लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

 

प्रवासी मुक्त अमेरिका के मुद्दे पर चुनाव जीते डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से अवसरों की भूमि माने जाने वाले अमेरिका में नस्लीय भेद हिंसा का रूप लेने लगा है। इस हिंसा के पहले शिकार दो भारतीय युवा इंजीनियर हुए हैं। इनमें से हैदराबाद के एक श्रीनिवास कुचिवोतला की मौके पर ही मौत हो गई। दूसरा अलोक मदसानी घायल है। 51 वर्षीय अधेड़ हमलावर सेवानिवृत्त अमेरिकी नौसैनिक एडम पुरिनटोन है। गोली दागते हुए उसने नस्लीय टिप्पणी करते हुए कहा भी ‘निकल जाओ मेरे देश से आतंकी।‘ हमलावर ने इन भारतीयों को अरबी नागरिक मानकर गोली चलाई थी। यह हिंसक घटना नस्लीयता पर बहस के बाद सामने आई। इस घटना का सुखद एवं सहिष्णु पहलू यह रहा कि वहां मौजूद अमेरिकी नागरिक इयान ग्रिलोट ने अपनी जान की परवाह किए बिना हमलावर को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन एडम ने उसे भी गोली मारकर जख्मी कर दिया। घायल इयान ने बेहद संवेदनशील एवं मानवीय बयान देते हुए कहा कि ‘हमलावर कहां से था, किस नस्ल से था, मुझे इस बात से कुछ लेना-देना नहीं था। हम सभी इंसान हैं और इंसानियत के नाते मैंने हमलावर को पकड़ने की कोशिश की थी।‘ इसके साथ ही श्रीनिवास के परिवार की मदद के लिए डेढ़ लाख डाॅलर के लक्ष्य से स्थापित सोशल साइट पेज पर 6 घंटे में ही करीब ढाई लाख डाॅलर एकत्रित हो गए। श्रीनिवास की पत्नी सुनैना दुमला ने ट्रंप प्रशासन से एक प्रेस वार्ता आयोजित कर सवाल पूछा कि क्या ‘वे अल्पसंख्यकों के विरुद्ध शुरू हुई इस नफरत को रोक पाएंगे ? क्योंकि अल्पसंख्यकों के खिलाफ पूर्वाग्रह की खबरों ने उन्हें डरा दिया है।‘ मानवीयता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े ये तथ्य उम्मीद जगाते है कि बहुसंख्यक अमेरिकी समाज फिलहाल पूर्वग्रह से मुक्त होने के साथ सांप्रदायिक सद्भाव और मानवीय मूल्यों से लवरेज है।

इन सकारात्मक और सहिष्णु हालातों के बावजूद पूरे अमेरिका में भारतीय समुदाय सकते में है। उसे सार्वजनिक स्थलों पर एक-दूसरे से मातृभाषा हिंदी में बात नहीं करने और किसी के साथ बहस न करने का फैसला लेना पड़ा है। श्रीनिवास की हत्या और इस फैसले से तय होता है कि चुनाव में कटु और कर्कश प्रचार का कितना उन्मादी असर होता है। इस उन्माद को उकसाने का काम डोनाल्ड ट्रंप के प्रचार ने इस हद तक कर दिया है कि समूचे अमेरिका में धार्मिक, नस्लीय और जातीय विभाजन की एक रेखा खिंच गई है। हालांकि अमेरिका में अश्वेतों और एशियाई लोगों के खिलाफ एक किस्म का दुराग्रह हमेशा रहा है। नतीजतन नस्लीय हमले भी होते रहे हैं। ये हमले बराक ओबामा के दूसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से ही गैर अमेरिकियों पर जारी हैं। ओबामा जब अमेरिका के दूसरी बार राष्ट्रपति चुने गये थे तब यह बात उजागर हुई थी कि अमेरिका में नस्लीयता बढ़ रही है। क्योंकि 39 फीसदी गैर अमेरिकियों के वोट ओबामा को मिले थे। इनमें अफ्रीकी और एशियाई मुल्कों के लोग थे। मूल अमेरिकियों के केवल 20 फीसदी वोट ही ओबामा को मिले थे। यह इस बात की तसदीक है कि अमेरिका में नस्लीयता की खाई लगातार चैड़ी हो रही है और प्रशासन उसे नियंत्रित नही कर पा रहा है।

5 अगस्त 2015 को रंगभेदी मानसिकता के चलते विस्कोशिन गुरुद्वारे पर हुए हमले में सात सिख मारे गए थे। बाद में हमलावर वेड माइकल पेज ने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली थी। श्वेत नस्लवादी पेज फौज में नौकरी कर चुका था। इसके बाद न्यूजर्सी में 24 दिसंबर 2014 को गुजराती व्यापारी अष्वनी पटेल और फरवरी 15 में अमित पटेल की हत्याएं हुईं। 6 फरवरी 2015 को सुरेश भाई पटेल पर पुलिसकर्मियों ने ही बर्बर हमला किया था। इस हमले में वे स्थाई विकलांगता के शिकार हो गए। बाद में अदालत ने हमलावर पुलिसकर्मी एरिक पार्कर को बरी कर दिया। सुनंदों सेन को एक अमेरिकी महिला ने चलती भूमिगत रेल से सिर्फ इसलिए धक्का दे दिया था, क्योंकि वह रंगभेदी मानसिकता के चलते गैर अमेरिकियों से नफरत करने लगी थी। ऐरिका मेंडेज नाम की इस महिला ने अदालत में बेझिझक कबूल भी किया कि वह हिंदुओं, सिख और मुसलमानों से नफरत करती है, लिहाजा उसने सेन की हत्या करके कोई गलत काम नही किया है। दरअसल अमेरिका में 9/11 के आतंकवादी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के लोगों पर हमले तेज हुए हैं। दाड़ी और पगड़ी वालों को लोग नस्लीय भेद की दृष्टि से देखने लगे है। इसके बाद आग में घी डालने का काम ट्रंप की  नस्लभेद से जुड़ी उपराष्ट्रीयताओं ने कर दिया। नस्लीय मानसिकता रखने वाले मूल अमेरिकी ट्रंप की टिप्पाणियों बहकावे में आ गए। जिसके दुष्परिणामस्वरूप वे गैर अमेरिकियों से खूनी खेल खेलने लगे हैं।

अमेरिका में विस्कोन्सिन गुरुद्वारे पर हुए हमले के बाद ही यह तय हो गया था कि यहां अश्वेतों के लिए नही रहने लायक पृष्ठभूमि तैयार हो रही है। इस घटना के बाद जिन तथ्यों का खुलासा हुआ वे  हैरानी में डालने वाले रहे हैं। एक अश्वेत बाराक ओबामा को राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर बिठाने वाले अमेरिका में बाकायदा श्वेतों को सर्वोच्च ठहराने का सांगठनिक आंदोलन चल रहा है। लिहाजा कंसास में इंजीनियरों पर हुआ हमला, किन्हीं बौराए लोगों की विवेकहीन परिणाम की हरकत न होकर  नितांत सोची-समझी साजिशें हैं। गुरुद्वारे पर जिस वेड माइकल पेज नामक सख्स ने हमला किया था, वह कोई मामूली सिरफिरा व्यक्ति नहीं था, बल्कि अमेरिकी सेना के मनोविज्ञान अभियान का विशेषज्ञ था और नस्लीय आधार पर गोरों को सर्वश्रेष्ठ मानने वाले नव-नाजी गुट ‘एंड एपैथी’ से जुड़ा था। एरिका मेंडेज भी दक्षिणपंथी सोच की महिला है और एंड एपैथी समूह की विचारधारा से प्रभावित है। इसी सोच का पूर्व नौसैनिक एडम पुरिनटोन बताया जा रहा है। यह आंदोलन इसलिए भी परवान चढ़ रहा है, क्योंकि इसे दक्षिणपंथी बंदूक लाॅबी से भी समर्थन मिल रहा है। नतीजतन अमेरिका में उग्रवादी गोरों के निशाने पर हिंदू, सिख और मुस्लिम आ रहे हैं।

ओबामा जब दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे, तब गैर अमेरिकियों में यह उम्मीद जगी थी कि वह अपने इतिहास की श्वेत-अश्वेत के बीच जो चौड़ी खाई है उसे पाट चुके है, क्योंकि अमेरिका में रंगभेद, जातीय भेद एवं वैमनस्यता का सिलसिला नया नहीं है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। इन जड़ों की मजबूती के लिये इन्हें जिस रक्त से सींचा गया था वह भी अश्वेतों का था। हाल ही में अमेरिकी देशों में कोलम्बस के मूल्यांकन को लेकर दो दृष्टिकोण सामने आये हैं। एक दृष्टिकोण उन लोगों का है, जो अमेरिकी मूल के हैं और जिनका विस्तार व अस्तित्व उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के अनेक देशों में है। दूसरा दृष्टिकोण या कोलम्बस के प्रति धारणा उन लोगांें की है जो दावा करते है कि अमेरिका का वजूद ही हम लोगों ने खड़ा किया है। इनका दावा है कि कोलम्बस अमेरिका में इन लोगों के लिए मौत का कहर लेकर आया। क्योंकि कोलम्बस के आने तक अमेरिका में इन लोगों की आबादी 20 करोड़ के करीब थी, जो अब घटकर 10 करोड़ के आस-पास रह गई है। इतने बड़े नरसंहार के बावजूद अमेरिका में अश्वेतों का संहार लगातार जारी है। अवचेतन में मौजूद इस हिंसक प्रवृत्ति से अमेरिका मुक्त तो नही हो पाया, बल्कि अब ट्रंप के आने के बाद इस प्रवृत्ति में निरंतर इजाफा हो रहा है।

अमेरिका में नस्लीय भेद कई स्तरों पर देखने को मिल रहा है। वहां की ईसाई मिशनरियों ने बाबा रामदेव की योग शिक्षा पर इसलिए रोक लगा दी थी, क्योंकि यह शिक्षा हिंदुओं की सनातन परंपरा से जुड़ी हुई है। फिल्म कलाकार शाहरूख खान और शिल्पा शेट्टी को भी अमेरिका में नस्लीय भेद का सामना करना पड़ा है। अमेरिका के ट्राई वैली नाम के विवि में पढ़ने वाले छात्रों के टखनों में रेडियो काॅलर पहना दिए गए थे। यह पशुगत व्यवहार इसलिए किया गया था, जिससे छात्र भाग न पाएं। हाल ही में बाॅक्सर मोहम्मद अली के बेटे अली जुनियर को 2 घंटे तक फ्लोरिडा हवाई अड्डे पर हिरासत में रखा गया। इसके बाद आव्रजन अधिकारियों ने पूछा कि क्या तुम मुसलमान हो ? दरअसल भारतीयों की श्रमसाध्य कर्तव्य निष्ठां का लोहा अमेरिका समेत पूरा विश्व मान रहा है। किंतु भारतीयों का यही सर्मपण और सज्जनता अमेरिका के चरमपंथियों को परेशान कर रही है। भारतीय डाॅक्टर व इंजीनियरों को अमेरिकी लोग बेरोजगारी का कारण भी मान रहे है। अमेरिका के साथ ब्रिटेन में भी सिख समुदाय के लिए पगड़ी और कटार नस्लभेदी संकट का सबब बन रहे हैं। असल में भूमंडलीकरण के बहाने साम्राज्यवादी अवधारणा के ये ऐसे सह-उत्पाद है, जो यह तय करते है कि धर्मनिरपेक्षता यूरोपीय देशों का महज मुखौटा है, उसके भीतर जातीय और नस्लीय संस्कार अर्से से अंगड़ाई लेते रहे हैं।

 

आज लगभग पूरी दुनिया में बाजारवादी सोच को बढ़ावा मिल रहा है। इस विस्तारवादी सोच की आड़ में राजनीतिक चेतना, समावेशी उपाय और सांस्कृतिक बहुलता पिछड़ते दिखाई दे रहे हैं। परिणामस्वरूप सामाजिक सरोकार और प्रगतिशील चेतनाएं हाशिए पर धकेली जा रही हैं। उपेक्षापूर्ण कार्यशैली की यही परिणति प्रतिरोधी शंखनाद का ऐसा चेहरा है, जो मनुष्यताद्रोही है। गोया, बाजारवादी संस्कृति की यह क्रूरता और कुरूपता सांस्कृतिक बहुलतावाद को भी खतरा बन गई है। अमेरिका और अन्य यूरोपीय मूल के लोगों में ही नहीं, एशियाई और दक्षिण व मध्य एशियाई मूल के लोगों में भी प्रतिरोध की यही धारणा पनप रही है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन में हो रहे आतंकी हमलों की एक वजह सांस्कृतिक एकरूपता का विस्तार भी है। इन धरणाओं पर अंकुश कैसे लगे इस परिप्रेक्ष्य में संयुक्त राष्ट्रसंध जैसी संस्थाओं को सोचने की जरूरत है।

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