अखाड़ा न बने संसद

इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार ने कालाधन, भ्रश्टाचार एवं आतंकवाद पर नकेल कसने के लिए हजार-पांच सौ के नोट बंद करके जो निर्णायक पहल की है, वह स्वागत योग्य है। लेकिन नेक फैसले पर अमल की जो तमाम मुश्किलें पैदा हो रही हैं, उनका प्रबंध नोटबंदी लागू करने से पहले कर लिया गया होता तो शायद न तो देश में इतनी छुट्टे व नए नोटों के लिए मारी-मारी हो रही होती और न ही विपक्ष को जनता से सीधा जुड़ा इतना बड़ा मुद्दा मिला होता। इसलिए इस मुद्दे पर हंगामा खड़ा होना कोई हैरानी की बात नहीं है। फिर हमारे सांसदों में बहुत बड़ी संख्या ऐसे सांसदों की है, जो खुद नोटबंदी से आफत अनुभव कर रहे होंगे ? यह नोटबंदी ठीक उस वक्त की गई है, जब उत्तरप्रदेश व पंजाब समेत पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। ऐसे में इस नोटबंदी ने संभावित प्रत्याशि और दल-प्रमुखों की नींद हराम कर दी है।

parliamentप्रमोद भार्गव
शीतकालीन सत्र को गर्म रखने के लिए कांग्रेस समेत लगभग समूचे विपक्ष ने अपने-अपने हथियार भांज लिए हैं। हजार-पांच सौ के नोटों पर पाबंदी के साथ देशभर में जैसी उथल-पुथल मची है, उससे जहां राजग सरकार की चुनौती बढ़ी है, वहीं विपक्ष इतनी मजबूत मोर्चाबंदी में लगा है कि ममता बनर्जी जैसी तुनकमिजाज नेत्री सभी गिले-शिकवे भुलाकर माक्र्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी तक से हाथ मिलाने को तैयार हो गई हैं। वहीं कांग्रेस ने नोटबंदी के कारण उत्पन्न हुई अर्थव्यवस्था में खलबली को देखते हुए काम रोको प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया है। राज्यसभा में पार्टी के उपनेता आनंद शर्मा ने नियम 267 के तहत और लोकसभा कांग्रेस के नेता मलिकार्जुन खड़गे ने भी इसी प्रकृति का नोटिस दिया है। साफ है, विपक्ष सरकार की चैतरफा घेराबंदी में लगा रहकर उसे पष्त करने के मूड में है। हालांकि संसदीय कार्य राज्यमंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा है कि राजनीतिक वाद-विवाद से लेकर आम आदमी से जुड़े सभी मुद्दों पर चर्चा से सरकार पीछे नहीं हटेगी।
संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार की प्राथमिकता वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) संबंधी तीन विधेयकों को पारित कराना है। सरकार की मंशा है कि 1 अप्रैल 2017 से जीएसटी हर हाल में पूरे देश में लागू हो जाए। इस कानून की सार्थकता तभी है, जब इसके सहायक तीन और विधेयक पारित हो जाएं। इनमें केंद्रीय वस्तु एवं सोवाकर, समन्वित वस्तु एवं सेवाकर और वस्तु एवं सेवा कर ( राजस्व के नुकसान का मुआवजा) विधेयक शामिल हैं। जीएसटी की ज्यादातर कर दरों को अंतिम रूप दिया जा चुका है।
अर्थव्यवस्था से जुड़े इन विधेयकों के अलावा समाजिक व्यवस्था को नया रूप देने वाले करीब दर्जन भर विधेयक लंबित हैं। जिनमें तीन तलाक, श्रम सुधार और किराए की कोख नियमन विधेयक लंबित हैं। इस विधेयक के जरिए किराए की कोख संबंधी राष्ट्रीय बोर्ड, राज्य स्तरीय बोर्ड और किराए की कोख प्रक्रिया एवं चलन के नियम तय होंगे। सरकार तीन तलाक की तरह ईसाई दंपतियों से जुड़े डेढ़ सौ साल पुराने कानून में संसोधन के भी मूड में है। ईसाई समुदाय इसमें संशोधन की मांग अर्से से कर रहा है। हालांकि फिलहाल यह प्रस्ताव केंद्रीय मंत्री मंडल से मंजूर नहीं हुआ है। विधि मंत्रालय के प्रस्ताव के अनुसार आपसी सहमति से तलाक के लिए आवेदन दााखिल करने वाले ईसाई दंपत्तियों को अर्जी लगाने से पहले अलग-अलग रहने की अवधि को मौजूदा दो साल से कम करके एक साल करने के लिए तलाक अधिनियम 1869 में संशोधन किया जाना है। दरअसल हिंदू विवाह अधिनियम, पारसी और विशेष विवाह अधिनियमों में यह अवधि एक साल है। इस संशोधन का आदेश सर्वोच्च न्यायालय ने दिया था। ईसाई समुदाय के सदस्यों की मांग को पृष्ठभूमि कानून मंत्रालय ने अलग रहने की अवधि को कम करने का प्रस्ताव रखने का फैसला किया है।
लेकिन विधेयकों पर मुनासिब बहस करने से इतर संसद में उन मुद्दों पर ज्यादा हुल्लड़ होने की आशंका है, जिन पर नीतिगत एक राय बनाना संभव नहीं है। इनमें नोटबंदी, सेना की सर्जिकल स्ट्राइक और भोपाल में सिमी के पुलिस मुठभेड़ में मारे गए 8 आतंकी रहेंगे। इनके अलावा कश्मीर में हिंसा, विद्यालयों में आगजनी, पाकिस्तानी सेना के साथ युद्ध जैसे हालात और घाटी में जिदंगी सामान्य कैसे हो, ये मुद्दे छाये रह सकते हैं। परमाणु शक्ति के इस्तेमाल पर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का वह बयान भी चर्चा का विषय बन सकता है, जिसमें उन्होंने भारत पहले परमाणु हमला करने की संभावना को स्वीकर किया है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई जापान यात्रा और वहां हुए असैन्य परमाणु समझौते को लेकर भारत की जो कमजोरी सामने आई हैं, उसे भी मुद्दा बनाया जा सकता है। दरअसल भारत ने अभी तक परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत नहीं किए हैं। हालांकि 2005 में अमेरिका ने भारत के साथ औद्योगिक परमाणु सहयोग समझौता किया है, लेकिन यह समझौता इस शर्त पर हुआ था कि भारत किसी देश पर पहले परमाणु हमला नहीं करेगा। साथ ही भारत ने परमाणु परीक्षण की पहल पर रोक का ऐलान भी अपनी तरफ से किया था। इसके साथ ही भारत का परमाणु बहिष्कार खत्म हो गया था। इधर जापान यह चाहता था कि उसके साथ होने वाले परमाणु असहयोग समझौते में, यह शर्त शामिल हो कि भारत ने भविश्य में कोई परमाणु परीक्षण किया तो अनुबंध निरस्त हो जाएगा। यह शर्त जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे भारत आए थे, तब तक मंजूर नहीं थी, लेकिन अब राजग सरकार ने इस पर अपनी सहमति दे दी है। किंतु करार से थोड़े दिन पहले ही पर्रिकर द्वारा दिए विरोधाभासी बयान ने विपक्ष को इस मुद्दे पर संसद में बहस का रास्ता खोल दिया है। तय है, विपक्ष को बहस की तमाम सामग्री आसानी से मिल गई है। इसीलिए इस सत्र में कई दिन गतिरोध बना रहेगा।
यदि संसद में राजनीतिक गतिरोध बना रहता है और संसद अखाड़े में तब्दील होती रही तो उन विधेयकों और अधिनियमों पर बारीकी से बहस संभव नहीं है, जो देश की सवा सौ करोड़ जनता की भलाई व नियमन के लिए कानून बनने जा रहे हैं। सांसद का दायित्व भी यही बनता है कि वह विधेयकों के प्रारूप का गंभीरता से अध्ययन करे, जिससे यह समझा जा सके कि उसमें शामिल प्रस्ताव देश व जनता के हित से जुड़े हैं अथवा नहीं। लेकिन राज्यसभा और लोकसभा का यह दुर्भाग्य है कि ज्यादातर सांसद अधिनियम के प्रारूप पर चर्चा करने की बजाय, ऐसे मुद्दों को बेवजह बीच में घसीट के आते हैं, जिनसे उनकी क्शेत्रीय राजनीति चमके। ऐर्सी िस्थति सत्तारूढ़ सरकार के लिए लाभदायी होती है, क्योंकि वह बिना किसी बहस-मुबाहिशे के ही ज्यादातर विधेयक पारित करा लेती है। जबकि विपक्ष सार्थक बहस करने की बजाय गाहे-बगाहे सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश में लगा रहकर संसद का समय जाया कर देता है। जबकि प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा की दृष्टि से यह स्थित देशहित में कतई नहीं है।
इस लिहाज से सत्तारूढ़ सरकार और दल का कर्तव्य बनता है कि वह राजनीतिक गतिरोध का समाधान, राजनीतिक तौर-तरीकों से ही निकाले। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि राजग सरकार राज्यसभा में अभी बहुमत में नहीं है और कांग्रेस के सहयोग व समर्थन के बिना राज्यसभा से कोई भी अहम् विधेयक पास हो जाए, ऐसा आज की स्थिति में कतई मुमकिन नहीं है। इसलिए सत्ता पक्ष को संसद में गतीषीलता बनी रहे इस दृष्टि से व्यावहारिक और वास्तविक नजरिया अपनाना जरूरी है। दरअसल सत्ता पक्ष की विपक्ष के साथ एक अदृश्य सहमति राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर होती हैं। यह अलिखित परंपरा है। साथ ही संबंधों में मधुरता बनी रहे, इस नाते संवाद संप्रेशण निरंतर बना रहना चाहिए।
इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार ने कालाधन, भ्रश्टाचार एवं आतंकवाद पर नकेल कसने के लिए हजार-पांच सौ के नोट बंद करके जो निर्णायक पहल की है, वह स्वागत योग्य है। लेकिन नेक फैसले पर अमल की जो तमाम मुश्किलें पैदा हो रही हैं, उनका प्रबंध नोटबंदी लागू करने से पहले कर लिया गया होता तो शायद न तो देश में इतनी छुट्टे व नए नोटों के लिए मारी-मारी हो रही होती और न ही विपक्ष को जनता से सीधा जुड़ा इतना बड़ा मुद्दा मिला होता। इसलिए इस मुद्दे पर हंगामा खड़ा होना कोई हैरानी की बात नहीं है। फिर हमारे सांसदों में बहुत बड़ी संख्या ऐसे सांसदों की है, जो खुद नोटबंदी से आफत अनुभव कर रहे होंगे ? यह नोटबंदी ठीक उस वक्त की गई है, जब उत्तरप्रदेश व पंजाब समेत पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। ऐसे में इस नोटबंदी ने संभावित प्रत्याशि और दल-प्रमुखों की नींद हराम कर दी है। क्योंकि ज्यादातर उम्मीदवार धन की बहुलता से ही जीत की बाजी गले लगा पाते हैं। गोया विपक्षी दलों के ज्यादातर सांसद दुश्यंत कुमार की इस प्रसिद्ध गजल की पंक्ति के विपरीत जाते दिखेंगे कि ‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। ‘लेकिन हम जानते हैं, इस समय संसद के दोनों सदनों में सांसद पक्ष के हों, या विपक्ष के उनकी देश की सूरत बदलने में रुचि कम ही है। नतीजतन संसद में हंगामा खड़ा करके गतिरोध बनाए रखने की कोशिशें ही ज्यादा परवान चढ़ेगी।

 

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