अतीत के सभी विद्वानों व राज्याधिकारियों के आलस्य-प्रमाद युक्त कार्यों की कीमत भावी पीढ़ियों को चुकानी पड़ती है

मनमोहन कुमार आर्य

               मनुष्यों के दो भेद प्रायः देखने को मिलते हैं। एक विद्वान बुद्धिजीवी वर्ग होता है और दूसरा शासित सामान्य अल्प शिक्षित वर्ग। विद्वान बुद्धिजीवी देश के शिखरस्थ राजनीतिक पदों पर आसीन होकर निर्णय लेते, नीतियां व योजनायें बनाते हैं। उनके निर्णयों एवं कार्यों का प्रभाव देश के वर्तमान एवं भविष्य दोनों पर पड़ता है। प्राचीन काल में हमारा समाज चार वर्णों में विभाजित था। तब आजकल के समान जन्मना अगणित जातियां नहीं थी। सारा समाज गुण, कर्म एवं स्वभाव के आधार पर चार वर्णों में हुआ करता था। यह वर्ण होते थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। शूद्र अशिक्षित लोगों के समुदाय को कहा जाता था जो गुरुकुलों में पढ़ने का अवसर मिलने पर भी अपनी बौद्धिक दुर्बलताओं के कारण पढ नहीं पाते थे। उन्हें शारीरिक श्रम के कार्य दिये जाते थे। समाज में उनका अन्य वर्णों के समान आदर व यथायोग्य सत्कार होता था। प्रमुख व शीर्ष वर्ण, ज्ञान की अधिकत्रता से, ब्राह्मण होतो था जिसके कर्तव्य वेद एवं सभी विद्याओं को पढ़ना व पढ़ाना, यज्ञ करना व करवाना तथा दान लेना व देना मुख्य हुआ करते थे। ब्राह्मण ही राजा के परामर्शदाता व मंत्री हुआ करते थे। यह लोग राजा को जो परामर्श देते थे उसी के अनुसार देश चलता था और उसका प्रभाव देश के वर्तमान व भविष्य दोनों पर पड़ता था।

               महाभारत का युद्ध हुआ जिसमें हमारे देश के अनेक योद्धा मारे गये। इसका सेना व व्यापार पर दुष्प्रभाव हुआ था। किन्हीं कारणों से ब्राह्मणों ने अपने वेद व विद्या के अध्ययन व प्रचार के कार्य में शिथिलता बरती जिससे देश में सर्वत्र अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड एवं कुरीतियां उत्पन्न होना आरम्भ हो गयीं थीं और समय के साथ इनमें भारी वृद्धि होती गयी। यदि हमारा ब्राह्मण वर्ग स्वकर्तव्यों के पालन में शिथिलता न बरतता, देश में अध्ययन व अध्यापन की परम्परा में व्यवधान न आता और तब राज्य संचालन सहित धर्म एवं संस्कृति में वेद प्रतिपादित सत्य परम्पराओं का ही व्यवहार विद्यमान रहता। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे ब्राह्मण वर्ग में विद्या अध्ययन में आयी शिथिलता से यज्ञों में हिंसा का समावेश आरम्भ होकर वृद्धि को प्राप्त हुआ था। यज्ञों में गो, भेड़, अश्व आदि यजमान के पशुओं के मांस से आहुतियां दी जाने लगी थी। यज्ञ पूर्ण अहिंसक कर्म को कहते हैं। कैसे और क्यों हमारे उस समय के पण्डितों ने यज्ञों में हिंसा होने दी, इसका समुचित उत्तर नहीं मिलता। इसका कारण उनकी अविद्या व आलस्य व प्रमाद को ही माना जा सकता है। ऐसा ही ऋषि दयानन्द जी ने भी स्वीकार किया है। अब से लगभग ढाई हजार वर्ष पहले महात्मा बुद्ध के समय में यज्ञों में सर्वत्र हिंसा हुआ करती थी जिसके विरोध में महात्मा बुद्ध ने यज्ञों का बहिष्कार करने के साथ ईश्वर का भी बहिष्कार किया और कालान्तर में उनके शिष्यों ने उनकी शिक्षाओं के आधार पर बौद्ध मत स्थापित किया। इसके बाद तो सर्वत्र अविद्यायुक्त मतों की बाढ़ सी आ गई। कारण यही था कि वेदों के सत्य अर्थ विलुप्त हो गये थे और वेदों के योग्य अधिकारी विद्वान ऋषि आदि समाज में नहीं थे। वेदों के सत्य अर्थों का प्रचार न देश में और न देश से बाहर हो रहा था। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि समाज में योग्य विद्वान न हों तो मिथ्या परम्परायें आरम्भ हो जाती हैं जिसका कुप्रभाव समय के साथ वृद्धि को प्राप्त होता है और वह जाति के सभी लोगों के लिये अत्यन्त हानिकारक एवं प्राणघातक होता है।

               महाभारत युद्ध के बाद हमारे विद्वतवर्ग ने जो आलस्य प्रमाद के वशीभूत होकर अपने कर्तव्यों, विद्याध्ययन एवं उसका जनसामान्य में प्रचार, की उपेक्षा की उसका प्रभाव उस काल में भी हुआ था और कालान्तर में उसी के प्रभाव से देश देशान्तर में अनेक अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों के रूप में सामने आया। यदि मत-मतान्तर उत्पन्न हुए भी थे तो उन्हें अहिंसा पर आधारित होना चाहिये था परन्तु सभी मत-मतान्तर अहिंसा पर आधारित न होकर कुछ पशुओं के प्रति और धर्म प्रचार में अहिंसा को गौण मानते थे। इतिहास में उदाहरण मिलते हैं कि कुछ अविद्यायुक्त मतों ने अपने मत के प्रचार व प्रसार में हिंसा का आश्रय लिया और इससे बड़ी संख्या में निर्दोष अन्य मतावलम्बियों के जीवन नष्ट किये। बड़ी संख्या में कमजोर लोगों का मत-परिवर्तन व धर्मान्तरण भी किया गया। मत-मतान्तरों की ऐसी प्रवृत्तियां समय के साथ समाप्त होने के स्थान पर उग्रता को प्राप्त हुई हैं जिससे संसार में समय-समय पर अनेक प्रकार के भीषण हत्या-काण्ड तथा छोटी-छोटी बातों के लिये युद्ध आदि होते रहे हैं। भारत सन् 1947 में स्वतन्त्र हुआ था। हमारे नेताओं ने देश का विभाजन स्वीकार किया और एक बहुत बड़ी जनसंख्या को पाकिस्तान में वहां के कट्टर पंथियों के हाथों में छोड़ दिया। परिणाम भीषण हिंसा के रूप में हुआ जिसमें लाखों निर्दोष स्त्री-पुरुष व बच्चे मारे गये और बहुत सी बहिन-बेटियों के साथ दुष्कर्म हुआ। आज भी वह प्रवृत्तिां नष्ट व दूर नहीं हुई हैं। कब कहां क्या हो जाये, कहा नहीं जा सकता? देश में प्रजातांत्रिक व्यवस्था है। यहां सत्ता के लिये लोगों के वोटों का महत्व है। कुछ लोग व वर्ग संगठित होते हैं, वह राजनीतिक दलों से अपने वोट की कीमत वसूल करते हैं।

               हमारे देश में सत्ता प्राप्ति एक ऐसा खेल बन गया है जिसमें हमारे लोग उचित व अनुचित का ध्यान नहीं रखते। वोट प्राप्ति के लिये अनेक अलगाववादी शक्तियों तक से गुप्त समझौते किये जाते हैं। देश के हितों की अनदेखी की जाती है। हमारे देश में अतीत में अनेक साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं जिसके पीछे कुछ राजनीतिक दलों का हाथ होता है। ऐसे आरोप राजनीतिक दल एक दूसरे पर लगाते रहते हैं। इसकी कीमत हमारे देश के निर्दोष लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। ऐसा देखने में आ रहा है कि देश में हिंसा की प्रवृत्ति कम होने के स्थान पर बढ़ रही है। अतः समस्त देशवासियों को सावधान होने सहित संगठित होने की आवश्यकता है जिससे किसी दल या संगठन द्वारा अनुचित रूप से उन पर आक्समिक हमला होने पर वह अपनी रक्षा कर सकें। इसके लिये देश के प्रत्येक नागरिक को सोचना चाहिये कि वह हिंसा न करे, पीड़ितों के प्रति सब सद्भावना रखें, लोगों को धर्म और जाति के नाम पर सगठित नहीं होना चाहिये अपितु मानवता, मानवीय गुणों वा मानवीय मूल्यों के आधार पर संगठित होना चाहिये। ऐसा होना तो चाहिये परन्तु ऐसा हो नहीं रहा है। इससे अनुमान होता है कि आने वाला समय कहीं 7 दशक पहले जैसा व उससे भी बदतर समय सिद्ध न हो। देश में अमन व शान्ति हो, इसके लिये सभी राजनीतिक दलों को परस्पर सहयोग करना चाहिये। उनके विचार, भावना, नीतियां, सिद्धान्त, मान्यतायें देशहित में होनी चाहियें। सबको किसी भी प्रकार की हिंसा का पूरी दृढ़ता से खण्डन करना चाहिये, परन्तु ऐसा हो नहीं रहा है। देश व समाज भगवान के भरोसे अधिक चल रहा है। यह सब जो हुआ है वह हमें महाभारत युद्ध के बाद हमारे देश के विद्या के अध्ययन व प्रचार व प्रसार के लिये जिम्मेदार लोगों के आलस्य व प्रमाद आदि कारणों व अपने कर्तव्यों की उपेक्षा के कारण हुआ प्रतीत होता है। यही आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द का भी अनुमान व आंकलन था। अतः हमें अतीत की गलतियों से शिक्षा लेकर अपने सभी निर्णय बहुत ही सोच विचार कर लेने चाहियें। यदि हमारे निर्णयों में छोटी सी भी भूल होगी तो हमें व हमारी भावी पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी होगी। हम यदि वोट देने जाते हैं तो हमें अपने तात्कालीक लाभ, अपनी बिरादरी, क्षेत्रीय व जातिगत प्रत्याशी व अपनी भाषा बोलने वाले को महत्व न देकर देश व समाज को महत्व देना चाहिये जिससे देश व सभी देशवासियों को समान रूप से लाभ हो। इसी में सब मनुष्यों वा देश का हित छिपा है।

               किसी कवि की एक पंक्ति हैलम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पायी ऐसा ही कुछ महाभारत के बाद और सन् 1947 में हुआ। अतः अब हमारे पास सावधान होने और परस्पर संगठित होने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। आश्चर्य है कि ऋषि दयानन्द के अनुयायी ‘‘आर्यभी संगठित नहीं हैं। इस कारण भविष्य के विषय में सोचकर चिन्ता दुःख होता है। मनुष्य को स्वयं पुरुषार्थ करना चाहिये और शेष ईश्वर की व्यवस्था में समर्पित कर देना चाहिये। ईश्वर से ही प्रार्थना है कि वह सभी आर्यों व वेदभक्तों, ईश्वरभक्तों, देशभक्तों, राम व कृष्ण के अनुयायियों, सभी सज्जन पुरुषों को सद्बुद्धि दे और उनकी रक्षा करे। सावधान व संगठित होकर हमें अन्धविश्वास दूर करने व उन्हें छोड़ने, पाखण्डों से दूर रहने तथा मिथ्या व सड़ी-गली सामाजिक कुप्रथाओं का उन्मूलन करने में भी तत्परता करनी चाहिये। इसी में मनुष्यता व देश का हित है। हमने यह लेख मानवता की रक्षा के लिये लिखा है। हिंसा करने वाला व्यक्ति हर हाल में बुरा होता है। हिंसा एक अपराध है और हिंसा करने वाले को सब मनुष्यों को एकमत से व निष्पक्षता से अपराधी मानना चाहिये भले ही वह कोई भी क्यों न हो।                महाभारत युद्ध के बाद यदि हमारे पूर्वजों ने वेदों के सत्य अर्थों का अनुसंधान जारी रखते हुए उनका प्रचार किया होता तो आज जैसे दुर्दिन देश व विश्व में न आते। महर्षि दयानन्द ने भी तो वेद के सत्य अर्थों का प्रचार प्रसार किया है। उनकी तरह से अतीत के विद्वान भी कर सकते थे। उन्होंने अपना कर्तव्य नहीं निभाया। वेद पूर्णता से अहिंसा के समर्थक है। वेदों की अहिंसा ही असली अहिंसा है। अहिंसा का प्रयोग धर्म के मूल तत्वों को धारण करने वालों की रक्षा के लिये किया जाता है। सभी निर्णय देश काल व परिस्थिति के अनुसार ही किये जाते हैं। राम, कृष्ण, चाणक्य और ऋषि दयानन्द हमारे आदर्श हैं।

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