आतंकवाद से मुक्ति हेतु गायत्री मंत्राहुति का अभिनव प्रयोग

पिछले दिनों देव-भूमि हरिद्वार जाना हुआ, जहां ‘युग निर्माण योजना’ के अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय- शांति कुंज और इससे सम्बद्ध शिक्षण संस्थान- देव संस्कृति विश्वविद्यालय में एक अभिनव आध्यात्मिक प्रयोग देखने को मिला । वहां मैं प्रायः जाते रहता हूं । किन्तु इस बार वहां जो देखा , सो लिखने की अपनी इच्छा का संवरण मैं नहीं कर पा रहा हूं ; क्योंकि वह उल्लेखनीय है ।

purnahutiमनोज ज्वाला
पिछले दिनों देव-भूमि हरिद्वार जाना हुआ, जहां ‘युग निर्माण योजना’ के अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय- शांति कुंज और इससे सम्बद्ध शिक्षण संस्थान- देव संस्कृति विश्वविद्यालय में एक अभिनव आध्यात्मिक प्रयोग देखने को मिला । वहां मैं प्रायः जाते रहता हूं । किन्तु इस बार वहां जो देखा , सो लिखने की अपनी इच्छा का संवरण मैं नहीं कर पा रहा हूं ; क्योंकि वह उल्लेखनीय है । युग निर्माण योजना दरअसल मनुष्य में देवत्व के अभ्युदय से धरती पर सत् युग की वापसी के लिए ‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा , हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’ की ललकार के साथ स्वच्छ मन – स्वस्थ शरीर – सभ्य समाज की रचना का लक्ष्य लिए हुए व्यक्ति-निर्माण , परिवार-निर्माण , समाज-निर्माण विषयक कार्यक्रमों की विविध गतिविधियां चलाने को तदनुसार आध्यात्मिक विज्ञान व वैज्ञानिक अध्यात्म का प्रतिपादन करनेवाले महान ऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य की स्थापनाओं-विचारनाओं की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है । यह एक संस्था भी है और सतविचार भी ; संगठन , मिशन भी और सत्प्रवृतियों के संवर्द्धन व दुष्प्रवृतियों के उन्मूलन का क्रियात्मक विस्तार भी । अध्यात्म विज्ञान और पदार्थ विज्ञान के परस्पर समन्वय से व्यक्ति-परिवार-समाज के नवोन्मेष की यह योजना इस तथ्य व सत्य पर आधारित है कि दुनिया भर में व्याप्त समस्त समस्याओं का मूल है- वैचारिक प्रदूषण है , जिसका असली कारण विज्ञान के एक पक्ष- पदार्थ के प्रति बढती आशक्ति और दूसरे पक्ष- अध्यात्म के प्रति घटती रुचि अथवा इसकी गलत व पदार्थोन्मुखी अभिव्यक्ति है । रथ का एक घोडा कुमार्गी हो जाए और दूसरा उसी का अनुगामी , तब जिस तरह से दुर्घटना सुनिश्चित है ; उसी तरह की अवांछित स्थिति से उल्टी दिशा में गुजर रही है आज की मानवी सभ्यता , समाज- व्यवस्था और वैश्विक अवस्था । इस उल्टे को उलट कर सीधा करने का वैचारिक सरंजाम है- युग निर्माण योजना, जो आधुनिक युग के विश्वामित्र ऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य-विरचित साहित्य वाङ्गमय में वर्णित तथ्यों के अनुसार अदृश्य अलौकिक शक्तियों से निर्देशित-संचालित है ।
विचार ही मूल शक्ति है और शक्ति के मूल में है चेतना , जिसका स्रोत है सूर्य ; सूर्य अर्थात सविता ; सविता अर्थात गायत्री ; गायत्री अर्थात आद्यशक्ति , जो वेदों का सार है , जिसकी तीन धारायें है- सरस्वती, लक्ष्मी , काली । इन तीनों शक्तियों के बीज मंत्र हैं क्रमशः- ‘हृं’ , ‘श्रृं’ , ‘क्लीं’ । शक्ति की इन्हीं तीनों धाराओं में व्याप्त बुद्धि , मेधा , विद्या , वृति , ज्ञान-विज्ञान , कला-कौशल , सृजन तथा पालन-पोषण , ऋद्धि-सिद्धि , सुख-ऐश्वर्य , धन-समृद्धि , वैभव-विलास और बल-वीर्य , शौर्य-पराक्रम , क्षमा , दया , दण्ड , संहार की समन्वित व्याप्ति-अभिव्यक्ति है गायत्री , जिसकी विशद व्याख्या है- वेद , पुराण , उपनिषद शास्त्र आदि । वेदों की जननी है गायत्री , जबकि ‘गायत्री मंत्र’ वेदों का सर्वाधिक विशिष्ट महामंत्र है , जिसके तीन पदों व चौबीस अक्षरों में सम्पूर्ण सृष्टि के सारे सृजनात्मक-पोषक-संहारक तत्व समाहित हैं और जिसमें बुद्धि-विवेक-प्रज्ञा के परिष्कार की कामना की गई है । वर्तमान समय के मनुष्य की विचारणा-चेतना को सकारात्मक-सृजनात्मक दिशा में मोडने और उसके भीतर के देवत्व को उभारने का साधन और साध्य दोनों है गायत्री महामंत्र । इसकी साधना और धारणा से मनुष्य की दुष्प्रवृतियों का उन्मूलन और सत्प्रवृतियों का संवर्द्धन सुनिश्चित है । इसी तथ्य और सत्य को लेकर विचार-क्रांति अभियान के साथ दुनिया भर में युग परिवर्तन का आन्दोलन क्रियान्वित कर रही है युग निर्माण योजना ।
व्यक्ति-परिवार-समाज-जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त अवांछनीयताओं के विरुद्ध कल्याणकारी परिवर्तन के निमित्त सद्विचारों (गायत्री) की साधना, सत्साहित्यों की उपासना व सत्कर्मों की आराधना से जनमानस का परिष्कार इस बौद्धिक आन्दोलन की धुरी है । ब्रह्मबर्चस शोध संस्थान और देव संस्कृति विश्वविद्यालय इसकी दो अभिनव स्थापनायें हैं । ब्रह्मबर्चस में विशेष रूप से धर्म-अध्यात्म पर वैज्ञानिक शोध-संधान होते हैं , तो विश्वविद्यालय में भारतीय सांस्कृतिक-आध्यात्मिक पृष्ठभूमि और युगपरिवर्तनकारी भावभूमि पर प्राचीन गुरुकुलीय पद्धति एवं अत्याधुनिक पौद्योगिकी से भाषा, साहित्य, व्याकरण, इतिहास, पर्यटन, ज्योतिष, गणित, फलित, योग, मनोविज्ञान, स्वास्थ्य प्रबन्धन, ग्राम-प्रबन्धन, आपदा-प्रबन्धन, पत्रकारिता, अध्यापन आदि विविध विषयों पर अनूठे पाठ्यक्रमों की उच्च शिक्षा-विद्या प्रदान की जाती है । इन दोनों ही स्थापनाओं के संचालन और युग-परिवर्तनकारी भावनाशील व्यक्तियों के समय , साधन व श्रम के सुनियोजन का केन्द्र अथवा निदेशालय शांतिकुंज ही है , जहां प्रायः दस हजार से भी अधिक पीत-वस्त्रधारी ऐसे लोग युग निर्माण योजना की विविध गतिविधियों को भिन्न-भिन्न क्रिया-कलापों से देश-दुनिया भर में फैलाने के निमित्त एक सुव्यवस्थित दिनचर्या के तहत विविध प्रकल्पों-प्रकोष्ठों में सक्रिय देखे जाते हैं । प्रातः-जागरण से लेकर रात्रि-शयन तक की व्यस्त दिनचर्या का हर क्षण और हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग में सप्तसरोवर की तपोभूमि पर अवस्थित उस ऋषि-आरण्यक-आश्रम का एक-एक कण सविता के तेज से उद्दीप्त और वेद-विदित जीवन-शैली से अभिशिक्त प्रतीत होता है । प्रातः पांच बजे से आठ बजे तक व्यास-पीठ पर बैठ महिलायें-कन्यायें वेद-विदित विशुद्ध वैज्ञानिक रीति से नित्य यज्ञ-कर्म सम्पादित करती-कराती हैं । उन्हीं के निर्देशन में सामने यज्ञ-मण्डप में अग्नि-कुण्डों के चारो तरफ बैठे लोग पहले गायत्री-मंत्र , फिर महारुद्र व महामृत्युञ्जय मंत्र से विविध औषधीय पदार्थों की आहुतियां होम करते हैं । यह प्रति दिन का सबसे पहला सामूहिक नित्य-कर्म है ।
देश-दुनिया में बढती आतंकी घटनाओं के मद्देनजर इस दैनिक यज्ञ में अब एक और कर्मकाण्ड जुड गया है इन दिनों ; वह है आसुरी-आतंकी शक्तियों के उन्मूलनार्थ गायत्री-महामंत्र के साथ उसकी संहारक शक्ति के बीज-मंत्र- ‘क्लीं’ को युक्त कर विशेष आहुतियां होम करने का । बताया गया कि यज्ञ-कुण्ड में आहुतियों के साथ सोद्देश्य प्रेषित विचार-संवेदनाओं से अभीष्ट फलीभूत हुए बिना नहीं रहता , बशर्ते कि वह स्वार्थ-रहित , पवित्र व समाजोपयोगी हो और तत्सम्बन्धी मंत्र का उच्चारण-प्रेषण वेद-विदित विधि-सम्मत हो । इस विशेष यज्ञाहुति से वातावरण में ऐसी परिस्थितियां व शक्तियां निर्मित होंगी , जिनसे आतंकी प्रवृतियों व गतिविधियों के उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त होता जाएगा । दूसरे शब्दों में यह कि इससे एक विशेष लक्ष्य को नियोजित ऐसी प्रभावकारी सामूहिक चेतना का निर्माण होगा , जो आतंकवादी चेतना को परास्त करने में सब तरह से समर्थ होगी । युग निर्माण आन्दोलन के संस्थापक ऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य की स्थूल काया जब शांतिकुंज में वास करती थी, तब भारत-पाक युद्ध (१९७१) के दौरान राष्ट्र-संकट के निवारणार्थ अमेरिकी नैसेना के सातवें बेडे को भारतीय समुद्री सीमा-क्षेत्र में आने से रोक देने और एक भटके हुए प्रलयकारी अंतरिक्षयान- ‘स्काईकैब’ को पृथ्वी पर गिरने से रोक उसे गहरे समुद्र में धकेल कर प्रलय टाल देने जैसे कई आध्यात्मिक-यज्ञीय प्रयोग वहां सफलतापूर्वक सम्पन्न हो चुके हैं , जिनके रहस्यों से दुनिया आज तक अचम्भित है ; किन्तु उनका प्रचार नहीं किया गया । जाति-सम्प्रदाय के भेद से परे सर्वजन-हिताय उत्कृष्ट जीवन-शैली का अभ्यास कराने के बावत नियमित प्रशिक्षण-सत्रों का आयोजन करते रहने वाले शांतिकुंज में इन दिनों आतंकवाद के निवारणार्थ ‘क्लीं’ सम्पुट-युक्त गायत्री-मंत्र के जप व यज्ञ का यह जो प्रयोग चल रहा है , सो भी प्रचार-विज्ञापन से कोसों दूर ही है । इस प्रयोग का परिणाम क्या होगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा ; किन्तु इससे इतना तो स्पष्ट हो गया है कि अपने देश का आध्यात्मिक चिन्तन भी अब राष्ट्रीयता के चिन्तन से ओत-प्रोत हो गया है । हालाकि आज भी इस देश में ऐसे आध्यात्मिक गुरुओं-पंथों एवं उनके संगठनों की ही बहुलता है , जो बहुरुपियों की तरह किसिम-किसिम के रंग-रूप बदल-बदल के कुछ रोचक-आकर्षक चमत्कार दिखा-दिखा कर प्रचार-माध्यमों के सहारे अपना टंट-घंट सजा-बजा कर अपने शिष्यों की संख्या बढाने और उन्हें कथित रूप से स्वर्ग-मोक्ष दिलाने अथवा उनकी मनोकामनायें पूरी करने-कराने में ही धर्म-अध्यात्म की सार्थकता समझ रहे हैं । जबकि व्यष्टि-समष्टि-समाज-संस्कृति-राष्ट्र के कल्याणार्थ सत्कर्म करना ही वास्तविक धर्म-अध्यात्म है और यही आत्म-कल्याण का भी राजमार्ग है । ऋषि वशिष्ठ , विश्वामित्र , अगस्त्य , याज्ञवल्क , दधीचि से ले कर बुद्ध , महावीर , नानक , तुलसी , सुर , कबीर ही नहीं ; समर्थ रामदास , गुरु गोविन्द व रामकृष्ण परमहंस , तैलंग स्वामी एवं दयानन्द सरस्वती तक सबने इसी वास्तविकता को जिया है और जीना सिखाया है । युग निर्माण योजना धर्म-अध्यात्म की वर्तमान प्रचलित दुकानदारी से इतर इस धरती को ही स्वर्ग बनाने और मनुष्य में देवत्व उभारने का एक बौद्धिक आन्दोलन है , जिससे हर व्यक्ति को जुडना चाहिए ।

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