लेखक परिचय

अजीत कुमार सिंह

अजीत कुमार सिंह

लेखक अजीत कुमार सिंह, झारखंड की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले, भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर लिंग में से एक, बाबा की नगरी बैद्यनाथधाम, देवघर के रहने वाले हैं। इनकी स्नातक तक शिक्षा-दीक्षा यहीं पर हुई, दिल्ली से इन्होंने पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिप्लोमा किया। छात्रजीवन से ही लेखन में विशेष रूचि रहने के कारण समसामयिक मुद्दों पर विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं, बेबसाइट आदि में नियमित लेख प्रकाशित होते रहते हैं। देवघर और रांची में विभिन्न समाचार पत्र से जुड़कर समाचार संकलन आदि का काम किया। वर्तमान में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से प्रकाशित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का मुखपत्र "राष्ट्रीय छात्रशक्ति" मासिक पत्रिका में बतौर सहायक-संपादक कार्यरत हैं। संपर्क सूत्र- 8745028927/882928265

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rain2अजीत कुमार सिंह
बरसात को कौन नहीं चाहता..बरसात के आने का हर किसी को बेसब्री से इंतजार रहता है। लेकिन यही बरसात अगर आफत का रूप ले ले तो कल्पना नहीं कर सकते हैं कि यह कितना पीड़ादायी होगा…। असम, बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश राजस्थान समेत देश के कई हिस्सों में बाढ़ के कारण लाखों लोग प्रभावित है। लोंगो की जिंदगियां तबाह है। सभी अपने घर-द्वार को छोड़कर सुरक्षित ठिकाने के तलाश में निकल चुके हैं। इंसान तो कहीं-न-कहीं अपना आसरा का ठिकाना लगा भी लेते हैं लेकिन उन बेजुबान जानवरों का क्या…। न तो उसके लिए चारे की कोई व्यवस्था है और नहीं कोई आसरा।
देश के राजनेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार अभी दलित-गैरदलित, गौरक्षा जैसे मुद्दों मे उलझी हुई है। किसी का भी ध्यान अभी इधर नहीं आया है। लाखों लोग बेघर हो चुके हैं और शासन कुंभकरणी मुद्रा में सोये हुए हैं। रोहित बेमुला और दलित चिंतन पर चर्चा करने वाले नेता बाढ़ से प्रभावित लोंगो पर चर्चा करने की जरूरत नहीं समझ रही है। जबकि इस विभित्स बाढ़ के कारण कितने रोहित की जिंदगियां सिसक रही है। आज भी अधिकतर दलित, गरीब, वंचित तबके के लोग गांवो में बसते हैं। बाकी दलितों, गरीबों की हक की बात करने वाले तो दिल्ली, मूंबई जैसे महानगर के आलिशान कमरे में ऐशो-आराम फरमा रहे हैं। किसी को भी दलित, गरीब के दुखों से लेना देना नहीं है। सिर्फ ढ़कोशाला है। पैलेट गन पर चर्चा कि मांग करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी, पत्रकार के प्राइम टाइम में अभी तक बाढ़ पर विशेष चर्चा नहीं की गई है। शायद इसे जरूरी ही नहीं समझ रहे हों।
चाहे गांव हो या शहर..हर तरफ बाढ़ के कारण बस पानी ही पानी। कहीं कहीं तो यह भयावह रूप ले चुकी है। कई लोगों की जानें भी जा चुकी है। नदियो से सटे इलाके के लोग घर-बार छोड़कर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं और बाढ़ राहत शिविर भी खानापूर्ति भर है। बाढ़ राहत कार्य को नाकाफी बताया जा रहा है। मदद के नाम पर चंद नावें,दवायें और थोड़ी बहुत खाद्य सामग्री लोगों की दर्द की ओर बढ़ा रही है। गंगा व घाघरा ने बनारस से लेकर बलिया तक तबाही मचा रखी है। घाटो का शहर बनारस आज बिन घाट का बनारस हो गया है। गलियों में तीन-चार फीट पानी भर आया है। मोक्षदायिनी मां गंगा अपना विकराल रूप ले चुकी है। बनारस के सीमावर्ती जिले चंदौली, भदोही, गाजीपुर व मीरजापुर में बाढ़ ने खेतों व फसलो को खासा नुकसान पहुंचाया है। बलिया में गंगा का बढ़ाव जारी है।
बिहार तो बाढ़ से बेहाल है। कई दिनों से पानी में घिरे पीड़ितों का गुस्सा चरम पर है और होना भी लाजमी है। कोशी का कहर आज भी लोंगो के जेहन में बैठा हुआ है। एक और जहां लोग बाढ़ की तबाही से भारी मुसीबतों का सामना कर रहे हैं वहीं बिहार के एक बड़े नेता ने यह कहकर उनलोंगो के जख्म में नमक डाल दिया कि आप सौभाग्यशाली है मां गंगा आपके द्वार पर आई है। इस बेहुदगी भरे बयान के बाद सोशल मीडिया में लोंगो की तीखी प्रतिक्रियाएं आने शुरू हो गयी है। बिहार की जनता ने प्रचंड बहुमत से इन नेताओं को गद्दी पर इसी दिन के लिए बैठाया था। कुछ लोंगो ने तो उक्त नेता का फेसबुक, ट्वीटर पर जमकर मजाक उड़ाया है।
बिहार आपदा प्रबंदन के एक बयान के अनुसार 14 जिलों में 33 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित है। जन हानि के आंकड़े तो लगातार सामने आ रहे हैं, लेकिन बाढ़ के कारण धन हानि का अनुमान लगाना कठिन है। हमें तो लगता है कि इसका आकलन शायद ही कभी कोई कर पाता हो कि बाढ़ के प्रभावित इलाके के लोग बाढ़ के उतर जाने के बाद कितने अनगिनत समस्याओं का सामना करते रहते हैं। एक समय था जब बाढ़ ग्रस्त इलाकों की बदहाली एक बड़े मसले के तौर पर लोंगो के सामने आती थी। अब तो ऐसा लगता है, मानो! बाढ़ जीवन का हिस्सा बन गया है, क्योंकि उससे निपटने के दीर्घकालीन उपायों की चर्चा मुश्किल ही सुनाई देती है। देश के कई हिस्से हैं जो लगभग हर साल बाढ़ के चपेट में आते है। अगर हर वर्ष नहीं भी माना जाय तो भी दूसरे-तीसरे वर्ष बाढ़ के चपेट में आ ही जाता है। इसके चलते कई बार लाखों लोगों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ता है। जब ऐसा होता है तो उनकी पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है। यह दुष्चक्र दशकों से चला आ रहा है और फिर भी हमारे नीति-नियंता बाढ़ की समस्या का स्थायी हल अभी तक नहीं निकाल पाये हैं। अभी भी ऐसा नहीं लगता है कि केन्द्र या राज्य सरकार के पास बाढ़ के नियंत्रण की कोई ऐसी ठोस योजनाएं है जिन पर अमल की प्रतिबद्धता दिखाई देती हो।
जब बाढ़ आती है तो प्रभावित राज्य सरकार केन्द्र से मदद की गुहार लगाती है। केन्द्र सरकार यथासंभव मदद कर अपना पिंड छुटा लेती है और बाद में सबकुछ भूला दिया जाता है। आने वाले दिनों में भी यह सिलसिला जारी रहा तो फिर बाढ़ के नुकसान का भरपाई कर पाना मुश्किल हो जायेगा।

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