सर्वधर्म समभाव निरा आदर्श नहीं अपितु अनुभूत यथार्थ

स्वामी रामकृष्ण परमहंस के जन्मदिवस 18 फरवरी पर विशेष आलेख)


स्वामी रामकृष्ण परमहंस का जन्मदिवस धार्मिक- आध्यात्मिक जगत में अनेक संस्थाओं द्वारा प्रति वर्ष की भांति अपने आंतरिक कार्यक्रमों के रूप में मनाया जाएगा। भव्य आश्रमों में आयोजित होने वाले ऐसे औपचारिक कार्यक्रम आयोजकों और प्रतिभागियों की गहन श्रद्धा के बावजूद स्वामी रामकृष्ण के विचारों को आश्रम की चहारदीवारी से बाहर ला पाने में असमर्थ रहते हैं। हर युग में विवेकानंद का अवतरण संभव भी तो नहीं है। यह भी हो सकता है कि ज्ञान के प्राथमिक स्रोतों से दूर हो चुकी पीढ़ी सोशल मीडिया आदि के माध्यम से परोसे जा रहे रामकृष्ण परमहंस के जीवन दर्शन के अपूर्ण, एकांगी और भ्रामक पाठ को स्वीकारने भी लगे।
रामकृष्ण परमहंस अपने जीवन काल में भारतीय समाज के लिए जितने प्रासंगिक थे उससे कहीं अधिक प्रासंगिक और आवश्यक आज हैं। धार्मिक कट्टरता की वापसी के इस दौर में उनका जीवन हमें यह बताता है कि उदारता और पारस्परिक स्वीकृति-सम्मान की बहुमूल्य विरासत को गंवा बैठने की हमारी गलती ने किस प्रकार हमारी आध्यात्मिक यात्रा को बाधित कर हमें संकीर्णताओं की हिंसक गलियों में भटका दिया है।
उन्होंने कितने ही सरल उदाहरणों के द्वारा यह बताया कि परम तत्व एक ही है। वे कहते हैं- एक ही सरोवर के अनेक घाट हैं। एक घाट पर हिन्दू अपने कलशों में पानी भरते हैं और उसे जल की संज्ञा देते हैं । दूसरे घाट पर मुसलमान अपनी मश्कों में पानी भरते हैं और उसे पानी या आब कहते हैं। तीसरे घाट पर ईसाई जल लेते हैं और उसे वाटर का नाम देते हैं। क्या हम कल्पना भी कर सकते हैं कि यह वारि जल नहीं है अपितु वाटर अथवा पानी ही है। कितनी हास्यास्पद बात है। भिन्न नामों के आवरण के नीचे एक ही वस्तु है और प्रत्येक उसे तलाश रहा है। जलवायु, स्वभाव तथा नाम ही भिन्न है अन्यथा और कोई भेद नहीं है। प्रत्येक मनुष्य को अपने मार्ग पर चलने दें। यदि उसमें हार्दिक भाव से भगवान को जानने की उत्कंठा है तो वह अवश्य ही उन्हें प्राप्त कर लेगा।
वे एक अन्य उदाहरण देते हैं -यदि हम किसी कुम्हार की दुकान में जाते हैं तो हमें विभिन्न आकार के बर्तन दिखाई देते हैं किंतु सभी का मूल तत्व मिट्टी है। इसी प्रकार ईश्वर एक है किंतु हम उसे अलग अलग काल में अलग अलग स्थानों पर भिन्न भिन्न नाम और स्वरूप से जानते और पूजते हैं। स्वर्ण से विभिन्न प्रकार के गहने बनाए जाते हैं यद्यपि सभी स्वर्ण से निर्मित हैं किंतु इनका अलग अलग नाम और स्वरूप होता है। इसी प्रकार एक ही ईश्वर विभिन्न देश और काल में विभिन्न नाम और स्वरूप में पूजा जाता है। अपनी अपनी अवधारणाओं के आधार पर लोग विभिन्न विधियों और स्वरूपों में ईश्वर की उपासना करते हैं। कुछ माता के रूप में तो कुछ पिता के रूप में, कुछ सखा मानकर तो कुछ प्रेमी या प्रेमिका समझकर उसकी पूजा करते हैं। कुछ तो परमात्मा को अपना शिशु समझकर उस पर अपना वात्सल्य लुटाते हैं। वे इसी सत्य को एक अन्य रूप में समझाते हैं- घर का मुखिया एक होता है किंतु घर के किसी सदस्य के लिए वह पिता होता है तो किसी के लिए पति। किसी के लिए वह भाई होता है तो किसी के लिए पुत्र। जिस प्रकार घर का हर सदस्य घर के मुखिया से स्वयं के संबंध के आधार पर उसे परिभाषित करता है उसी प्रकार अलग अलग श्रद्धालु उसी रूप में परमात्मा को चित्रित करते हैं जिस रूप में वे उन्हें जानते हैं।
श्री रामकृष्ण देव के अनुसार जिस प्रकार घर की छत पर पहुंचने के लिए हम सीढ़ी, बांस या रस्सी की मदद ले सकते हैं उसी प्रकार परमात्मा को प्राप्त करने के लिए विभिन्न साधनों का प्रयोग कर सकते हैं। विभिन्न धर्म एक परमात्मा को प्राप्त करने के साधन मात्र हैं। जिस प्रकार कलकत्ता के कालीघाट के काली माता के इस मंदिर तक पहुंचने के अनेक रास्ते हैं उसी प्रकार परमात्मा को प्राप्त करने के अनेक रास्ते हैं। यह रास्ते ही विभिन्न धर्मों के रूप में हमें दिखते हैं।
परमात्मा का स्मरण हमेशा आनंददायी होता है भले ही उसकी उपासना जिस भी रूप में की जाए। जिस प्रकार शक्कर से बनी मिठाई मीठी ही लगेगी चाहे हम उसे सीधा पकड़ कर खाएं या तिरछा।
प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म का पालन करे। ईसाई जन ईसा का अनुसरण करें और मुसलमान पैगम्बर मोहम्मद साहब का। हिन्दू अपने सनातन धर्म को मानें। एक सच्चा धार्मिक अन्य धर्मों को एक ही सत्य की ओर ले जाने वाले विभिन्न मार्गों के रूप में देखता है और उनका सम्मान करता है। कोई मनुष्य चाहे तो ईसाई बंधुओं के समान करुणावान, मुसलमानों के समान धार्मिक नियमों और परंपराओं का कठोरता से पालन करने वाला और हिंदुओं की भांति प्राणिमात्र के प्रति कल्याण की भावना रखने वाला बन सकता है।
सर्वधर्म समभाव की शिक्षा अनेक मनीषियों द्वारा बहुत विद्वत्तापूर्ण ढंग से दी गई है। किंतु श्री रामकृष्ण देव की विलक्षणता यह थी कि उन्होंने सर्वधर्म समभाव के आदर्श को इस धरा पर अवतरित कर हमें यह बताया कि नाना प्रकार के निरर्थक भेदों और उपभेदों में पड़कर हम धार्मिक और जातीय वैमनस्य को अकारण ही बढ़ावा दे रहे हैं जबकि निर्मल हृदय साधक के लिए प्रत्येक साधना पद्धति से परम तत्व का ज्ञान प्राप्त अत्यंत सहज और सुगम है।
दक्षिणेश्वर पधारे सूफी संत गोविंद राय से वे इस्लाम धर्म में दीक्षित हुए और बाकायदा पांच वक्त की नमाज अदा करने लगे। इस्लाम धर्म की साधना के दौरान उन्होंने मुस्लिम वेश धारण कर लिया और हिंदू मंदिरों में जाना छोड़ दिया। कहा तो यह भी जाता है कि वे गोमांस तक खाने को तत्पर हो गए थे। जैसा रामकृष्ण परमहंस के भक्त बताते हैं कि मात्र तीन दिनों की साधना के उपरांत उन्हें पैगम्बर हजरत मोहम्मद का साक्षात्कार हुआ और जिन्होंने एक ख़ुदा और एक मज़हब की शिक्षा दी। रामकृष्ण देव के इस प्रयोग ने इस बात की संभावना को रेखांकित किया कि वेदांत दर्शन इस्लाम और सनातन धर्म के मध्य समन्वय स्थापित कर सकता है।
दक्षिणेश्वर में ही दक्षिण दिशा में स्थित अपने भक्त यदु मलिक के उद्यान भवन में स्थित माता मरियम और प्रभु यीशु के चित्र को निहारते निहारते एक दिन परमहंस को समाधि लग गई। उन्होंने अनुभव किया कि माता मरियम के चित्र से दिव्य प्रकाश निकलकर उनमें प्रविष्ट हो रहा है। वे प्रभु यीशु के साथ तद्रूप हो गए और यह स्थिति तकरीबन तीन दिवस तक रही। इसी मनोदशा में उन्होंने कलकत्ता के उस गिरिजाघर को भी देखा जहां ईसाई बन्धु प्रभु यीशु की उपासना करने हेतु आते थे। कहा जाता है कि तीसरे दिन उन्हें एक गौरवर्णी देवपुरुष के अलौकिक दर्शन हुए। उन्हें अंतःप्रेरणा हुई कि यही प्रभु यीशु हैं। दोनों अलौकिक आत्माएं आलिंगनबद्ध हो गईं और प्रभु यीशु की छवि रामकृष्ण में समाहित हो गई।
यह रामकृष्ण की निश्छल श्रद्धा ही थी जिसने सन 1864 में दक्षिणेश्वर पधारे जटाधारी महात्मा के पास स्थित रामलला के अष्ट धातु के विग्रह को चपल चंचल जीवित जाग्रत रामलला में परिवर्तित कर दिया था। स्वामी रामकृष्ण देव ने सर्व धर्म समभाव को जिया था। इस अमूर्त अवधारणा को उन्होंने अपनी साधना द्वारा इस धरा पर अवतरित किया था। तब जाकर वे यह कह पाए- मैंने हिन्दू, मुसलमान और ईसाई सभी धर्मों का अनुशीलन किया है। मैंने हिन्दू धर्म के विविध संप्रदायों के अलग अलग पंथों का भी अनुसरण किया है। मैंने जाना है कि उसी एक ईश्वर की तरफ सभी के पग उठ रहे हैं। भले ही उनके पथ भिन्न भिन्न हैं। तुम्हें भी प्रत्येक विश्वास की परीक्षा और इन भिन्न भिन्न पथों की यात्रा करनी चाहिए। मैं जिस ओर भी दृष्टिपात करता हूँ उस ओर हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्म, वैष्णव और अन्य सभी सम्प्रदायवादियों को धर्म के नाम पर परस्पर संघर्ष करते देखता हूँ। परंतु वे इस बात पर कभी चिंतन नहीं करते कि जिसे हम कृष्ण के नाम से संबोधित करते हैं वही आद्य शक्ति है,वही शिव है, वही ईसा है और वही अल्लाह है, सब उसी के नाम हैं। एक ही राम के सहस्रों नाम हैं। सम्पूर्ण संसार एक ही ज्योति से प्रकाशित है। क्या वह ज्योति हिन्दू है या मुसलमान है या ईसाई है? नहीं, वह ज्योति है, परम ज्योति है। जब संसार के समस्त मानवों के भीतर एक ही दिव्य ज्योति की सत्ता है तो यह क्यों न कहा जाए कि वे परस्पर एक दूसरे के बंधु हैं और एक ही कुटुम्ब के सदस्य हैं। फिर क्या यह उचित नहीं है कि वे आपस में मिलकर रहें। उन्होंने यह भी कहा- लज्जा, घृणा, भय, जन्म, जाति, कुल और शील आदि अष्ट पाशों का समूल त्याग किए बिना ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में कभी किसी को सफलता नहीं मिल सकती।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने हर धर्म के हर कर्मकांड को गहनतम श्रद्धा के साथ संपादित किया। अलग अलग धर्मों के कर्मकांड उन्हें परस्पर विरोधी नहीं लगे। यद्यपि आत्मसाक्षात्कार के उपरांत यह कर्मकांड उनके लिए बालसुलभ कौतुकों से अधिक महत्व नहीं रखते थे किंतु उन्होंने इनका निर्वाह कर यह संदेश दिया कि अपने धर्म या पंथ के कर्मकांडों के प्रति हमारी निष्ठा तब तक परिपक्व और दृढ़ नहीं होगी जब तक हम दूसरों के धर्म या पंथ के कर्मकांडों के प्रति सम्मान और विश्वास नहीं रखेंगे।
जब हममें से अधिकांश बुद्धिजीवी सर्व धर्म समभाव को एक अप्राप्य आदर्श मानकर हताश होने लगते हैं तब रामकृष्ण परमहंस का जीवन हमें यह संदेश देता है कि सर्व धर्म समभाव निरा आदर्श नहीं है बल्कि अनुभूत यथार्थ है। सर्व धर्म समभाव परम सत्य है और धार्मिक कट्टरता तथा साम्प्रदायिकता इस परम सत्य से विमुख हो इसे विस्मृत कर देने की दुःखद परिणति हैं।
डॉ राजू पाण्डेय

2 thoughts on “सर्वधर्म समभाव निरा आदर्श नहीं अपितु अनुभूत यथार्थ

  1. “सर्व धर्मं समभाव” का नारा वही लोग लगाते हैं जो अपने बुद्धि तथा विवेक से काम लेने के बजाय अपने आप को प्रगतिवादी ,लिबरल या धर्मं निरपेक्ष बता कर सस्ती ख्याति अर्जित करना चाहते हैं . यदि आप अपने विवेक से काम लें तो इस्लाम तथा ईसाइयत के प्रत्यक्ष
    दुर्गुण आप का भ्रम दूर कर देंगे .लगता है कि विद्वान् लेखक ने न तो कुरान और हदीस का अध्ययन किया है न बाइबिल का. मैं लेखक महोदय से विनम्र निवेदन करना चाहूँगा कि वे इन दोनों धर्मों के गुणदोष पर जो विशाल साहित्य उपलब्ध है उसका गहन अध्ययन करें और फिर इस विषय पर लिखें .

  2. सचमुच सम्पूर्ण वैदिक वांग्मय सर्व धर्म समभाव के मानवतावादी चिंतन पर ही आधृत है । हमारे विद्वानों ने इसकी ऐसी ही व्याख्या भी की है ।यही कारण है कि हिन्दू स्वाभाविक रूप से मानवतावादी होता है ।पर अन्य मजहब अपने मनावतावफ को भी संकीर्ण कर लेते हैं , उन्हें अपने मजहबी भाइयों का हितसाधन ही मानवतावाद लगता है ।यहीं से साम्प्रदायिकता का जन्म होता है ।लेखक ने विद्वत्तापूर्ण ढंग से भारतीयता का पक्ष रखा है ।सचमुच सराहनीय ।

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