मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

आतंकवाद से मुक्ति हेतु गायत्री मंत्राहुति का अभिनव प्रयोग

मनोज ज्वाला पिछले दिनों देव-भूमि हरिद्वार जाना हुआ, जहां ‘युग निर्माण योजना’ के अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय- शांति कुंज और इससे सम्बद्ध...

मैकाले-मैक्समूलर के सामने रावण-महिषासुर भी बौने

मनोज ज्वाला भारत पर अपना औपनिवेशिक प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद ब्रिटिश हूक्मरानों-चिंतकों व यूरोपियन दार्शनिकों ने भारत को...

मैकाले-अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति से भारतीय भाषाओं की दुर्गति

मनोज ज्वाला विद्यालय सरकारी हों या गैर-सरकारी ; उनमें पढने वाले बच्चों को वही सिखाया-पढाया जा रहा है , जिससे...

एक अचम्भा मैंने देखा- माडर्न इण्डिया में प्राचीन भारतीय शिक्षा !

मनोज ज्वाला अपने देश के गीने-चुने अत्याधुनिक शहरों में शुमार अहमदाबाद में पिछले दिनों मैंने एक अचम्भा सा देखा- मात्र...

राज-सत्ता को दरकिनार कर देने वाली ऋषि-सत्ता की जय !

डा० प्रणव पण्ड्या मनोज ज्वाला अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख और देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलाधिपति- डा० प्रणव...

मैकाले -मैक्समूलर के चिन्तन से भारतीय राष्ट्रीयता का क्षरण

मनोज ज्वाला भारत पर अपना औपनिवेशिक प्रभुत्व स्थापित कर लेने के बाद ब्रिटिश हूक्मरानों-चिंतकों व यूरोपियन दार्शनिकों ने भारत को...

नस्ल-विज्ञान का साम्राज्यवादी औपनिवेशिक विधान

मनोज ज्वाला यूरोपीय औद्योगिक क्रांति की कोख से उत्त्पन्न औपनिवेशिक साम्राज्यवाद ने अपनी जडें जमाने के लिए एक से बढ...

भाषा-विज्ञान में साम्राज्यवादी षड्यंत्रों से सावधान !

मनोज ज्वाला यूरोप के रंग-भेदकारी औपनिवेशिक साम्राज्यवादियों ने सम्पूर्ण विश्व, विशेष कर भारत पर अपना दबदबा कायम रखने और जबरिया...

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