लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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मनोज ज्वाला

‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ दुनिया भर के देशों को छडीबाज मास्टर की तरह स्वतंत्रता , समानता, लोकतंत्र व मानवाधिकार का पाठ पढाते रहने वाले अमेरिका के हाथों का एक ऐसा डंडा है , जिसकी मार से उसकी छाल इस कदर उखड जाती है कि धार्मिक स्वतंत्रता की परिभाषा ही बदल जाती है । अपनी आस्था और निजी विश्वास के आधार पर किसी भी धर्म को मानना अथवा नहीं मानना ही ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ का सामान्य अर्थ है, जिसके लिए किसी कानून की कोई आवश्यकता नहीं है , क्योंकि आस्था व विश्वास कानून का विषय ही नहीं है । किन्तु अमेरिका चूंकि पूरी दुनिया का स्वघोषित मास्टर है , तो जाहिर है धार्मिक स्वतंत्रता की व्यख्या भी उसे ही करनी होती है , सो ‘मास्टरी धर्म’ के अनुसार इसका अर्थ समझाने के लिए वह ‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ नामक अपने डण्डे से अनर्थ बरपाते रहता है । इस अनर्थकारी अधिनियम के खास निहितार्थ हैं, जिन्हें जान कर आपको दुनिया के तमाम एशियाई देशों सहित भारत से सम्बन्धित समस्त अमेरिकी नीतियां एक गहरे षड्यंत्र का हिस्सा मालूम पडेंगी । वह षडयंत्र समस्त विश्व को ‘ईसाई-विश्व’ बना डालने सम्बन्धी ‘वेटिकन सिटी’ की योजनाओं में से एक है । ईसाइयों के वैश्विक नेता-‘पोप’ का मुख्यालय- ‘वेटिकन सिटी’ इटली का एक छोटा सा शहर है , जिसे दुनिया के समस्त ईसाई राष्ट्रों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी स्वतंत्र ‘ईश्वरीय राज्य’ की मान्यता प्रदान किया हुआ है । उस तथाकथित ईश्वरीय राज्य का राजा- ‘पोप’ सेण्ट पिटर चर्च में उठते-बैठते सोते-जागते दिन-रात एक ही सपना देखते रहता है- सम्पूर्ण विश्व को मूर्ति-पूजा से मुक्त एवं ईसाई विश्व बना देने का सपना , जिसे साकार करने के बावत दुनिया के तमाम देशों में उसके न केवल राजदूत नियुक्त हैं , बल्कि सैकडों चर्च-मिशनरियों के साथ-साथ हजारों एन०जी०ओ० भी सक्रिय हैं, जिन्हें दुनिया के हवलदार अर्थात अमेरिकी सरकार का संरक्षण प्राप्त है ।
ऐसे में कहने को धर्मनिरपेक्ष , किन्तु ईसाई राष्ट्रों के सिरमौर अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय वैदेशिक नीतियां वेटिकन की सोच व योजनाओं के अनुसार ही बनती और क्रियान्वित होती हैं । वर्ल्ड विजन , युएसएड (युनाइटेड स्टेट इण्टरनेशनल डेवलपमेण्ट), क्रिश्चियन रिफार्म्ड वर्ल्ड रिलिफ कमिटी, फ्रिडम हाऊस, युएस कमिशन आन इण्टरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम, तथा प्यू सेण्टर ट्रस्ट , प्रिजन फेलोशिप मिनिस्ट्री, फुलर थियोलाजिकल सेमिनरी, क्रिश्चियनिटी टुडे इण्टरनेशनल और क्रिश्चियन कम्युनिटी डेवलपमेण्ट एशोसिएशन, वर्ल्ड इवैंजेलिकल एलायन्स व नेशनल बैपटिस्ट कानवेंशन आदि अनेक ऐसी संस्थायें हैं, जो एक तरफ तमाम गैर ईसाई देशों में ईसाइयत के विस्तार हेतु सक्रिय हैं , तो दूसरी ओर अमेरिकी शासन पर तत्सम्बन्धी कानून बनाने का दबाव डालने के निमित्त वहां की ‘कांग्रेस’ एवं ‘ह्वाइट हाऊस’ के विभिन्न प्लेटफार्मों पर भारतीय हितों के विरूद्ध हिन्दू-विरोधी षडयंत्र रचने में भी तत्पर हैं ।
अमेरिकी शासन का ‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ जो सन १९९८ में पारित हुआ है, तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पर वेटिकन सिटी से प्रेरित-संचालित धर्मान्तरण्कारी उपरोक्त ईसाई मिशनरी संस्थाओं के दबाव से बने कानून का प्रमुख उदाहरण है । इस अधिनियम के तहत कथित तौर पर अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी के लिए अमेरिकी शासन के विदेश मंत्रालय में एक सर्वोच्च स्तर के राजदूत की नियुक्ति और कांग्रेस, विदेश मंत्रालय व ह्वाइट हाउस को सलाह देने के लिए युएस कमिशन आफ इण्टरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम के गठन और राष्ट्रपति की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में एक विशेष सलाहकार नियुक्त करने का प्रावधान है । ये तीनों संस्थान धार्मिक स्वतंत्रता को गैर-ईसाइयों के धर्मान्तरण की आजादी के तौर पर परिभाषित करते हुए धर्मान्तरण में बाधायें खडी करने वाले देशों के विरूद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति को प्रतिवेदित करते रहते हैं, और उन देशों के प्रति अमेरिका की वैदेशिक नीतियों को प्रभावित-नियंत्रित करते हैं । इस कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ का हनन करने वाले , अर्थात धर्मान्तरण बाधित करने वाले देशों को अमेरिकी सहयोग से वंचित और प्रतिबन्धित कर देने का अधिकार प्रदान किया गया है ।
‘युनाइटेड स्टेट कमिशन फोर इण्टरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम’ (यु एस सी आई आर एफ) , अर्थात ‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता के लिए अमेरिकी आयोग’ कहने को तो दुनिया के सभी देशों के भीतर धार्मिक स्वतंत्रता की समीक्षा और ततविषयक हनन-उल्लंघन मामलों की सुनवाई करता है, किन्तु उसके निशाने पर गैर-ईसाई देश ही हैं, जिनके बीच गैर-पैगम्बरवादी व मूर्तिपूजक धर्मानुयायी, अर्थात हिन्दू और पैगम्बरवाद की बडी चुनौती के रूप में हिन्दू-बहुल देश भारत मुख्य निशाने पर है । सीधे ह्वाइट हाउस से संचालित यह अमेरिकी आयोग भारत में सक्रिय विभिन्न चर्च मिशनरियों तथा दलित फ्रीडम नेट्वर्क , आल इण्डिया क्रिश्चियन काउंसिल व फ्रीडम हाउस जैसे चर्च-समर्थित एन०जी०ओ० और उनके भारतीय अभिकर्ताओं, कार्यकर्ताओं एवं भाडे के बुद्धिजीवी टट्टुओं व मीडियाकर्मियों के सुनियोजित संजाल के माध्यम से हिन्दुओं को आक्रामक-हिंसक प्रमाणित करते हुए उनकी आक्रामकता व हिंसा के कारण मुसलमानों-ईसाइयों की धार्मिक स्वतंत्रता के हनन सम्बन्धी मामले रच-गढ कर उनकी सुनवाई करता है । फिर उस सुनवाई के निष्कर्षों के आधार पर अल्पसंख्यकों (मुख्य रुप से ईसाइयों) की धार्मिक स्वतंत्रता (गैर-ईसाइयों के धर्मान्तरण सम्बन्धी गतिविधियों) की रक्षा के लिए अमेरिका से हस्तक्षेप की अनुशंसा करते हुए उसकी वैदेशिक नीतियों को तदनुसार प्रभावित-निर्देशित करता है ।
भारतीय मूल के एक अमेरिकी लेखक राजीव मलहोत्रा की पुस्तक- ‘ब्रेकिंग इण्डिया’ में इस अधिनियम से सम्बद्ध अमेरिकी आयोग की हिन्दू-विरोधी धर्मान्तरणकारी करतूतों का विस्तार से खुलासा हुआ है । मिली जानकारी के अनुसार ‘यु एस सी आई आर एफ’ द्वारा बीते वर्ष २००० में ह्वाइट हाउस को प्रेषित भारत-सम्बन्धी रिपोर्ट में धर्मान्तरित बंगाली हिन्दुओं के प्रत्यावर्तन को नहीं रोक पाने पर वहां की माकपाई सरकार के विरूद्ध शिकायतें दर्ज की गई थीं और उन ईसाइयों के हिन्दू धर्म में वापसी को ‘अंधकार में प्रवेश’ कहते हुए उस पर चिन्ता जाहिर की गई । यह आयोग हिन्दू समाज के किसी व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप से किसी गैर-हिन्दू के विरूद्ध की गई हिंसा को भी समस्त ईसाई समाज के विरूद्ध हिन्दुओं की संगठित हिंसा के रूप में बढा-चढा कर प्रतिवेदित करता है , जबकि हिन्दुओं के विरूद्ध ईसाइयों की संगठित हिंसा को उल्लेखनीय भी नहीं मानता । वर्ष २००१ में इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भारत के त्रिपुरा आदि पूर्वांचलीय राज्यों में जहां हिंसक ईसाई संगठन- ‘नैशनल लिबरेशन फ्रण्ट आफ त्रिपुरा’ (एन०एल०एफ०टी०) के आतंक से हिन्दुओं का सुनियोजित सफाया होता जा रहा , वहां ‘हिन्दुओं के प्रभुत्व-सम्पन्न’ होने और ‘ईसाइयों के हाशिये पर चले जाने’ को ईसाई-हिंसा का कारण बताते हुए उसे न्यायोचित भी ठहरा दिया । वर्ष २००३ की अपनी रिपोर्ट में आयोग द्वारा भारत के ‘विदेशी आब्रजन अधिनियम’ की यह कह कर आलोचना की गई कि इससे ‘विदेशी ईसाई प्रचारकों का मुक्त प्रवाह’ बाधित होता है । इसी आयोग के दबाव पर सन २००४ में अमेरिकी कांग्रेस के चार-सदस्यीय प्रतिनिधिमण्डल ने भारत का दौरा किया था , जिसके अध्यक्ष जोजेफ पिट्स ने धर्मान्तरण रोकने सम्बन्धी भारतीय कानूनों की आलोचना करते हुए कहा था कि ये कानून मानवाधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रताओं का हनन करने वाले हैं । इस आयोग की ऐसी ही अनुशंसाओं के आधार पर अमेरिका द्वारा सन २००९ में भारत को अफगानिस्तान के साथ विशेष चिन्ताजनक विषय वाले देशों की सूची में शामिल किया गया था । दलितों के हिन्दू धर्म-समाज से जुडे रहने को ‘गुलामी’ और धर्मान्तरित होकर ईसाई बन जाने को ‘मुक्ति’ बताने तथा इस आधार पर धर्मान्तरण की वकालत करते रहने वाले दलित फ्रीडम नेटवर्क और फ्रीडम हाउस जैसे एन०जी०ओ० की पहल पर यह ‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग’ हिन्दू समाज की ‘वर्ण-व्यवस्था’ को समाप्त करने और दलितों के धर्मान्तरण का मार्ग प्रशस्त करने हेतु भारत में अमेरिकी शासन के हस्तक्षेप की सिफारिस करता रहा है । यह आयोग हर साल अमेरिकी कांग्रेस और ह्वाइट हाउस को अपनी रिपोर्ट प्रेषित करता है , जिसमें सुनियोजित ढंग से हिन्दुओं को ईसाइयों के प्रति आक्रामक हिंसक और भारतीय ईसाइयों को तथाकथित हिन्दू-हिंसा-आक्रामकता से आक्रांत व पीडित-प्रताडित दिखाता-बताता है ।
भारत में धर्मान्तरण के मार्ग में आ रही बाधाओं और छिट-पुट साम्प्रदायिक झडपों में हिन्दुओं द्वारा की गई असंगठित हिंसा को भी गैर-हिन्दू अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता के संगठित हनन का मामला बना कर उसकी सुनवाई करने वाला यह अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम व अमेरिकी आयोग पाकिस्तान में हिन्दुओं की दुर्दशा पर मौन रहता है, क्योंकि इसके ईश्वरीय राज्य- वेटिकन सिटी के मुख्य निशाने पर मूर्तिपूजक हिन्दू सबसे पहले हैं, इस्लाम तो पैगम्बरवादी होने के कारण ईसाइयत का हमसफर ही है । स्पष्ट है कि अमेरिका के इस अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम की नीति और नीयत गैर-ईसाइयों के बेरोक-टोक धर्मान्तरण के सिवाय और कुछ नहीं है , जबकि धर्मान्तरण में ‘रोक-टोक’ ही धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है ।

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