कांग्रेस के राज में बर्बादी की तरफ बढ़ता एशिया का पहला पत्रकारिता विश्वविद्यालय ।


मध्यप्रदेश के जम्बूरी मैदान में जमा हजारों की भीड़ और मंच पर खड़े कमलनाथ, जिन्हें थोड़ी ही देर बाद राज्यपाल मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाने वाली थीं। 17 दिसम्बर का यह दृश्य देखने में किसी भी और शपथ समारोह की ही तरह था, लेकिन कांग्रेस के लिए ख़ास था क्योंकि घड़ी की बढ़ती सुईयों के साथ मध्यप्रदेश कांग्रेस का 15 साल का राजनीतिक वनवास ख़त्म होने वाला था।

आज जब इस दिन को लगभग 3 महीने बीतने वाले हैं तो एक बार पलट कर देखने की जरुरत है कि इन तीन महीनों में मध्यप्रदेश में क्या बदला? इस बदलाव को देखने के लिए हम मध्यप्रदेश की राजधानी में स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की तरफ चलते हैं। देश के तत्कालीन उपराष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा द्वारा 16 जनवरी, 1991 में उद्घाटन के साथ चंद कमरों और कुछ विद्यार्थियों के साथ शुरू हुए इस विश्वविद्यालय ने पत्रकारिता के क्षेत्र में खूब नाम कमाया। चंद कमरों का वह परिसर बड़ा होता गया। आज 50 एकड़ में नए कैंपस का निर्माण चल रहा है और छात्रों की संख्या हजारों में है। देश के हर बड़े मीडिया संस्थान में यहाँ के छात्र काम कर रहे हैं। इस विश्वविद्यालय ने अपने 27 साल के इस सफ़र में राष्ट्रीय पटल पर खुद को बहुत ही सीमित संसाधनों के साथ स्थापित किया।

अब लौट कर चलते हैं जम्बूरी मैदान की तरफ। शपथ ग्रहण के साथ ही मध्यप्रदेश में लूट-खसोट का 15 साल पुराना खेल दोबारा शुरू हो गया। मुख्यमंत्री तो कमलनाथ बने लेकिन बंटाधार के नाम से मशहूर दिग्विजय सिंह ने सत्ता की कमान अपने हाथों में ही रखी। सालों से भूखा और हर जगह अपनी नज़रें गड़ाए बैठा गिरोह दोबारा सक्रिय हो गया और इनके शिकारों की इस लिस्ट में एक नाम माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय का भी था।

3 जनवरी को खबर आई कि विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश उपासने ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को इस्तीफा सौंप दिया है। इसके कयास पहले से लगाये जा रहे थे और सरकार की तरफ से जगदीश उपासने के ऊपर दबाव भी बनाया जा रहा था। जगदीश उपासने ने युगधर्म, जनसत्ता,  हिंदुस्थान समाचार सहित कई प्रमुख समाचार-पत्रों एवं समाचार एजेंसियों में अपनी सेवाएं दी हैं। 26 साल इंडिया टुडे जैसे प्रतिष्ठित पत्रिका का संपादन किया। वह पाञ्चजन्य एवं ऑर्गेनाइजर के समूह संपादक भी रहे। उपासने का इस्तीफा लेने के बाद शुरू हुआ राष्ट्रवादी विचारधारा के लोगों को विश्वविद्यालय से उखाड़ फेंकने का काम। इस क्रम में रजिस्ट्रार, रैक्टर, डायरेक्टर समेत विभागाध्यक्षों से इस्तीफा ले लिया गया, यह सिलसिला अबतक निरंकुशता से जारी है।

माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में जगदीश उपासने के बाद कुछ समय तक कार्यवाहक कुलपति के तौर पर जनसंपर्क आयुक्त पी. नरहरि ने जिम्मेदारी संभाली। उसके बाद 23 फरवरी को जारी आदेश के अनुसार अंग्रेजी पत्रिका “द वीक” के विशेष संवाददाता दीपक तिवारी को कुलपति नियुक्त किया गया। लेकिन समस्या तब शुरू हुई जब दीपक तिवारी कुलपति की तरह नहीं बल्कि कांग्रेस के बनाये गए मशीन की तरह काम करने लगे।

जहाँ तक रही बात कमलनाथ की तो वह चुनाव से पहले भी संघ पर निशाना साध चुके थे। एक वायरल वीडियो में वह मुस्लिम वोटर्स के सामने संघ को देख लेने की बात कहते हुए कैमरे में कैद हो चुके हैं। एक विचारधारा से नफरत की आग में जल रहे कमलनाथ ने अपना गुस्सा विवेकानंद और माता सरस्वती पर निकाला। विश्वविद्यालय की लिफ्ट के पास लगने वाले विवेकानंद के विचारों को संघी बताकर हटा दिया गया। कार्यक्रमों से माता सरस्वती की तस्वीर और वन्देमातरम को तिलांजलि दे दी गई। विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार पर लगी माँ की मूर्ति धूल खा रही है। पूर्व में विश्वविद्यालय के कुलपति यहाँ पुष्प और माल्यार्पण कर आपके कैबिन में जाते थे, लेकिन अब महीनों से माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण नहीं किया जा रहा।

कुलपति बनने के 15 दिनों के भीतर दीपक तिवारी ने विश्वविद्यालय के दरवाज़े पर लगे स्टैंड से विश्वविद्यालय प्रकाशन की किताबों को बेकार बताकर हटवा दिया, इनमें गाँधी का संचार शास्त्र, विवेकानंद, महर्षि अरविन्द सहित हिंदी पत्रकारिता जगत के शीर्ष संपादकों पर केन्द्रित किताबें थीं।

विश्वविद्यालय को लेकर दीपक तिवारी और कांग्रेस की नीयत तब ही साफ़ हो गई जब राजनीति से दूर रहने वाले विश्वविद्यालय में उद्बोधन के लिए कांग्रेस मंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह को बुलाया गया। उनका स्वागत कांग्रेस के छात्र संघ इकाई NSUI के कार्यकर्ताओं ने पार्टी और संगठन के प्रतीक चिन्हों से किया। विश्वविद्यालय के परिसर में किसी राजनीतिक व्यक्ति का इस तरह स्वागत होने की यह पहली घटना है। जिस समय को विश्वविद्यालय के संघिकरण और भाजपाकरण बताया जाता है, उस समय भी इस प्रकार की गतिविधि नहीं हुई।

NSUI के नेता विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में गए और वहां से हर वह पुस्तक जिस पर हिन्दू, संघ या किसी समान विचारधारा के नेता का नाम लिखा मिला उठाकर बाहर फेंक दी गईं, क्या छात्रों को सिर्फ कांग्रेस की विचारधारा पढ़ने के लिए मजबूर किया जायेगा?

इसके बाद कहर बरसा तस्वीरों पर कुलपति ने मीडिया के सामने दावा किया कि दीनदयाल उपाध्याय की तस्वीर हटाई गयी है लेकिन हकीकत है कि कुलपति के कमरे में कभी दीनदयाल उपाध्याय की तस्वीर थी हीं नहीं। तो फिर सवाल उठता है कौन-सी तस्वीरें हटाई गयीं? हटाई गयी तस्वीरें थी, स्वामी विवेकानंद और जयप्रकाश नारायण की।

जब इनकी आत्मा को इतना करने के बाद संतुष्टि नहीं मिली तो अब इनकी नज़र उन हजारों छात्रों के भविष्य की तरफ है जो हर साल इस विश्वविद्यालय और इसके संबधित संस्थाओं में प्रवेश लेते हैं। सेशन के खत्म होने में चंद महीने बचे हैं और अबतक एडमिशन की प्रक्रिया शुरू नहीं की गयी, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स से खबर आ रही हैं कि इस साल जीरो इयर रखा जायेगा ताकि पाठ्यक्रम को बदला जा सके। अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए, अपनी कुंठा को शांत करने के लिए यह प्रशासन उन हजारों छात्रों के हित का नुकसान करने की तैयारी कर रहा है, जो माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढाई करने का सपना देखते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह विश्वविद्यालय पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गाँधी का सपना था, लेकिन कांग्रेस उनके सपने को सिर्फ इसलिए मार देना चाहती है क्योंकि इस संस्थान की स्थापना का अवसर भाजपा सरकार को प्राप्त हुआ। ध्यान रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में इस विश्वविद्यालय को बंद करने के प्रयास हो चुके हैं। 

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