लेखक परिचय

विनोद कुमार सर्वोदय

विनोद कुमार सर्वोदय

राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक ग़ाज़ियाबाद

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आओ हमें गालियां दो , जलील करो , नोचों-खरोचों, लात मारों ,घायल करो या हमारे प्राण भी ले लो , हम “आह” भी नही भरेंगे….हमारे हेल्मेट, सुरक्षा कवच व हथियार आदि भी लुट लो हम “उफ” भी करें तो कहना… ?…. क्योंकि हम तो संयम में रहकर धैर्य के बड़े बड़े कीर्तिमान बनाते आये है और बनाते रहेंगे….
1947-48 में पाकिस्तानी शत्रुओं ने हमारे कश्मीर का एक तिहाई भाग लगभग 75 हज़ार वर्ग किलोमीटर पर कब्जा कर लिया फिर भी हमने उनको उसी स्थिति का लाभ देकर युद्ध विराम करके हथियार डाल दिये… 1962 में चीन से पिटे और 37 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक का कश्मीरी भूभाग और गंवा बैठे…1965 में भी हमने अपनी वीरता की गाथा को लिखने के लिये “ताशकंद समझौता” किया जिसमें जीते हुए युद्ध को भी समझौते की पटल पर हार गये… और फिर 1971 में हाथ आये शत्रुओ के लगभग 93000 हज़ार कैदियों के साथ अतिथि सत्कार का धर्म निभाते हुए उनकी अच्छी आवभगत करके बाद में बिना शर्त उनको मुक्त कर दिया…इस पर भी अभी शेष है कि 1999 में करगिल में पहले ह्रमारे युवा सैनिक मरते रहें और जब मारने की स्थिति में आये तो ‘सेफ पैसज’ देकर शत्रुओं को सुरक्षित कर दिया पर अपनी “विजय” का डंका आज तक पीटने में गर्वित होते रहें ..2001 में ग्यारह माह सीमाओं पर सेना तैनात रही परंतु किसी की क्या हिम्मत जो एक भी गोली शत्रु के सीने को छलनी करने के लिए चलाई हो ! निसंदेह देश की जनता को अपने सुरक्षाबलों पर पूरा भरोसा है फिर इतना संयम क्यों ?
यह अधिकांश सैनिकों की पीड़ा है….जो उनके मन-मस्तिष्क से निकल नही पा रही । विभिन्न अवसरों पर ऐसे भी समाचार आते रहते है कि ऐसी परिस्थितियों के शिकार सैनिकों के मनोबल को बनाये रखने के लिए मनोचिकित्सको की भी सेवायें ली जाती है। जबकि हमारे राजनेता अपनी भीरुता को छिपा कर सैनिको के पिटते और मरते रहने पर भी अपनी अपनी राजनीति को निखारते रहते है । साथ ही तथाकथित बुद्धिजीवी व मीडिया जगत भी ऐसे राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बंधित विषयों पर मौन रहकर अपने देशी-विदेशी प्रायोजकों और आकाओं को भी प्रसन्न रखते है।
राष्ट्र रक्षा के लिए संवैधानिक शपथ से बंधे हुए जवान जब किसी सैनिक बल का भाग बनते है तो अपने आप को गौरवान्वित पाते है। उस युवा के माता-पिता, भाई-बहन व अन्य परिवारजन एवं मित्रगण सबको गर्व होता है । बड़ी बड़ी कठिनाइयों और भारी विपदाओं में रहकर प्रशिक्षण पाने वाले सैनिको को अपने अपने शौर्य प्रदर्शन की निरंतर प्रतीक्षा होती होगी ? क्यों न हो वस्तुतः राष्ट्र अपनी सुरक्षा के लिए अपने वीर पुत्रों पर ही तो निर्भर करता है। किसी भी देश की सेनायें व अन्य सुरक्षा बल अपने- अपने देश की संप्रभुता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए पूर्णतः कटिबद्ध होते है। इसी प्रकार “भारत” जो एक स्वतंत्र राष्ट्र है कि सुरक्षा का उत्तरदायित्व भी तो उसके सैनिकों व अर्धसैनिक बलों का ही तो है ।
संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर की जयंती प्रत्येक वर्ष धूम-धाम से बनाई जाती है। परंतु उस संविधान की शपथ लेने वाले नेता सेनाओं को राष्ट्र की सुरक्षा के लिये उसका लेशमात्र भी अनुसरण करने का अधिकार नही देते, क्यों ? लोकतंत्र की यह कैसी विडंबना है कि केंद्रीय व राज्य सरकारों के अधीन आने वाले सभी सुरक्षा बल उसमे चाहे सेना, अर्धसैनिक बल व पुलिस आदि हो सभी के हाथ बंधे हुए है । यह एक राजनैतिक विवशता बन गई है कि अपराधी, देशद्रोही और आतंकवादी कितने ही बड़े बड़े अपराध करता रहें परंतु उदारता व संयम की ढाल बना कर सैनिकों को पलटवार करने से रोका जाता आ रहा है। कभी छदम धर्मनिरपेक्षता तो कभी मानवाधिकार आगे आ जाते है। परंतु उन सब आपराधिक व आतंकी घटनाओं से पीड़ित सैनिकों व उनके परिवारों तथा सामान्य नागरिको के मौलिक व संविधानिक अधिकारों का कोई महत्व नही…क्यों ? महान आचार्य चाणक्य के अनुसार “संसार में कोई किसी को जीने नही देता, प्रत्येक व्यक्ति / राष्ट्र अपने ही बल व पराक्रम से जीता है।” यह संदेश हमको बहुत कुछ सोचने और करने का आह्वान करता है ।
विश्व के सभी देश अपने अपने नागरिकों के महत्व को समझते है और उसकी रक्षा के साथ साथ उसके समस्त मौलिक अधिकारों को यथा संभव सुरक्षा प्रदान करने के लिए संकल्पित है। परंतु हम सत्तर वर्ष के अपने स्वतंत्र राष्ट्र में इतने बौने हो गए है कि सैनिको का मान-मर्दन होता रहें और हम चिंता व निंदा करके केंडिल मॉर्च से अपने अपने दायित्व से मुक्त हों कर मीडिया में श्रद्धांजलियां देते हुए छपते रहना चाहते है । आज के सोशल मीडिया ने तो इस चलन की बाढ़ आती जा रही है ,यह कैसी राष्ट्रपरायणता है जो मानवीय संवेदनाओं से भी प्रचार की होड़ करवाती है । क्या पीड़ित हृदयो में आंसुओ का अकाल हो गया है या ह्र्दय ही इतना कठोर होता जा रहा है कि हमारी सुरक्षा में लगे इन सैनिकों को आक्रोशित हों कर भी आत्मग्लानि में जीने को विवश होना पड़ें ?
वर्षो से नक्सलवाद हो या माओवाद और आतंकवाद हो या अलगाववाद सभी का एक ही ध्येय है कि शेष अखंड भारत को खंड खंड करके अनेक भाग बना दो…?…इसके लिए राष्ट्रद्रोहियों के सभी हिंसक व अहिंसक समूह सक्रिय है । उसमें जेएनयू , जाधवपुर व हैदराबाद आदि विश्वविद्यालयों के “भ्रमित नही” बल्कि अपनी देशद्रोही मानसिकता “देश की बर्बादी” के प्रति जागरुक व समर्पित भाड़े के अराजक तत्वों का पूरा योगदान है। यह कैसी विवशता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अहिंसक आंदोलनों से देश की बर्बादी की जंग लड़ने वालों के कथित राष्ट्रद्रोह पर हमारा संविधान उदासीन है …क्यों..? क्या यह संविधानिक उदासीनता उन हिंसक आतंकवादियों, नक्सलवादियों , देशद्रोहियो व पत्थरबाजों को अप्रत्यक्ष कुप्रोत्साहित नही कर रहीं ?
ऐसी विपरीत परिस्थितियों में कश्मीर में भाड़े के पत्थरबाजों को उकसाना और उन्हें भारत विरोधी अभियान चलाने के लिए प्रेरित करते रहना उतना ही सरल हो गया है जितना कि देश के अनेक विद्यालयों और विश्विद्यालयों में छात्रों और छात्राओं की मानसिकता को राष्ट्रवाद से दूर करना। हम अपने धर्मनिरपेक्ष देश मे जब संविधान को ही धर्म ग्रंथ मानते है तो उसका पूर्णतः पालन तो करें । हमारे संविधान ने उपरोक्त समस्त समस्याओं पर कठोर विधि-विधान की व्यवस्था करके सरकार को उचित समयानुसार कार्यवाही करने के अधिकार दिये है , तो फिर अगर-मगर क्यों ?
क्या राष्ट्रवाद का ढिंढोरा पीटते पीटते राष्ट्रवादियों के वोटों की फसल पकाओ और काटो परंतु जब प्रहार का अवसर मिलें या आये तो कठोर शब्दों में केवल उत्साहवर्धक वक्तव्य देकर बगलें झांकने लग जाओ ? धैर्य व संयम की भी तो कोई सीमा होती होगी ? अतः राष्ट्रवादियों के आत्मबल को जगाने व उनके मनोबल को बनाये रखने के लिये सुरक्षाबलों का संवैधानिक सदुपयोग करके शत्रुओं पर प्रभावकारी प्रहार तो करना ही होगा ।

विनोद कुमार सर्वोदय

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