“नास्तिक, ईश्वर के सत्यस्वरूप से अनभिज्ञ, मिथ्या कर्मकाण्ड व उपासना करने वाले मनुष्यों का परलोक वा भविष्य असुखद”

 

मनमोहन कुमार आर्य

हम आंखों से जितना व जैसा संसार देखते हैं वह सब और जो नहीं देख पाते वह सब भी सच्चिदानन्द, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की रचना है। उसी परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों को उत्पन्न कर उनके द्वारा ईश्वर, जीवात्मा और सृष्टि का यथार्थ व सत्य ज्ञान दिया था जिससे मनुष्य अज्ञान व अन्धविश्वासों में न भटके। महाभारत काल तक वेदों का यथार्थ ज्ञान देश भर में उपलब्ध था। इसके बाद अव्यवस्था उत्पन्न होने व विद्वानों की कमी व उनके आलस्य प्रमाद और पुरुषार्थरहित जीवन के कारण धीरे धीरे वैदिक ज्ञान विलुप्त होता रहा। ईश्वर की कृपा व ऋषि दयानन्द (1825-1883) के पुरुषार्थ से ईसा की उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पुनः वेदों का प्रकाश-प्रचार हुआ। आज भी ऋषि दयानन्द के ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका सहित उनके ऋग्वेद भाष्य (आंशिक) व यजुर्वेद भाष्य से सत्य विद्याओं का प्रकाश हो रहा है। वेदों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि इस संसार को बनाने, चलाने व पालन करने वाली एक सत्ता है जिसे ईश्वर कहा जाता है। ईश्वर ने यह संसार जीवों वा जीवात्माओं के लिए बनाया है। जीव एक चेतन सत्ता है। यह जीव अत्यन्त सूक्ष्म, एकदेशी, अल्पज्ञ, अल्प शक्ति वाला, अनादि, अनुत्पन्न, अविनाशी और अमर सत्ता है। सृष्टि प्रवाह से अनादि है। ईश्वर ने संसार में विद्यमान असंख्य वा अनन्त जीवों को उनके पूर्व कृत कर्मों के अनुसार सुख व दुःख प्रदान करने के लिए ही यह सृष्टि बनाई है। हम देखते हैं कि जिस मनुष्य में जितना ज्ञान व सामर्थ्य होती है, वह उसके अनुरूप कर्म करता है। कोई मनुष्य निकम्मा या खाली रहना नहीं चाहता। वेदों में शिक्षा है कि मनुष्य कर्म को करते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करे। बिना कर्म किये मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। बतातें हैं कि पलकों का खुलना या बन्द होना अर्थात् आंखों की पलकों का झपकना आदि क्रियायें भी आत्मा के संकल्प के कारण ही होती हैं। मनुष्य शरीर में प्राण जन्म से मृत्यु पर्यन्त चलते ही रहते हैं। सद्कर्मों वा पुरुषार्थ से ही मनुष्य को सुख व शान्ति मिलती है। मनुष्य जब रोगी हो जाता है तो वह काम करने में असमर्थ होता है। उस समय उसकी यही भावना होती है कि वह जल्दी से जल्दी स्वस्थ हो जाये और अपने ज्ञान व शक्ति के अनुसार कर्म व पुरुषार्थ कर सुखी हो। ईश्वर भी एक चेतन सत्ता है। वह सर्वज्ञ है और सर्वशक्तिमान है। ईश्वर को अनादि काल से सृष्टि उत्पत्ति, पालन व प्रलय करने का ज्ञान व अनुभव है। इसी कारण वह सृष्टि की रचना व पालन करता है। सभी जीवात्मायें उसकी सन्तानों के समान है। अतः उसका कर्तव्य है कि जीवात्माओं को सुख प्रदान करने के लिए वह सभी कार्य करें जो कि माता-पिता को अपनी सन्तानों के प्रति करने आवश्यक व उचित होते हैं। यह ईश्वर द्वारा सृष्टि की रचना करने के साधारण कारण व तर्क हैं।

 

परमात्मा ने मनुष्य को बनाया व जन्म दिया है। वेदों का ज्ञान भी उसने मनुष्य को अपने कर्तव्यों का मार्गदर्शन कराने के लिए दिया है। अतः मनुष्यों को अपने मन व बुद्धि से वेदों का अध्ययन कर उसका मनन करते हुए वेद द्वारा बताये गये सभी के लिए हितकारी कर्तव्यों का आचरण व पालन करना चाहिये। मनुष्य का पहला कर्तव्य है कि वह ईश्वर व जीवात्मा सहित इस सृष्टि के सत्यस्वरूप को जाने। यह ज्ञान उसे वेदों से ही प्राप्त होता है। अन्य सभी ग्रन्थ न्यूनाधिक भ्रान्तियों से युक्त है। मनुष्य अल्पज्ञ होता है अतः उसकी रचनायें भी अल्प ज्ञान वाली सत्यासत्य मिश्रित ही होती हैं। मनुष्य के ग्रन्थों से मनुष्य सत्य व यथार्थ निर्भान्त ज्ञान को प्राप्त नहीं हो सकता। वेदों से इतर संसार में जितने भी ग्रन्थ हैं वह सभी मनुष्य वा मनुष्यों के द्वारा रचित व उपदेशित हैं। अतः उन सभी में अज्ञान व भ्रान्तियां हैं व उनका होना सम्भव है। वेदाध्ययन से ही उन भ्रान्तियुक्त कथनों का ज्ञान होता है। ऋषि दयानन्द ने वेदों का अध्ययन कर वेदज्ञान को सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के प्रथम 10 समुल्लासों में प्रस्तुत किया है। शेष चार समुल्लासों वा अध्यायों में उन्होंने संसार के प्रमुख मत-मतान्तरों की मिथ्या व सृष्टि क्रम के विरुद्ध भ्रान्ति उत्पन्न करने वाली मान्यताओं व विचारों की समीक्षा वा खण्डन किया है। सत्यार्थप्रकाश संसार का एकमात्र ऐसा ग्रन्थ है जिसे पढ़कर मनुष्य सत्य व असत्य के स्वरूप को जान व समझ सकता है। सत्य का ग्रहण कर असत्य का त्याग कर मानव कर्तव्य वा धर्म का पालन कर सकता है। सत्यार्थप्रकाश के बाद उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति व वेदभाष्य आदि पढ़कर अपने ज्ञान को और अधिक बढ़ाया जा सकता है। जिन लोगों ने सत्यार्थप्रकाश को पढ़ा है वह सभी आश्वस्त हैं कि उन्हें ईश्वर, जीव व प्रकृति विषयक संसार के सभी मनुष्यकृत ग्रन्थों में उपलब्ध ज्ञान की तुलना में कहीं अधिक मानव जीवन का उत्थान करने वाला सत्य व यथार्थ ज्ञान प्राप्त है। अतः संसार के सभी मनुष्यों का कर्तव्य है कि वह जीवन में एक जिज्ञासु बनकर सत्यार्थप्रकाश एवं ऋषि दयानन्द जी के वेद भाष्य सहित उपनिषदों, दर्शनों व मनुस्मृति आदि ऋषि ग्रन्थों का अवश्य अध्ययन करें।

मनुष्य का कर्तव्य ईश्वर, जीव व प्रकृति के विषय में अधिकाधिक सत्य ज्ञान प्राप्त करना है। आजकल बहुत से शिक्षित लोग ईश्वर व जीवात्मा के सत्य ज्ञान के विषयक में भ्रमित हैं। वह ईश्वर की सत्ता को नहीं मानते। उनसे पूछा जाये कि यह संसार कैसे बना और कौन इसे चला रहा है तो इसका सन्तोषजनक उत्तर उनके पास नहीं होता। ऐसे लोगों को यदि बुद्धि का शत्रु कहा जाये तो अनुचित न होगा। संसार में दो प्रकार के नास्तिक दृष्टि गोचर होते हैं। एक तो वह हैं जो ईश्वर के अस्तित्व वा उसकी सत्ता से इनकार करते हैं। दूसरे वह लोग भी पूर्ण या अर्धनास्तिक हैं जो ईश्वर को कथन मात्र से मानते हैं परन्तु ईश्वर के यथार्थ स्वरूप को न जानते हैं और न जानने का प्रयास ही करते हैं। उनके अपने अपने मत में जो अविद्यायुक्त बातें हैं वह लोग उन्हीं बातों को वह बिना सोचे विचारे बुद्धि की आंखे बन्द करके स्वीकार कर लेते हैं। यह घोर अविद्या का कार्य है। इन मतों के जो आचार्य व प्रणेता होते हैं वह भी सत्य व असत्य के यथार्थ स्वरूप को जानने का प्रयत्न नहीं करते। उनके लिए इतना ही पर्याप्त होता है कि उनके आचार्य व प्रवर्तक ने क्या विचार दिये व उनके मत की पुस्तक में क्या लिखा है। सत्य का अनुसंधान वा विचार न करने के कारण ऐसे लोग ईश्वर-जीवात्मा विषयक सत्य ज्ञान को प्राप्त नहीं हो सकते। जीवात्मा कर्म करने में स्वतन्त्र है और परमात्मा न्यायकारी है, अतः वह सबको उनके पूर्व कर्मों के अनुसार जीवन जीने के लिए भोग प्रदान कर रहा है। भौतिक सुख प्राप्त होने के कारण मत-मतान्तरों के लोग सन्तुष्ट रहते हैं कि वह ठीक है। यह एक प्रकार से अपनी जमा पूंजी को खर्च करने के समान है। ऐसे मनुष्य भविष्य के लिए नई पूंजी संग्रहीत नहीं कर रहे हैं जिस कारण उनका भविष्य दुःखमय होगा। मत-मतान्तरों के अपने स्वार्थ व संगठन के लोगों द्वारा की जाने वाली हिंसा आदि के डर से भी बहुत से लोग चाह कर भी सत्य को जान लेने पर उसे स्वीकार नहीं कर पाते। यह क्रम कभी समाप्त होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता? इससे होने वाली हानि का मतों के आचार्यों व उनके अनुयायियों को अपनी अविद्या के कारण ज्ञान नहीं है। जिन्हें है भी वह अपने स्वार्थों व अविद्या के कारण उन्हीं में लिप्त हैं और अपने विवेक ज्ञान की आंखों को बन्द किये हुए हैं। वेदों ने हमें कर्मफल का सिद्धान्त दिया है जिसे हमारे ऋषियो व विद्वानों ने अपने ज्ञान व विवेक से विस्तार दिया है। इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य जो शुभ व अशुभ अर्थात् अच्छे व बुरे कर्म करता है उसके फल उसे अवश्यमेव भोगने ही होते हैं। मनुष्य का यह जीवन न प्रथम है और न अन्तिम। ऐसे असंख्य जीवनों की यात्रा करता हुए मनुष्य का जीवात्मा इस जन्म में आया है और मृत्यु होने के बाद भी अनन्त काल तक इसी प्रकार से उसकी आत्मा का जन्म-मरण अर्थात् पुनर्जन्म होता रहेगा। ईश्वर ने हमें मनुष्य जीवन ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति आदि को यथार्थरूप में जानने और सत्य ज्ञानपूर्वक ईश्वर की उपासना करके अपनी आत्मा की उन्नति करने के लिए दिया है। यदि हम ऐसा करते हैं तो हमारी आत्मा की उन्नति होने के साथ हमारा परलोक वा परजन्मों का सुधार होता है। यदि हम मनुष्य जीवन के उद्देश्य ईश्वर व जीव आदि के यथार्थ ज्ञान को प्राप्त करने में आलस्य प्रमाद व पुरुषार्थ की उपेक्षा करेंगे तथा ईश्वर व जीव के यथार्थ स्वरूप व इनके गुण कर्म स्वभाव को नहीं जानेंगे तो हम आत्मोन्नति से तो वंचित होंगे ही, मनुष्य जन्म के उद्देश्य को भुलाकर अज्ञानपूर्वक केवल इन्द्रिय सुख व मिथ्या कर्मों व आचरणों में लगे रहने के कारण ईश्वर से दण्डित भी होंगे। कर्मफल सिद्धान्त के अनुसार यह प्रायः निश्चित है कि नास्तिक लोगों को मनुष्य का पुनर्जन्म मिलना कठिन वा असम्भव है। इसका कारण यह लगता है कि ईश्वर ने हमें जिस उद्देश्य से जन्म दिया हमने उसे जानने का प्रयत्न ही नहीं किया और न ही उसके लिए पुरुषार्थ किया। ऐसे नास्तिक व अज्ञानी मनुष्यों को ईश्वर पुनः मनुष्य बनने का अवसर नहीं देगा। इसलिये कि नास्तिक व अन्धविश्वासी मनुष्यों ने ईश्वर की वेद में की गई मनुष्य के हित की आज्ञा व प्रेरणा की अवहेलना की है। नास्तिक होना या मिथ्या पूजा उपासना आदि करना किसी भी मनुष्य के लिए उचित नहीं है। अतः सभी मनुष्यों को अपने ही हित में और अपने परलोक व भविष्य के सुखों को देखते हुए सत्यार्थप्रकाश और वेदभाष्य आदि पढ़कर अपने यथार्थ कर्तव्यों का निर्धारित करना चाहिये। ईश्वर के सत्य स्वरूप को जानकर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। यदि ऐसा करेंगे तो इसमें हमारा ही हित व लाभ है। इससे संसार में सुख व शान्ति का विस्तार भी हो सकता है। ओ३म् शम्।

 

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