो ऋषि दयानन्द के समय में प्रचलित थे, उनकी अज्ञानयुक्त मान्यताओ ंसे भी जनसामान्य को परिचित कराता है। ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति के स्वरूप व गुण-कर्म-स्वभाव सहित ईश्वर की उपासना का तार्किक आधार भी प्रस्तुत कर ईश्वर प्राप्ति की सरल व सफलता देने वाली विधि भी बताता है। ऋषि दयानन्द की शिक्षायें मानवमात्र के लिए हैं व सबकी हितकारी हैं। वेदों की शिक्षा व सत्यार्थप्रकाश में निहित ज्ञान से मनुष्य का सर्वांगीण विकास वा उन्नति होती है। वेदों के अनुसार पूरे ब्रह्माण्ड में एक ही ईश्वर है जो सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सृष्टि का उत्पत्तिकर्ता, धारणकर्ता व पालनकर्ता है। वही जीवात्माओं को उनके पूर्व जन्मों के कर्मानुसार मनुष्यादि योनि में जन्म देकर उनके पाप व पुण्यों के अनुरूप सुख व दुःख रूपी फल देता है। उन्होंने बताया और सिद्ध भी किया कि ईश्वर, जीवात्मा तथा मूल प्रकृति आदि तीन सत्तायें स्वभावतः अनादि, अनुत्पन्न एवं अविनाशी हैं। ईश्वर के प्रायः सभी गुणों को, जो मनुष्य अपनी क्षमता के अनुसार जान सकता है, वेदों से चुन-चुन कर ऋषि दयानन्द ने अपनी पुस्तक आर्याभिविनय के प्रथम मंत्र की व्याख्या सहित अन्य स्थानों पर भी दिये हैं।

 

जीवात्मा का सत्य स्वरूप भी ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश आदि प्रायः सभी प्रमुख ग्रन्थों में प्रस्तुत हुआ है। उन्होंने वेदों के आधार पर बताया कि संसार के सभी मनुष्य व इतर प्राणी भी ईश्वर की प्रजा अर्थात् उसके पुत्र व पुत्रियां हैं। सभी परस्पर बन्धुत्व के बन्धन में बन्धें हुए हैं। ईश्वर व जीवात्मा अनादि सत्तायें हैं और सृष्टि प्रवाह से अनादि है, इसलिये सभी जीवात्माओं के अनन्त बार जन्म व मरण हो चुके हैं। कई बार हम व सभी जीवात्मायें मोक्ष को भी प्राप्त हुई हैं। संसार में जितनी भी प्राणियां योनियां हैं, अनुमानतः सभी योनियों में सभी जीवात्मायें एक व अधिक बार जन्मीं हैं एवं उसमें उन्होंने जीवन बिताया है। यह भी सम्भव है कि हम सभी जीवात्मायें आपस में एक व कई बार माता-पिता-भाई-बहिन व अन्य सम्बन्धों में बन्धे हैं। अतः हमें परस्पर इन्हीं सम्बन्धों को जानकर एक दूसरे से प्रेम व मित्रता का व्यवहार कर जीवन बिताना चाहिये। ऋषि दयानन्द ने यह भी सिद्ध किया है कि सभी मनुष्यों का एक ही धर्म वैदिक धर्म है। वैदिक धर्म का पालन कर ही मनुष्य का वर्तमान जीवन सुखी व कल्याणयुक्त होता है व मृत्यु के बाद के जन्म व जीवन भी उन्नत व सुखी होते हैं। असत्य व्यवहार, मांसाहार, ईश्वर की सही विधि से उपासना न करना व यज्ञ आदि से पृथक होने से मनुष्य का भावी जीवन जिसका होना सुनिश्चित है, वह निश्चय ही बिगड़ता है। मनुष्यों को देवनागरी अक्षर सीखकर एवं वेदमंत्रोच्चार कर उनके अर्थ पढ़कर ईश्वर की उपासना करनी चाहिये। इससे ईश्वर से निकटता व संगति होने से हमारे दुष्ट गुण, कर्म व स्वभाव सुधरते हैं। आत्मा का बल बढ़ता है और पहाड़ के समान दुःख प्राप्त होने अर्थात् अपनी व अपनों की मृत्यु के क्षणों में भी मनुष्य घबराता नहीं है। स्वामी दयानन्द जी ने देश को आजाद कराने की प्रेरणा करने के साथ विधर्मियों को शुद्ध कर वैदिक धर्मी बनाने का भी सत्परामर्श दिया था। कुछ ऋषि भक्तों ने यह कार्य किया भी परन्तु किन्हीं कारणों से इस कार्य को जारी नहीं रख सके। इस कार्य में यदि सभी देशवासियों का सहयोग मिलता तो आज भारत विश्व का आदर्श राष्ट्र होता।

 

महर्षि दयानन्द जी ने विश्व के अन्य मताचार्यों के समान अपना कोई नया मत व सम्प्रदाय नहीं चलाया अपितु सनातन वैदिक धर्म में जो वेद विरुद्ध हानिकारक विचार व मान्यतायें आ गईं थीं, उन्हें ही दूर करने का प्रयास किया। उन्होंने सच्ची उपासना पद्धति दी और सभी प्रकार के भेदभाव व छुआछूत आदि को समाप्त करने का पुरजोर प्रयत्न किया। देहरादून में उन्होंने सबसे पहले एक मुस्लिम बन्धु की उसके अनुरोध पर शुद्धि की थी। यदि ऋषि दयानन्द की वेद पर आधारित विचारों व मान्यताओं को सभी सनातन धर्मी बन्धु जो हिन्दू कहलाते हैं, अपना लेते तो  हिन्दुओं को पदे पदे अपमानित न होना पड़ता, न देश का विभाजन होता और न ही देश में स्वार्थ की राजनीति होती। सभी व्यक्ति धार्मिक विचारों के होते और देश को आगे बढ़ाते। योग्यतम व्यक्ति ही देश को चलाते। राम, कृष्ण का नाम पूरे विश्व में आदर पाता। मूर्तिपूजा का स्थान सन्ध्या व ध्यान को प्राप्त होता, फलित ज्योतिष का उन्मूलन होता, मृतक श्राद्ध बन्द होता तथा अवतारवाद के स्थान पर राम व कृष्ण आदि को महामानव व महापुरुष मानकर उन जैसा बनने का लोग प्रयत्न करते। समाज में जन्मना जातिवाद सर्वथा समाप्त हो जाता। एक धर्म व एक जाति होने से जो स्त्री-पुरुष व युवक-युवती जहां जिससे अपने गुण, कर्म व स्वभाव के अनुरूप विवाह करना चाहते, कर सकते थे। दुनियां के सभी लोग भी हमारे सिद्धान्तों को पसन्द करते व अपनी मिथ्या मान्यताओं को छोड़कर प्रसन्नता से वैदिक धर्म की शरण में आते जिससे सारा विश्व वसुधैव कुटुम्बकम् को प्रत्यक्ष व आदर्श स्वरूप में उपस्थित करता। ऐसा इसलिये नहीं हो सका कि हमारे सनातनी पौराणिक हिन्दू भाईयों ने अपनी अविद्या आदि के कारण ऋषि दयानन्द के हिन्दू जाति का उत्थान करने वाले विचारों को न अपनाकर अन्धविश्वासों व मिथ्या परम्पराओं को ही मानना जारी रखा जिससे देश व मानवजाति की अपूरणीय क्षति हुई है।

 

मनुस्मृति का श्लोक का है धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो हन्तव्यः मानो धर्मो हतोवाधीत्।। जो धर्म की हत्या करता है वही धर्म उसकी हत्या कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता है वही धर्म उसकी रक्षा करता है। हमने अतीत में धर्म का जो त्याग किया है उसके परिणाम तो हमें भोगने ही पड़ेगे वा भोग ही रहे हैं। अब भी हम सुधरे व सम्भले नहीं हैं। इसका परिणाम हानिकारक होना है। अब भी समय है परन्तु लगता नहीं कि हमारे आर्य व हिन्दू बन्धु वर्तमान देश, काल और परिस्थिति पर विचार कर सही निर्णय लेंगे। आज हमारे पास न तो एक ऋषि दयानन्द है, न स्वामी श्रद्धानन्द, न पंडित लेखराम और न कोई गुरुदत्त विद्यार्थी। आर्यसमाज के लोग असंगठित हैं और परस्पर लड़ रहे हैं। इसका कारण संगठन में स्वार्थी व आर्यसमाज की विचारधारा विरोधी छद्म लोगों का प्रवेश होना है। हम ईश्वर से ही प्रार्थना करते हैं कि वही कोई उपाय करे जिससे आर्यसमाज का विद्यटन दूर हो। आर्यसमाज व हिन्दू समाज परस्पर मित्रभाव को प्राप्त होकर धर्म व देश की रक्षा के कार्य में पूरी शक्ति से कार्य करें।

 

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