एक संत का अहिंसक आंदोलन

जन्मदिन 11 सितम्बर पर विशेष

कुमार कृष्णन

महात्मा गांधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी एवं महान स्वतंत्रता सेनानी विनोबा भावे ने देश में अपने भूदान आंदोलन की शुरुआत ऐसे समय की जब देश में जमीन को लेकर रक्तपात होने की आशंका उत्पन्न हो गई थी। तेलांगना के पोचमपल्ली में आज से 66  साल पूर्व हुए पहले भूदान के बाद आचार्य बिनोवा भावे देश भर की पूरी यात्रा करके ही रुके। पवनार से शिवरामपल्ली, फिर पोचमपल्ली होते हुए पवनार लौटे। इस बीच भारत सरकार ने योजना आयोग की बैठक में बिनोवा को देश की भावी अर्थ रचना और योजना के बारे में चर्चा के लिए बुलाया। बिनोवा पवनार से योजना आयोग की बैठक में भाग लेने के लिए पदयात्रा करते हुए दिल्ली पहुंचे, पर योजना आयोग के साथ चर्चा का कोई परिणाम नहीं निकला। बिनोवा जी देश के असली मालिक को ही जगाने में जुट गए। बिनोवा भावे नवंबर 1951 में पूरे उत्साह के साथ दिल्ली से उत्तर प्रदेश की ओर पद यात्रा पर निकल पड़े। पूरे देश की नजर बिनोवा के भूदान यज्ञ की ओर टिक गयी। आम लोगों के बीच खासकर ग्रामीणों तक यह खबर फैल गयी थी कि कोई संत निकला है, जो दान में भूमिहीनों के लिए जमीन मांगता है और कहता है कि हवा, पानी और आसमान की तरह जमीन भी ईश्वर की ही बनायी हुई है। वह सबके लिए है।

जब बिहार में बिनोवा ने भूदान यात्रा शुरू की, तब झाररखंड नहीं बना था और उसका क्षेत्र संयुक्त बिहार में ही शामिल था। बिहार में भूदान और ग्रामदान अभियान के लिए बिनोवा  छह बार आए और गए। सबसे पहली बार 14 सितम्बर 1953 में वे बिहार आए और 31 दिसम्बर 1954 तक रहे। इसके बाद उनकी यात्रा का दूसरा चरण 25 दिसम्बर 1960 से शुरू हुआ और 9 फरबरी 1961 तक चला। तीसरा चरण 24 अक्टूवर 1962 से 9 नवबंर 1962 तक रहा। चौथा चरण सबसे कम दिनों का रहा। ये चरण 10 अगस्त 1963 से 12 अगस्त 1963 तक चला। इसके बाद वे ग्रामदान के लिए दो बार बिहार आए। इस यात्रा को ग्रामदान तूृफान यात्रा कहा जाता है। इस यात्रा के तहत पहली बार 11 सितम्बर 1965 को आए और 15 मार्च 1966 तक रहे। इस यात्रा का दूसरा चरण 16 मार्च 1966 से शुरू हुआ जो 30 अक्टूवर 1969 तक चला।

आचार्य बिनोवा जब उत्तर प्रदेश यात्रा पर थे तब तक किसी ने उनकी बिहार यात्रा के बारे में सोचा भी नहीं था, लेकिन इसके पहले रचनात्मक शिवरामपल्ली में मार्च 1951 में आयोजित तीसरे सर्वोदय समाज सम्मेलन में बिहार में सभी कार्यक्रमों के प्रमुख लक्ष्मी बाबू, अखिल भारतीय चरखा संघ के अध्यक्ष घीरेन्द्र मजूमदार से मिले और उनसे कहा कि लगता है कुछ होनेवाला है। मजूमदार ने लक्ष्मी बाबू से कहा कि नई क्रांति आ रही है और इसका नया आधार पहले से तैयार करना होगा। बिहार में ऐसा कोई आधार खड़ा कीजिए, सेवाग्राम में वह आधार नहीं बन सकता है। लक्ष्मी बाबू ने घीरेन्द्र भाई की बात मान ली और उनको बिहार आने का निमंत्रण दिया। फिर दोनो ने मिलकर बिहार में खादीग्राम को स्थापित किया, जो भूदान आंदोलन को चरम तक पहुंचाने का आधार बना।

तेलांगना से उत्तर प्रदेश तक की भूदान यात्रा एकाकी थी। रास्ते में रचनात्मक कार्यकर्ता और कांग्रेसजन अपने-अपने क्षेत्र में बिनोवा को सहयोग देते थे। भूदान प्राप्त करते थे, लेकिन वह बिनोवाजी का एकाकी संकल्प भर ही था। अप्रैल 1952 में सेवापुरी उत्तर प्रदेश में हुए चौथे सर्वोदय समाज सम्मेलन में सर्व सेवा संघ ने इसे अपने कंधे पर उठा लिया और अगले दो सालों में पूरे देश भर में 25 लाख एकड़ भूदान प्राप्त करने का संकल्प किया। इसी सम्मेलन में बिहार से कुछ अग्रणी समाज सेवक लक्ष्मी बाबू, घ्वजा बाबू, रामदेव बाबू और वैद्यनाथ बाबू आये थे। इन सभी का इरादा बिनोवा जी को बिहार लाना था। बिनोवा से इन नेताओं ने वादा किया कि वे बिहार में एक लाख एकड़ जमीन भूदान में हासिल करेंगे, लेकिन बिनोवा ने चार लाख एकड़ की बात कही। यह सबक बिहार के इन नेताओं के लिए काफी मुश्किल था। इसके बावजूद इन नेताओं ने बिनोवा की बात कबूल कर ली। इस तरह बिहार में बिनोवा जी का आना तय हो गया।

 

 

ऐसी स्थिति में भूदान यज्ञ के लिए अक्टूबर 1952 में संगठनात्मक तैयारी पर जोर दिया गया। कांग्रेसजनों से सहयोग की अपील की गयी। बिहार कांग्रेस कमेटी ने फरबरी 1953 तक चार लाख एकड़ भूदान प्राप्ति तक प्रस्ताव किया। बिहार के बड़े कांग्रेसी नेता और सरकार चला रहे श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिंह ने भूदान आंदोलन को अपना समर्थन दिया। सबसे बड़ी बात कि महान समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण को भी भूदान आंदोलन में समाजवाद की चाभी मिलती नजर आयी। वे भूदान आंदोलन में कूद पड़े। बिहार खादी समिति और बिहार  गांधी स्मारक निधि ने भी भूदान कार्य में अपने को पूरा झोंक दिया। प्रांतीय भूदान आंदोलन समिति के लक्ष्मी बाबू सहित रामदेव बाबू, ध्वजा बाबू, रामाचरण बाबू, गजानंन दास, गोपाल झा शास्त्री, भवानी सिंह, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सहरसा, रांची जिलें पूरी तरह से सक्रिय हो गए। इसके अलावा संथालपरगना में मोतीलाल केजरीवाल, शाहाबाद में प्रद्युम्न मिश्र, भागलपुर में  बोधनारायण मिश्र, शुभकरण चुड़ीवाला, मानभूमि में लालबिहारी सिंह और शीतल प्रसाद तायल, सारण जिले में हीरालाल सर्राफ, पटना जिले में अवध बिहारी सिंह, पूर्णिया जिले में वैद्यनाथ प्रसाद चैधरी, चंपारण जिले में बिहार कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पंडित प्रजापति मिश्र ने भूदान आंदोलन में खुद को झोंक दिया। मुंगेर जिले में खादीग्राम भूदान आंदोलन का केन्द्र बन गया। दादा धर्माधिकारी, विमला ठकार, शंकरराव देव और धीरेन्द्र भाई जगह- जगह सभाएं करने लगे, जिससे भूदान आंदोलन के अनुकूल माहैाल बनने लगा था।

कांग्रेस, प्रजा समाजवादी दल और सर्वोदयी नेताओं और रचनात्मक कार्यकर्ताओं के समर्थन तथा सहयोग से बिनोवा का भूदान आंदोलन तेज हो गया, लेकिन साम्यवादी कार्यकर्ताओं का विरोध तेज हो गया था। तेलांगना में उनके द्वारा चलाए गए सशस्त्र संघर्ष की पृष्ठभूमि में भूदान आंदोलन के शुरू होने से वे सक्रिय विरोध में सामने आ गए थे जबकि उत्तर प्रदेश के साम्यवादियों ने बिनोवा के अभियान का समर्थन किया था। बिहार में साम्यवादियों की शिकायत थी कि भीख मांगने  से क्रांति नहीं आ सकती है। बिनोवा ने बिहार प्रवेश से पहले ही दिन दुर्गावती में कहा था कि-‘ कम्युनिष्टों का कहना है कि इससे क्रांति रूक जाएगी। वे जानते नहीं कि क्रांति किस चिड़िया का नाम है। वे कहते हैं कि मार्क्स ने जो शास्त्र बनाया है, उसी के अनुसार क्रांति होगी। मैं उनसे कहना चाहता हूं कि हिन्दुस्तान में क्रांति किस ढंग से हो सकती है। यह मैं आपसे बेहतर जानता हूं। मैं वेदों से लेकर गांधी तक के सारे विचार घोलकर पी गया हूं। सब विचारों का अध्ययन किया है। इस देश का अपना ढंग है, अपना मिशन और अपना धर्म है, जब सारी दुनिया घोर अंधकार में डूबी हुई थी, तब यहां आत्मज्ञान का स्वच्छ प्रकाश फैला हुआ था। वेदांत समझे  बिना यहां कोई भी क्रांति नहीं हो सकती है। अगर आप आत्मा के टुकड़े करेंगे, वर्ग बनाएंगे और कटुता तथा द्वेष फैलाएंगें तो उससे क्रांति नहीं होगी।’ कम्युनिष्टों के विरोध के बावजूद बिनोवा कहते रहे कि मैं भूमिहीनों के लिए भीख नहीं, उनका हक मांगने आया हूं। यह बात मैं न चीन से लाया हूं, न रूस से बल्कि इसी आर्य भूमि से लाया हूं।बक्सर जिले में पहुंचने के बाद बिनोवा जेल में नजरबंद कम्युनिष्ट भाईयों से मिले वहां कम्यूनिष्टों द्वारा यह पूछे जाने पर कि तेलांगना से ही आपको भूदान यज्ञ की प्रेरणा मिली तो बिनोवा ने साफ किया था कि भूदान यज्ञ का आरंभ तेलांगना में जरूर हुआ, लेकिन कम्युनिष्टों के कारण नहीं हुआ। भूदान यज्ञ की बात  मेरे मन में चार-पांच सालों से चल रही थी, जब मैं दिल्ली में मेवातों और शरणार्थियों के बीच काम कर रहा था, यह समस्या मेरे सामने खड़ी हुई, तब से मैं इस पर सोचता रहा। तेलांगना में उपाय हाथ आया। बिनोवा के इन विचारों के कारण धीरे-धीरे कम्युनिष्टों का विरोधभाव काफी ठंडा हो गया था और भूदान आंदोलन उत्तरोत्तर आगे की ओर बढ़ता चला गया।

बक्सर के बाद पटना होते हुए बिनोवा गया पहुंचे, जहां बोधगया में जिले के करीब पांच सौ कार्यकर्ता जमा हुए। सबों ने एक लाख एकड़ भूमि भूदान में प्राप्त करने का संकल्प किया। इस संकल्प की पूर्ति के बिनोवा जी ने गया जिला भूदान यज्ञ समिति गठित की और जिले के एक मध्यमवर्गीय जमींदार, भूदान यज्ञ  के बड़े सहयोगी और समर्थक गौरीशंकर शरण सिंह को इस समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया। इसके अलावा अपने निजी सचिव दामोदार दास मूंदड़ा को गया जिले के कार्य के लिए छोड़ दिया। यहां तक कि अपने पूरे परिवार को भूदान के काम में झोंक डाला।विदित हो यही भूदान यज्ञ समिति बाद में बिहार भूदान यज्ञ समिति में तब्दील हो गयी थी, जो आज भी सक्रिय है।

गया जिला में भूदान के काम को सुनिश्चित कर बिनोवा जी दूसरे जिलों की ओर बढ़े। गया के बाद पलामू जिले की यात्रा शुरू हुई फिर रांची जिले की। ग्यारह दिनों की पदयात्रा के बाद बिनोवा लोहरदग्गा गए, वहां से सिंहभूम जिले में पदयात्रा आरंभ हुई।उनकी यात्रा से भूदान प्राप्ति में अच्छी प्रगति होने लगी थी, लेकिन चांडिल पहुंचते-पहुंचते उनकी हालत गंभीर हो चली थी। 106 डिग्री बुखार रहने लगा था। उन्होंने दवा लेने से इंकार कर दिया  लेकिन राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू, श्रीबाबू, ध्वजा बाबू के निवेदन पर दवा इस्तेमाल के लिए राजी हो गए। धीरे- धीरे उनके स्वास्थ्य में सुधार होने लगा। बिनोवा जी के चांडिल में रहते हुए सर्वोदय समाज का पांचवा वार्षिक सम्मेलन सात से नौ मार्च 1953 में हुआ। इसमें राष्ट्रपति डाॅ राजेन्द्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण ने भाग लेकर सम्मेलन को महत्वपूर्ण बनाया। बिनोवा ने इस सम्मेलन में देश भर से आए प्रतिनिधियों को अपने- अपने प्रांत जाकर अपना पूरा समय एक साल तक भूदान कार्य के लिये देने की अपील की। साथ ही भिन्न- भिन्न प्रांतों के कुछ लोगों को बिहार में भी अपना समय देने की सलाह दी। चांडिल में 87 दिनों तक ठहरने के बाद मानभूमि जिले की ओर गए। वहां से हजारीबाग जिले में प्रवेश किया, जहां दो बड़े महारथियों का दबदबा था। इनमें एक बिहार के राजस्व मंत्री कृष्णवल्लभ सहाय और रामगढ़ के राजा कामाख्या नारायण सिंह थे। दोनों  भूदान कार्य के बड़े सहयोगी थे, लेकिन दोनों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा  भी चरम कोटि की थी। हजारीबाग में आयोजन संबधी भार राजा कामाख्या नारायण सिंह पर था। उनके विशेष आग्रह पर ही बिनोवा जी हजारीबाग जिला आ रहे थे, लेकिन यह बात उस क्षेत्र में कांग्रेसवालों को बहुत खटक रही थी। मुख्यमंत्री श्रीबाबू के आ जाने के बाद स्थिति अनुकूल हुई।

हजारीबाग में 21 दिनों की पदयात्रा के बाद बिनोवा जी फिर गया पहुंचे। अब तक गया जिला पूरे भारत का मोर्चा बन चुका था। यहां दामोदर दास मुंदड़ा के संयोजन में जिले के नेता और कार्यकर्ता पूरी तरह सक्रिय थे। बिनोवा के पवनार आश्रम और वर्धा से लोग पहुंच गए थे। स्कूल, काॅलेज के नौजवान भी भूदान कार्य में जूट गए थे। गया जिला उस वक्त न केवल बिहार अपितु संपूर्ण देश की प्रयोग भूमि बना हुआ था। गया जिले में इस बार की पदयात्रा के दौरान खास महत्वपूर्ण घटना यह थी कि बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने 32 लाख एकड़ भूदान प्राप्त करने का संकल्प किया। बिहार में बिनोवा जी की आठ माह की पदयात्रा और चांडिल सर्वोदय समाज सम्मेलन से जैसा वातावरण बन चुका था, उसमें प्रदेश कांग्रेस को अब 32 लाख एकड़ भूदान कराने की प्रेरणा हुई। गया जिले में 27 दिनों के कार्यक्रम के बाद बिनोवा जी पलामू जिले की ओर गए, जहां रंका में बिनोवा जी दो दिन ठहरे। रंका के राजा गिरिवरनारायण सिंह ने अपनी काश्त जमीन का छठे हिस्से का दानपत्र अर्पित करते हुए बिनोवा जी से कहा कि-‘ हम जोत जमीन का दान दे रहे हैं परती जमीन नहीं दे रहे हैं।’ बिनोवा जी ने कहा कि आप सारी परती जमीन भी हमें दे दीजिए। इस पर राजा साहब ने पूछा कि परती जमीन आप लेकर क्या करेंगे? बिनोवा जी ने कहा प्रति जमीन लेकर आप ही रखकर क्या करेंगे? इस पर रंका के राजा ने अपनी सारी प्रति जमीन सहित कुल एक लाख दो हजार एक एकड़ जमीन दान में दे दी।पलामू के बाद वे फिर रांची गए और यहां उन्होंने बिहारवासियों के नाम एक पत्र जारी किया। पत्र में उन्होंने लिखा-‘ मैं भूदान के सिलसिले में बिहार प्रदेश की यात्रा कर रहा हूं। बिहार से मैंने 32 लाख एकड़ की मांग की है जो भूमिहीनों में बांटी जा सके। अब यह तो नहीं हो सकता कि मै खुद हर गांव पहुंचूं। इसलिए मेरा आपसे निवेदन है कि आप ही अपनी जमीन दानपत्र हमारे कार्यकर्ता के पास पहुंचा दे। मैं यह भी चाहता हूं कि आप दूसरों से जमीन दिलाने का काम करें। हमारी यह प्रेम की मांग है। हमारा भरोषा है कि जैसे अहिंसा की ताकत से हमने राजनीतिक आजादी हासिल की। वैसे आर्थिक आजादी का मसला भी आप हम मिलकर हल कर लेंगे।’

गया जिले के तीसरी बार की पदयात्रा के बाद बिनोवा जी पटना पहुंचे। पटना में दूसरी बार की यात्रा थी जो ग्यारह दिनों तक चली। पूरे प्रांत में भूदान प्राप्ति में गति आ गयी थी, लेकिन पटना में निराशा ही हाथ लगी। ऐसे में बिनोवा जी ने पटना में काम कर रही एक अच्छी और समर्पित टीम को गया जाकर संकल्पपूर्ति में जुट जाने कहा।यहां के बाद दक्षिणी मुंगेर में बिनोवा जी की पदयात्रा शुरू हुई। यहां श्रीकृष्ण बाबू के जन्मग्राम माउर में कार्यक्रम रखवाया। इसके बाद वे खादीग्राम जमुई पहुंचे, जो भूदान क्रांति का आधार बन गया था। दक्षिणी मुंगेर के बाद संथालपरगना जिले का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। यहां मोतीलाल केजरीवाल अग्रणी स्वतंत्रता सेनानी त्याग और सेवा के मूर्तिमान रूप थे। उन्होंने अपनी संपत्ति और परिवार को गांधीजी के काम में होम कर दिया था। उन्होंने जगह-जगह आश्रम स्थापित कर रखे थे और हर जगह कार्यकर्ता खड़े किए थे।ऐसे समर्थ और समर्पित व्यक्तित्व और उसके साथ सेवकों की एक बड़ी फौज भूदान कार्य के लिए उपलब्ध थी। इस जिले में मोतीबाबू के अलावा सत्यम भाई और बिहार सरकार के वरिष्ठ मंत्री पंडित विनोदानंद झा भी जुटे हुए थे। अपनी यात्रा के क्रम में बिनोवा देवघर पहुंचे। देवघर का शिवलिंग जो वैद्यनाथ के नाम से विख्यात है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक है। लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन-पूजन को आते हैं, लेकिन मंदिर में जाहिरा तौर पर हरिजन प्रवेश निषिद्ध था। हालांकि अमल में शायद ही किसी की रोकटोक हुई हो। बिनोवा जी दर्शन को जानेवाले नहीं थे, लेकिन सरदार पंडा ने उन्हें मंदिर आने का आमंत्रण दिया और यह भी आश्वस्त किया कि मंदिर में दर्शन में कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। बिनोवा जैसे ही मंदिर के द्वार पर पहुंचे।  कट्टरपंथी पंडों ने उनपर हमला कर दिया, लेकिन बिनोवा बचा लिये गए। इसके बावजूद एक तमाचा उनके बांये कान पर लग ही गया, जिससे उनके कान का परदा फट गया और सुनने की शक्ति चली गयी। इसके पहले पंडों ने महात्मा गांधी को भी नहीं बख्शा था। उनकी कार पर भी चट्टान फेंकी गयी थी। कट्टरपंथी पंडों के हमले को प्रसादी बताते हुए बिनोवा दक्षिण भागलपुर की ओर प्रस्थान कर गए। इधर देवघर की घटना पर देश भर में गहरी प्रतिक्रिया हुई और पंडों ने अपनी तरफ से हरिजनों के लिए दरबाजे खोल दिए।

दक्षिणी भागलपुर में 22 दिनों की पदयात्रा के बाद बिनोवा फिर दक्षिणी मुंगेर में आए। मुंगेर में बिनोवा जी ने कहा- ‘जिस अहिंसा का प्रयोग बुद्ध और महावीर ने किया, उसे ही महात्मा गांधी ने सामूहिक रूप दिया। लाखों लोगों ने इसको अपनाया। जहां जोरो से हवा आती है, वहां केवल परिंदे ही नहीं पत्ते भी उड़ते हैं,पर जैसे ही आंधी रूकती है तो पत्ते गिर जाते हैं और सदैव उड़नेवाले परिंदे उड़ते ही रहते हैं। महात्मा गांधी के चले जाने के बाद हम सब सुस्त हो गए, पर यह भूदान आया और चल रहा है। हमें एक लाख दानपत्र मिले हैं। यह कोई छोटी बात नहीं। जैसे गरमी में तपी हुई जमीन बारिश की राह देखती और बारिश होते ही उसे चूस लेती है। वैसे ही युगधर्मानुसार युग प्रर्वतक कार्यसाधक विचार रखने पर जो लोग चिंतनशील नहीं होते हैं, वे भी उसे सुनने के लिए उत्सुक होते हैं और मुझ जैसा योगी त्याग का संदेश सुनाने आता है तो लोग उसका उपकार मानते हैं।’

दक्षिणी मुंगेर में 17 दिनों पदयात्रा के बाद बिनोवा जी उत्तर बिहार की ओर बढ़े। मोकामा, बेगूसराय होते हुए बिनोवा जी ने पूर्णिया जिले में प्रवेश किया। पहला पड़ाव कुरसेला में था, जहां गंगा और कोसी का संगम है। बैद्यनाथ बाबू का यह अपना जिला था। पहले पड़ाव पर ही उनका स्वागत 3,334 दानपत्रों से किया गया इसमें 13,614 एकड़ जमीन थी। इसके बाद दरभंगा महराज कामेश्वर सिंह ने कुरसेला आकर एक लाख अठारह हजार एकड़ का दानपत्र बिनोवा जी को समर्पित किया। महाराजा ने यह दान बिना मांगे स्वयं प्रेरित होकर दिया था। साथ ही दान की सारी जमीन का पूरा-पूरा ब्यौरा दानपत्र के साथ दिया था। उन्होंने बिनोवाजी को लिखित वचन दिया था कि अगर कोई अनधिकृत जमीन भूल से दान में आ गयी हो तो उसके एबज में दूसरी सही जमीन दे देंगे। पूरे ब्यौरे के साथ यह दान प्राप्त होने की वजह से जब भूमि वितरण कार्यक्रम आगे शुरू हुआ तो दरभंगा राज वाली जमीन का वितरण करना काफी सुगम रहा। पूर्णिया जिले में दूसरा पड़ाव टीकापट्टी में रहा। आजादी की लड़ाई के दिनों से ही वैद्यनाथ बाबू का यहां आश्रम था, जो तमाम उनकी राष्ट्रीय प्रवृतियों का केन्द्र रहा। पूर्णिया जिले की अठारह दिनों की पदयात्रा के बाद बिनोवा जी ने सहरसा जिले में प्रवेश किया। वैसे दक्षिण बिहार में ही पड़ावों पर समर्पित होनेवाले दानपत्रों की संख्या बढ़ चुकी थी। पूर्णिया, सहरसा और बाद में दरभंगा जिले में मानो दानपत्रों की वर्षा ही शुरू हो गयी। दानपत्र मांगनेवालों की ही कमी थी, देनेवालों की नहीं। जहां भी बिनोवा जी जाते, रास्ते में और पड़ावों पर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती। इसके बाद बिनोवा ने मुजफ्फरपुर जिले में प्रवेश किया। दस दिनों के कार्यक्रम के बाद बिनोवा जी गंगा नदी पारकर पटना आए। पटना जिला में बीस दिनों का  कार्यक्रम रहा, लेकिन मिला 657 दानपत्रों से 657 एकड़ का भूदान। बिनोवा जी को बिहार की पूरी पदयात्रा में, जो 839 दिनों तक चली,उनमें सात पड़ाव ऐसे भी रहे, जहां उन्हें एक भी दानपत्र नहीं मिला। पटना के बाद फिर गया जिले में चैथी बार पदयात्रा प्रारंभ हुई। इस बार महात्मा गांधी की पुण्यतिथि 30 जनवरी 1954 से जो पदयात्रा शुरू हुई वह वोधगया सर्वोदय सम्मेलन तक यानी चार मई तक जारी रही। बीच में सिर्फ पांच दिनों तक के लिए वे पलामू जिला गए थे। गया जिले में इसी यात्रा क्रम में टिकारी में पड़ाव रहा, जहां कार्यकर्ताओं ने एक सधन अभियान का कार्यक्रम तय किया था। गया जिले में इन दिनों देश के विभिन्न राज्यों और बिहार के अन्य जिलों से चार सौ से अधिक कार्यकर्ता जुटे थे।ये सबलोग जिला के 6,100 गांवों में भूदान प्राप्त करने में लगे थे। मानो पूरा भारत वहां जमा हो  गया था। संत तुकड़ोजी महराज ने जिले की दो बार यात्रा की। कवि दुखायल घूम-घूमकर अपने गीतों से भूदान का प्रचार  कर रहे थे। उस समय बिहार विधानसभा ने भी अपना चालू सत्र एक सप्ताह तक स्थगित रखकर सभी सदस्यों  तक भूदान संग्रह करने का निर्देश दिया।

18,19 और 20 अप्रैल 1954 में बोध गया सर्वोदय सम्मेलन संपन्न होने के बाद बिनोवा जी ने भूमि वितरण कार्य शुरू करने की। अब तक भूमि प्राप्ति की संकल्प पूर्ति के अभियान के कारण वितरण के काम को शुरू नहीं किया गया था। बिहार में भूमि वितरण की शुरूआत गया जिले से ही हुई। हजारीबाग को छोड़कर बांकी जिलों में प्राप्ति का लक्ष्य पूरा होना बांकी था। सर्वोदय सम्मेलन के बाद बिनोवा जी की शाहाबाद, सारण और चंपारण जिले की पदयात्रा शुरू हुई। शाहाबाद में पहला पड़ाब डालमियानगर में था। रास्ते में जगह-जगह हजारों ग्रामीणों की भीड़ स्वागत में खड़ी थी, जिसे बाबा रूक-रूककर कुछ कहते भी जाते थे। लोगों से मुलाकात के कारण अगले पड़ाब पर पहुंचने में बिनोवा को देरी महसूस हुई तो वे दौड़ने लगे और आधे घंटे मेें करीब चार मील की दूरी तय की। पदयात्रा में जिले के कार्यकर्ताओं, नेताओं और सरकारी अधिकरियों  का काफिला भी चल रहा था, और उनको भी बिनोवा के साथ लंबी दौड़ लगानी पड़ी। शाहाबाद जिले में करीब 28 दिनों तक पदयात्रा चली।शाहाबाद के बाद फिर सारण जिले की पदयात्रा शुरू हुई। बारह दिनों के कार्यक्रम में एक पड़ाव  जीरादेई में, जो प्रथम राष्ट्रपति का जन्मग्राम है और दूसरा हथुआ में रहा। हथुआ स्टेट की तरफ से महाराजा गोपेश्वर शाही ने पहले ही एक लाख एकड़ जमीन का दान दिया था। इसके बाद चंपारण जिले में पदयात्रा आरंभ हुई। इस जिले में बिहार आने के बाद बिनोवा जी पहली बार पहुंचे। पूरे जिले में पदयात्रा प्रायः उन स्थानों से होकर चली, जहां- जहां महात्मा गांधी चंपारण सत्याग्रह के दौरान ठहरे थे। चंपारण के बाद मुजफ्फरपुर जिले की पदयात्रा शुरू हुई। यहां सर्वोदय ग्राम में जीवनदानी शिविर रखा गया था।यह जीवनदानी शिबिर अन्य शिविरों से कई अर्थों में भिन्न और महत्वपूर्ण था। यहां धीरेन्द्र भाई के साथ, लक्ष्मी बाबू, ध्वजा बाबू, रामदेव बाबू, वैद्यनाथ बाबू मौजूद थे। इस समय तक भूदान आंदोलन की पूरे देश में समर्पित सेवकों की एक अपनी सेना खड़ी हो गयी थी। शुरू के वर्षो में बिनोवा जी इन लोगों से अनुरोध कर रहे थे कि आप हमारी जेल कुछ समय के लिए कवूल कीजिए और भूदान का काम कीजिए। वे पंद्रह दिनों से लेकर छह महीने और सालभर के समय की मांग अलग-अलग लोगों से करते आ रहे थे। बिनोवा तो यहां तक कहने की स्थिति में आ गये थे कि फुर्सत से कोई क्रांति नहीं होती। सर्वोदय ग्राम में बिनोवा जी की  मौजूदगी में जीवनदानी शिबिर शुरू हुआ। बिहार में ग्यारह सौ से अधिक लोगों ने जीवनदान का संकल्प लिया। मुजफ्फरपुर के बाद बिनोवा को दरभंगा जिले में पदयात्रा करनी थी, लेकिन अगस्त 1954 में एकाएक भीषण बाढ़ आ गयी। इसके वाबजूद बिनोवा रूके नहीं और महाभयंकर बाढ़वाले क्षेत्र में उनकी इक्कीस दिनों की यात्रा चली। इस यात्रा के समय एकाएक अनपेक्षित बाढ़ आ जाने से पहले से तय पड़ाबों पर नावों की कमी के कारण लोगों को तैरकर यात्रा करनी पड़ी। एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक कमर भर, छाती भर पानी होकर मीलों तक चलने की नौबत आयी।उपर सर पर सारे सामान, बिस्तर वगैरह का जो बोझ था, वह अलग। रास्ते में और प्रार्थना सभाओं में बीच-बीच में मूसलाधार बारिश होती रहती थी। इस हाल में भी हरेक जगह लोगों की भीड़ कम नहीं होती थी। इक्कीस दिनों की पदयात्रा के बाद मुजफ्फरपुर जिले में तीसरी बार कार्यक्रम शुरू हुआ, जो अठारह दिनों तक चला। बाढ़ की हालत में पदयात्रा के दौरान कम दानपत्र और कम जमीन बिनोवा जी को मिली। बिनोवा ने दरभंगा जिले के बाद दूसरी बार सहरसा और पूर्णिया जिले की पदयात्रा की। फिर गंगा नदी पार कर संथालपरगना में प्रवेश किया। उन्होंने पूर्णिया में चैंतीस और संथालपरगना में तीस दिनों के समय दिए। इसके बाद मानमूमि जिले का कार्यक्रम आरंभ हुआ, जहां अब बिनोवा जी की बिहार यात्रा की अब समाप्ति हो रही थी। मानभूमि जिले में झरिया में पड़ाव था। यहां बिनोवा ने कहा -‘ यहां हमने सुना कि झरिया एक बड़ा कुरूक्षेत्र है यहां लड़ाइयां चलती हैं। यहां कितने दुर्योधन, दुःशासन और कितने कौरव पुत्र हैं, हम नहीं जानते, लेकिन यहां मजदूर अवश्य रहते हैं, उनसे काम लेना है और हर हालत में लेना है। कोयला निकलवाना है। अगर जमीन से कोयला नहीं निकला तो देश का मुंह काला हो जाएगा। कहते हैं कि यहां गुंडों का राज चलता है, लेकिन जहां गुंडों का राज न हो ऐसी जगह खोजने पर भी नहीं मिलेगी। एक गुंडे वे हैं जो गुंडे कहलाते हैं और दूसरे वे हैं जो ‘सेनापति या कार्यकर्ता’ कहलाते हैं। सोंचने की बात है कि सारे शिक्षित लोग अपनी रक्षा का आधार पुलिस और सेना पर रखते हैं। इससे अधिक अनर्थ क्या हो सकता है, लेकिन आज तो हम गुंडों को हनुमान की पदवी देना चाहते हैं। हम उस सेना को अपनी रक्षा का आधार मानते हैं कि जिसके सिपाहियों को शराब पिलानी पड़ती है। भोग के साधन देने पड़ते हैं और रणक्षेत्र में भेजने पर जिनके भोग विलास के लिए कन्याएं भेजनी पड़ती है। उनकी अनीति को भी नीति मानना पड़ता है। जबतक देश की रक्षा गुंडों पर निर्भर है,गुंडों का ही राज चलेगा, भले चाहे जो नाम दें।’

जाने से पहले बिहार के कार्य ठीक से चलते रहे। इसकी चिंता रखकर बिनोवा जी ने अपनी ओर से पक्का बंदेावस्त कर दिया। विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए विभिन्न समितियां गठित कीं। हर जिले में और प्रांतीय स्तर पर भी भूदान समिति य कार्य कर रही थीं। इन सारी समितियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण था बिहार सर्वोदय मंडल। श्यामसुंदर प्रसाद को उन्होंने इसका संयोजक नियुक्त किया। बिहार सर्वोदय मंडल का उद्देश्य सभी को जोड़ने और मार्गदर्शन करने का था। बिहार में काफी काम हुआ, ऐसा सब मानते थे। साथ ही यह भी कबूल करते थे कि अगर पूरी तत्परता से लगे होते तो बत्तीस एकड़ भूमि प्राप्त करने का संकल्प अब तक पूरा हो ही सकता था। यह संकल्प भले पूरा नहीं हुआ, लेकिन बिनोवा जी को बिहार के नेताओं पर पूरा विश्वास था कि शेष कार्य ये लोग अवश्य पूरा कर लेंगे और जो नेतागण बिहार आगमन पर बिनोवा जी को एक लाख एकड़ भूमि भी दे सकने में आश्वस्त नहीं थे, उन्हें इन सत्ताइस महीनों मे जैसा वातावरण तैयार हुआ था, उस कारण शेष कार्य संपन्न हो जाने का भरोसा हो चला था। बिहार में बिनोवा जी 839 दिनों में 694 पड़ावों पर रूके। 5557 मील की यात्रा के दौरान उन्हें दो लाख छियासी हजार चार सौ बीस दानपत्रों से 22,32,474 एकड़ जमीन दान में प्राप्त हुई।

बिहार से विदाई के मौके पर आखिरी पड़ाव ढेकशिला में बिनोवा जी को एक लाख दानपत्र समर्पण करने का बिहार के नेताओं ने तय किया था। इसके लिए विभिन्न जिलों के कोटे तय किए गए थे। हालांकि एक लाख एकड़ जमीन तो नहीं हो पायी, लेकिन साढ़े सोलह हजार दानपत्रों से पचपन हजार एकड़ का दान समर्पित किया जा सका। विदाई के मौके पर जयप्रकाश नारायण समेत लक्ष्मी बाबू, ध्वजा बाबू, रामदेव बाबू, वैद्यनाथ बाबू और बहुत सारे कार्यकर्ता जुटे थे। बिहार सरकार की ओर से कृष्णवल्लभ सहाय, विनोदानंद झा, महेश प्रसाद सिंह आदि मंत्रिगण आये थे, लेकिन मुख्यमंत्री श्रीबाबू नहीं आ सके थे, क्योंकि विदाई के समय मुंगेर जिले का चार-पांच हजार एकड़ का कोटा पूरा नहीं हुआ था। श्रीबाबू उस कोटा को पूरा करने में लगे रहे, लेकिन लक्ष्य पूरा करने के बाद वे बीमार हो गए। श्रीबाबू ने बिनोवा के नाम एक पत्र लिखकर उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए कहा कि भूदान यज्ञ में आपकी इच्छा के अनुसार जमीन प्राप्त नहीं हुई है, पर बिहार से आपके जाने के  बाद  भी बिहार के लोग और बिहार सरकार उक्त लक्ष्य की पूर्ति के लिए सदैव प्रत्यनशील रहेंगे। विदाई पर बिनोवा ने कहा कि 14 सितम्बर 1952 से 31 दिसम्बर 1954 तक मेरी बिहार में यात्रा हुई। 23 लाख एकड़ भूमि प्राप्त हुई, लेकिन उससे बड़ी बात यह है कि मैं कह सकता हूं कि बिहार में ईश्वरीय प्रेम का साक्षात्कार हुआ। बिहार के लिए मेरे मन में एक स्वप्न था और है।यहां की जनता की सरलता और उदारता हृदय को छुए बिना नहीं रह सकती है, जिसे प्रांतीय भावना कहते हैं वह बिहार के लोगों में दूसरे प्रांतों की तुलना में मुझे बहुत कम मालूम हुई। यहां के लोगों ने मुझे आत्मीय भाव से माना और बहुत प्रेम दिया। मैं अधिक प्रेम संपन्न होकर यहां से जा रहा हूं। मुझे यहां बहुत आनंद और अपार शांति का अनुभव हुआ। आकाश के समान विशाल हृदय का सर्वत्र स्पर्श हुआ, इसलिए इस यात्रा को हम ‘ आनंद यात्रा’ कहते हैं। इस पर बहुत भाव विह्वल होकर जयप्रकाश नारायण ने कहा कि -‘ बाबा, आपने इसे आनंद यात्रा कहा, लेकिन हमलोग ही जानते हैं कि आपको हमने कितना कष्ट दिया है। सबसे अधिक कष्ट इस बात का कि अपने संकल्पों की पूर्ति नहीं की। हमने आपको वचन दिया था, वह पूरा करने में असफल रहे।

 

 

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