मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

सतलुज, ब्यास और रावी का पानी क्‍यों जाए पाकिस्‍तान ?

मानवीयता कहती है कि जरूरतमंद की जितनी मदद हो सकती है वह अवश्‍य करनी चाहिए किंतु जिसे जरूरत है वही गाली-गलौच करे, अपमान जनक भाषा में प्रश्‍नोत्‍तर करे, तब ऐसे जरूरतमंद के लिए क्‍या करें ? सीधी बात है कि ऐसे व्‍यक्‍ति, संस्‍था, समूह, देश या अन्‍य कोई क्‍यों न हो उसके साथ किसी प्रकार की मानवीयता नहीं दिखाई जानी चाहिए। उसे तो फिर इसके लिए अपनी ताकत का अहसास कराने की जरूरत होती है।

#नोटबंदी पर रामभुलावन ने कहा, हम कितने ढीठ किस्‍म के हो गए हैं साहब !

हम कितने ढीठ किस्‍म के हो गए हैं, वह ऐसे ही नहीं कह रहा, उसके पीछे ओर भी कई कारण है। रामभुलावन आगे बोला..मसलन लोगों ने लाइन में लगने को ही धंधा बना डाला, सरकार ने बैंक से नोट बदलने की सुविधा एटीएम का उपयोग करने वालों की तुलना में जो लोग इस का उपयोग नहीं करते हैं, उनको ध्‍यान में रखकर की थी लेकिन हुआ क्‍या ….. लोग चंद रुपयों के लालच में लाइन में लगकर काले को सफेद करने के फेर में पड़ गए। जिसके बाद मजबूरी में सरकार को 4 हजार 500 की नगद राशि परिवर्तन किए जाने के निर्णय को वापिस लेकर उसे 2 हजार रुपए करना पड़ा।

एक निर्णय जो बदल देगा भारत का भविष्‍य

देखाजाए तो केंद्र सरकार देशभर में फैले भ्रष्‍टाचारियों से सवा लाख करोड़ रुपये का काला धन वापस निकालने में अब तक सफल रही है लेकिन इस एक निर्णय के बाद उम्‍मीद करिए कि 100 प्रतिशत कालाधन जल्‍द ही बाहर आना तय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात में बहुत दम है कि भ्रष्‍टाचार और आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई जरूरी है। जाली नोटों का जाल देश को तबाह कर रहा है। देश विरोधियों एवं आतंकियों को कहां से पैसा नसीब होता होगा, यह बेहद सोचनीय है।

बच्चा चुराने वालों को अब आजीवन कारावास

इस विधेयक के पास हो जाने के बाद यह संभव हो सकेगा कि मानव तस्करी के गंभीर मामलों में जो दोषी पाए जाएंगे उन्हें हत्या करने या उसके प्रयासों के लिए दी जाने वाली सजा के समकक्ष तक माना जा सकेगा। साथ ही मानव तस्करी रोधी विधेयक के माध्यम से यह भी एक श्रेष्ठ निर्णय लिया जा रहा है कि इसमें बंधुआ मजदूर से लेकर भीग मंगाने के उद्देश्य से बच्चों का इस्तेमाल कर रहे लोगों एवं शादी के लिए बिना उसकी इच्छा और स्वीकारोक्ति के किसी महिला की तस्करी या उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाये जाने जैसे अपराध को भी सम्मिलित किया गया है।

मानव तस्‍करी से मुक्‍ति के लिए केंद्र के प्रयास

इन दिनों जिस तरह केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने मानव तस्करी रोधी विधेयक के मसौदे को कैबिनेट के पास भेजा है। उसे देखते हुए यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत सरकार इस विषय और इससे जुड़े अपराध को जड़ से समाप्त करने के लिए संकल्पित हो उठी है। संसद में इस बिल पर मोहर लग जाने के बाद उम्मीद यही की जा सकती है कि इसके सख्त कानून के दायरे में आने से अपराधियों में भय व्याप्त होगा और वे छोटी-मोटी सजा के बजाय लम्बी एवं जीवनभर की सजा पाने के भय से इस अपराध से दूर रहेंगे।

समाजिक समरसता और हमारा अनुसूचितजाति समाज

” अनुसूचित जाति उन्‍हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज हैं, जिन्‍होंने जाति से बाहर होना स्‍वीकार किया, लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्‍वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्‍हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्‍योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्‍वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्‍वयं अपमान व दमन झेला।”

केंद्र का भिखारियों के प्रति व्‍यक्‍त होता सम्‍मान

इसे देखते हुए जो निर्णय हाल ही में केंद्र की मोदी सरकार लेने जा रही है, निश्‍चित ही उसकी सर्वत्र सराहना होनी चाहिए। वस्‍तुत: सरकार शीघ्र ही जिस विधेयक लाने जा रही है उससे भिखारियों और बेघर लोगों का पुनर्वास होना सुनिश्‍चित है। विधेयक की मदद से भीख मांगने के धंधे का अपराधीकरण रोका जाना संभव हो जाएगा।

बहुत हुई राजनीतिक जाग्रति, अब कुछ कर्तव्य की बात हो जाए

वस्तुत: यहां कर्तव्य चेतना से तात्पर्य अपने राष्ट्र और राज्य के प्रति राजनीतिक अधि‍कारों से ऊपर उठकर  स्वप्रेरित हो विकास के लिए कार्य करने से है। इन दिनों जहां देखो वहां अधि‍कारों की बाते हो रही हैं। केंद्र से लेकर समस्त राज्य सरकारें, एक रुपए किलो गेहूं से लेकर शादी और भगवान के दर्शन तक करा रही हैं। भले ही आज सुविधाभोगी विश्व में लोग इसे सही ठहराएं लेकिन क्या यह वाकई सही है