गोपाल बघेल 'मधु'

President Akhil Vishva Hindi Samiti​ टोरोंटो. ओंटारियो, कनाडा

ना ही शरीर ना ही मन हूँ !

ना ही शरीर ना ही मन हूँ, आत्म स्वयम्भू; क्यों वृथा व्यथा मैं हूँ सहूँ, विचरते विभु ! करते हैं नाट्य सब पदार्थ, प्राण त्राण वश; अस्तित्व कहाँ अपने, नृत्य करते वे विवश ! शक्ति है शिव की, प्रकृति कृति गति उन्हीं के हाथ; वे ही त्रिलोक विचरें सतत, पात्र हर के साथ ! हैं देश काल उनके, ब्रह्म-कण उन्हीं के गात; वे ही समात प्रष्फुरात,

स्वच्छ सुन्दर पथ सँवारे !

स्वच्छ सुन्दर पथ सँवारे, गा रही हिम रागिनी; छा रही आल्ह्वादिनी उर, छिटकती है चाँदनी ! वन तड़ागों बृक्ष ऊपर, राजती सज रजत सी; घास की शैया विराजी, लग रही है विदूषी ! रैन आए दिवस जाए, रूप ना वह बदलती; रूपसी पर धूप चखके, मन मसोसे पिघलती ! वारिशों में रिस रसा कर, धूलि से तन तरजती; त्राण को तैयार बैठी,

लगाये कितने क़यास !

लगाये कितने क़यास, जानने अपना सकाश; उड़ने आकाँक्षा का आकाश, अथवा पाने कुछ अवकाश ! जानने निज इतिहास, पहचानने मृदु हास; करने कभी अट्टहास, जानने अपना अहसास ! आम्र मुकुल का सुहास, भ्रमर का बढ़ता साहस; करा देता कुछ प्रयास, दिखा देता आत्म प्रकाश ! आशाओं से भरा सन्देश, आलोकित होजाता अनायास; आलोक का लोक आवास,

चित्रण चितेरा कर गया !

चित्रण चितेरा कर गया, है भाव अपने ले गया; कुछ दे गया सा लग रहा, गा के वो गोमन रम गया ! गोपन में रस रच चल दिया, द्रष्टा रहे वृष्टि किया; चित की दशा समझा किया, बुधि की विधा को वर दिया ! वह व्याप्ति की बौछार में, संतृप्ति के अँकुर बोया; आलोक से निज लोक का, रास्ता दिखाया चल दिया ! रिश्ते बनाना जानता, किस्से में ना वह उलझता; अपनी ही द्युति द्रुति ढालता,

लहर ही ज़िन्दगी ले रही !

लहर ही ज़िन्दगी ले रही, महर ही माधुरी दे रही; क़हर सारे वही ढल रही, पहलू उसके लिये जा रही ! पहल कर भी कहाँ पा रहा, हल सतह पर स्वत: आ रहा; शान्त स्वान्त: स्वयं हो रहा, उसका विनिमय मधुर लग रहा ! लग्न उसकी बनाई हुईं, समय लहरी पे सज आ रहीं; देहरी मेरी द्रष्टि बनी, सृष्टि दुल्हन को लख पा रही ! हरि के हाथों हरा जो गया, बनके हरियाली वह छा गया; आली मेरा जगत बन गया,

अब मैं आता हूँ मात्र !

अब मैं आता हूँ मात्र, अपनी विश्व वाटिका को झाँकने; अतीत में आयोजित रोपित कल्पित, भाव की डालियों की भंगिमा देखने ! उनके स्वरूपों की छटा निहारने, कलियों के आत्मीय अट्टहास की झलक पाने; प्राप्ति के आयामों से परे तरने, स्वप्निल वादियों की वहारों में विहरने ! अपना कोई उद्देश्य ध्येय अब कहाँ बचा, आत्म संतति की उमंगें तरंगें देखना; उनके वर्तमान की वेलों की लहर ताकना, कुछ न कहना चाहना पाना द्रष्टा बन रहना ! मेरे मन का जग जगमग हुए मग बन जाता है, जीवित रह जिजीविषा जाग्रत रखता है; पल पल बिखरता निखरता सँभलता चलता है,

नव रूप में नव प्रीति में !

‘नव रूप में नव प्रीति में , आते रहेंगे ज्योति में; अनुभूति में चित दीप में, वाती जलाते श्रीति में !   वे दूर ना हम से गये, बस टहलने सृष्टि गये; अवलोकते हमको रहे, वे और भास्वर हो रहे !   देही बदल आजाएँगे, वे और प्यारे लगेंगे; दुलरा हमें पुनि जाएँगे, जो रह गया दे जाएँगे !