लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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bharatडॉ. मधुसूदन

(एक)
अवसर
**सतर्कता से अवसर की ताक में रहना; कौशल और साहस से अवसर को प्राप्त करना; शक्ति और दृढता के द्वारा अवसरों को सर्वोत्तम सफलता पर पहुँचाना —-निश्चय ही सफलता देने वाले प्रधान सद्‌गुण हैं।**
—-ऑस्टिन फेल्प्स
कई लोग असाधारण अवसर की ही बाट देखा करते हैं। साधारण अवसर उनकी दृष्टि में उपयोगी नहीं। परन्तु वास्तव में कोई अवसर छोटा नहीं होता। छोटे से छोटे अवसर का उपयोग करने से, अपनी बुद्धि को उसी में भिडा देने से वही छोटा अवसर बडा हो जाता है।
कुछ लोग अवसर हाथ में आने के पश्चात ही उसपर परिश्रम करना जानते हैं।नहीं तो, सोचते हैं,  क्यों व्यर्थ में परिश्रम करें? उन्हें सफलता (की गॅरन्टी) भी आरक्षित चाहिए। सोचते हैं, कि, जब सफलता निश्चित  नहीं है, तो, व्यर्थ में, क्यों परिश्रम किया जाए? कुछ लोग अनुरूप योग्यता का प्रयास भी तब प्रारंभ(?) करते हैं, जब अवसर हाथ में आ जाए।
तब तक बहुत बहुत देरी हो गयी होती है।
आज चीन, जापान, कोरिया और न जाने कौन कौनसे अन्य देश  हमारे प्रतिस्पर्धी हैं? ये पहले से सारी सज्जता कर बैठे हैं; जो बाजी मार जाते हैं।
और हमारा जनतंत्र भी जब अडंगे डाल रहा है, तो पीडा होती है, कि, वैश्विक अवसर हम खो न दें?

(दो)
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में आरक्षण?
अंतर्राष्ट्रीय बाजार में आरक्षण नहीं होता, स्पर्धा होती है। और, केवल प्रधान मंत्री अकेला निवेश नहीं करवा सकता। उस के पीछे सभी को खडा होना पडेगा। सभीको साथ देना होगा। जनतंत्र में जनता का उत्तरदायित्व अधिक होता है, कम नहीं। हम साथ नहीं देंगे, पर विकास चाहेंगे; तो ’सबका साथ सबका विकास’ सफल नहीं होगा, तब ही सफल होगा,जब सबका साथ होगा।

(तीन)
सबका अडंगा, सबका विकास।
पर यहाँ विरोधी साथ देना छोड अडंगा बने बैठे हैं। और चुनौती दे रहे हैं कि साथ तो देंगे नहीं, पर सबका विकास कर के दिखा। ईर्ष्या, असूया, द्वेष इत्यादि षड-रिपुओं से पीडित विरोधक, संसद चलने नहीं देंगे, राज्य सभा में विरोध करेंगे।
ये ही, झमूरे हर्षित होते हैं, यदि पाकिस्तान से मोदी का वार्तालाप असफल होता है।

हम पंचतंत्र वाली कबूतरों की बोधकथा पढे हैं, पर गढे नहीं। सारे कबूतर जाल में फँसे है, और एक कबूतर नेता से सारे कबूतरों को उडाकर छुडाने ने की अपेक्षा रखते हैं। ये असंभव है। सभी को साथ दे कर उडना होगा। नहीं तो फिरसे श्री गणेश करना होगा।

“हम साथ बिलकुल नहीं देंगे, तेरा साहस हो तो विकास कर के दिखा। सब के विकास का नारा पूरा कर के दिखा।” भूल जाते हैं, कि, “सबका साथ सबका विकास” में, सबका साथ होगा, तो ही सबका विकास होगा।
“विकास”  पका पकाया फल नहीं है, जो आप के मुँह में चक्कर खाकर आ गिरे।
विश्वके बाजार में, सफलता आरक्षित  नहीं होती। स्पर्धा आरक्षित होती है।
निवेश के बिना उद्योग नहीं। उद्योग के बिना रोजगार नहीं। और कुशलता के बिना रोजगार नहीं।
हमें बुरी आदत डाली गयी है। बिना कुशलता हम रोज़गार चाहते हैं। बिना योग्यता डिग्रियाँ चाहते  हैं। और बिना साथ और परिश्रम के सबका विकास चाहते हैं। डाक्टर भी रोगी को स्वस्थ नहीं कर सकता यदि रोगी, औषधि के सेवन से साथ ना दें।

(चार)
कर्म शक्ति की भ्रूण हत्त्या
हमारे नेतृत्व ने वोट पाने के चक्कर में, आरक्षण घोषित कर, हमारे कर्म-शक्ति की  भ्रूण हत्त्या कर दी है। सारा पुरूषार्थ, पराक्रम, साहस धरनों के लिए, घेरों के लिए। हमारा अवसर रेल की पटरी पर जाकर, आत्महत्त्या करने  तत्पर बैठा है। हम अकर्मण्य रहकर, सारा जीवन बैठे बैठे रोटियाँ तोडने की महत्वाकांक्षा रखते है।
(पाँच)
मुद्रा स्फीति
५०% की कृषक जनसंख्या अच्छे मान्सून के बाद भी अधिकतम १५% की सकल घरेलू उत्पाद
पैदा करती है।  ८५%  का (G D P) सकल घरेलू उत्पाद अन्य उद्योगों से होता है। इतना  सीधा गणित विद्वानों के समझ में कैसे आता नहीं? अनुदान दे देकर मुद्रा का मूल्य घट जाता है। मुद्रा के गुब्बारे में ६७ वर्षों से हवा भर भर के,जो दर १९७२ के आसपास एक डालर= ४.७६ रूपए था, वह आज ६३-६४ रुपए चल रहा है।
मुद्रा का मूल्य घटता है और  मुद्रा स्फीति होती रहती है।
(छः)
मोदी का प्रभाव ही था।
पर, कितनी कुशलता से हमारे प्रधान मंत्रीने युनायटेड नॅशन्स के द्वारा, सदा के लिए, प्रतिवर्ष २१ जून को योग दिवस घोषित करवा दिया। अनेक जानकार, तो हमारे प्रधान मंत्री जी के,९ दिन की नवरात्रि के मात्र नींबू-पानी के आहार पर ही चकित थे; जब वे, उनकी ऊर्जा में कोई न्यूनता नहीं देख पाए। सामान्य जन भी अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रभाव से बच नहीं पाये थे, तो चकित थे।

(सात)
कैसे हुआ ?
समाचारों में था “PM’s Energy While Fasting Impressed Obama, Say Officials”
प्रधान मंत्री के (नवरात्रि ) उपवास में भी ऊर्जा को देख ओबामा प्रभावित थे।
वाशिंग्टन से समाचार था,
Washington: Prime Minister Narendra Modi’s “energy and vigor” despite a strict fast wowed President Barack Obama, say American officials.
प्रधान मंत्री मोदी जी के (नवरात्रि )कठोर उपवास के उपरांत, उनकी ऊर्जा और शक्ति  देख कर ओबामा भी अचंभित थे। केवल नींबूरस-युक्त गरम पानी पीकर कठोर व्रत का पालन कर मोदी ने कितनी सारी, व्यस्तता भरी शीघ्र भेंटें, मिलन,साक्षात्कार इत्यादि से, भारतीयों की अपेक्षा अभारतीयों को और अमरिकनोंको ही अधिक प्रभावी कर दिया था। शायद अमरिकियों के  लिए ऐसा उपवास असाधारण था। हमारे लिए घर की बात थी। ये सच्चाई मुझे भी निम्न उद्धरणों के कारण और मेरे कन्सल्टिंग क्लायन्ट के कारण पता चली।

(आठ)
भोज जिसके आयोजित, उसी का अनशन।
समाचार का उद्धरण:(सार अनुवाद मेरा)
**Mr Modi, who had a working dinner with the President at the White House on Monday, sipped warm water while the courses served to others included crisped halibut with ginger carrot sauce and compressed avocados. Mr Modi was strictly observing the Navratri fast during his hectic tour of the US.
**They joked about the fact that the rest were eating and the Prime Minister (Modi) was fasting.
जिसके लिए भोज आयोजित था, वही अनशन कर रहा है। हा-हा-हा।
The President expressed admiration for the energy and the vigor with which the Prime Minister was able to maintain this rigorous schedule on a diet of only warm water,”
“The President also expressed interest in having a conversation about yoga,”
ओबामा ने जब योग के विषय में भी जानने की उत्सुकता दिखाई।
तो इस समाचार का भी प्रजा जनों पर प्रभाव पडा। योग में भारत के लिए अवसर यदि आकाश छूए तो अचंभित न होइएगा। मैं योग, ध्यान, मुद्राएं, आसन, प्राणायाम इत्यादि में अवसरों के उफान की अपेक्षा रखता हूँ। इसकी आपूर्ति करने हम आगे बढें; नहीं तो डरता हूँ, कि, कोई अन्य देशी इस अवसर का भी लाभ लेकर रहेगा।

Mr Modi, 64, a  keen practitioner of yoga, in his address to the UN General Assembly this year, called for declaring an International Yoga Day.

(नौ)
अनुभव
मेरे एक परामर्षी  (कन्सल्टिंग क्लायंट) ग्राहक ने जब, मोदी जी के, मॅडिसन स्क्वेयर गार्डन वाले सम्बोधन का और उपवास का उल्लेख किया, तब मुझे कुछ अनुमान हुआ, कि, मोदी जी के प्रभाव की पहुँच कितनी दूर तक फैली थी। संक्षेप में, मेरा विश्वास दृढ हो रहा है; कि,  इस प्रभाव के कारण और अन्य गति विधियों के कारण,भारत का स्वर्ण-अवसर आ रहा है, नहीं, आ गया है।

(दस)
राजनीति की सर्पिल दिशा
राजनीति सदैव सर्पिल दिशाओं से आगे बढती है। दो बिन्दुओं को राजनीति में सीधी रेखा से जोडा नहीं जाता। कभी बाँए कभी दाहिने, कभी पीछे भी दो कदम हटकर, फिर आगे बढकर लक्ष्य प्राप्त करती है। कभी सीधी रेखा में कोई समाधान निकलता नहीं।
जैसे नदी समुन्दरसे जा कर मिलती है; पहाडियाँ, चट्टानें इत्यादि का अवरोध पार करने नदी उनके बाँए दाहिने होकर मार्ग निकालते निकालते आगे बढती है; पर रुकती नहीं।सफल राजनीतिज्ञ भी उसी प्रकार अवरोधों को पार करता है। मोदी जी भी इस सर्पिल मार्ग-क्रमण में, मार्ग निकालते निकालते आगे बढते प्रतीत होते हैं।
यह आलेख एक दिशा चिह्नित करने के उद्देश्य से प्रवेश मात्र है। कोई विशेषज्ञता का दावा नहीं करता। पर चेताना चाहता है, कि, स्वर्ण अवसर आ रहा है, नहीं आ गया है। हमें कमर कस के तैयार होना पडेगा।
साथ देना होगा।
अवसर का अषाढ चूकना, अवसर को गँवा देने बराबर है। गँवाया हुआ अवसर दूबारा नहीं आता।

(ग्यारह)
एक प्रदर्शनी की मूर्ति
एक प्रदर्शनी में मूर्ति देख, दर्शक ने पूछा
-द.—“यह किसकी मूर्ति है?”
मूर्तिकार :— “अवसर की।”
द.—“इसका मुँह क्यों छिपा है?
मू.—“क्यों कि यह जब सामने आता है, तो,
— बहुत लोग, इसे पहचान नहीं सकते।”
द.—“इसके पैरों में पंख क्यों लगे हैं?”
मू.— “क्यों ये शीघ्र उडकर चला जाता है।”
द.—“तो फिर ये वापस नहीं आता?”
मू.—“सही कहा।
“ये अवसर उडकर जाने पर वापस नहीं आता।”
जय भारत

5 Responses to “भारत का वैश्विक स्वर्ण-अवसर:”

  1. Rekha Singh

    मोदी जी के आने से देश के विकास की गति , रफ़्तार तो पकड़ चुकी है लेकिन मेरा अपना अनुभव यही बताता है की पिछले ६५ वर्षो मे भारत अंदर से बहुत खोखला हो चुका है । मुठ्ठी भर लोगो का आर्थिक विकास तो हुआ लेकिन नैतिक दरिद्रता के साथ । आज पढ़े लिखे बहुत सारे लोग अपनी लच्छेदार भाषा मे राष्ट्र, समाज को इस तरीके से अपमानित करते है की आश्चर्य होता है । खैर किस युग मे रावण , कंस , जयचंदो आदि आदि की कमी रही है ???रिजर्वेशन के नाम पर योग्यता को दण्डित किया जाता है क्योकि यदि परिवार मे आरक्षणके नाम पर किसी को मौक़ा दिया गया है तो उस व्यक्ति के समस्त परिवार और खानदान को पीढ़ी दऱ पीढ़ी आरक्षण का भोग करना उचित नही है , क्योकि यह एक मानसिकता को जन्म देता है जो की गलत है । आज भारत मे बहुत सारे लोग बिना मेहनत के ही डिग्री, नौकरी , बिजली , पानी आदि आदि पाना चाहते है ,मालामाल , भी होना चाहते है चाहे देश को ही बेचना पड़े ।
    आज हमारे देश मे कलाम जी जैसे महान व्यक्तित्व की चर्चा होनी चाहिए लेकिन कुछ लोग आतंकी की तरफदारी से बाज नही आते क्योकि देश के विकास का उनसे कोई लेना देना ही नही है । विघटनकारी शक्तियाँ सर उठाकर बोल रही है और जनता बार बार पैसे लेकर वोट को बेचकर इन देश द्रोहियो को जिताकर संसद मे भेज देती है ।

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  2. बी एन गोयल

    B N Goyal

    सफलता प्रदान करने वाले कुछ सद्गुणों की व्याख्या की है । इन में कुछ शाश्वत सत्य हैं जैसे कि कोई अवसर छोटा नहीं होता। अवसर की व्याख्या एक बिना मुंह के पक्षी से की है। बहुत खूब। आप कहते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में आरक्षण नहीं होता, स्पर्धा होती है। हमारे नेतृत्व ने वोट बैंक के चक्कर में आरक्षण घोषित कर हमारी कर्म-शक्ति की भ्रूण हत्त्या कर दी है। प्रश्न है कि क्या विकास और राजनीति दो विरोधी अवधारणा हैं ? शायद हाँ – विकास की गति कभी समान नहीं होती है। इस का ग्राफ कुछ घटकों पर आधारित होता है। इसी लिए वह ऊपर नीचे होता रहता है। राजनीति की गति सर्पीली होने के कारण कभी कभी कुलांचे भी मारती है। आपने लिखा है कि आप का आलेख एक दिशा चिह्नित करने के उद्देश्य से प्रवेश मात्र है। लेकिन यह आशा और विश्वास भी जगाता है। मोदी जी से अपेक्षाएँ बहुत हैं। 65 वर्षों से यह देश आशा, विश्वास और अपेक्षा पर जी रहा है – अब समय है कुछ ठोस करने का।

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  3. suresh karmarkar

    मधुसूदनजी मैं आपके लेखों को पढता हुँ. इस लेख में आपने अवसर और कमियों को सफलता में बदलने की बात कही हैक़िन्तु हमारे यहाँ बजाय कार्य संस्कृति के कथा संस्कृति हावी हो रही है्‌इन्दि भाषी प्रदेशों के अख़बारों को देखो तो सिवाय कथाएं ,सत्संग ,मूर्तिपूजा अभिषेक ,उपवास प्रवचन में एक बड़ा जनसमुदाय व्यस्त है. सोमनाथ मंदिर में अभी एक भक्त ने ४१ किलो का सोना चढ़ाया। कई शताब्दियों पूर्व हमारे कई मंदिरों से विदेशी आये सोना लूट कर चले गये. हमें यह समझ नहीं आया मूर्ती को सोना चढाने के बजाय हम समाज के लोगों के पेट भरें,उन्हें शिक्षित करें,उन्हें मजबूत और ताक़तवर बनाये।भारत के कई मंदिर ऐसे हैं जहाँ के सोने से कई कारखाने, खड़े किये जा सकते हैं,उसके ब्याज से सोलर बिजली के प्लांट लगा सकते हैं. ये मंदिर दानदाताओं के दान को अवसरों में बदल सकते हैं. स्वयं की बैंकें खड़ी करके आसान किश्तों पर सशर्त ,जमानत लेकर कर्मियों,सब्जी विक्रेताओं, रद्दी खोमचे वालों को पैसा दे सकते हैं. अल्प ब्याज पर पैसा देकर अपनी पूँजी की वृद्धि कर सकते हैं. इस देश में मोदीजी का विरोध हो रहा है ऐसा आपको लगता है ,तो जिन विधेयकों को मोदी जी और उनके दल ने पास नहीं होने दियाथा वे ही विधेयक आज वे पास करवा रहे हैं.

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    • डॉ. मधुसूदन

      Dr. Madhusudan

      Dear Nagdaji, Karmarkar ji and Goyal ji
      Pranams to all.

      On travel till 27th July.
      Thanks all learned and valued comment makers.
      Appreciate the angles you enlightened on the subject.
      Please keep on giving your independent views.

      Dhanyavad.
      Madhusudan

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  4. दुर्गा शंकर नागदा

    Great, dear Dr. Madhusudan ji. नमश्कार

    मोदी जी कुछ करके बताएंगे । बताया भी है। विश्व मे भारत की इज्जत बढी है। मुझे आशा ही नही पूर्ण विश्वास है । बस अब थोडी सी उनकी दया दृष्टि भारत की गरीबी व शिक्षा या भारतीयो के स्वाभिमान व सोच बदलने पर पड जाए तो कल्याण हो जाए।

    धन्यवाद

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