मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

काले धन के जड-मूल : पाश्चात्य-पद्धति के स्कूल

काले धन के विष-वृक्ष से समाज व देश को अगर सचमुच ही मुक्त
करना है , तो इसकी पत्तियों व डालियों के ‘विमुद्रीकरण’ अथवा लेन-देन की
प्रक्रिया के ‘कम्प्युटरीकरण’ से कुछ नहीं होगा ; बल्कि इसके लिए इसके
जड-मूल अर्थात दीक्षाहीन पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति को उखाड कर
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-सम्पन्न भारतीय शिक्षण-पद्धति का पुनर्पोषण करना
होगा ।

‘लोकमंथन’ से निकली युक्ति- सच्चे स्वराज के लिए बदलें शिक्षा-पद्धति

मनोज ज्वाला ‘हिन्द-स्वराज’ में महात्मा गांधी ने अपने सपनों के स्वराज को परिभाषित करते हुए

आतंकवाद से मुक्ति हेतु गायत्री मंत्राहुति का अभिनव प्रयोग

पिछले दिनों देव-भूमि हरिद्वार जाना हुआ, जहां ‘युग निर्माण योजना’ के अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय- शांति कुंज और इससे सम्बद्ध शिक्षण संस्थान- देव संस्कृति विश्वविद्यालय में एक अभिनव आध्यात्मिक प्रयोग देखने को मिला । वहां मैं प्रायः जाते रहता हूं । किन्तु इस बार वहां जो देखा , सो लिखने की अपनी इच्छा का संवरण मैं नहीं कर पा रहा हूं ; क्योंकि वह उल्लेखनीय है ।

सत्ता सौंपने से पहले जांच ली गई थी नेहरू की ब्रिटेन-परस्त अंग्रेज-भक्ति

मालूम हो कि ब्रिटेन को सैन्य-शक्ति के सहारे भारत से खदेड भगाने के लिए आजाद हिन्द फौज कायम कर अपनी सरकार बना लेने के पश्चात जर्मनी-जापान के सहयोग से भारत के पूर्वोत्तर सीमा-क्षेत्र में घुस इम्फाल एवं कोहिमा पर कब्जा कर लेने वाले सुभाष चन्द्र बोस ने जुलाई १९४५ में बंगाल पर आक्रमण करने की पूरी तैयारी कर ली थी और खुली धमकी दे रखी थी ।

रावण-दहन से ज्यादा जरुरी है मैकाले-दहन

मालूम हो कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के माध्यम से भारत पर अपना औपनिवेशिक शासन-साम्राज्य कायम कर लेने के पश्चात अंग्रेजों ने पहले तो अपने साम्राज्यवादी उपनिवेशवाद का औचित्य सिद्ध करने के लिए अपने तथाकथित विद्वानों-भाषाविदों के हाथों प्राचीन भारतीय शास्त्रों-ग्रन्थों को अपनी सुविधा-योजनानुसार अनुवाद करा कर उनमें तदनुसार तथ्यों का प्रक्षेपण कराया और फिर बाद में भारतीय शिक्षण-पद्धति