लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार इजाफा हो रहा है। नतीजतन पेट्रोल, डीजल और घरेलू गैस के दाम घटने की बजाय बढ़ने की नौबत आ गई है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल का भाव 80 डाॅलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया है, जो 2014 के बाद अब तक का सबसे ऊपरी स्तर है। इस कारण पेट्रोल 84 रुपए और डीजल 71 रुपए प्रति लीटर के इद-गिर्द पहुंच गए हैं। पांच साल पहले 14 सितंबर 2013 को तेल की कीमतें शिखर पर थी। इस समय पेट्रोल 76.04 रुपए प्रति लीटर था। हकीकत में इन मूल्यों में उछाल पिछले माह से ही शुरू हो जाने थे, लेकिन कर्नाटक चुनाव के कारण इनपर अंकुश लगा दिया था। आमतौर से तेल के दाम बढ़ाने-घटाने में अंतरराष्ट्रीय बाजार की भूमिका रहती है। फिलहाल यह भी कहा जा रहा है कि कच्चे तेल की कीमत 100 डाॅलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। यूपीए के कार्यकाल में तेल की कीमतों पर नियंत्रण के अधिकार सरकार के पास थे, लेकिन अब दाम का खेल भारतीय कंपनियों के हाथ में है, इसलिए वे इस खेल से कठपुतलियों की तरह खेलने का काम करती है। खेल में अप्रत्यक्ष भूमिका केंद्र सरकार की भी है। यही कारण रहा कि नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद नबंवर 2014 से जनवरी 2016 तक कच्चे तेल की गिरती कीमतों के बावजूद 9 बार उत्पादन  शुल्क बढ़ाया जा चुका है। इससे सरकार को 2016-17 में 2,42,691 करोड़ रुपए का फायदा हुआ है। इस दौरान बाजार में कच्चे तेल की कीमतें भी कम थीं, लेकिन सरकार ने मूल्य वृद्धि का सिलसिला जारी रखा। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार करों में कटौती कर, कीमतें नहीं घटाएगी।
इस साल दिल्ली में आयोजित ऊर्जा क्षेत्र के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘इंटरनेशनल एनर्जी फोरम‘ (आईईएफ) के 16वें संस्करण का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेल उत्पादक देशों  के संगठन (ओपेक) को चेताते हुए कहा है कि ‘यदि समाज के सभी वर्गों को सस्ती दरों पर ऊर्जा की सुविधा नहीं दी गई तो ओपेक देशों  को ही घाटा होगा।‘ इस मौके पर इस संगठन के सदस्य देशों  में से सऊदी अरब, ईरान, नाइजीरिया और कतर के ऊर्जा मंत्री मौजूद थे। आईइएफ में वैसे तो 72 सदस्य देश हैं, लेकिन इस बैठक में 92 देशों  के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। गौरतलब है कि जो नरेंद्र मोदी ओपेक को चेताते हैं, वही देश सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों समेत सरकार की तेल से होने वाली कमाई पर कोई लगाम लगाना नहीं चाहते। तेल के भाव जब 40 रुपए डाॅलर प्रति बैरल थे, तब यही सरकार करों में बढ़ोतरी कर खजाना भरती रहती थी। लिहाजा सरकार को उदारता बरतने की जरूरत है। अन्यथा मंहगाई आसमान छू लेगी, जो इसी साल नवंबर में होने वाले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम के चुनावों को प्रभावित कर सकती है। हालांकि इस दौरान सऊदी अरब ने जरूर भरोसा जताया है कि वह तेल का उत्पादन बढ़ाकर कीमतों को काबू में लाने की कोशिश  करेगा।
हालांकि बहुत दिनों से तेल की कीमतों में जो उतार-चढ़ाव देखने में आ रहा है, उसकी एक अन्य वजह खाड़ी देशों के बीच तनाव का बढ़ना भी है। यूरोप की एयर ट्राफिक कंट्रोल एजेंसी ने अगले कुछ दिनों में सीरिया पर हवाई हमले की आशंका जताई है। इससे इतर अमेरिका और चीन के बीच छिड़े कारोबारी युद्ध के चलते भी कच्चा तेल मंहगा हो रहा है। इधर ओपेक देश  व रूस मिलकर कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित कर रहे हैं। इसकी वजह से भी निर्यात प्रक्रिया में देरी हो रही है। भारत की चिंता तेल को लेकर इसलिए भी है, क्योंकि भारत कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार देश  है। यहां कुल खपत का 80 फीसदी से ज्यादा तेल आयात किया जाता है। हालांकि कीमतें बढ़ने से तेल की खपत भी प्रभावित होती है, जिसका खामियाजा तेल उत्पादक देशों  को भुगतना होता है। भारत में अगले 25 वर्षों  तक ऊर्जा की मांग में सालाना 4.2 प्रतिशत की दर से वृद्धि होगी, जो अन्य किसी भी देश  में होने वाली नहीं है। भारत में गैस की खपत भी 2030 तक तीन गुना हो जाएगी।
पूरी दुनिया में कच्चा तेल वैश्विक  अर्थव्यवस्थाओं की गतिशीलता का कारक माना जाता है। ऐसे में यदि तेल की कीमतों में लगातार बढ़त दर्ज की जा रही है,तो इसका एक कारण यह भी है कि दुनिया में औद्योगिक उत्पादों की मांग बढ़ रही है। बावजूद विश्व की उम्मीद इसलिए की जा रही थी, क्योंकि 2016 में सउदी अरब और ईरान में चला आ रहा तनाव खत्म हो गया था। अमेरिका और यूरोपीय संघ ने ईरान से परमाणु प्रतिबंध हटा लिए थे। इसलिए कहा जा रहा था कि अब ये दोनों देश  अपना तेल बाजार में खपाने में तेजी लाएंगे।
2016 तक कच्चे तेल की दरों में गिरावट के चलते भारत में इसकी कीमत पानी की एक लीटर बोतल की कीमत से भी नीचे आ गई थी। सार्वजनिक क्षेत्र की सबसे बड़ी तेल विपणन कंपनी इंडियन आॅयल काॅर्पोरेशन के आंकड़ों के अनुसार,तेल कंपनियां रिफाइनरियों से 22.46 रुपए प्रति लीटर पर तेल उपलब्ध कराती हैं। इस पर विशिष्ट उत्पाद शुल्क 19.73 रुपए प्रति लीटर है। वहीं डीजल का रिफायनरी मूल्य 18.69 प्रति लीटर की दर से क्रय करने के बाद डीलरों को 23.11 रुपए प्रति लीटर की दर से हासिल कराया जाता है। डीजल पर उत्पाद शुल्क 13.83 रुपए प्रति लीटर है। यदि डीजल-पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क घटा दिया जाए तो उपभोक्ताओं को मंहगा तेल खरीदने से राहत मिलेगी। किंतु अब तेल की कीमतों में जिस तरह से उछाल आया है, उसके चलते सरकार भी मुश्किल में है। देश की तेल व ईंधन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भरता कम करने के उपायों में भी सरकार लगी है। इस मकसद पूर्ति के लिए एथनाॅल की खरीद बढ़ाई जा रही है। एथनाॅल पर उत्पाद शुल्क भी समाप्त कर दिया गया है। इस साल डीजल-पेट्रोल में पांच प्रतिशत एथनाॅल मिश्रण का लक्ष्य हासिल कर लेने की उम्मीद सरकार को है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के लिए किसी एक कारक या कारण को जिम्मेबार नहीं ठहराया जा सकता है। एक वक्त था जब कच्चे तेल की कीमतें मांग और आपूर्ति से निर्धारित होती थीं। इसमें भी अहम् भूमिका ओपेक देशों  की रहती थी। दरअसल अमेरिका का तेल आयातक से निर्यातक देश  बन जाना, चीन की विकास दर धीमी हो जाना, सैल नई तकनीक, तेल उत्पादक देशों  द्वारा सीमा से ज्यादा उत्पादन, ऊर्जा दक्ष वाहनों का विकास और इन सबसे आगे सौर ऊर्जा एवं बैटरी तकनीक से चलने वाले वाहनों का विकास हो जाने से यह उम्मीद की जा रही थी कि भविष्य  में कच्चे तेल की कीमतें कभी नहीं बढ़ेंगी। भारत भी जिस तेजी से सौर ऊर्जा में आत्मनिर्भरता की और बढ़ रहा है, उसके परिणामस्वरूप कालांतर में भारत की तेल पर निर्भरता कम होने वाली है। इस्लामिक आतंकवाद और कई देशों  में शिया-सुन्नियों के संघर्ष  के चलते सीरिया, लीबिया, इराक और अफगनिस्तान में जिस तरह से जीवन बचाने का संकट उत्पन्न हुआ है, उसने सामान्य जीवन तहस-नहस किया हुआ है। इस कारण भी यही उम्मीद थी कि तेल की कीमतें स्थिर रहेंगी। किंतु इधर खाड़ी के देशों में जिस तरह से तनाव उभरा है, उसके चलते अनेक देशों  ने तेल का संग्रह शुरू कर दिया है। जिससे युद्ध की स्थिति में इस तेल का उपयोग किया जा सके। चीन, रूस और उत्तरी कोरिया भी बड़ी मात्रा में तेल का भंडारण कर रहे हैं। यह संग्रह तेल में उछाल की एक प्रमुख वजह है। गोया किसी भी वस्तु के दाम जब एक बार उछाल भर लेते हैं, तो उनका नीचे आना नामुमकिन होता है। इसलिए सरकार को ही हस्तक्षेप कर दूरदृष्टि से काम लेने की जरूरत है। जिससे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां मुनाफे का खेल, खेलने में न लगी रहें।

 

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