लेखक परिचय

मनोज श्रीवास्‍तव 'मौन'

मनोज श्रीवास्‍तव 'मौन'

जन्म 18 जून 1968 में वाराणसी के भटपुरवां कलां गांव में हुआ। 1970 से लखनऊ में ही निवास कर रहे हैं। शिक्षा- स्नातक लखनऊ विश्‍वविद्यालय से एवं एमए कानपुर विश्‍वविद्यालय से उत्तीर्ण। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में पर्यावरण पर लेख प्रकाशित। मातृवन्दना, माडल टाइम्स, राहत टाइम्स, सहारा परिवार की मासिक पत्रिका 'अपना परिवार', एवं हिन्दुस्थान समाचार आदि। प्रकाशित पुस्तक- ''करवट'' : एक ग्रामीण परिवेष के बालक की डाक्टर बनने की कहानी है जिसमें उसको मदद करने वाले हाथों की मदद न कर पाने का पश्‍चाताप और समाजोत्थान पर आधारित है।

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मनोज श्रीवास्तव ”मौन”

पृथ्वी के तापमान में वृध्दि मानव जाति के लिए चिन्ता का सबब बनी हुई है। दुनिया भर के ताकतवर देशें के कद्दावार नेता आपसी सहमति बनाकर तापमान वृध्दि के नियंत्रण पर प्रयास करने के लिए कोपेनहेगन में एकत्रित हुए थे, इस सम्मेलन में कुछ ठोस हासिल तो नहीं हुआ मगर इतना जरूर हुआ कि दुनिया का ध्यान पृथ्वी को बचाने की ओर जरूर गया।

चार्ल्स डार्विन ने आज से 150 वर्ष पूर्व ही अपनी पुस्तक में बढ़ती हुई उष्णता से होने वाले वैश्विक खतरे से अगाह करा दिया था उष्णता के द्वारा होने वाले खतरों के प्रति आज भी दुनिया भर के तमाम देश असंवेदनशील बने हुए है। वहीं भारत में सामान्य लोगों में आंशिक जागरूकता देखने मिल रही है। यहां लोगों द्वारा विभिन्न सामाजिक संगठनों के सहयोग से जनसामान्य को वृक्षारोपण के प्रति जागरूक करने और विभिन्न स्थानों पर वृक्षारोपण भी कराया जा रहा है लेकिन यह लघु प्रयास तुलनात्मक रूप से पर्याप्त नहीं हो रहा है।

वन को संरक्षित करने और वन्य जीवों की रक्षा के लिए भारत ने विभिन्न वनों को संरक्षित करके पर्यावरण संतुलन का भी प्रयास किया जा रहा है, लेकिन पर्यावरण में बढ़ती उष्णता जैविक रूप से अपने प्रभाव के रूप में जीवनों में जेनेटिक परिवर्तन करके लिंग परिवर्तन तक की स्थित उत्पन्न कर दे रहा है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण लखनऊ स्थित प्रिंस आफ वेल्स जुलोजिक गार्डेन में देखने को मिला है जहां एक मोर में नैसर्गिक रूप से परिवर्तित हो कर मोरीन बन गया था बढ़ती उष्णता से धरती पर जीवों में इस तरह के परिवर्तन हमें सुरक्षा के प्रति सोचने पर विवश कर रहे हैं।

वैज्ञानिक अध्ययनों एवं आंकलन के आधार पर पृथ्वी पर तमाम खतरे मडरा रहे हैं तापमान बढ़ने से लू लगने, मलेरिया, डेंगू तथा दिमागी बुखार जैसी बीमारियां बढ़ेगी विभिन्न देशों में खाद्यान्नों के उत्पादन में 40 प्रतिशत तक कमी हो जाएगी आर्कटिक समुद्र में बर्फ पिघलने से समुद्र तटीय क्षेत्रों में सुनामी व भूकम्प आने की सम्भावना में वृध्दि होगी वर्तमान में चिली देश भूकम्प की भयावह मार झेल रहा है।

भारतीय सरकार अपनी क्षमता के अनुरूप आगामी वर्षों में कार्बन उत्सर्जन में 25 प्रतिशत की कमी लाने का प्रयास कर रही है यह एक बहुत बड़ा कदम है वैसे कुछ छोटे-छोटे उपाय भी है जिसके द्वारा हम सभी मिलकर उष्णता को वैश्विक स्तर पर फैलने से रोक सकते हैं जैसे एयर कंडीशन का फिल्टर यदि स्वच्छ रखा जाए तो 100 किलों कार्बन डाईऑक्साइड कम हो सकती है रेफ्रिजरेटर को रसोई घर से बाहर रखने से 160 किलों कार्बन डाईऑक्साइड कम हो सकती है दिन में एक कप काफी कम पीने से 175 किलो कार्बन डाईऑक्साइड कम हो सकती है। दुनिया भर में छोड़ी जा रही कुल कार्बन डाईऑक्साइड से 40 गुना अधिक अर्थात् 300 अरब टन गैस दुनिया भर के जंगल अवशोषित करते हैं इसलिए पेड़ों का जंगल और पेड़ों का संरक्षण काफी आवश्यक हैं

एक तरफ वैज्ञानिक स्तर पर जेनेटिक परिवर्तन करके अप्राकृतिक तरीके से मानव निर्मित पेड़-पौधे के निर्माण करने में लग गये है कुछ जीयों इंजीनियरों का मानना है कि अगले 10 से 20 वर्षो के अन्दर दुनिया भर में करीब एक लाख अप्राकृतिक या मानव निर्मित वृक्ष लगा दिए जाएंगे जो कार्बन उत्सर्जन को कम करेंगे इन पौधों की वजह से प्रदूषण के स्तर में कमी आएगी, डॉ. टिम के अनुसार यह जीयो इंजीनियरिंग प्रदूषण को कम करने के लिए सर्वाधिक उपयोगी सिध्द होंगे।

* लेखक पर्यावरणप्रेमी हैं।

4 Responses to “तापमान नियंत्रण की नई सोच”

  1. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    मनोज जी आपके और हम सब के लिए एक शुभ सूचना है कि पूर्ण रूप से विकसित पीपल का एक वृक्ष दर्जनों ए.सी. के बराबर शीतलता प्रदान करता है. करोड़ों रुपये मूल्य की ऑक्सीज़न का उत्सर्जन दिन-रात करता रहता है. केवल पीपल का वृक्ष हैं जो रात को भी ऑक्सीज़न प्रदान करता है.
    २८ अप्रेल को एक विद्यालय में बचों से व्यक्तित्व विकास पर आयोजित एक कार्यक्रम में वार्ता के लिए गया तो पर्याप्त गर्मी के मौसम में भी वहाँ ठंडी हवा चल रही थी. ३००-४०० मीटर की दूरी पर चीड के घने जंगल में भारी गर्मीं थी. स्कूल के प्रांगन में सुखद ठंडी हवा चलने का कारण था वहाँ का विशाल पीपल का वृक्ष. इस से पहले पडौस के स्कूल में होकर आये थे तो वहाँ तो भारी गर्मी थी. क्यूंकि वहाँ कभी किसी ने पीपल का वृक्ष लगाने की समझदारी नहीं दिखाई थी.
    आप कभी चंडीगढ़ जाकर देखिये. पहले के बसे चंडीगढ़ में किसी नासमझ प्रशासक नें दुनिया भर के अनुपयोगी वृक्ष लगवाए हुए है. घने वृक्ष होने पर भी भरपूर गर्मी वहाँ गर्मियों के दिनों में पड़ती है. पर पुराने चंडीगढ़ के बाहर के क्षेत्र में बस रहे नए चंडीगढ़ में किसी समझदार योजनाकार नें पीपल के सैंकड़ों वृक्ष लगवाए है. अतः वहां गर्मी बहुत कम पड़ती है. बड़ी सुखद शीतल बयार चलती है.
    अतः केवल वृक्ष लगाना ही पर्याप्त नहीं .यह भी देखना होगा कि कौनसे वृक्ष लगाए ? सफेदे, पापुलर. सिल्वर ओक जैसे प्रदुषणकारी या अनुपयोगी, पानी की कमी पैदा करने वाले वृक्ष लगाने की नालायकी करके तो समस्या का समाधान नहीं, समस्या वृधि ही होगी.
    एक चिकित्सक के नाते अद्भुत जानकारी दे रहा हूँ कि विशाल पीपल के नीचे सांप के काटे व्यक्ति को बिठाने की परंपरा अनेक स्थानों पर है. ८-१०-१२ घंटों में सर्प विश उतर जाता है. अतः स्थान के अनुसार वृक्षारोपण सोच-समझ कर उचित वृक्षों का, समझदारी के साथ होना ज़रूरी है.

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  2. Ajay Srivastava

    मैं पूरी तरह से सुनील पटेल जी से सहमत हूँ की श्री मनोज कुमार श्रीवास्तव “मौन” ने एक बहुत ही बढ़िया सोच अपनी कलम के माध्यम से परिलक्षित की जो की न केवल हर भारतीय वरन हर इंसान को सोचना है और न केवल सोचना है परन्तु उसे कर्म में परिवर्तित कर के अपने और अपने बच्चों के लिए एक खूबसूरत दुनिया बनायें. सोचें, हमे अपने पूर्वजो से क्या मिला और हम अपने बच्चों के लिए क्या छोड़ कर जायेंगे. क्या हमारे बच्चों को विरासत में सूखा, बिमारी, सीमेंट और पत्थरों की दुनिया मिलेगी या …………!!!!

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  3. sunil patel

    श्री मनोज जी ने बहुत बढ़िया जानकारी दी है. वाकई पेड़ लगाने से हर तरह से पर्यवारण को फायदा होगा. पिछले कुछ सो सालो से रेलवे लाइन, मकानों को बनाने, उद्योगों, कारखानों में इस्तेमाल के लिए करोडो अरबो पेड़ कटे गए है. हर परिवार अगर एक पेड़ भी लगाए तो १५-२० करोड़ पेड़ तो हमारे देश में ही लग सकते है.

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