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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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हरिकृष्ण निगम

‘राजनीतिक पत्रकारिता’ पर हाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल की शोध-परियोजना के अंतर्गत श्री राकेश सिंहा के एक प्रकाशित ग्रंथ में जब यह पढ़ा कि देश के कुछ प्रमुख अंग्रेजी दैनिक पत्रों की राजनैतिक व वैचारिक प्रतिबध्दता में दृष्टिकोण की खोट हो सकती है तब अनेक बुध्दिजीवियों की तरह मेरा संदेह भी विश्वास में परिणत हो गया। व्यवस्था-विरोधी छवि और वामपंथी झुकाव तो अनेक अंग्रेजी पत्र बहुधा नहीं छिपाते हैं पर उनका हिंदू-आस्था और बहुसंख्यकों के संगठनों में इतना वैर और वैमनस्य होगा इसका अनुमान नहीं था। संपादकीय तो दूर, समाचारों की प्रस्तुति व उनके चयन में भी उनके बहुसंख्यक विरोध का खेल स्पष्ट देखा जा सकता है। इस बौध्दिक स्वेच्छाचारिता और दुराग्रह पर हाल में अंग्रेजी में एक शोध रिपोर्ट जो मुंबई विश्वविद्यालय के गरवारे इंस्टीट्यूट के अंग्रेजी पत्रकारिता विभाग ने उपलब्ध कराई है उसमें भी दर्जनों उदाहरणों के साथ इस तत्व का पर्दाफाश हुआ है। लगभग 150 पृष्ठों के इस सर्वेक्षण में मुंबई महानगर के ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ संस्करणों की विषयवस्तु का विस्तृत और तुलनात्मक विश्लेषण द्वारा यह निष्कर्ष निकाला गया है कि ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ पाठकों में अपनी बढ़ी स्वीकृति के दावों के बाद भी सनसनीखेज व छिछले, बहुसंख्यक विरोधी समाचारों को हर तरह से उछालता है। इसके विपरित ‘इंडियन एक्सप्रेस’ यद्यपि उसका पाठक वर्ग ‘टाइम्स’ की तुलना में सीमित है, पर अधिक संतुलित, रचनात्मक, निष्पक्ष और तथ्यपूर्ण पत्र है जो युवाओं को भाता है। अपने दबदबे और प्रचारतंत्र के कारण ‘टाइम्स’ भले ही पाठक वर्ग के विश्वास का दावा करे पर हिंदी व भारतीय भाषाओं के पत्रों के मंतव्यों की पारदर्शिता व विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता है। एक तथ्य और भी सामने आया है कि अंग्रेजी पत्रों के वर्चस्व बढ़ाने का एक बड़ा कारण यह भी है कि राजनीतिक गलियारों में उसे अधिक महत्व मिलता है। क्योंकि वोट सदा क्षेत्रीय या स्थानीय भाषाओं में मांगे जाते हैं इसलिए कथित नई उदारवादी चेतना और अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि उनका एक बड़ा ढोंग है।

ऐसे प्रेस का दोहरा चरित्र और भ्रमित रूप तब सामने आता है जब यह निष्पक्ष होने का ढोंग करता है। प्रेस का उपयोग राजनीति में स्थान बनाने के लिए ही आज होता है पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नारा कब क्षुद्र राजनीति की बैसाखी बनकर रह जाता है इसके अनगिनत उदाहरण है जो एक सामान्य पाठक भी समझने लगा है। समाचारों की प्रस्तुति में रंग भरने या उन्हें कभी-कभी संपादकीय जैसा बनाने में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ पर दूसरों की तुलना में सर्वाधिक आरोप लगते रहे हैं। पाठक के मन को पहले पूर्वाग्रह का शिकार बना कर किसी घटना को इतना नकारात्मक ढंग से समझा कर प्रस्तुत किया जाता है कि सामान्य पाठक भ्रमित होता है। इस तरह गुमराह कर समाचार-पत्र जनमत बनाने का ढोंग भी करते हैं तथा बहुसंख्यकों के विषय में विषवमन द्वारा एक प्रकार से वे लोकतांत्रिक दृष्टि को विफल करने के लिए भी जिम्मेदार कहे जा सकते हैं। सच तो यह है कि ‘टाइम्स’ जैसे पत्रों का अब उद्देश्य सामाजिक व राष्ट्रीय सरोकार न होकर अपने व्यवसाय की उन्नति है और अब उन्हें संपादक नहीं निगमित नियंत्रण की परवाह अधिक हैं क्योंकि यह उद्योग मुनाफे के हर दरवाजे खटखटाने में विश्वास करने लगा है। इसलिए इसके समाचारों का प्रायोजित ढंग से सुविधाजनक रूप में प्रकाशित करना सामान्य बात हैं। सामान्य पाठक बहुधा उस समाचार के पीछे के मस्तिष्क और योजना तक नहीं पहुंच पाते हैं। इसलिए संपादकीय संस्था के अवमूल्यन का एजेंडा ही ऐसे उद्योगपति के समक्ष सर्वोपरि रहता है।

राजनीतिबाजों के अतिरिक्त, इस देश में यदि जात-पात का तुलनात्मक महत्व व विभाजन, विद्वेष, वैमनस्य या पक्षपात को बढ़ावा देने वाला कोई है तो वह है मेनस्ट्रीम अंग्रेजी मीडिया का प्रभावी वर्ग। चाहे चुनावों का समय हो या जनगणना का अकसर ऐसे समाचार-पत्र जाति के समर्थक बन जाते है यद्यपि वे सदैव जाति प्रथा को कोसने में अगुवाई करते दिखते हैं। कुछ उदाहरण तो हमें विस्मित भी कर सकते हैं। देशवासियों के पूज्य योगगुरू बाबा रामदेव या साध्वी ॠृतंभरा आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उनकी जाति या वर्ण को कुटिलतापूर्वक उल्लेख कर, उदाहरण के लिए ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ या कुछ वैसे पत्रों ने विराट हिंदू दृष्टि को अपमानित करने की कई बार कोशिश की है। भारत सहित दुनियां में उनके करोड़ों श्रध्दालुओं ने उनकी जाति जानने की कभी उत्सुकता नहीं की थी पर उनकी जाति के उल्लेख का मंतव्य क्या हो सकता है यह हमारा कथित प्रबुध्द मीडिया ही प्रकट कर सकता है।

संवेदनहीनता या छिछली मनोवृत्ति यही नहीं समाप्त होती हैं 26/11 के दुर्दांत आतंकवादी अभियुक्त कसाब की निजी रूचियों, विचारों, शौक आदि के बारे में इस देश के मीडिया ने लगातार एक वर्ष से अधिक हजारों शब्दों की हर बार रिपोर्ट प्रकाशित कर वस्तुतः अपने को कलंकित किया है क्योंकि इसी अंग्रेजी मीडिया को आतंकवाद के शिकारों व उनके परिवारों का नाम भी याद करना आवश्यक न लगा। मजे की बात यह है कि जब ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसे पत्र अबू सलेम के तलोजा करागार में कैरम खेलने के लिए कोई साथी नहीं मिला तब कैसे पुलिस अधिकारी द्रवित हो उठे इस पर 500 शब्दाें की एक रिपोर्ट पाठकों के लिए प्रयुक्त की जाती है। हाल की दो – एक अन्य घटनाओं पर दृष्टि डालें तो प्रारंभ में जो कहा गया है वह भलीभांति सत्यापित किया जा सकता है। जब दारूल उलूम देवबंद ने फतवा जारी किया कि किसी महिला का न्यायाधीश पद ग्रहण करना धर्मविहित नहीं हैया पुरूषों के साथ संगणकों की कंपनियों में काम करना वर्जित है या टी.वी. देखना गुनाह है। तब हमारे अंग्रेजी के बड़े पत्रों में या तो ये समाचार कहीं कोने में दबे रहे या उन्हें कोई महत्व नहीं दिया गया। इसी तरह जब कथित ईशनिंदा पर केरल के एक कॉलेज के प्रोफेसर का खुलेआम धर्मांधों ने हाथ काट डाला तब हमारे महानगरों के पत्रों में या मानवधिकार संगठनों ने कोई चीत्कार नहीं किया। इसी तरह जब पश्चिमी बंगाल के आलिया विश्वविद्यालय की एक अध्यापिका को बुर्का न पहनने पर निकाला गया, तो यही मुखर मीडिया भीगी बिल्ली बन जाती है। यही सब या इससे मिलता-जुलता थोड़ा भी ‘राम सेना’ जैसे संगठन ने या कथित दक्षिणपंथी मनोवृत्ति के एक व्यक्ति ने प्रतिरोध किया होता तो हमारा वही मीडिया सारी दुनियां मे हाहाकार करने या छाती पीटने का स्वांग रचता है। उन्हें तालिबानी या सांस्कृतिक पुलिस सैनिक तो कहा ही गया होता। अतिरेकियों को राष्ट्रद्रोही संरक्षण कौन दे रहा है? यह समझा जा सकता है।

* लेखक अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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