लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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थोडा पढे तो गांव छोड दे , ज्यादा पढे तो नगर ;
और पढे सो देश छोड दे , मैकाले-शिक्षण का जो असर !
मनोज ज्वाला
हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक सर्वेक्षण को ले कर लिखे मेरे
एक लेख- “देश छोडने को तैयार नवजवान” पर मेरे मेल-बाक्स में देश-विदेश से
बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रियायें लगातार आ रही हैं । उस लेख में मैंने
हिन्दुस्तान टाइम्स के उक्त सर्वेक्षण के आधार पर अपने देश की वर्तमान
शिक्षा-पद्धति का संक्षिप्त विश्लेषण मात्र किया है , जिसमें यह बताया
गया है कि ६०% से भी अधिक हमारे नवजवान विदेशों में बस जाना चाहते हैं ।
पाठकों की टिप्पणियों-प्रतिक्रियाओं को थोडा विस्तार देने पर तैयार इस
प्रस्तुत लेख का उपरोक्त शीर्षक मैंने बहुत सोच-समझ कर यह रखा है , जो
थोडा लम्बा जरूर है , जिसे ऊपर से आप पढते आ रहे हैं ; किन्तु उपयुक्त
यही है कदाचित । इस शीर्षक की रचना मेरी है , शब्द उत्तम भाई शाह के हैं
, जो अहमदाबाद के साबरमति में हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला नामक एक
गुरुकुल खोल कर मैकाले-अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति को खुलेआम चुनौती दे रहे
हैं । क्योंकि, बकौल शाह , हमारे देश की समस्त समस्याओं की जड में चालू
शिक्षा पद्धति ही है ।
आज कोई भी पढा-लिखा आदमी , खास कर नवजवान गांव में रहना
नहीं चाहता , खेती करना तो दूसरी बात है । आई०आई०टी० आई०आई०एम० जैसे नामी
शिक्षण संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त किया हुआ कोई व्यक्ति अगर गांव
में आकर पैसे कमाने के लिए ही खेती करता है तो वह खबर बन अखबारों की
सुर्खियों में आ जाता है , जिसका सीधा सा मतलब यह होता है कि ऊंची शिक्षा
ग्रहण कर खेती नहीं करनी चाहिए , गांव में नहीं रहना चाहिए । जिस देश में
“उत्तम खेती , मध्यम वाण ; करे चाकरी , अधम जान” जैसी कहावत प्रचलित थी,
वहां इस क्रम को उलट देने वाली यह शिक्षा-पद्धति ही है , जो हमें हमारे
देश के विरूद्ध खडा करने तथा घर-परिवार गांवों से उजाडने और हमारी जडों
से हमें काटने में लगी हुई है । इस शिक्षा के कारण परिवार का मतलब
बडे-बूढों से अलग सिर्फ पति-पत्नी-बच्चे तक सिमट कर रह गया है । समाज एक
बाजार बन गया है , जिसमें हर व्यक्ति एक दूसरे का प्रतिस्पर्द्धी बना हुआ
है । स्वार्थपरायणता इस कदर बढ गई है कि पारिवारिक- सामाजिक ताना-बाना
टूटता जा रहा है । हर आदमी शहर-बाजार की ओर दौड रहा है और शहर ‘पश्चिम’
से आकर्षित है , तो जाहिर है सबका उद्देश्य जैसे-तैसे धन कमा कर
‘पश्चिम’ की ओर भागना अथवा पश्चिम जाकर धन कमाना हो गया है । थोडा पढा
नवजवान गांव छोड कर नगर का हो जाता है , ज्यादा पढा नवजवान अपना नगर छोड
महानगर को चला जाता है तो और अधिक पढा हुआ स्वदेश छोड विदेश को । महज
साक्षरों की तो कोई बिसात ही नहीं , शिक्षितों का पीछा करने में
परिस्थितियां जहां ले जाए ।
ऐसा इस कारण क्योंकि यह शिक्षा-पद्धति न केवल पश्चिमोन्मुखी
है , बल्कि भारतीय चित्त के विरूद्ध भारत-विरोधी भी है । भारतीय
शिक्षा-पद्धति धर्म-अर्थ-काम-मोक्षलक्षी रही है , तो पश्चिम की यह
अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति काम-धंधा-मुनाफा-भोगलक्षी है । भारतीय
जीवन-दृष्टि तथा शिक्षा की भारतीय पद्धति में धन-धंधा व कामना-भोग पूरी
तरह से धर्म पर आधारित और मोक्ष को प्रेरित है ; जबकि युरोपीय
जीवन-दृष्टि तथा अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति में कामना ही समस्त चेष्टाओं का
आधार है , जो उपभोग-प्रेरित है , भोग ही उसका लक्ष्य है । धर्म का भारतीय
अर्थ भी पश्चिम के ‘रिलिजन’ से भिन्न है । वहां काम-क्रीडा की परिणति से
शुरू हुआ जीवन कामनामय होकर कामनाओं की तॄप्ति के लिए भिन्न-भिन्न तरह
के भिन्न-भिन्न तरीकों से उचित-अनुचित , नैतिक-अनैतिक, वैध-अवैध काम-धंधा
करते हुए धन-लाभ कमाने और उसके माध्यम से भोग-उपभोग करने में ही व्यतीत
हो जाता है । पश्चिम में जीवन की सार्थकता यही और इतनी ही है , जितनी
पशुओं की है , क्योंकि वहां मनुष्य एक ‘सामाजिक पशु’ (शोसल एनिमल) ही है
। किन्तु इससे उलट , भारतीय जीवन-दृष्टि सर्वथा भिन्न है । यहां मानवीय
जीवन चेतना-आत्मा की अनादि-अनंत यात्रा के बीच की मानवी काया-सम्पन्न
अवस्था है , जो परमात्म की ओर उन्मुख है । यहां मानवी काया में आत्मा के
अवतरण अर्थात व्यक्ति के जन्म से लेकर दूसरी काया में उसके परावर्तन
अर्थात व्यक्ति के मरण तक पूरा का पूरा मानव-जीवन धर्ममय है , जिसका
लक्ष्य जन्म-जन्मान्तर के इस यात्रा-चक्र से मुक्ति अर्थात परमात्म की
प्राप्ति है , जो मोक्ष कहलाता है । मानव-जीवन की उत्पत्ति और परिणति का
सच भी यही है । इस सच का अन्वेषण कर हमारे ऋषियों ने जीवन को
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष क्रम से चतुष्पदी आयाम प्रदान करते हुए हमारी समस्त
चेष्टाओं-शिक्षाओं का निर्धारण किया है , जिसके अनुसार मनुष्य कोई
सामाजिक पशु नहीं है, बल्कि संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है , जो ‘नर’ से
‘नारायाण’ बन जाने की समस्त क्षमताओं-सम्भावनाओं से सम्पनन है ।
पाश्चात्य पद्धति की शिक्षा-दीक्षा सिर्फ भोग-लक्षी व स्वार्थी है , जो
मनुष्य नामक ‘सामाजिक पशु’ को बढिया से बढिया , अधिक से अधिक असीमित भोग
भोगने ही के निमित्त अनन्त उत्पादन, विपणन, शोषण, विभाजन, धनार्जन और
विकसित पशुतायुक्त उद्यम सिखाती है ।
पश्चिम की इसी उद्यमिता का परिणाम था उपनिवेशवाद का जन्म ,
ईस्ट इण्डिया कम्पनी का भारत में आगमन तथा उसका शासन, जिसने अपनी
कमाऊ-खाऊ नीतियों के तहत पहले तो हमारी शिक्षा-व्यवस्था को समूल नष्ट कर
दिया और फिर ब्रिटेन की औपनिवेशिक-शासनिक जरूरतों के अनुसार हमारी
शिक्षा-पद्धति को उखाड फेंक कर शिक्षा की ऐसी पद्धति व ऐसी व्यवस्था कायम
कर दी जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद और ईसाई विस्तारवाद को मजबूती प्रदान करने
का साधन बन गई । इस शिक्षा-पद्धति के प्रवर्तक थामस विलिंग्टन मैकाले ने
इसके औचित्य के सम्बन्ध में यह तर्क प्रस्तुत किया था कि – “ हमें भारत
में ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना है , जो हमारे और उन करोडों भारतवासियों
के बीच , जिन पर हम शासन करते हैं उन्हें समझाने-बुझाने का काम कर सके ;
जो केवल खून और रंग की दृष्टि से भारतीय हों ; किन्तु रुचि , भाषा व
भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों ”।
ऐसा ही हुआ , बल्कि यह कहिए कि उन उपनिवेशवादी रणनीतिकारों
के निर्धारित लक्ष्य की हदें पार हो गई । उस औपनिवेशिक अंग्रेजी शासन की
समाप्ति के बाद भी हमारे देश के नीति नियन्ताओं द्वारा अंग्रेजी माध्यम
की उसी शिक्षा-पद्धति को खाद-पानी दिया जाता रहा , जो स्वार्थ-केन्द्रित,
भोग-लक्षी व पश्चिमोन्मुख है । नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजी भाषा व संस्कृति
‘अमरबेल’ की लत्तर की तरह हमारे ऊपर छाती गई और आज स्थिति यह है कि
हिन्दी सहित हमारी तमाम भारतीय भाषाओं का अंग्रेजीकरण हो गया है तो जाहिर
है हमारे निष्ठा-भक्ति का भी क्षरण होना ही था , जो होते-होते अब इतना हो
गया कि ६०% से अधिक नवजवान स्वदेश छोड विदेशों में ही बस जाने को तैयार
हैं । अंग्रेजी भाषा अपनाने के प्रति हमारा दृष्टिकोण चाहे कितना भी उदार
क्यों न हो और उससे होने वाली क्षति को हम चाहे कितना भी कम क्यों न
आंकते रहें , किन्तु वास्तविकता यही है कि बोल-चाल व कार्य-व्यापार की
भाषा ही व्यक्ति की निष्ठा का संवाहक होती है । इस तथ्य को जान कर ही
उपनिवेशवादियों ने हमारी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी को बनाया था । एक
ब्रिटिश इतिहासकार- डा० डफ ने अपनी पुस्तक “ लौर्ड्स कमिटिज-सेकण्ड
रिपोर्ट आन इण्डियन टेरिट्रिज- १८५३” में लिखा है कि भाषा का प्रभाव इतना
जबर्दस्त होता है कि जिस समय तक भारत के सभी देशी राजाओं-रजवाडों के साथ
अंग्रेज हुक्मरानों का पत्र-व्यवहार किसी भारतीय भाषा में होता रहेगा ,
उस समय तक भारतवासियों की भक्ति दिल्ली के बादशाह की ओर बनी रहेगी , इस
कारण ब्रिटेन के प्रति निष्ठा कायम करने के लिए जरूरी है कि अंग्रेजी को
सरकारी काम-काज की अनिवार्य भाषा बना दी जाए ”। उसके बाद ही अंग्रेजी की
अनिवार्यता कायम कर दी गई , जो आज भी है ।
मैकाले के बहनोई- चार्ल्स ट्रेवेलियन ने एक बार ब्रिटिश
पार्लियामेण्ट की एक समिति के समक्ष ‘ भारत की भिन्न-भिन्न
शिक्षा-पद्धतियों के भिन्न-भिन्न परिणाम’ शीर्षक से एक लेख प्रस्तुत किया
था, जिसका एक अंश उल्लेखनीय है- “ अंग्रेजी भाषा-साहित्य का प्रभाव
अंग्रेजी राज के लिए हितकर हुए बिना नहीं रह सकता ……. हमारे पास उपाय
केवल यही है कि हम भारतवासियों को युरोपियन ढंग की उन्नति में लगा दें
…..इससे हमारे लिए भारत पर अनंत काल तक अपना साम्राज्य कायम रखना बहुत
आसान और असन्दिग्द्ध हो जाएगा ”। तो इसी ‘युरोपीयन ढंग की उन्नति’ और
तदनुसार शिक्षा-पद्धति का परिणाम है कि उन्हीं युरोपियन देशों में ही बस
जाना चाह्ते हैं हमारे नवजवान । क्योंकि इस पद्धति से शिक्षित मानस हर
मायने में भारत को अधम और युरोप को उत्तम समझता है । वह अपनी
श्रेष्ठता-योग्यता पर भी युरोप-अमेरिका की मुहर चाहता है तथा युरोपियन
जीवन-शैली को विकास का पैमाना और अनंत सुख-भोग हेतु असीमित धनार्जन को
जीवन का परम लक्ष्य मानता है । यही कारण है कि कुछ अपवादों को छोड कर जो
जितना ज्यादा शिक्षित है, वह पश्चिमी देशों के प्रति उतना ही ज्यादा
आकर्षित है । क्योंकि पश्चिम में अनंत अनियण्त्रित भोग और भोग-लक्षी
उन्नति की अनुकूलतायें ज्यादा हैं ।
• मनोज ज्वाला

6 Responses to “थोडा पढे तो गांव छोड दे , ज्यादा पढे तो नगर ;”

  1. बीनू भटनागर

    हम भारतवासियों को हर बात के लिये पश्चिम को कोसने का शौक है और अपनी हर असफलता को पश्चिम की नकल का नतीजा बता कर ख़ुश होते है।गाँव में यदि विकास नहीं होगा तो व्यक्ति वहाँ क्या करेगा।पढ़े लिखे की छोड़िये पूर्वी दिल्ली में घरेलू काम के लियें ज्यादातर औरतें बंगाल के गाँव से हैं।मोक्ष की बात मै नहीं करूँगी जीवित हैं तो हर व्यक्ति अपनी प्रारंभिक ज़रूरत पूरी होने के बाद यदि आरामदायक जीवन के लिये अधिक कमाने का हक है बशर्ते कमाई कानूनी ढंग से की गई हो।हमारी संसकृति उसे भोग कह कर व्यक्ति को अपराधबोध से ग्रस्त क्यों करती है।
    बेहतर ज़िन्दगी के लियें कोई कहीं भी जाय इसमें बुरा क्या है? गाँव में डाक्टर नहीं जाते क्योंकि वहाँ चिकित्सा के लिये उपकरण जाँच की व्यवस्था नहीं है।पढाई की बिजली पानी की दिक्कत है।
    मैं 70 साल की उम्र में किसी पहाड़ी गाँव मे बसना चाहती हूँजबकि यहाँ बच्चे साथ रहते तब भी ,क्योंकि प्रकृति जुड़कर कुछ लिखना चाहती हूँ पर ये संभव नहीं है।हम दोनो उम्र के उस दौर मे हैं जहाँ चिकित्सा सुविधाओं की ज़रूरत होती है। भारत मे परिवार जितने जुड़े हुए हैं दुनिया में कहीं नहीं है और अगर बच्चे अलग रहना भी चाहें तो बुरा क्या है?

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    • मनोज ज्वाला

      मनोज ज्वाला

      इसी कारण से गांव सुविधा-हीन और समस्याग्रस्त होते गए , क्योंकि पढे-लिखे लोग गांव छोडते गए । इस शिक्षा-पद्धति के कारण ही लोगों में गांव के प्रति नकारात्मकता का भाव निर्मित होता गया । सरकार की नीतियां तो जिम्मेवार हैं ही , किन्तु सकार की तत्सम्बन्धी नीतियां बनाने वाले लोग इसी शिक्षा-पद्धति की ऊपज हैं । गांव की दुर्दशा के मूल में इस शिक्षा-पद्धति से उत्पन्न विचारणा-धारणा ही है , जो हमारे नीति-नियंताओं को जमीन से दूर करती रही है।

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  2. इंसान

    मनोज ज्वाला जी, मैं आपकी भावना को भली भांति समझता हूँ और मेरे दिल में आपके लिए सम्मान होने के कारण मैं आपका पीछा करते यहाँ भी पहुँच गया हूँ| मेरे दिल में आदर और प्रशंसा उस भद्र पुरुष के लिए भी सदैव बने रहे हैं जिन्होंने १९३७ में पंजाब के एक गाँव से पहुंचे “मैट्रिक-पास” मेरे पिता जी को दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म से उन्हें न केवल अपने घर ले गए, उन्हें रेलवे में नौकरी भी दिलवाई| पंजाब में हमारे दोआबे क्षेत्र से ही आए पूर्णतया अपरिचित वो भद्र पुरुष रेलवे बोर्ड के निर्देशक थे| कुछ सप्ताह बाद आर्थिक ढंग से अपने पांव पर खड़े मेरे पिताजी के लिए उन्होंने दिल्ली में करोल बाग़ की नाईवाला में किराये के मकान का प्रबंध किया जहां तब मेरी माताजी व मेरे बड़े भाई गाँव से आ बस गए थे| इस प्रकार “थोड़ा पढ़े तो गाँव छोड़ दे” का सिलसिला मानव इतिहास में बहुत पुराना है| इसके अतिरिक्त चिरकाल से गाँव में भरती हुए भारतीय सेना के फ़ौजी कार्यमुक्ति के पश्चात अपने गाँव कम ही लौटते थे| मैं समझता हूँ कि भद्र पुरुष ने मेरे पिताजी का दिल्ली में आना केवल समयानुकूल परिवर्तनीयता माना होगा लेकिन शिक्षा-पद्धति को ध्यान में रख यदि आप वर्तमान स्थिति से चिंतित हैं तो आप मुझे अपने से बहुत पीछे नहीं पाएंगे| जिस देश में शासक देशवासियों से किसी मूल भारतीय भाषा में संपर्क नहीं बना पाता हो वहां के नागरिक कैसे स्वतन्त्र हो सकते हैं?

    बिना अंतरजाल पर खोजे आप अपने इर्द-गिर्द दस लोगों से पूछें कि “भारत का राजपत्र” क्या है और एक नागरिक के लिए उसकी क्या विशेषता अथवा महत्वता है| शेष, यदि आप विषय पर वार्तालाप आगे बढ़ाना चाहते हों|

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    • मनोज ज्वाला

      मनोज ज्वाला

      यही तो मेरा भी मानना है- आजादी मिली ही नहीं है । सच्ची आजादी मिली होती तो स्थिति शायद ऐसी नहीं होती । चालू शिक्षा-पद्धति पश्चिम पर निर्भरता बढाने वाली और पश्चिम की ओर आकर्षित करने वाली है । हमारे देश में आज के शहर असल में पश्चिम के ही प्रतिरूप हैं । आदरणीय पिताजी का उदाहरण यहां उपयुक्त प्रतीत नहीं होता, क्योंकि वे शहरोन्मुखी मानसिकता और शहरी आकर्षण के कारण दिल्ली नहीं बसे, जैसा कि आपने स्वयं ही कहा है । किन्तु आज की शिक्षा-पद्धति हमारे लोगों में शहरोन्मुखी मानसिकता का निर्माण कर रही है, पश्चिम की ओर आकर्षित कर रही है । भाषा पर आपकी चिन्ता तो वास्तव में मेरी ही चिन्ता है ।

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  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    *भाषा विषयक ऐतिहासिक भूलें* नामक,– निम्न कडि पर डाला हुआ, आलेख पढने का अत्याग्रही अनुरोध। इसी प्रवक्ता में २०१० से आजतक प्रायः ६५+ आलेख भाषा विषय पर डाले गए हैं। क्या मैं आपकी संज्ञानी टिप्पणी की अपेक्षा कर सकता हूँ?

    http://www.pravakta.com/bhashaa-vishyak-aitihasik-bhulein/

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