स्वतंत्रता की 65वीं वर्षगांठ

भारत के साथ सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इसका इतिहास जो आज विद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है वह इसका वास्तविक इतिहास नही है। यह इतिहास विदेशियों के द्वारा हम पर लादा गया एक जबर्दस्ती का सौदा है और उन विदेशी लेखकों व शासकों के द्वारा लिखा अथवा लिखवाया गया है जो बलात हम पर शासन करते रहे और शताब्दियों तक इस राष्ट्र का शोषण करते रहे।भारत के अतीत को खोजिये तो आप पाएंगे कि आज का बांग्लादेश, पाकिस्तान, बर्मा, नेपाल, तिब्बत, भूटान, श्रीलंका, मालद्वीप, ईरान और अफगानिस्तान सहित एशिया में कितने ही देश, इस देश के अतीत के अंग बने हुए थे। ये सब मिलकर भारत का निर्माण करते थे अथवा यह कहें कि इन सबसे मिलकर भारत बनता था।

सोवियत संघ की भांति ये विभिन्न देश मिलकर एक महादेश का निर्माण ही नही करते थे, अपितु इनकी भौगोलिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक एकता शक्ति इन्हें एक ही राष्ट्र राज्य का नागरिक बनाती थी। इनकी राष्ट्र भक्ति सदा अक्षुण्ण रही। कई बार ऐसे अवसर भी आये कि जब स्वतंत्र शासकों के होने के उपरांत भी भारत के इस भूभाग के शासकों की निष्ठा भारत के प्रति अडिग रही।

महाभारतकालीन भारत

महाभारत काल में भारत के अंदर 101 प्रसिद्घ क्षत्रिय राजवंश थे। इनमें 86 राजा मगध नरेश जरासंध ने पराजित कर जेल में डाल रखे थे। इन 101 राजवंशों के इतने ही महाजनपद (प्रांत या राज्य क्षेत्र) थे। इससे महाभारत (विशाल भारत) का निर्माण होता था। ये राजा किसी एक राजा से होने वाले दूसरे राजा के युद्घ की भांति कौरव पांडवों के युद्घ में सम्मिलित नही हुए थे अपितु सभी राजा एक दूसरे के पक्ष में सम्मिलित होकर लड़े थे। इसीलिए यह महाभारत का युद्घ कहलाया। आज इस तथ्य से बहुत कम लोग भारत में परिचित हैं कि वह युद्घ महाभारत का युद्घ क्यों कहा जाता है? महाभारत काल में एक वंश का नाम तर्जिका आता है। इनके प्रांत का नाम कालतोयक था। गुप्तों के काल में कालतोयकों पर मणिन्धान्मजों का राज्य था। वर्तमान अफरीदी (मूलपाठ अपरन्ध्र) पठानों के प्रांत का नाम अपरांत या अपरीत था। आज का समरकंद चर्मखण्डिक कहलाता था। सम्राट द्रहयु के वंशज गांधार ने गांधार राज्य की स्थापना की। जो कि मांधाता से कुछ काल पश्चात हुआ था। महाराजा दशरथ के पुत्र और श्रीराम के अनुज भरत के पुत्रों तक्ष और पुष्कर की नगरियां इसी गांधार देश की सीमा में थीं। सम्राट मांधाता के काल से ही भारत की उत्तर पश्चिमी सीमा पर यवन लोगों का एक समुदाय था। कालांतर में ये लोग यहां से आगे बढ़े और यूनान व ग्रीस देश की स्थापना की। यूनान और ग्रीस से भारत के युगों पुराने संबंध हैं। उसकी संस्कृति की प्राचीनता भारत की देन है।

अल्बरूनी के अनुसार वर्तमान मुल्तान वह स्थान है जहां कभी प्राचीन राजवंश सैवीर के शासक राज्य करते थे। इसी प्रकार वर्तमान स्यालकोट कभी शाकल नगरी थी। जिसे अल्बेरूनी ने सालकोट लिखा है। वर्तमान बंगाल कभी का अंग देश था, जिस पर कर्ण ने शासन किया था। बंग इसी से लगता हुआ प्रांत था। कालांतर में यह बंग ही बंगाल के रूप में रूढ़ हो गया।

इससे आगे का प्रांत प्राग्ज्योतिषपुर (वर्तमान असम) था। इसे कामरूप भी कहा जाता है। कभी इसी का नाम चीन भी था। जबकि वर्तमान चीन का नाम महाचीन था। इसी प्रकार कौटिल्य ने भी चीन शब्द का प्रयोग कामरूप के लिए किया है। जो विशाल भारत को दर्शित करता है।

इसमें अरूणाचल ही नही पूर्व के सभी सात प्रांत तथा चीन का भी बहुत बड़ा भाग सम्मिलित था। यहां तक कि कम्बोडिया तक यह प्रांत था। जबकि वर्तमान नेपाल भारत के विदेह नामक प्रांत से जाना जाता रहा है। इसकी राजधानी मिथिला थी। जिसे आजकल जनकपुर कहा जाता है, जो नेपाल में स्थित है। वैदेह जनक इसी नगरी के राजा थे। जो कि सीता जी के पिता थे।

कभी मगध के अधीन तिब्बत और नेपाल भी रहे थे। त्रिविष्टप तो तिब्बत का प्राचीन नाम है जहां से उतरकर आर्य लोग शेष भारत में फैले थे। यह प्रदेश ही प्राचीन काल में मानव सृष्टि का उदगम स्थल माना गया है।

ईरान कभी आर्यन प्रदेश था तो अफगानिस्तान उपगण-स्थान के नाम से जाना जाता था। ईरान के राजा तो अपने नाम के साथ सदा आर्य मेहर (सूर्यवंशी आर्य) शब्द का प्रयोग करते रहे हैं। वहां की हवाई उड़ानों का नाम आर्यन ही है।

वहां आज तक हमें यही पढ़ाया जाता है कि आर्य लोग भारत से यहां आये। जबकि भारत में इसका विपरीत पढ़ाया जाता है। इस उल्टे को यहां सीधा नही किया जा सकता। क्योंकि कुछ लोगों की आपत्ति होती है कि ऐसा करने से भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

यह प्राचीन भारत अपने स्वरूप में सन 1876 ई तक लगभग ज्यों का त्यों बना रहा। उस समय तक अफगानिस्तान, पाकिस्तान, श्री लंका, बर्मा, नेपाल, तिब्बत, भूटान, बांग्लादेश इत्यादि देशों का कोई अस्तित्व नही था। ये सारा भूभाग भारत कहा जाता था।

अंग्रेजों ने 26 मई सन 1876 ई को रूस की साम्राज्यवादी नीति से बचने के लिए भारत को प्रथम बार विभाजित किया और अफगानिस्तान नाम के एक बफर स्टेट की स्थापना कर उसे स्वतंत्र देश की मान्यता दी। तब भारत के देशी नरेश इतने दुर्बल और राष्ट्र भक्ति से हीन हो चुके थे कि उन्होंने इस विभाजन को विभाजन ही नही माना बल्कि बड़े सहज भाव से इस पर अपनी सहमति की मुहर लगा दी।

इतिहास में इस घटना को विभाजन के रूप में दर्शित नही किया गया। आज तक हम वही पढ़ रहे हैं जो अंग्रेजों ने इस विषय में लिख दिया था। इसके पश्चात सन 1904 ई में नेपाल को तथा सन 1906 ई में भूटान और सिक्किम को भारत से अलग किया गया। बाद में सिक्किम ने सन 1976 ई में भारत में अपना विलय कर लिया, जबकि नेपाल के विलय प्रस्ताव को रूस के समर्थन के बाद भी नेहरू जी ने सन 1955 ई में अस्वीकार कर दिया।

अंग्रेज शासक अपने साम्राज्य की सुरक्षार्थ निहित स्वार्थों में देश को बांटता गया और नये नये देश इसके मानचित्र में स्थापित करता गया और हमने कुछ नही किया।

सन 1914 ई में अंग्रेजों व चीन के मध्य एक समझौता हुआ जिसके अनुसार तिब्बत को एक बफर स्टेट की मान्यता दी गयी। मैकमोहन रेखा खींचकर हिमालय को विभाजित करने का अतार्किक प्रयास किया गया, जो भूगोल के नियमों के विरूद्घ था।

सन 1911 ई में अंग्रेजों ने श्रीलंका और सन 1935 ई में बर्मा को अलग देश की मान्यता दे दी। अंग्रेज शासक राष्ट्र की एकता और अखण्डता को निर्ममता से रौंदता रहा और हम असहाय होकर उसे देखते रहे। इनसे दर्दनाक और मर्मान्तक स्थिति और क्या हो सकती है?

कांग्रेस इस सारे घटनाक्रम से आंखें मूंदे रही। उसकी उदासीनता सचमुच लज्जाजनक है। बर्मा, रंगून और माण्डले की जेलें हमारे देशभक्तों को सजा देने के काम आती रहीं। कोई वह विदेश की जेलें नही थी, अपितु वह अपने ही देश की जेलें थी, जहां अंग्रेज हमारे देशभक्तों को ले जाया करते थे। उन पर तत्कालीन कांग्रेसी नेतृत्व ने जरा भी विचार नही किया।

ऐसा लगता है कि यथाशीघ्र सत्ता मिल जाना और इस देश पर शासन करना ही कांग्रेसी नेताओं की परंपरा थी। इसलिए जब अंग्रेज यहां से गया तो उसने मालदीव को भी अलग देश का स्तर दे दिया और इस देश के तीन टुकड़े कर गया।

पिछली सदी की भयानक त्रासदी थी-भारत विभाजन जिसमें लाखों लोग जनसंख्या की अदला बदली में मारे गये थे। आज देश में अराजकता की स्थिति है। भगीरथ को अपने साठ हजार पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए गंगा को हिमालय से धरती पर लाना पड़ा था, लेकिन हम अपनी आजादी के समय लगभग दस लाख लोगों के मरने को शहादत तो दूर उसे मरना भी नही मानते। हमने उनकी आत्मा की शांति के लिए कुछ भी तो नही किया। उनकी याद को यूं भुला दिया गया जैसे कुछ हुआ ही नही, यानि ये वो लोग रहे जिनके लिए न तो दीप जले और न पुष्प चढ़े।

कांग्रेसी नेतृत्व ने इस ओर भी ध्यान नही दिया कि भारत में मुस्लिमों की जनसंख्या में हो रहे अचानक जनसांख्यिकीय परिवर्तन के क्या परिणाम होंगे? इसलिए उसने पूर्व के विभाजनों की भांति इस विभाजन को भी सहज रूप में मान लिया। एक षडयंत्र के अंतर्गत हम आज तक वही पढ़ते आ रहे हैं जो अंग्रेजों ने हमारे विषय में लिख दिया है।

यह केवल भारत ही है जहां अपने गौरवपूर्ण अतीत की बातें करना भी साम्प्रदायिकता माना जाता है। लगता है कि हमने अपने अतीत के कडवे अनुभवों से कोई शिक्षा नही ली है। पाकिस्तान का अस्तित्व भारत का सातवां और बांग्लादेश आठवां टुकड़ा है। क्या अनुसंधान कर्ता इस ओर ध्यान देंगे?

स्वतंत्रता की 65वीं वर्षगांठ पर विशेष 15 अगस्त 1947 और भारत का विभाजन

Rakesh kumar arya

 

4 thoughts on “स्वतंत्रता की 65वीं वर्षगांठ

    1. जगन मोहन जी आपकी सार्थक प्रतिक्रिया बताती है भारतीय संस्कृति और इतिहास के प्रति आपके भीतर एक टीस है हम चाहेंगे कि यह टीस लोगो में राष्ट्र प्रेम कि भावना को जगाने में सहायअक हो आपका मार्गदर्शन अवश्य है ।

  1. चक्षु खोलने वाला लेख राकेश कुमार आर्य जी और आज हमारा दुर्भाग्य ही कहेंगे की हमें गलत पढाया जाता रहा है और ham आँख मूँद कर भरोषा भी करते आये हैं …

    1. राणा जी आप का कथन बिल्कुल सत्य है प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद हमे वैचारिक क्रांति के लिए सतत प्रयासरत रहना चाहिये तभी हम अपने आपको स्थापित रख पाएंगे ।

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