मानवीय मदद के दुष्परिणाम

-प्रमोद भार्गव-

Sushma-Swaraj

-संदर्भ – सुषमा स्वराज और ललित मोदी विवाद-

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आईपीएल के खलनायक ललित मोदी की कथित मानवीय आधार पर मदद करके घनघोर मुसीबत से घिरती जा रही हैं। अब तक कमोबेश स्वच्छ छवि की रहीं सुषमा ने एकाएक कैसे 22 वित्तीय आपराधिक मामलों में वांछित और देश से फरार आरोपी की मदद महज मानवीय आधार पर कर दी, यह बात सरलता से गले उतरने वाली नहीं है ? यदि वे वाकई मानवीय आधार पर मदद कर ही रही थीं, तो यह मदद गुपचुप तरीके से क्यों की गई ? यह गोपनीयता जनता को इसलिए नहीं सुहा रही, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी आदर्शवाद के अध्याय लिखने के दावों के साथ सत्ता में आई थी। जबकि इस मामले में वह स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देने के साथ, अपनी जवाबदेही और पारदर्शिता के तकाजों से भी मुकरती दिख रही है ? क्योंकि सुषमा स्वराज जिस भारतीय कानून की रक्षा की शपथ लेकर मंत्री बनी हैं, ललित मोदी अर्से से उसी कानून को ठेंगा दिखाकर विदेश में गुलछर्रे उड़ा रहा है। इसलिए कानून से परे नैतिकता के ऐसे सरकारों को मानवीय आधार देकर माफ नहीं किया जा सकता है।

यदि लंदन से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘संडे टाइम्स’ ने इस राश्ट्रहित से जुड़े मामले का खुलासा न किया होता तो इस काली-करतूत पर पर्दा ही पड़ा रहता। भारतीय मूल के सबसे लंबे समय सांसद रहे कीथ वॉज और ब्रिटेन की वीजा व आव्रजन अधिकारी सारा रैपसन के बीच हुए ई-मेल आदान प्रदान में इंडियन प्रीमियर लीग के पूर्व प्रमुख ललित मोदी को यात्रा दस्तावेज उपलब्ध कराने में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के नाम का उल्लेख बार-बार किया गया था। नतीजतन मीडिया का माथा ठनका। इस ई-मेल पत्राचार की गहराई से पड़ताल जब मीडिया ने की तो पता चला कि इस पत्राचार में ऐसी सिफारिशें हैं, जो आर्थिक घोटाले से जुड़े ललित मोदी जैसे आरोपी को ब्रिटिश प्रशासन से पर्यटन बीजा हासिल कराने के लिए की गई हैं। मोदी आईपीएल घोटाले में मैच फिक्ंिसग करके काले धन को बड़े पैमाने पर सफेद करते रहे हैं। मनी लॉंड्रिंग के ये गंभीर आरोप उन पर 2010 में लगे थे। चूंकि वे खुद के द्वारा किए काले कारनामों से अच्छी तरह से वाकिफ थे, इसलिए आरोप लगते ही भारत से भागकर ब्रिटेन पहुंच गए। तब से वहीं रह रहे हैं। कुल मिलाकर उनके खिलाफ भारत में 22 वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले अदालतों में विचाराधीन हैं। कई मामलों में जांच भी चल रही है। प्रवर्तन निदेशालय ने ब्लू कॉर्नर नोटिस भी जारी किया हुआ है। भारत सरकार ललित मोदी को भगोड़ा घोशित कर चुकने के साथ ब्रिटिश हुकूमत से उन्हें भारत भेजने की मांग भी कर चुकी है। यही नही तात्कालीन संप्रग सरकार ने कड़ाई बरतते हुए 2013 में ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर हिदायत दी थी कि अगर ललित मोदी को किसी भी तरह की सहूलियत और रियायत दी गई तो दोनों देशों के रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं। यह पत्राचार दो व्यक्तियों के बीच नहीं, वरन् दो देशों की सरकारों के बीच था, इस नाते इस रुख की बरकरारी जरुरी थी। बावजूद बर्ताव में परिवर्तन लाना ही था, तो भारतीय मूल के ब्रिटिश सांसद कीथ वॉज और ब्रिटिश उच्चायुक्त जेम्स बीवन से गुपचुप सिफारिश करने की बजाय भारतीय विदेश मंत्रालय को सीधे ब्रितानी सरकार से मोदी को राहत दिलाने की बात करनी चाहिए थी ?

इस मामले में ललित मोदी ने अपनी कैंसर से पीडि़त पत्नी के इलाज हेतु पुर्तगाल जाने के लिए ब्रिटेन के वीजा एवं आव्रजन विभाग में आवेदन किया था। मोदी पर्यटन वीजा के क्शेत्र का विस्तार कराकर पुर्तगाल जाना चाहते थे। चूंकि ब्रिटेन सरकार भारत की संप्रग सरकार द्वारा भेजे गए पत्र को दरकिनार नहीं कर सकती थी, इसलिए मोदी ने प्रशासन के स्तर पर वीजा विस्तार की चालाकी बरती और इस कार्रवाई को सुषमा स्वराज द्वारा कराई सिफारिशों के जरिए अंजाम तक पहुंचाया। सुषमा की सिफारिश के बूते ही महज 24 घंटे के भीतर मनी लांड्रिंग के आरोपी को वीजा मिल गया। हालांकि मोदी ने पत्नी का इलाज तो बहाना बनाया था, क्योंकि पुर्तगाल के अस्पतालों में किसी भी शल्य-क्रिया के लिए पति के हस्ताक्शर जरुरी नहीं हैं। सोशल मीडिया पर आ रही खबरों से ये तथ्य भी सामने आ रहे हैं कि ललित मोदी कैंसर पीडि़त पत्नी की सेवा-सुश्रुशा करने की बजाय यूरोप, अमेरिका और अफीकी देशों में मौज-मस्ती कर रहे हैं। और फिलहाल जिनेवा में हैं। इसके साथ ही वे अपने व्यावसायिक साम्राज्य को बढ़ावा देने में भी लगे हैं।
साफ है सुषमा स्वराज ने व्यक्तिगत संबंधों का लाभ राश्ट्रहित के तकाजे को नजरअंदाज करके ललित मोदी को दिया है। इस दाग को भाजपा के अध्यक्श अमित शाह बोफोर्स तोप घोटाले के आरोपी क्वात्रोचि और भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े एंडरसन को देश से बाहर भेज देने के धतकर्मों से धोने की कोशिश कर रहे हैं, जो कतई तार्किक नहीं है। एक दागी के दाग, दूसरे दागी के दागों से नहीं धोए जा सकते हैं ? इससे अच्छा होता सुषमा, मोदी की मदद इस शर्त पर करतीं की वे भारत आकर जांच में सहयोग करते हुए कानून का सामना करते। ऐसा होता तो मानवीय और वैधानिक दोनों दायित्वों की पूर्ति हो जाती। साथ ही सुषमा और सरकार को तीखे हमलों का सामना नहीं करना पड़ता ?
इस मामले के उद्घाटन से भारत में ही नहीं ब्रिटेन में भी हल्ला मचा हुआ है। नतीजतन कीथ वाज, जेम्स बीवन और सारा रैपसन को जवाब देना मुश्किल हो रहा है। दरअसल वॉज ने जब मोदी से वीजा विस्तार की पहल की थी, तब वे ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स की प्रवर समिति के प्रमुख थे। इस नाते उनका दायित्व अपने देश के आव्रजन विभाग की गतिविधियों पर निगरानी रखना था, न कि उनका उल्घंघन करना ? चूंकि कीथ वॉज भारतीय मूल के हैं और ललित मोदी मूलत: भारतीय ही हैं, इसलिए इस मामले में उनके आचरण और व्यवहार को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। कंजरवेटिव पार्टी के कई सांसद उन पर तीखे सवालों की बौछार कर रहे हैं। इस गतिविधि को ब्रिटेन के राष्ट्रीय हितों को दरकिनार कर देने की दृष्टि से देखा जा रहा है। यदि ब्रिटेन सरकार, बाला-बाला किए गए इस कार्य के परिप्रेक्श्य में कीथ वॉज और अपने आव्रजन विभाग को कठघरे में खड़ा करके कानूनी दायरे में लाती है तो भारत सरकार की स्थिति और दयनीय हो जाएगी।
इस मामले में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जहां कड़े तेवर अपनाते हुए सुषमा के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गए हैं, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा संगठन के अध्यक्श अमित शाह और राश्टीय स्वयं सेवक संघ सुषमा स्वराज के ढाल बनते दिखाई दे रहे हैं। इससे यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि ललित मोदी की मदद पर सहमति का स्तर व्यापक था। हो सकता है ललित मोदी से लोकसभा चुनाव मंे प्रचार के लिए बड़ी धनराशि भाजपा ने ली हो ? सुषमा को तो जरिया बनाया गया। अलबत्ता एक फरार अभियुक्त को सहायता करने से पहले सुषमा स्वराज ने भी कई बार सोचा होगा ? क्योंकि सुषमा इतनी भोली भी नहीं हैं कि इस करतूत के खुलासे पर दुष्परिणामों का उन्हें अंदाजा न हो ?

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