बदकिस्मती से आज भी प्रासंगिक है चंपारण सत्याग्रह

यह हमारा दुर्भाग्य है कि चंपारण सत्याग्रह  एक शताब्दी बाद भी अपनी प्रत्येक वर्षगाँठ पर पहले से अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है। चंपारण सत्याग्रह नील की खेती करने वाले किसानों के अधिकारों के लिए संगठित संघर्ष के रूप में विख्यात है। इसके एक सदी बाद भी देश का किसान आज बदहाल है। 2010-11 के एग्रीकल्चर सेंसस के अनुसार देश के 67.04 प्रतिशत किसान परिवार सीमांत हैं जबकि 17.93 प्रतिशत कृषक परिवार लघु की श्रेणी में आते हैं। देश के कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने संसद को नेशनल सैंपल सर्वे द्वारा कृषि वर्ष जुलाई 2012 से जून 2013 के संदर्भ में संकलित आंकड़ों के आधार पर बताया कि देश में लगभग 52 प्रतिशत कृषक परिवार ऋणग्रस्त हैं और प्रति कृषक परिवार पर 47000 रुपए औसत ऋण बकाया है। बकाया ऋण में 60 प्रतिशत संस्थागत स्रोतों से लिया गया है जिसमें 42.9 प्रतिशत के साथ बैंकों की हिस्सेदारी सर्वाधिक है जबकि गैर संस्थागत स्रोतों से लिया गया बकाया ऋण 40 प्रतिशत है जिसमें सूदखोरों से लिए गए ऋण का प्रतिशत सर्वाधिक 25.8  है। ऋण लेने वाले समस्त किसानों में सीमांत(अढ़ाई एकड़ से कम) और लघु कृषकों(अढ़ाई से पांच एकड़) की संख्या 72.02 प्रतिशत है। सूदखोरों से ऋण लेने वाले सीमांत और लघु कृषकों की संख्या 2.21 करोड़ अनुमानित है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि वर्षों(2014 से 2016) के मध्य देश में 36000 किसानों ने आत्महत्या की है। यह आंकड़े चिंताजनक रूप से अधिक हैं किंतु तब भी भयावहता का सम्पूर्ण प्रकटीकरण नहीं करते क्योंकि यदि आत्महत्या करने वाला कृषि भूमि का स्वामी है तब तो उसकी पहचान कृषक के रूप में हो जाती है किंतु कृषि मजदूरों के आंकड़े कभी भी सही रूप से दर्ज नहीं हो पाते। नेशनल सैंपल सर्वे का ही आंकड़ा यह भी है कि कृषक परिवार की कृषिजन्य आय केवल 3078 रुपए है। स्वतंत्र एजेंसियों के सर्वेक्षण बताते हैं कि देश के 58 प्रतिशत किसान भूखे सोते हैं। सीएसडीएस का सर्वेक्षण है कि 62 प्रतिशत किसान खेती छोड़ना चाहते हैं। एनएसएसओ की 2014 की रिपोर्ट बताती है कि कृषि त्याग कर पलायन करने वाले कृषकों में अधिकांश सीमांत कृषक हैं।
पारंपरिक कृषि से अपनी आवश्यकता का अन्न उपजाते तथा स्थानीय संसाधनों पर आधारित कुटीर उद्योगों के माध्यम से अपनी दैनंदिन उपयोग की वस्तुएं रचते आत्मनिर्भर ग्रामों और उनके संतोषी निवासियों को गढ़ने का सपना गांधी जी के आर्थिक दर्शन का केंद्र बिंदु रहा। स्वतन्त्रता के बाद उनके विचारों को दकियानूसी और अप्रायोगिक मानकर दरकिनार कर दिया गया किन्तु जब हम देखते हैं कि कृषि में उन्नत तकनीक और वैज्ञानिक प्रविधि के प्रयोग के लाभ न केवल सीमांत और लघु कृषकों की पहुंच से दूर हैं बल्कि इनके कारण ये पराश्रित और ऋणग्रस्त हो रहे हैं तो गाँधी के आर्थिक दर्शन के पुनर्पाठ की आवश्यकता बड़ी तीव्रता से अनुभव होती है। यद्यपि यह पुनर्पाठ अब शायद यही बता सकेगा कि हमने गाँधीवाद को नकार कर क्या खोया है क्योंकि इससे उलटे रास्ते पर हम इतना आगे निकल आए हैं कि लौटना मुमकिन नहीं है।
स्थिति आज यह है कि सीमांत किसानों के पास आधुनिक कृषि उपकरणों और सिंचाई सुविधाओं को जुटाने के लिए धन का अभाव है। किराये से इनकी व्यवस्था इन किसानों को करनी पड़ती है। इस कारण लागत में वृद्धि होती है। रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक भी अपनी बढ़ती कीमतों के कारण सीमांत और छोटे कृषकों पर आर्थिक बोझ डालने लगे हैं। आधुनिक तकनीक ने कृषि में पशुधन के प्रयोग को विस्थापित किया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि अब दुग्ध भी किसानों को खरीदना पड़ रहा है। सीमांत किसानों की समस्याओं का हल कोआपरेटिव कृषि में छिपा है किंतु सरकार कॉर्पोरेट खेती की ओर भाग रही है जो अंततः कॉर्पोरेट मालिकों की मर्जी के अनुसार फसल उगाने की ओर ले जाएगी। यह स्थिति चंपारण के नील की खेती करने वाले किसानों से कदापि भिन्न नहीं है। केरल की कुडम्बश्री योजना कोआपरेटिव खेती की सफलता का बेहतरीन उदाहरण है किंतु दुर्भाग्यवश इसे अपेक्षित महत्व नहीं दिया जा रहा। कोआपरेटिव खेती के मार्ग में बाधाएं कम नहीं हैं। किसानों को इसके लिए तैयार करना कठिन है। कोऑपरेटिव आंदोलन और भ्रष्टाचार का चोली दामन का साथ रहा है। इसे असफल बताकर खारिज भी कर दिया गया है किंतु इसके बाद भी सरकार कॉरपोरेट्स के एजेंडे को लागू करने के लिए जिस प्रकार की तत्परता और समर्पण का प्रदर्शन कर रही है उसके दशमांश से ही सहकारिता की दशा और दिशा बदल सकती है।
एक प्रश्न नकदी फसलों का भी है। जिन नकदी फसलों के विषय में यह कहा गया था कि वे किसानों की आय को दुगना चौगुना कर सकती हैं वे नकदी फसलें किसानों की बदहाली और खुदकुशी का कारण बन रही हैं। देश भर में आलू, प्याज, टमाटर, गन्ना, कपास आदि का विपुल उत्पादन करने वाले किसान भूखे मर रहे हैं, कर्ज में डूबे हैं, अपनी फसलों को सड़कों पर फेंक रहे हैं और अपनी जान भी दे रहे हैं। जब गाँधी जी अपनी जरूरत भर का अनाज उगाने की बात पर जोर देते थे तब उन्हें किसान विरोधी तक समझ लिया जाता था किंतु समय ने सिद्ध किया है कि अधिकांश मामलों में नकदी फसलों का लाभ जिस किसी को मिल रहा हो कम से कम वह गरीब किसान तो नहीं है।
कृषि की जीडीपी में हिस्सेदारी घटी है। 1950 में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी जीडीपी में 50 प्रतिशत थी जो वर्तमान में 17 प्रतिशत के करीब रह गई है। अर्थशास्त्री यह मानते हैं कि जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी का घटना हमेशा इसकी बदहाली का द्योतक नहीं होता। दरअसल उद्योग और सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी जीडीपी में बढ़ी है। इस कारण कृषि क्षेत्र का हिस्सा कम हुआ है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार विकसित अर्थव्यवस्थाओं में जीडीपी बहुत अधिक होता है किंतु विकास के साथ साथ कृषि क्षेत्र का हिस्सा कम होता जाता है। विश्व के विकसित देशों में कृषि क्षेत्र की जीडीपी में हिस्सेदारी 5-7 प्रतिशत या उससे भी कम होती है। किन्तु भारत के साथ समस्या यह है कि देश की 49 प्रतिशत आबादी कृषि पर आश्रित है। देश के लगभग 58 करोड़ लोग रोजगार के लिए कृषि पर निर्भर हैं। देश में हर वर्ष 2 करोड़ नए खाद्य उपभोक्ता बढ़ रहे हैं। कृषि योग्य भूमि में 17 प्रतिशत तक की कमी आई है। उद्योग और सेवा क्षेत्र में रोजगार बढ़ाकर कृषि क्षेत्र पर निर्भर जनसंख्या को घटाने के प्रयास का यह अर्थ नहीं होना चाहिए कि कृषि को हाशिए पर डाल दिया जाए। विगत छह वर्षों में 4 वर्ष ऐसे रहे हैं जब कृषि विकास दर चिंताजनक रूप से कम रही है। गाँवों में बसने वाले कृषि प्रधान देश भारत ने विकास के जिस पश्चिमी मॉडल को अपनाया उसके कारण कृषि, भारतीय अर्थव्यवस्था की शक्ति बनने के बजाए भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी बनती दिख रही है। सरकार के 2022 तक किसानों की आय दुगनी करने के आधारहीन वादों के बीच कृषि और किसान की गहन उपेक्षा का दौर जारी है। सरकारों की प्राथमिकताओं को किसानों और कॉरपोरेट्स को दिए गए कर्ज की वसूली में सम्बन्ध में उनके दोहरे मापदंडों के आधार पर सरलता से समझा जा सकता है। सरकारी कर्मचारी सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का लाभ उठा रहे हैं किंतु किसानों की आय में सुनिश्चित वृद्धि करने का कोई प्रयास अब तक नहीं हुआ है। समर्थन मूल्य का कमजोर समर्थन किसानों को सहायता नहीं दे पा रहा है और आधार मूल्य का कानूनी आधार देने की सरकारों की नीयत नहीं दिखती। कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन और अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया जैसे विशेषज्ञ दूसरी हरित क्रांति की आवश्यकता का अनुभव कर रहे हैं किंतु इससे किसानों की दशा में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन हो पाएगा यह कहना कठिन है।
पूरे देश में किसान आंदोलनरत हैं। कृषि मुद्दों के जानकार देविन्दर शर्मा बताते हैं कि साल 2016 में किसानों के  4837 विरोध प्रदर्शन हुए जो 2 साल के भीतर 680 प्रतिशत का उछाल है। कुछ एक अपवादों(मध्यप्रदेश के मंदसौर में जून 2017 में हुई हिंसा आदि) को छोड़ दिया जाए तो किसान आंदोलन मोटे तौर पर अहिंसक रहे हैं और किसानों ने गाँधी जी की शांतिप्रिय विरोध और सत्याग्रह की परंपरा को जीवित रखा है। हाल ही में मार्च 2018 में महाराष्ट्र में 35000 किसानों का शांतिपूर्ण मार्च इसकी ताजातरीन मिसाल है।
गाँधी जी के जीवन के अनेक पाठों में एक किसान नेता और कृषि तथा कृषक के अनन्य समर्थक के रूप में उनकी भूमिका से सम्बंधित पाठ भी है। यदि यह पाठ अल्पचर्चित रहा है तो इसे विमर्श के केंद्र में लाया जाना चाहिए। गाँधी जी कृषकों के हाथों में सत्ता की कमान देखना चाहते थे। कृषक पुत्र एवं आधुनिक भारत में किसान आंदोलन के प्रारंभिक पुरोधा एनजी रंगा द्वारा 29 अक्टूबर 1944 को लिए गए एक साक्षात्कार में गाँधी जी कहते हैं- लेकिन मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि यदि हमारे यहां लोकतांत्रिक स्वराज्य आया एवं अहिंसक तरीकों से स्वतन्त्रता प्राप्त करने पर ऐसा होगा ही, तो उसमें कृषकों के पास राजनीतिक सत्ता के साथ ही हर प्रकार की सत्ता होनी ही चाहिए। 26 नवंबर, 1947 को प्रार्थना-सभा में महात्मा गांधी ने कहा – ‘हमारे दुर्भाग्य से हमारा एक भी मंत्री किसान नहीं है। सरदार (पटेल) जन्म से तो कृषक हैं, कृषि के बारे में समझ रखते हैं, मगर उनका पेशा बैरिस्टरी का रहा। जवाहर लाल जी विद्वान हैं, बड़े लेखक हैं, मगर वे कृषि के बारे में क्या समझें! हमारे देश में 80 प्रतिशत से ज्यादा जनता किसान है। सच्चे प्रजातंत्र में हमारे यहां राज कृषकों का होना चाहिए। उन्हें बैरिस्टर बनने की जरूरत नहीं। अच्छा किसान बनना, उपज बढ़ाना, ज़मीन को कैसे ताजा रखना, यह सब जानना उनका कार्य है। ऐसे योग्य किसान होंगे तो मैं जवाहर लाल जी ने कहूंगा कि आप उनके सेक्रेटरी बन जाइये। हमारा किसान-मंत्री महलों में नहीं रहेगा। वह तो मिट्टी के घर में रहेगा, दिन भर खेतों में कार्य करेगा, तभी योग्य किसानों का राज हो सकता है।
गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद गोखले के परामर्श पर वर्ष भर भ्रमण करते हुए भारत के ग्रामों और किसानों को समझने की मौन चेष्टा की। चंपारण सत्याग्रह के दौरान किसानों से जो नाता बना वह गाँधी जी ने जीवन पर्यंत निभाया बल्कि किसानों के प्रति उनका अनुराग और किसानों की शक्ति पर उनका विश्वास उत्तरोत्तर प्रगाढ़ होते गए। यह कहा जाता है कि किसानों की समस्याओं को उठाना स्वाधीनता आंदोलन को जन आंदोलन बनाने के लिए गाँधी जी की सजग रणनीति थी किन्तु सत्य तो यह है गांधी जी को ऐसा भारत कभी स्वीकार्य न था जहाँ कृषक को शोषित और अपमानित किया जाता हो। 29 जनवरी 1948 की प्रार्थना सभा में अपनी मृत्यु से ठीक एक दिन पूर्व उन्होंने कहा- यदि मेरा वश चले तो हमारा गवर्नर-जनरल किसान होगा, हमारा बड़ा वजीर किसान होगा, सब कुछ किसान होगा, क्योंकि यहां का राजा किसान है। मुझे बाल्यावस्था से एक कविता सिखाई गई – “हे किसान, तू बादशाह है।” किसान ज़मीन से उत्पन्न न करे तो हम क्या खाएंगे? हिंदुस्तान का वास्तविक राजा तो वही है। लेकिन आज हम उसे ग़ुलाम बनाकर बैठे हैं। आज किसान क्या करे? एमए बने? बीए बने? ऐसा किया तो किसान मिट जाएगा। फिर वह कुदाली नहीं चलाएगा। किसान प्रधान बने, तो हिंदुस्तान की तस्वीर बदल जाएगी। आज जो सड़ा पड़ा है, वह नहीं रहेगा।
इस बात की आशा कम ही है कि आज की सरकारों को गाँधी जी का यह कृषक प्रेम आसानी से रास आएगा और वे इससे प्रेरित होकर अपनी रीति नीति में बदलाव करेंगी। किन्तु कृषि और कृषक को चर्चा में बनाए रखना हमारी अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए आवश्यक है। चंपारण सत्याग्रह की सफलता का मूलाधार था गाँधी जी की प्रेरणा से पढ़े लिखे नवयुवकों द्वारा भाषा आदि की समस्याओं पर विजय प्राप्त करते हुए चंपारण क्षेत्र के 2841 ग्रामों का विस्तृत,गहन और प्रामाणिक सर्वेक्षण। अप्रैल 1917 से जून 1917 के बीच गाँधी के समर्पित युवा मित्र 8000 किसानों के बयान दर्ज कर रिपोर्ट तैयार करने की ओर अग्रसर हो गए थे। यह रिपोर्ट इतनी परिपूर्ण थी कि सरकार इसकी सच्चाई को नकार न सकी। आज भी सरकार पर दबाव बनाने के लिए बुद्धिजीवियों और मीडिया को किसानों की समस्याओं की शोधपरक ,तथ्यपूर्ण और बेबाक रिपोर्टिंग करनी होगी।
डॉ राजू पाण्डेय

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