UP election 2017

यूपी की चर्तुभुज सियासत !

कहने को कांगे्रस ने ब्राहमण नेता और दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित को यूपी का भावी सीएम प्रोजेक्ट कर दिया है,लेकिन शीला जी को यही नहीं पता है कि अगर कांगे्रस का सपा से चुनावी तालमेल हो जायेगा तो चुनाव में उनकी क्या हैसियत रहेगी। इसके अलावा राहुल गांधी पीएम मोदी को भ्रष्टाचारी साबित करने के लिये कथित तौर पर जो कागज लिये घूम रहे हैं,उसमें शीला दीक्षित का भी नाम है, इससे भी शीला असहज महसूस कर रही है।

आगामी चुनाव जीतने के लिये समाजवादियों का सबसे बड़ा दांव

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनावों से ठीक पहले बसपा , भाजपा और कांग्रेस को परेशान करने के लिये 17 अति पिछड़ी जातियों कहार, कश्यप, केवट, मल्लाह, निशाद, कुम्हार,प्रजापति,धीवर, बिंद,भर,राजभर,धीमर, बाथम, तुरहा, गोडिंया, मांझी व मछुआ को एस सी का दर्जा देने का ऐलान किया है। अब यह प्रस्ताव केंद्र सरकार के विचाराधीन भेजा जायेगा। सपा सरकार ने यह फैसला करके एक तीर से कई निशाने लगाने का अनोखा प्रयास किया है।

उ.प्र. चुनाव : सपा की रणनीति से विरोधी होगें चित्त !

बसपा की बात करें तो नोटबंदी के चलते बहनजी चर्चा में रही हैं । आम जनता को नोटबंदी से हुई परेशानी के लिये मायावती ने आवाज उठाई तो भाजपा ने चुनाव में नोट लेकर टिकिट देने की छवि प्रचारित कर इस आवाज को दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । बसपा सपा को अराजकतावादी और भाजपा को साम्प्रदायिक घोषित करते हुये कानून व्यवस्था के मुद्दे पर चुनाव लड़ने जा रही है । विकास की नित नई योजनाओं से अखिलेश अपना पल्लू साफ करके मायावती की इस कोशिश को असफल करने में लगे हैं । कांग्रेस और लोकदल के जनसमर्थन के साथ आने से भी इस काले धब्बे को नकारने में सपा को मदद मिल जायेगी । ऐसे में बसपा का सीधा सामना इस महागठबंधन से होगा ।

राम के नाम चुनावी नैया

रामाश्रय लेना राजनीतिक दलों के लिए शायद इसलिए जरूरी लग रहा है, क्योंकि उनके पास राज्य के विकास का कोई ठोस अजेंडा नहीं है। साथ ही इतना आत्मविश्वास भी नहीं है कि सिर्फ विकास और सुद्ढ़ कानून व्यवस्था पर वोट मांग सकें, क्योंकि अराजकता पर नियंत्रण कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। इसलिए जाति और धर्म से जुड़े प्रतीकों को विकल्पों के रूप में आजमाने की कोशिशें तेज हो रही हैं