लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

Posted On by &filed under प्रवक्ता न्यूज़.



मनोज ज्वाला
हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, हिन्दू समाज और हिन्दू राष्ट्र अभूतपूर्व संकटों और अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्रों के दौर से गुजर रहा है । इस षड्यंत्र में वैसे तो अमेरिका की कई संस्थायें शामिल हैं, किन्तु दलित फ्रीडम नेटवर्क और फ्रीडम हाऊस दो ऐसी संस्थायें हैं, जो अमेरिकी शासन में भी इतनी गहरी पैठ रखती हैं कि उसकी भारत-विषयक वैदेशिक नीतियों को भी ये तदनुसार प्रभावित किया करती हैं ।
दलित फ्रीडम नेटवर्क (डी०एफ०एन०) का मुख्यालय संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलोराडो शहर में स्थित है । इसके निदेशकों में से कई अमेरिकी कांग्रेस के पूर्व या वर्तमान सदस्य-सिनेटर हैं , तो कई प्रमुख प्रशासक व शिक्षाविद । भारतीय दलितों की मुक्ति का अगुवा होने का दावा करने वाली यह संस्था ‘दलित-मुक्ति’ के नाम पर हिन्दू धर्म का दानवीकरण करने में कमर कस कर लगी हुई है । हिन्दू देवी-देवताओं, पर्व-त्यवहारों , ग्रंथों-शास्त्रों , रीति-रिवाजों सबको विकृत रूप में विश्लेषित-प्रचारित कर हिन्दू धर्म का छिद्रान्वेषण करने और दलितों को गैर-दलित हिन्दुओं के विरूद्ध सशस्त्र गृह-युद्ध के लिए भडकाते रहना डी०एफ०एन० की प्राथमिकताओं में शामिल है । इस निमित्त यह संस्था विभिन्न शिक्षाविदों, लेखकों से तत्सम्बन्धी उत्पीडन साहित्य लिखवा कर उन्हें प्रायोजित-प्रोत्साहित व पुरस्कृत करती है, तो विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं (एन०जी०ओ०) से सुनियोजित सर्वेक्षण करा कर उन्हें वैश्विक मंचों पर उछालती है और अमेरिकी सरकार के विभिन्न आयोगों व नीति-निर्धारक निकायों के समक्ष भाडे के भारतीय बौद्धिक-बहादुरों द्वारा हिन्दू धर्म की तथाकथित असहिष्णुता से दलितों के पीडित-प्रताडित होने तथा उस पीडा-प्रताडना से उबरने के लिए ‘ईसा’ को पुकारने की गवाहियां दिलवाती है । डी०एफ०एन० की इस पैंतरेबाजी से अमेरिकी सरकार की विदेश-नीतियां प्रभावित होती रही हैं । मालूम हो कि सन २००५ में वैश्विक मानवाधिकार पर गठित संयुक्त राज्य अमेरिका के एक सरकारी आयोग ने डी०एफ०एन० द्वारा “ वर्ण-व्यवस्था के शिकार २० करोड लोगों के लिए समता व न्याय” शीर्षक से प्रेषित प्रतिवेदन के आधार पर यह घोषित कर दिया था कि भारत में हिन्दुओं द्वारा धर्मान्तरित दलितों एवं ईसाई मिशनरियों को हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है , जिन्हें सजा भी नहीं दी जाती । डी०एफ०एन० ने कांचा इलाइया नामक एक तमिल भारतीय से ‘ह्वाई आई एम नाट हिन्दू’ (‘मैं हिन्दू क्यों नहीं हूं’) नामक पुस्तक लिखवा कर उसे इस बावत पोस्ट डाक्टोरल फेलोशिप प्रदान किया हुआ है, तो जान दयाल , कुमार स्वामी व स्मिता नुरुला नामक भारतीय ईसाइयों से सन २००७ में अमेरिकी ‘कांग्रेसनल ह्युमन राइट्स काकस’ के समक्ष इस झूठे तथ्य की गवाहियां दिलवायी है कि हिन्दू धर्म अतिवादी है और उसकी अतिवादिता ही सभी प्रकार की धार्मिक हिंसा के लिए जिम्मेवार है । ‘क्रिश्चियन टुडे’ पत्रिका के अनुसार डी०एफ०एन० के द्वारा कांचा से अमेरिकी कांग्रेस की एक सभा में यह तथाकथित साक्ष्य भी दिलवाया गया है कि हिन्दू धर्म एक प्रकार का आध्यात्मिक फासीवाद है । दलित फ्रीडम नेटवर्क के पैसे पर पल रहे कांचा ने एक और किताब लिखी है- ‘पोस्ट हिन्दू इण्डिया’, इसमें उसने दलितों को हिन्दू-देवी-देवताओं के शस्त्र-धारण का प्रायोजित अर्थ (दलित-विरोधी) समझाते हुए गैर-दलित हिन्दुओं के विरूद्ध सशस्त्र युद्ध के लिए प्रेरित किया है । डी०एफ०एन० की पहल पर कांचा इलाइया की ये दोनों पुस्तकें विभिन्न अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हिन्दू धर्म-विषयक पाठ्यक्रम में शामिल कर ली गई हैं । यह डी०एफ०एन० क्रिश्चियन सालिडरिटी वर्ल्ड वाइड तथा गास्पेल फार एशिया और एशियन स्टडिज सेन्टर नामक संस्थाओं के साथ गठजोड कर आल इण्डिया क्रिश्चियन काऊंसिल के माध्यम से भारत में दलितों को गैर-दलित हिन्दुओं के विरूद्ध भडकाने और उनके धर्मान्तरण का औचित्य सिद्ध करने के बावत पश्चिमी देशों में हिन्दू धर्म के विरूद्ध घृणा फैलाने हेतु भिन्न-भिन्न परियोजनाओं को क्रियान्वित करते रहता है ।
हिन्दू धर्म के दानवीकरण तथा हिन्दू-समाज के विखण्डन में अमेरिका की एक और संस्था काफी सक्रिय है- ‘सेन्टर फार रिलीजियस फ्रीडम’ , जो भारत में पश्चिमी रुझान के तथाकथित बुद्धिजीवियों , खास कर दलितों को धार्मिक स्वतंत्रता का छ्द्म अर्थ समझाता है कि पुराने धर्म अर्थात हिदू धर्म को आत्मसात किए रहना बंधन है और इससे विलग हो जाना स्वतंत्रता है , जबकि ईसाइयत को अपनाना तो सीधे मुक्ति ही है । धर्म-अध्यात्म के ककहरा-मात्रा की भी समझ नहीं रखने वाले लोग दुनिया के आध्यात्मिक गुरू के वंशजों को धार्मिकता-आध्यात्मिकता सिखा रहे हैं, तो इससे बडी विडम्बना और क्या हो सकती है !
लेकिन ‘फ्रीडम हाऊस’ और इससे जुडी संस्थायें धार्मिक स्वतंत्रता की अपनी इसी अवधारणा पर भारतीय कानूनों की समीक्षा करती हैं और तदनुकूल कानून बनवाने के लिए भारत सरकार पर दबाव कायम करती हैं । इसके लिए ये संस्थायें तरह-तरह के मुद्दों का निर्माण करती हैं और तत्सम्बन्धी तरह-तरह के आन्दोलन प्रायोजित करती-कराती हैं । फ्रीडम हाऊस ने कुछ वर्षों पहले ‘हिन्दू एक्सट्रीमिज्म’ अर्थात ‘हिन्दू उग्रवाद’ नाम से बे सिर-पैर का एक मुद्दा खडा किया था और इस तथाकथित कपोल-कल्पित प्रायोजित-सुनियोजित मुद्दे को मीडिया के माध्यम से दुनिया भर में प्रचारित करते हुए इस पर बहस-विमर्श के बहुविध कार्यक्रमों का आयोजन कर “ द राइजिंग आफ हिन्दू एक्सट्रीमिज्म ” (हिन्दू उग्रवाद का उदय) नाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी । उक्त रिपोर्ट में हिन्दू-उग्रवाद का बे-सुरा, बे-तुका राग अलापते हुए ‘फ्रीडम हाऊस’ ने जो रिपोर्ट प्रकाशित की थी , उसके कुछ अंशों पर ही गौर करने से आप इसकी नीति-नीयत और इसके निहित उद्देश्यों को समझ सकते हैं ।
“ द राइजिंग आफ हिन्दू एक्सट्रीमिज्म ” नामक उक्त रिपोर्ट में ‘रिलीजियस फ्रीडम’ की वकालत करने वाली इस संस्था ने जिन बातों पर जोर दिया है , सो तो वास्तव में हिन्दुओं के धर्मान्तरण में मिशनरियों के समक्ष खडी बाधाओं पर उसकी चिन्ता की ही अभिव्यक्ति है । रिपोर्ट में धार्मिक स्वतंत्रता सम्बन्धी भारतीय कानूनों की गलत व्याख्या करते हुए भारत को ‘एक धार्मिक उत्पीडक देश’ घोषित कर इसके विरूद्ध यहां अमेरिका के हस्तक्षेप की आवश्यकता पर बल दिया गया है । मालूम हो कि हमारे देश के ‘धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ और तत्सम्बन्धी अन्य कानून धोखाधडी से अथवा बहला-फुसला कर या जबरिया किये जाने वाले धर्मान्तरण को रोकते हैं , न कि स्वेच्छा से किये जा रहे धर्मान्तरण को । किन्तु उस रिपोर्ट में इसकी व्याख्या इन शब्दों में की गयी है- “ भारतीय कानून के तहत किसी धर्म अथवा पन्थ विशेष के आध्यात्मिक लाभ पर बल देना गिरफ्तारी का कारण हो सकता है । भारत में धर्मान्तरण आधारित टकराव इस कारण है , क्योंकि ईसाइयत के माध्यम से दलितों की मुक्ति से अगडी जाति के हिन्दू घबडाते हैं ” । जाहिर है, इस व्याख्या में ‘आध्यात्मिक लाभ’ और ‘मुक्ति’ शब्द का गलत इस्तेमाल किया गया है , जिससे फ्रीडम हाऊस और उसकी सहयोगी संस्थाओं की मंशा और मान्यता दोनों स्पष्ट हो जाती है ।
गास्पल फार एशिया (जी०एफ०ए०) अमेरिका की एक ऐसी भारी-भरकम संस्था है जो भारत के बाहर-भीतर सर्वत्र यह प्रचारित करते रहती है कि एशिया में भूख और गरीबी के लिए हिन्दू धर्म जिम्मेवार है, क्योंकि कई एशियाई देशों पर इसका प्रभाव है । भारत की खाद्य समस्या के लिए हिन्दू धर्म पर दोषारोपण करते हुए इसके कर्ता-धर्ता के०पी० योहन्नान कहते हैं कि “हिन्दुओं के आध्यात्मिक अंधेपन के कारण पूजनीय बनी गायों और चुहियों से प्रतिवर्ष हजारों टन अनाज के नुकसान होने से खाद्यान-संकट गहराते जाता है” । जी०एफ०ए० का अपना रेडियो-प्रसारण केन्द्र है जहां से वह ९२ भारतीय भाषाओं में हिन्दू धर्म के विरूद्ध अनर्गल प्रलाप करते रहता है और लोगों को ‘मुक्ति का मार्ग’ बताता है । यह मूर्तिपूजा की भर्त्सना करते हुए ईसा को सच्चा ईश्वर और हिन्दू-देवी-देवताओं को ‘दैत्य-पापी’ बताता है । हिन्दू-पर्व-त्योहारों के विरूद्ध नकारात्मक दुष्प्रचार के लिए ‘फेस्टिवल आउटरिच’ नाम से इसका एक विशेष कोषांग है, जो हमारे ‘कुम्भ आयोजनों’ को ‘उत्साहियों का हंगामा’ बताता है और उसके विरोध में प्रचार-पत्रक वितरित करता है । ‘गास्पल फार एशिया’ वह संस्था है जिसने वर्ष २००८ में मुम्बई में हुए जिहादी आतंकी हमले को हिन्दू अतिवादियों द्वारा किया हुआ बताते हुए दुनिया भर में यह प्रचारित किया कि हिन्दू संगठनों ने विदेशी पूंजी निवेश को भारत में आने से रोकने के लिए उसे अंजाम दिया , तकि दलित लोग गरीबी में ही रहें और ईसाइयों पर हो रहे हिन्दू-हमलों की आवाज दब जाए । भारत पर होते रहे जिहादी आतंकी हमलों को लेकर हमारी सरकार द्वारा यदा-कदा वैश्विक मंचों पर उठाये जाने वाले आतंकवाद विषयक मसलों के प्रति अमेरिकी राष्ट्रपति- जार्ज बुश से ले कर ओबामा तक की उदासीनता व उनकी ढुलमुल नीतियों के पीछे मेरिका की वेटिकन-चर्च-प्रेरित इन संस्थाओं की ही भूमिका प्रभावी होती रही हैं । ऐसे में हिन्दू धर्म-समाज के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण रखने वाले नये अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के वैदेशिक नीति-निर्धारक संस्थानों में गहरी पैठ बना चुकी इन संस्थाओं से निष्पक्षतापूर्वक निपटेंगें , ऐसी उम्मीद की जा सकती है क्या ?

• मनोज ज्वाला ; फरवरी’२०१७

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *