मराठा साम्राज्य के जनक छत्रपति शिवाजी महाराज

अध्याय 1

राकेश कुमार आर्य

शिवाजी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी दीप्ति से भारत का समकालीन इतिहास आज भी दीप्तिमान है । शिवाजी एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनके नाम से आज भी इस देश के युवा प्रेरणा लेते हैं । ऐसे महानायक को कुछ षड्यंत्रकारी इतिहासकारों ने बहुत ही संकीर्ण दृष्टिकोण से देखने का राष्ट्रघाती प्रयास किया है । जिस कारण इस महानायक का संपूर्ण व्यक्तित्व भारतीय इतिहास में वह स्थान नहीं प्राप्त कर पाया है जिसका वह पात्र था । 
भारत के स्वाधीनता के दीर्घकालिक संघर्ष को शिवाजी महाराज के पुरुषार्थ ने जितनी ऊंचाई दी उतनी किसी अन्य महापुरुष के महान कार्यों से उसे ऊंचाई नहीं मिल पाई । यह अकेले शिवाजी थे , जिन्होंने 1674 में जिस मराठा साम्राज्य की स्थापना विदेशी मुगलों को भारत से भगाने के संकल्प के साथ की थी , वह साम्राज्य भारत में 2800000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैल गया था । 2800000 वर्ग किलोमीटर का यह क्षेत्रफल आज के 3200000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैले हुए भारतवर्ष से मात्र 400000 वर्ग किलोमीटर ही छोटा था । 
अतः पाठक अनुमान लगा लें कि हम जिस महानायक के बारे में अब यहां बात करने लगे हैं उस महानायक के महान प्रयासों से यह भारतवर्ष 1947 में मिली तथाकथित आजादी से बहुत पहले स्वाधीन हो चुका था । यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि इतिहासकारों ने और स्वयं हमने इस महानायक के प्रयास को भारतीय स्वाधीनता का आंदोलन स्थापित नहीं किया या माना नहीं । जिसका परिणाम यह निकला कि हम अपने स्वर्णिम इतिहास से और अपने महानायकों के उल्लेखनीय कार्यों से वंचित होकर रह गए ।
शिवाजी महाराज के जीवन पर यदि निष्पक्ष होकर चिंतन और विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि वह भारत में भारतीयता के अनुकूल उसी राजनीतिक सिद्धांत के आधार पर उसी राजनीतिक प्रणाली को स्थापित कर देना चाहते थे जो भारत के लोगों के मौलिक अधिकारों की हितचिंतक तो हो ही साथ ही वह मानवता की भी हित चिंतक हो । वह चाहते थे कि राजा और शासक वर्ग प्रजाहितचिंतक हो और प्रजा के मौलिक अधिकारों का शोषण करने के विरुद्ध हो । उनका उद्देश्य था कि राज्य शासन ऐसे लोगों के हाथों में जाए जो जनता के मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले हों । यही कारण रहा कि वह उपनिवेशवादी और साम्राज्यवाद व्यवस्था को उखाड़ फेंक कर भारत के प्राचीन ऋषियों के द्वारा स्थापित की गई प्रजा हित चिंतक शासन प्रणाली को भारत में लागू करना चाहते थे । 
ऐसे ही एक महान योद्धा और रणनीतिकार थे – छत्रपति शिवाजी महाराज । इस पुस्तक के पहले अध्याय में हम शिवाजी महाराज के उन महान कार्यों पर प्रकाश डालेंगे जिनके कारण वह छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से हमारे देश के राष्ट्रवादी लोगों के हृदय में आज तक राज करते हैं और आज भी इस देश के करोड़ों लोगों को उस शासन व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं जो लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में या तो असफल हो गई हो या लोगों की मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने में अपने आप को अक्षम अनुभव कर रही हो ।
शिवाजी जी ने कई वर्षों तक मुगलों के साथ युद्ध किया था । सन 1674 ई. में वह ऐतिहासिक पल आए थे जब रायगढ महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक किया गया था, तब से उन्हें छत्रपति की उपाधि प्रदान की गयी थीं । इनका पूरा नाम शिवाजी राजे भोसलें था और छत्रपति इनको उपाधि में मिली थी । उनका संकल्प था कि मैं अपने देश के लोगों को प्रजा के प्रति समर्पित और उत्तरदाई शासन प्रदान करूंगा । मैं हर संभव प्रयास करूंगा कि अपने देशवासियों के मौलिक अधिकारों का हनन करने वाली प्रत्येक राजनीतिक सत्ता और विशेषकर विदेशी सत्ता को भारत से उखाड़ फेंकूँगा । जिससे कि मेरे देशवासियों का सम्मान सुरक्षित रह सके और वह अपने आप को स्वतंत्र अनुभव कर सकें । यही कारण था कि शिवाजी महाराज ने अपनी सेना, सुसंगठित प्रशासन इकाईयों की सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया था । 
कुछ लोगों ने शिवाजी पर एक साम्राज्यवादी शासक होने का आरोप लगाया है । ऐसे इतिहासकारों की संकीर्ण मानसिकता का हमें पर्दाफाश करना चाहिए । यदि शिवाजी साम्राज्यवादी शासक होते तो वह प्रजा के प्रति उत्तरदायी शासन की स्थापना कभी नहीं करते । न ही कभी भारत के प्राचीन राजनीतिक सिद्धांतों के अनुकूल प्रजा हितचिंतक शासन प्रणाली का चिंतन करते और दूसरी बात यह भी कि यदि शिवाजी महाराज साम्राज्यवादी शासक होते तो वह अपने बाद की आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक भी कभी नहीं बनते।
शिवाजी महाराज ने भारतीय समाज के प्राचीन हिन्दू राजनैतिक प्रथाओं और मराठी एवं संस्कृत को राजाओं की भाषा शैली बनाया था । कुछ शत्रु मानसिकता के इतिहासकारों ने शिवाजी की इस बात के लिए आलोचना की है कि उन्होंने अपने शासन को प्राचीन हिंदू प्रथाओं के अनुकूल चलाने का प्रयास किया । ऐसे अज्ञानी इतिहासकारों के भ्रमजाल से हमें अपने आप को बचाना चाहिए । हमें यह मानना और जानना चाहिए कि भारत की प्राचीन वैदिक शासन प्रणाली में कहीं भी सांप्रदायिक संकीर्णता नहीं मिलती । यही कारण रहा कि शिवाजी महाराज ने अपने शासनकाल में किसी भी मुस्लिम के विरुद्ध इस आधार पर कोई अत्याचार नहीं किया कि वह उसकी प्रजा में रहकर किसी विपरीत धर्म को अपनाता है ? 
शिवाजी महाराज अपने शासनकाल में बहुत ही नीति निपुण प्रजावत्सल और प्रजा के हित चिंतन में लगे रहने वाले राजा थे । वह साम्राज्यवादी शक्तियों के विरोधी थे और उन आततायी लोगों का विनाश कर देना चाहते थे जो भारत को और भारत के लोगों को अपने शासन के अधीन रख कर उन पर अत्याचार करना अपना मौलिक धर्म समझते थे । यही कारण रहा कि लोगों ने शिवाजी महाराज के जीवन चरित्र से शिक्षा लेते हुए भारत की आजादी में अपना रक्त तक बहा दिया था ।

शिवाजी महाराज का आरम्भिक जीवन :

हमारे इस इतिहासनायक और भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महान सेनापति शिवाजी महाराज का जन्म 19 फ़रवरी 1630 ( कुछ लोगों का मानना है कि शिवाजी महाराज का जन्म वर्ष 1627 है ) में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था । इनके पिता का नाम शाहजी भोसलें और माता का नाम जीजाबाई था । जीजाबाई एक महान नारी थीं । जिन के भीतर देशभक्ति और अपने देश के प्रति समर्पित होने का भाव कूट-कूट कर भरा था । माता जीजाबाई के यह संस्कार कालांतर में उनके पुत्र शिवाजी के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए । जिनसे प्रेरित होकर शिवाजी ने अपना जीवन देश , धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया ।
शिवाजी का जन्म स्थल शिवनेरी दुर्ग पुणे के पास है । शिवाजी का अधिक जीवन अपनी माता जीजाबाई के साथ बीता था । शिवाजी महाराज बचपन से ही अपनी माता के विचारों से प्रेरित हो चुके थे । जिसके कारण उनके भीतर बौद्धिक चातुर्य कूट-कूट कर भर गया था । विपरीत परिस्थितियों में कैसे अपने आप को शत्रु की चालों से बचा लेना है और कैसे अपनी रक्षा करते हुए अपने लोगों की भी रक्षा करनी है ? – ऐसा उन्होंने बचपन से ही सीखना आरंभ कर दिया था । शिवाजी ने बचपन से ही युद्ध कला और राजनीति की शिक्षा प्राप्त कर ली थी । 
भोसलें एक मराठी क्षत्रिय हिन्दू राजपूत की एक जाति हैं । कुछ लोगों का यह भी मानना है कि गुर्जर जाति में मिलने वाला बैसला गोत्र इसी भोंसले का अपभ्रंश है । शिवाजी के पिता भी बहुत साहसी और शूरवीर थे । यद्यपि कुछ परिस्थितियां ऐसी रहीं कि शिवाजी अपने पिता से अधिक कहीं अपनी माता जीजाबाई से अधिक प्रेरित रहे। शिवाजी महाराज के लालन-पालन और शिक्षा में उनके माता और पिता का बहुत ही अधिक योगदान रहा है । उनकी माता जीजाबाई शिवाजी को बचपन से ही युद्ध की कहानियां तथा उस युग की घटनाओं को बताती थीं । विशेष रूप से जीजाबाई उन्हें रामायण और महाभारत की प्रमुख कहानियाँ सुनाती थी । जिन्हें सुनकर शिवाजी के ऊपर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा था । मां चाहती थी कि शिवाजी बड़े होकर एक स्वतंत्र राज्य की नींव रखें , वह चाहती थीं कि उनकी कोख से पैदा हुआ शिवा बड़ा होकर किलों को जीतने वाला महान और शूरवीर शासक बने और देश के भीतर चल रही क्रूर राजशाही को उखाड़कर प्रजा के प्रति उत्तरदायी शासन की नींव रखने में सक्षम और सफल हो ।
शिवाजी महाराज का विवाह 14 मई 1640 में सईबाई निम्बलाकर के साथ हुआ था ।

शिवाजी महाराज का सैनिक वर्चस्व :

हिंदी में एक कहावत है कि ” होनहार बिरवान के होत चिकने पात “। कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि ” सपने वही सही होते हैं जो व्यक्ति को सोने नहीं देते ।” बात दोनों अपनी जगह सही हैं। इनका मूल अर्थ है कि जो लोग प्रतिभा संपन्न होते हैं , उनकी प्रतिभा उन्हें ऊपर उठने के लिए और बड़ा कुछ करने के लिए सदैव प्रेरित करती रहती है । एक लेखक इसलिए लेख नहीं लिखता कि उसे लेख लिखना है , अपितु वह इसलिए लेख लिखता है कि उसके भीतर की प्रतिभा उसे लेख लिखने के लिए प्रेरित करती है । वह बीमार होता है तो भी वह उसे लेख के लिए उठा लेती है , वह किसी विपरीत परिस्थिति में भी फंसा होता है ,तो भी वह उसे लिखने के लिए कहती रहती है कि लिख , लिख और अच्छा लिख। यही स्थिति किसी कवि की होती है। जब वह अपनी मां के वियोग में तड़प रहा होता है , तो भी उसके भीतर छिपी हुई उसकी प्रतिभा उसे लिखने के लिए प्रेरित करती है और जब वह कहीं पुरस्कृत हो रहा होता है तो भी उसकी प्रतिभा उसे लिखने के लिए प्रेरित करती है । अंतर केवल इतना होता है कि जब मां के वियोग में कवि वेदनाग्रस्त होता है तो लेखनी वेदना में विलीन हो जाती है ,और जब कहीं पुरस्कृत हो रहा होता है तो वही लेखनी वेद में विलीन हो जाती है । यही कारण है कि कवि कभी वेदना के स्वर निकालता है तो कभी वह वेद के गीत गाकर अपनी मस्ती प्रकट करता है । यही किसी शूरवीर साहसी सेनानायक की स्थिति होती है । वह बचपन से ही ऐसे सपने देखने लगता है , अर्थात उसकी प्रतिभा उसे ऊंचा उठने और महान कार्य के माध्यम से समाज में अपना स्थान बनाने के लिए प्रेरित करती रहती है। 
शिवाजी के साथ भी अब कुछ ऐसा ही होने लगा था । बालक शिवाजी ने जब किशोरावस्था की दहलीज पर अपने कदम रखे तो उसकी प्रतिभा भी उसे ऊंचा उड़ने के लिए प्रेरित करने लगी ।सन 1640 और 1641 के समय बीजापुर महाराष्ट्र पर विदेशियों और राजाओं के आक्रमण हो रहे थे । शिवाजी महाराज मावलों को बीजापुर के विरुद्ध इकट्ठा करने लगे । मावल राज्य में सभी जाति के लोग निवास करते हैं, कालांतर में शिवाजी महाराज ने इन मावलो को एक साथ परस्पर मिलाया और मावला नाम दिया । इन मावलों ने कई सारे दुर्ग और महलों का निर्माण करवाया था ।
इन मावलो ने शिवाजी महाराज का जीवन भर हर विपरीत परिस्थिति में साथ दिया । बीजापुर उस समय पारस्परिक संघर्ष और मुगलों के युद्ध से पीड़ित था । जिस कारण उस समय के बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने बहुत से दुर्गो से अपनी सेना हटाकर उन्हें स्थानीय शासकों के हाथों में सौप दिया था ।
तभी अचानक बीजापुर के सुल्तान बीमार पड़ गए थे । इसी स्थिति का लाभ उठाकर बीजापुर के कई दुर्गों पर शिवाजी महाराज ने अपना अधिकार जमा लिया था । शिवाजी ने बीजापुर के दुर्गों को हथियाने की नीति अपनायी और पहला दुर्ग तोरण के दुर्ग को अपने नियंत्रण में ले लिया था । इस प्रकार शिवाजी ने अपने भविष्य का संकेत तोरण दुर्ग को जीत कर दे दिया कि वह किसी किले का किलेदार बनकर किसी किले के स्वामी को शीश झुकाना नहीं चाहता , अपितु इसके विपरीत वह अनेकों दुर्गों का स्वामी बनकर अनेकों क्रूर बादशाहो और राजाओं को अपने सामने झुका देखने में ही आनंद अनुभव करता है। 

शिवाजी महाराज का किलों पर अधिकार :

शिवाजी अपने बौद्धिक चातुर्य और कूटनीतिक दृष्टिकोण के लिए भी इतिहास में जाने जाते हैं । उन्होंने जीवन भर कितने ही अवसरों पर अपनी बौद्धिक क्षमताओं का अनेकों बार प्रदर्शन किया । तोरण दुर्ग को जीतकर उन्होंने न केवल अपनी बौद्धिक चतुरता का प्रदर्शन किया , अपितु उसके पश्चात उन्होंने अपने कूटनीतिक विवेक का भी प्रयोग किया ।
तोरण का दुर्ग पूना (पुणे) में हैं । शिवाजी महाराज ने सुल्तान आदिलशाह के पास अपना एक दूत भेजकर समाचार भिजवाया कि यदिआपको अपना किला वापिस चाहिए तो इसके लिए आपको हमें बड़ी भारी धनराशि चुकानी होगी । यदि आप में एक बड़ी धनराशि इस दुर्ग के बदले में हमें दे देते हैं तो हम आपको आपका विजित क्षेत्र भी लौटा देंगे। शिवाजी महाराज ने अपनी कूटनीतिक क्षमताओं का प्रदर्शन करते हुए आदिलशाह के दरबारियों को पहले से ही खरीद लिया था ।
वास्तव में आदिल शाह को ऐसा कोई आभास नहीं था कि उसके पड़ोस से एक छोटा सा बालक उठेगा और वह भविष्य के एक हिंदू साम्राज्य की स्थापना का श्री गणेश उसी के एक किले को जीतकर कर देगा। अतः शिवाजी जी के इस प्रकार के साम्राज्य विस्तार की नीति की भनक जब आदिलशाह को लगी तो वह देखता ही रह गया । 
अपनी अपरिमित संकल्पशक्ति को साथ लेकर उठे शिवाजी नाम के इस बालक का सामना करने का साहस आदिलशाह के भीतर नहीं हो पाया । इसी से पता चलता है कि शिवाजी बचपन से ही कितने शूरवीर और साहसी थे ? – उनका संकल्प राष्ट्रभक्ति के लिए था , देशभक्ति के लिए था और अपने देशवासियों के लिए था । उनकी नीति व नियत सभी बहुत स्पष्ट थे । यही कारण था कि ईश्वर की अनुकंपा उनका साथ दे रही थी । यही कारण है कि आदिलशाह जैसा शासक उनका सामना करने के लिए नहीं आया। उसने शाहजी राजे को अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने के लिये कहा । लेकिन शिवाजी महाराज ने अपने पिता की चिन्ता किये बिना अपने पिता के क्षेत्र का प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया और आदिलशाह को लगान देना भी बंद कर दिया था ।
शिवाजी के लिए यह बहुत ही शुभ संयोग रहा कि उनका सामना पहली बार आदिलशाह जैसे दुर्बल शासक से हुआ । जिसने उनकी बढ़ती शक्ति का उचित प्रतिरोध नहीं किया । इस कारण शिवाजी का मनोबल बढ़ गया और वह जिस दिशा में जिस उद्देश्य के साथ आगे बढ़ना चाहते थे , उसमें निरापद आगे बढ़ने लगे।
वे 1647 ई. तक चाकन से लेकर निरा तक के भू-भाग के भी स्वामी बन चुके थे । अब शिवाजी महाराज ने पहाड़ी क्षेत्रों से मैदानी क्षेत्रों की ओर चलना आरम्भ कर दिया था । शिवाजी जी ने अपनी शक्ति का विस्तार करते हुए और अपने महान उद्देश्य में सफलता के कीर्तिमान स्थापित करते हुए कोंकण और कोंकण के 9 अन्य दुर्गों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था । शिवाजी महाराज को अपने जीवन में कई देशी और कई विदेशियों राजाओं के साथ-साथ युद्ध करना पड़ा था , जिनमें सफल भी हुए थे । 

शाहजी की बंदी और युद्ध बंद करने की घोषणा:

बीजापुर के सुल्तान के लिए सांप – नेवले की स्थिति हो गई थी । वह शिवाजी से युद्ध नहीं कर सकता था , पर शिवाजी जिस प्रकार अपनी शक्ति का विस्तार करते जा रहे थे , वह भी उसके लिए असहनीय स्थिति बन चुकी थी । अतः उसने शिवाजी को नियंत्रण में रखने के लिए एक युक्ति का सहारा लिया । वास्तव में वह युक्ति उसकी दुर्बलता का प्रतीक थी । इससे पता चलता है कि वह शिवाजी का सीधे सामना करने से बचता था या कहिए कि शिवाजी का सीधा सामना करने से घबराता था । तब उसने सोचा कि क्यों न शिवाजी के पिता को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाए और उस स्थिति का मनोवैज्ञानिक दबाव शिवाजी पर डालकर शिवाजी को इस बात के लिए बाध्य किया जाए कि वह आदिल शाह को भविष्य में किसी प्रकार से उत्पीड़ित नहीं करेगा ? 
अपनी इस योजना को सिरे चढ़ाने के लिए बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने शिवाजी महाराज के पिता को बंदी बनाने का आदेश दे दिया । शिवाजी के पिता शाहजी उस समय कर्नाटक राज्य में थे । सुल्तान आदिलशाह के गुप्तचरों ने उनका वहां पर जाकर सावधानी से पीछा किया और एक दिन घात लगाकर शाह जी को गिरफ्तार कर लिया । सुल्तान आदिलशाह इसी स्थिति की प्रतीक्षा में था । वह चाहता था कि किसी प्रकार शाहजी उसकी जेल में लाकर डाल दिए जाएं , तो वह शिवाजी से अपनी शर्त मनवाने के लिए उन्हें बाध्य करे । उसने ऐसा ही किया भी । फलस्वरूप उनके पिता को एक शर्त पर रिहा किया गया कि शिवाजी महाराज बीजापुर के किले पर आक्रमण नहीं करेगा । ऐसी शर्त को मनवा कर आदिलशाह को मानो जीवनामृत ही मिल गया था । अब वह इस बात से निश्चिंत हो गया था कि शिवाजी उसके राज्य पर भविष्य में कोई आक्रमण नहीं करेंगे । सुल्तान के इस कार्य को हमारे कुछ इतिहासकारों ने इस प्रकार प्रदर्शित करने का प्रयास किया है कि जैसे उसने बड़े प्यार से और अपनी ओर से अत्यधिक उदारता दिखाते हुए शिवाजी को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वह शांतिपूर्वक उसे शासन करने दे , परंतु यदि इसको एक इतिहासकार के दृष्टिकोण से और तत्कालीन परिस्थितियों में अपने आप को निरपेक्ष भाव से खड़ा होकर देखा जाए या देखने का प्रयास किया जाए तो सुल्तान आदिलशाह शिवाजी के बढ़ते हुए वर्चस्व और सैनिक शक्ति से आतंकित था । बस , यही वह स्थिति है जो शिवाजी को बचपन से ही किसी महान शासक के गुणों से भर देती है । जिससे पता चलता है कि शिवाजी बचपन से ही उन राजकीय गुणों से भरे हुए थे जो उन्हें भविष्य के एक महान साम्राज्य का संस्थापक बनाने जा रहे थे । 
शिवाजी महाराज ने जब अपने पिता को आदिलशाह से उपरोक्त शर्त को मानकर रिहा करा लिया तो अपने कर्तव्य का पालन करते हुए उन्होंने भी अगले 5 वर्षों तक कोई युद्ध नहीं किया और तब शिवाजी अपनी विशाल सेना को सुद्रढ़ करने में लगे रहे । 

शिवाजी महाराज का राज्य विस्तार :

यदि शिवाजी को आदिल शाह की शर्तों को मान लेने के पश्चात इस प्रकार स्थापित किया जाए कि वह इसके पश्चात निष्क्रिय हो गए या इस भय से ग्रस्त होकर शांत रहने लगे कि कहीं आदिलशाह उनके साथ कोई ऐसी ही घटना पुनः न कर दे , तो यह इतिहास के इस महानायक का आकलन करने में हमारी ओर से की जाने वाली भारी चूक होगी ।शाहजी की रिहाई के समय जो शर्ते लागू की गई थीं , उन शर्तो का शिवाजी ने पालन तो किया ,परंतु बीजापुर के दक्षिणी क्षेत्रों में अपनी शक्ति को बढ़ाने में ध्यान लगा दिया था । यद्यपि शिवाजी की इस योजना को क्रियान्वित होने में जावली नामक राज्य बीच में बाधा बना हुआ था । उस समय यह राज्य वर्तमान के सतारा महाराष्ट्र के उत्तर और पश्चिम के कृष्णा नदी के पास था । कुछ समय बाद शिवाजी ने जावली पर युद्ध किया और जावली के राजा के पुत्रों ने शिवाजी के साथ युद्ध किया । इस युद्ध में शिवाजी ने उन दोनों पुत्रों को बंदी बना लिया था और किले की सारी संपति को अपने नियंत्रण में ले लिया था। इसी मध्य कई मावल शिवाजी के साथ आकर मिल गए थे । 

शिवाजी महाराज का मुगलों से पहला युद्ध :

जिस समय दक्षिण भारत में शिवाजी महाराज का उदय हो रहा था , उस समय उत्तर भारत में मुगल सत्ता दिल्ली पर अपना अधिकार किए हुए थी । वैसे तो मुगलों के प्रत्येक शासक या बादशाह ने हिंदुओं के प्रति निर्दयता और निर्ममता का प्रदर्शन करने वाली नीतियों का अनुगमन किया , परंतु शिवाजी के समकालीन औरंगजेब की नीतियां तो अत्यंत निर्दयता पर आधारित थीं । इतिहास में औरंगजेब अपनी क्रूरता , निर्ममता , असहिष्णुता और सांप्रदायिक नीतियों के लिए जाना जाने वाला बादशाह है । उसके शासनकाल में उसके हिंदू दमनकारी शासन का विरोध करने के लिए दक्षिण से शिवाजी का उठना न केवल भारत के दीर्घकालीन स्वाधीनता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण घटना है , अपितु शिवाजी के भीतर छिपे एक महान देशभक्त और क्रूर शासक से टकराने की उनकी साहस भरी नीति का भी परिचायक है। औरंगजेब या उसके पूर्वज इस देश को अपना देश न मानकर और इस देश के निवासियों को अपनी प्रजा न मानकर अपना अत्याचारपूर्ण शासन कर रहे थे । उस अत्याचारपूर्ण शासन को चुनौती देना किसी शिवाजी के ही वश की बात थी । इस असंभव कार्य को शिवाजी जिस प्रकार पूरा कर रहे थे , उसे उसी रूप में इतिहास में सम्मानित किया जाना अपेक्षित है । जिस शासक को उस समय चुनौती देना हर किसी के वश की बात नहीं थी , उस असंभव को संभव करने वाले शिवाजी थे । इतिहास में उन्हें इसी रूप में सम्मान मिलना चाहिए।
मुगलों के शासक औरंगजेब का ध्यान उत्तर भारत के पश्चात दक्षिण भारत की ओर गया ।उसे शिवाजी के बारे में पहले से ही ज्ञात था कि वह हिंदू राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में दक्षिण भारत में शक्ति संचय कर अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे हैं । अतः शिवाजी पर नियंत्रण रखने के लिए औरंगजेब ने दक्षिण भारत में अपने मामा शाइस्ता खान को सूबेदार बना दिया था । वर्तमान प्रचलित इतिहास लेखकों के माध्यम से हमें पता चलता है कि शाइस्ता खान अपने 150,000 सैनिकों को लेकर पुणे पहुँच गया और उसने 3 वर्ष तक वहां लूटपाट की ।इस प्रकार की मुस्लिम शासकों की लूटपाट को हमारे इतिहासकार उस समय की एक सामान्य घटना मानकर उपेक्षित करने का अक्षम्य कार्य करते हैं , जबकि वास्तव में अपने देशवासियों के साथ होने वाली इस लूटपाट और मारकाट ने ही हमारे अनेकों शिवाज़ियों का अलग – अलग समय पर निर्माण किया। दूसरी बात यहां पर यह भी समझने की है कि यदि लूटपाट एक अनैतिक कार्य था तो उसे समाप्त करना हमारे देश के लोगों का मौलिक अधिकार था । अपने इस मौलिक अधिकार का प्रयोग करते हुए भारत के लोग शिवाजी जैसे साहसी नेतृत्व के साथ उठ रहे थे तो यह उनका स्वराष्ट्रवाद था , स्वराज्यवाद था , स्वदेशीवाद था । भारतीय इतिहास का यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि यहां के स्वराष्ट्रवाद ,स्वराज्यवाद और स्वदेशीवाद को प्रारंभ से ही विदेशी सत्ताधीशों ने एक अपराध के रूप में परिभाषित किया । जिसे इतिहासकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से मान्यता प्रदान की । यही कारण रहा कि शिवाजी जैसे महानायक का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान समाप्त करने का हर संभव प्रयास किया गया । जबकि मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष किए जाने की राष्ट्रीय भावना को राष्ट्रधर्म के साथ या राष्ट्रभक्ति के साथ जोड़कर देखना इतिहासकार का कार्य होता है । इस कसौटी पर यदि शिवाजी और शिवाजी जैसे भारत के अनेकों स्वतंत्रता सेनानियों को कसकर देखा जाएगा तो पता चलता है कि उनका कार्य वंदनीय था , क्योंकि वह जनता को लूटपाट और मारकाट करने वाली राज्यसत्ता से मुक्त कर देना चाहते थे।
शाइस्ता खान को औरंगजेब ने शिवाजी के सर्वनाश के लिए भेजा था । औरंगजेब के लिए शिवाजी आंख की किरकिरी बन चुके थे । वह नहीं चाहता था कि शिवाजी नाम का कोई व्यक्ति उसे इस भूमंडल पर भी कहीं दिखाई दे । वह शिवाजी को ‘ पहाड़ी चूहा ‘ कहा करता था । अतः वह इस चूहे को पकड़ कर समाप्त करने की किसी भी सीमा को पार कर सकता था । शिवाजी यह भली प्रकार जानते थे कि उनका सामना किस क्रूर तानाशाही से है ? – अतः वह भी अपने स्तर पर औरंगजेब और उसके लोगों की हर चाल से सावधान रहने का प्रयास निरंतर करते रहे । 
औरंगजेब को उसकी योजना में असफल करने के लिए एक बार शिवाजी ने अपने 350 मावलो के साथ शाइस्ता खान और उसकी सेना पर हमला कर दिया था , तब शाइस्ता खान अपनी जान बचाकर भाग खड़ा हुआ । इतना ही नहीं शाइस्ता खान को इस हमले में अपनी 4 उँगलियाँ भी खोनी पड़ी । इस हमले में शिवाजी महाराज ने शाइस्ता खान के पुत्र और उनके 40 सैनिकों का वध कर दिया था । उसके बाद औरंगजेब ने शाइस्ता खान को दक्षिण भारत से हटाकर बंगाल का सूबेदार बना दिया था ।

सूरत की लूट :

औरंगजेब को उस समय आंखें दिखाना हर किसी के बस की बात नहीं थी । उसके मामा और सेनापति शाइस्ता खान को जब शिवाजी महाराज ने निर्णायक रूप से पराजित किया तो इस जीत से शिवाजी की शक्ति और भी अधिक सुदृढ़ हो गयी थी । परंतु शाइस्ता खान भी अपने स्वामी और बादशाह औरंगजेब की दृष्टि में अपना सम्मान बनाए रखना चाहता था । अतः वह भी नहीं चाहता था कि वह दक्षिण से इस ‘पहाड़ी चूहे ‘ से पराजित होकर लौटे । वह जानता था कि यदि वह पराजित होकर लौटता है तो उसका भांजा और हिंदुस्तान का बादशाह औरंगजेब उसके साथ कैसा व्यवहार करेगा ? 
अपनी इसी मानसिकता के वशीभूत होकर 6 वर्ष पश्चात शाइस्ताखान ने अपने 15,000 सैनिकों के साथ मिलकर छत्रपति शिवाजी के कई क्षेत्रों को जला कर नष्ट कर दिया था । शिवाजी ने जब शाइस्ता खान के इस दुस्साहस को देखा तो उन्हें भी यह सहन नहीं हुआ । शिवाजी ‘ जैसे को तैसा ‘ की नीति में विश्वास रखते थे । वह जानते थे कि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करने से ही दुष्ट की दुष्टता समाप्त की जा सकती है , या उसका सही प्रतिशोध उससे लिया जा सकता है ।अतः शाइस्ता खान को उसके दुस्साहस का पाठ पढ़ाने के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस भारी विनाश की क्षतिपूर्ति के लिए मुगलों के क्षेत्रों में जाकर लूटपाट आरंभ कर दी । सूरत उस समय हिन्दू मुसलमानों का हज पर जाने का एक प्रवेश द्वार था । शिवाजी ने 4 हजार सैनिकों के साथ सूरत के व्यापारियों को लूटा । उन्होंने शाइस्ता खान को बता दिया कि हिंदुस्तान में शिवाजी जैसी शक्ति के बौद्धिक चातुर्य और कूटनीतिक दांव पेंच से वह बच नहीं सकता । शिवाजी शाइस्ता खान के दुस्साहस का सही प्रतिशोध लेना जानता है और यदि उसने भविष्य में फिर ऐसी मूर्खता की तो उसे भविष्य में भी इसका सही प्रति उत्तर दिया जाएगा। मुगलों और तुर्कों का यह इतिहास रहा है कि वह जब – जब भी भारत के किसी भी कोने में हमला के लिए पहुंचे तो उन्होंने लूटपाट के पश्चात जनसंहार के भी आदेश दिए । परंतु सूरत की लूट में छत्रपति शिवाजी महाराज ने ऐसा नहीं किया , क्योंकि वह जिस परंपरा में पले और ढले थे , उसमें जनसंहार को महापाप माना जाता था । शिवाजी के इस महागुण को इतिहास में सम्मान की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। भारतीयता को सम्मानित करने और भारतीय इतिहास परंपराओं को सही संदर्भ और परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए ऐसा किया जाना नितांत आवश्यक है। शिवाजी ने सूरत को लूटा , लेकिन उन्होंने उन ठिकानों पर ही अपनी लूट को केंद्रित रखा , जहां लूटने से शाइस्ता खान को कष्ट हो सकता था या उसे नष्ट करने में उन्हें सहायता मिल सकती थी । उन्होंने जनसाधारण के साथ किसी भी प्रकार का कोई दुर्व्यवहार नहीं किया । 

आगरा में आमन्त्रित और पलायन :

औरंगजेब चाहता था कि शिवाजी को किसी भी प्रकार से गिरफ्तार कर लिया जाए । वह अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भांति – भांति के षड्यंत्र रच रहा था । इसके लिए उसने अपने कई व्यक्तियों की नियुक्ति विशेष रूप से कर दी थी । वह किसी भी प्रकार से शिवाजी को अपने दरबार में उपस्थित हुआ देखना चाहता था । अतः उसकी ओर से शिवाजी महाराज को आगरा बुलाया गया । औरंगजेब एक षड्यंत्र के अंतर्गत अपने महान शत्रु शिवाजी को अपने दरबार में एक हिंदू राजा जयसिंह की ‘ जयचंदी ‘ सोच का लाभ उठाकर उपस्थित करने में सफल हो गया । 
शिवाजी को औरंगजेब के दरबार में लाने वाला जय सिंह ही था । उसने शिवाजी का विश्वास जीता और उन्हें अपना बनाकर औरंगजेब से मिलाने की योजना समझायी । शिवाजी अपने किलेदारों को सतर्क कर और अपनी माता जीजाबाई को अपने प्रशासन की बागडोर सौंपकर आगरा के लिए जयसिंह के साथ चलने पर सहमत हो गए । माता जीजाबाई की सहायता के लिए शिवाजी ने पेशवा मोरोपंत पिंगले और सेनापति प्रतापराव गुर्जर को नियुक्त कर दिया था । शिवाजी को औरंगजेब के दरबार में ले जाते हुए अपने इस कृत्य पर जय सिंह का हृदय तो कांपता था , पर उसका मन उसे साहस बंधाता और वह शिवाजी को निरंतर मिथ्या भाषण करके भ्रमित करता जाता कि आगरा में उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाएगा । 
11 मई 1666 को जब शिवाजी औरंगजेब के दरबार में पहुंचे तो उनकी अगवानी के लिए कुमार रामसिंह और फिदाई खान को औरंगजेब की ओर से लगाया गया । मुख्य द्वार पर कुमार रामसिंह और गिरधारी लाल उन्हें लेने के लिए पहुंचे । स्वागत सत्कार के पश्चात शिवाजी महाराज अपने लिए बनाए गए एक विशेष कक्ष में चले गए । अगले दिन उन्हें दरबार में उपस्थित होने के लिए कहा गया। 
एक वर्णन के अनुसार उस दिन शहंशाह औरंगजेब का जन्म दिन था और उस दिन मुगल दरबार में उत्सव के पान बांटे जा रहे थे – सरदारों उमरावों में । शिवाजी को भी एक पान दिया गया । शहजादा ,राजाओं , सरदारों को खिलअत बांटी गई । इस पर शिवाजी दुखी और बहुत नाराज हो गए । उनकी आंखों में आंसू आ गए । शहंशाह ने यह देखकर कुमार से कहा — शिवा से पूछो उसे क्या तकलीफ है ? 
शिवाजी ने कहा — तुम देख रहे हो , तुम्हारे बाप ने देखा है, तुम्हारे बादशाह ने देखा है । मैं किस प्रकार का आदमी हूं और फिर भी तुमने जानबूझकर मुझे इतनी देर खड़े रखा । मैं तुम्हारी मनसब छोड़ता हूं । मुझे खड़ा ही रखना था तो सही सम्मानपूर्ण स्थान पर खड़ा करना चाहिए था । यह कहकर शिवाजी ने पीठ फेरी और अपनी जगह से सरदारों की पंक्ति में जाने लगे । तब कुमार ने उनका हाथ पकड़ लिया । शिवाजी ने उसे झटक दिया और एक ओर जाकर बैठ गए । कुमार उनके पीछे पीछे आए और उन्होंने शिवाजी को समझाने का प्रयास किया , पर शिवाजी ने उसकी एक न मानी । औरंगजेब शिवाजी महाराज को राजा या उसके समकक्ष मानने को तैयार नहीं था । यही कारण रहा कि उसने शिवाजी को अपने दरबार में बैठने का उचित स्थान भी नहीं दिया । अपने साथ हुए इस अपमान को देखकर शिवाजी भांप गए कि वह गलत स्थान पर आ गए हैं । उन्हें लगा कि उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया गया है । शिवाजी अपने साथ हुए इस दुर्व्यवहार को देखकर आगबबूला हो उठे । इसके विरुद्ध उन्होंने अपना रोष दरबार पर निकाला और औरंगजेब पर छल का आरोप लगाया । औरंगजेब इसी अवसर की प्रतीक्षा में था । वह चाहता था कि किसी प्रकार शिवाजी कोई ऐसा कार्य कर बैठे जिससे उन्हें गिरफ्तार करने का उसे अवसर उपलब्ध हो जाए । अतः औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया और शिवाजी पर 500 सैनिकों का पहरा लगा दिया । अब भारत के पौरुष ,वीरता और साहस का प्रतीक शिवाजी नाम का यह योद्धा तत्कालीन क्रूर तानाशाही की जेल में बंद था । क्रूर तानाशाही सोच रही थी कि इस महायोद्धा को जेल में बंद कर वह इसकी वीरता और साहस को प्रतिबंधित कर अब भारत पर निष्कंटक हो शासन करेगी , परंतु नियति कुछ और ही कराना चाहती थी । फलस्वरूप शिवाजी इस विपरीत परिस्थिति में घबराए नहीं , अपितु वह अपने कुछ अज्ञात मित्रों के सहयोग से औरंगजेब की जेल से निकलने की युक्तियां बनाने लगे । कुछ ही दिनों बाद 1666 को शिवाजी महाराज को जान से मारने का औरंगजेब ने इरादा बनाया था । लेकिन अपने बेजोड़ साहस और युक्ति के साथ शिवाजी और संभाजी दोनों कैद से भागने में सफल हो गये ।यह उनका बौद्धिक चातुर्य ,आत्मविश्वास और उनके भीतर भरे साहस का ही प्रतिफल था कि वह औरंगजेब जैसे अत्याचारी और क्रूर बादशाह की जेल से मुक्त हो कर भागने में सफल हो गए । बादशाह औरंगजेब को शिवाजी महाराज के बौद्धिक चातुर्य के सामने झुकना पड़ा और वह बहुत काल पश्चात तक भी यह समझ नहीं पाया था कि अंततः शिवाजी उसके जेल से भागने में सफल कैसे हुए ,? 
औरंगजेब की जेल से सफलतापूर्वक भाग निकलने के पश्चात छत्रपति शिवाजी महाराज ने संभाजी को मथुरा में एक ब्राह्मण के यहाँ छोड़ दिया था । स्वयं शिवाजी महाराज बनारस चले गये थे और बाद में सकुशल राजगढ आ गये । शिवाजी महाराज को जेल से भगाने में औरंगजेब ने जयसिंह पर संदेह व्यक्त किया और उसने विष देकर उसकी हत्या करा दी । जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद शिवाजी ने मुगलों से दूसरी बार संधि की । 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लूटा था, यहाँ से शिवाजी को 132 लाख की संपति हाथ लगी और शिवाजी ने मुगलों को सूरत में फिर से हराया था ।

शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक :

सन 1674 तक शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था जो पुरंदर की संधि के अन्तर्गत उन्हें मुगलों को देने पड़े थे । अब शिवाजी स्वयं को विधिवत राजा घोषित करने की योजना पर विचार करने लगे । यह अब उनके लिए उचित भी था। उन्होंने पिछले कई वर्षों से जो संघर्ष मां भारती की सेवा के लिए किया था उसका उचित पुरस्कार उन्हें मिलना ही चाहिए था । वह अब राजा बनने की सारी योग्यताओं को पूर्ण कर रहे थे । अतः उन्होंने एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन अपने राज्याभिषेक के लिए कराने की तैयारियां करनी आरंभ कीं। बालाजी राव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड़ के सिसोदिया वंश से मिलते हुए प्रमाण भेजे थे । इस कार्यक्रम में विदेशी व्यापारियों और विभिन्न राज्यों के राजदूतों को भी बुलाया गया था । शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण की और काशी के पंडित भट्ट को इस समारोह में विशेष रूप से बुलाया गया था । शिवाजी के राज्याभिषेक करने के 12 वें दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया था और फिर दूसरा राज्याभिषेक हुआ ।
कुछ लोगों ने यहां पर शिवाजी महाराज की जाति का प्रश्न उठाया है और यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि उनकी जाति क्षत्रिय नहीं थी , या वह किसी क्षत्रिय कुल या राजवंश से संबंध नहीं रखते थे , इसलिए उनका राज्याभिषेक नहीं हो सकता था । जो लोग ऐसा प्रश्न उठाते हैं या करते हैं उन्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि भारतवर्ष में वैदिक राज्य व्यवस्था के अंतर्गत किसी भी राजा की जाति कभी नहीं पूछी गई । यहां पर केवल वर्ण देखा गया और क्षत्रियोचित गुणों के किसी भी व्यक्ति को राजा बनने के लिए सुपात्र माना गया शिवाजी महाराज क्षत्रियोचित्र गुणों से भरे हुए थे ।
अतः उनके राजा होने पर कोई प्रश्न नहीं कर सकता था, यद्यपि उस समय कुछ लोगों ने ऐसे प्रश्न किए हैं। हम इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे हैं ,परंतु यह प्रश्न करना भारतीय वैदिक संस्कृति का विकृतिकरण था ।इसे संस्कृतिबोध नहीं कहा जा सकता । भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में ऐसा प्रश्न निरर्थक ही माना जाएगा । दूसरी बात यह है कि जो लोग छत्रपति शिवाजी महाराज की जाति के प्रश्न को कहीं अधिक गंभीर मानते हैं ,और इसी आधार पर उन्हें अभी तक राजा न मानने का प्रमाण पत्र लिए घूम रहे हैं । उनसे हम यह भी पूछ सकते हैं कि जिन विदेशी आतंकवादी हमलावर लोगों के वह गुणगान करते हैं , वह कौन सी जाति के थे और कौन से राजघराने के थे ?- उनमें से कई ऐसे थे जो डाकू दल के नेता के रूप में भारत में घुसे और यहीं पर उन्होंने छोटा-मोटा अपना राज्य खड़ा कर स्वयं को नवाब ,सुल्तान या बादशाह घोषित कर दिया । यदि वे अपने बाहुबल और तथाकथित क्षत्रियबल से साम्राज्य खड़ा करने की योग्यता रखते थे तो शिवाजी महाराज ऐसी योग्यता के पात्र क्यों नहीं ? अतः हमारा मानना है कि शिवाजी महाराज के बारे में उनकी जाति के संबंध में कोई प्रश्न करना भारतीय इतिहासकारों को शोभा नहीं देता ।

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