मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

मानव तस्‍करी से मुक्‍ति के लिए केंद्र के प्रयास

इन दिनों जिस तरह केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने मानव तस्करी रोधी विधेयक के मसौदे को कैबिनेट के पास भेजा है। उसे देखते हुए यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत सरकार इस विषय और इससे जुड़े अपराध को जड़ से समाप्त करने के लिए संकल्पित हो उठी है। संसद में इस बिल पर मोहर लग जाने के बाद उम्मीद यही की जा सकती है कि इसके सख्त कानून के दायरे में आने से अपराधियों में भय व्याप्त होगा और वे छोटी-मोटी सजा के बजाय लम्बी एवं जीवनभर की सजा पाने के भय से इस अपराध से दूर रहेंगे।

समाजिक समरसता और हमारा अनुसूचितजाति समाज

” अनुसूचित जाति उन्‍हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज हैं, जिन्‍होंने जाति से बाहर होना स्‍वीकार किया, लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्‍वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्‍हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्‍योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्‍वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्‍वयं अपमान व दमन झेला।”

केंद्र का भिखारियों के प्रति व्‍यक्‍त होता सम्‍मान

इसे देखते हुए जो निर्णय हाल ही में केंद्र की मोदी सरकार लेने जा रही है, निश्‍चित ही उसकी सर्वत्र सराहना होनी चाहिए। वस्‍तुत: सरकार शीघ्र ही जिस विधेयक लाने जा रही है उससे भिखारियों और बेघर लोगों का पुनर्वास होना सुनिश्‍चित है। विधेयक की मदद से भीख मांगने के धंधे का अपराधीकरण रोका जाना संभव हो जाएगा।

बहुत हुई राजनीतिक जाग्रति, अब कुछ कर्तव्य की बात हो जाए

वस्तुत: यहां कर्तव्य चेतना से तात्पर्य अपने राष्ट्र और राज्य के प्रति राजनीतिक अधि‍कारों से ऊपर उठकर  स्वप्रेरित हो विकास के लिए कार्य करने से है। इन दिनों जहां देखो वहां अधि‍कारों की बाते हो रही हैं। केंद्र से लेकर समस्त राज्य सरकारें, एक रुपए किलो गेहूं से लेकर शादी और भगवान के दर्शन तक करा रही हैं। भले ही आज सुविधाभोगी विश्व में लोग इसे सही ठहराएं लेकिन क्या यह वाकई सही है 

केंद्र की श्रेष्‍ठ शिक्षा नीति का बुरा हाल

वस्‍तुत: सरकार को यदि शिक्षा के स्‍तर में समानता रखनी है तो सबसे पहले संपूर्ण देश में एक जैसा पाठ्यक्रम लागू करने पर जोर देना होगा, बोर्ड माध्‍यम फिर केंद्रीय हो या राज्‍य स्‍तरीय पुस्‍तकों के स्‍तर में बहुत अंतर नहीं होना चाहिए। इसमें स्‍थानीय स्‍तर पर कुछ पाठ अलग हो सकते हैं लेकिन ऐसा न हो कि पूरा का पूरा सिलेबस ही अलग हो

सेना पर प्रश्‍न खड़े करते केजरीवाल

वास्‍तव में केजरीवाल के इस बयान को गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने “राजनीतिक” करार देते हुए उनकी सही आलोचना की है। रिजिजू को बाकायदा ट्वीट कर कहना पड़ा कि  “यह राजनीति करने का समय नहीं है। भारतीय सेना पर विश्वास कीजिए।” केजरीवाल ये समझें कि भारत के प्रधानमंत्री को किसी को सबूत दिखाने की जरूरत नहीं है, सेना अपना कार्य बखूबी कर रही है।

शक्‍ति आराधना का यह पक्ष भी जानें

इसका शरीर पर प्रभाव यह होता है कि वह अपने को स्‍थ‍िर रखने के लिए, स्‍वस्‍थ रहने के लिए लगातार वातावरण से संघर्ष करता है। जिसके कारण शरीर में वात, पित्‍त, कफ का संतुलन बिगड़ जाता है। देखा जाए तो शरीर के इस बिगड़े हुए असंतुलन को फिर से संतुलन में लाना ही नवरात्रों का अहम कार्य है।

सार्क सम्‍मेलन के रद्द होने को भारत की सफलता मानिए 

कुल मिलाकर कहना होगा कि भारत सरकार का यह कदम स्‍वागत योग्‍य है, क्‍योंकि कार्य और समझौते अपनी जगह है, लेकिन देश की संप्रभुता अपनी जगह। पाकिस्‍तान जैसा मुल्‍क जो भारत से ही पैदा हुआ और आज भारत को ही आंख दिखाए तो बेहतर है ऐसे देश से जितनी अधिक दूरी बनाई जाए उतना अच्‍छा है।