राजनीति जरुरी हो गई थी सीबीआई अफसरों की छुट्टी। October 29, 2018 | Leave a Comment संदीप सुमन सीबीआई निर्देशक आलोक वर्मा और संस्था के दूसरे शीर्षस्थ पदाधिकारी राकेश अस्थाना के बीच मचे घमासान के बाद सरकार ने दोनों को अवकाश पर भेज दिया है। इन दोनों का एजेंसी में कार्य करते हुए कभी मधुर संबंध नहीं रहे। दोनों के मध्य आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला पहले से चला आ रहा था। दोनों […] Read more » जरुरी हो गई थी सीबीआई अफसरों की छुट्टी। प्रशांत भूषण भ्रष्टाचारीयों मोदी सरकार
राजनीति चेतन भगत द्वारा संघ पर लिखे एक लेख के प्रत्युत्तर में October 29, 2018 | Leave a Comment आज के दैनिक भास्कर में चेतन भगत का संघ पर लिखा एक लेख आया है|मैंने यह पोस्ट उसी संदर्भ में लिखा है| एक तटस्थ चिंतक/लेखक के रूप में संघ पर उनका लिखा लेख स्वागत योग्य कहा जा सकता है|हालाँकि संघ में जाने वाले नियमित स्वयंसेवकों के बीच भी यह जुमला बहुत प्रचलित रहा है कि […] Read more » अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद चेतन भगत द्वारा संघ पर लिखे एक लेख के प्रत्युत्तर में दूरदर्शी-युगांतकारी पुरातनपंथी भारतीय जनता पार्टी भारतीय मजदूर संघ रचनात्मक कार्यक्रम रूढ़िवादी वनवासी कल्याण आश्रम विश्व हिंदू परिषद वैचारिक आधार सांप्रदायिक
राजनीति ‘बिहार’ क्यों ढो रहा है आतताई ‘बख्तियार’ को ! October 24, 2018 | Leave a Comment शिवशरण त्रिपाठी आखिर हम कब तक उन विधर्मी आक्रांताओं को ढोते रहेंगे जिन्होने न केवल हमारी अकूत धन दौलत को जमकर लूटा खसोटा वरन् हमारी महान संस्कृति को नष्ट करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। खून की नदियां बहाने वाले इन आक्रांताओं द्वारा हमारे धार्मिक स्थलों को नेस्तनाबूद करने दृष्टि से तोड़ा व ढहाया गया। […] Read more » 'बख्तियारपुर नालंदा विश्व विद्यालय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राष्ट्रवाद
समाज विकृति को बढ़ावा देनेवाले फैसले September 28, 2018 | Leave a Comment बिपिन किशोर सिंहा सुप्रीम कोर्ट देश का सर्वोच्च न्यायालय है। इसके फैसले कानून बन जाते हैं। अतः जिस फैसले से समाज का स्वस्थ तानाबाना तार-तार होता है, उसपर गंभीरता से विचार करने के बाद ही निर्णय अपेक्षित है। हाल में सुप्रीम कोर्ट के कुछ ऐसे फैसले आये हैं जिससे समाज में विकृति फैलने की पर्याप्त […] Read more » बालक/बालिका विकृति को बढ़ावा देनेवाले फैसले सुप्रीम कोर्ट स्त्री-पुरुषों
कविता दर्द भी दिया अपनों ने September 28, 2018 | Leave a Comment डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ भी दिया अपनों ने उम्मीद भी अपनों से जाएँ कहा बिना उनके अपने तो अपने होते हैं। वो दूर चले गए कितने या हम पास न रह पाए कहने को तो बहुत है पर अपने तो अपने होते हैं। गिला-शिकवा अपनों से आस लगा के छोड़ देना आख़िर भुलाएँ तो कैसे अपने तो अपने होते हैं। Read more » दर्द भी दिया अपनों ने
कविता दुआ-ए-सलामती September 27, 2018 | 3 Comments on दुआ-ए-सलामती डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ रखता हूँ हर कदम ख़ुशी का ख़याल अपनी डरता हूँ फिर ग़म लौट के न आ जाए अब भुला दी हैं रंज से वाबस्ता यादें यूँ आके ज़िंदगी में ज़हर न घोल जाएँ इक बार जो गयी तो फिर न आएगी यहाँ शौक महँगा है लबों पे हँसी रखने का अपनी आबरू का ख़याल […] Read more » कश्ती साहिल जहर हँसी
कविता हुनरमंद है वो September 26, 2018 | Leave a Comment विनोद सिल्ला वो भिगो लेता है शब्दों को स्वार्थ की चाशनी में रंग जाता है अक्सर अवसरवादिता के रंग में वो धार लेता है मौकाप्रसती के आभूषण ओढ़ लेता है आवरण आडम्बरों का नहीं होता विचलित रोज नया रंग बदलने में आगे बढ़ने के लिए रख सकता है पाँव अपने से अगले के गले पर […] Read more » रंग हुनरमंद है वो
गजल यकीं का यूँ बारबां टूटना September 25, 2018 | Leave a Comment डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ यकीं का यूँ बारबां टूटना आबो-हवा ख़राब है मरसिम निभाता रहूँगा यही मिरा जवाब है मुनाफ़िक़ों की भीड़ में कुछ नया न मिलेगा ग़ैरतमन्दों में नाम गिना जाए यही ख़्वाब है दफ़्तरों की खाक छानी बाज़ारों में लुटा पिटा रिवायतों में फँसा ज़िंदगी का यही हिसाब है हार कर जुदा, जीत कर भी कोई तड़पता रहा नुमाइशी हाथों से फूट गया झूँठ का हबाब है धड़कता है दिल सोच के हँस लेता हूँ कई बार तब्दील हो गया शहर मुर्दों में जीना अज़ाब है ये लहू, ये जख़्म, ये आह, फिर चीखो-मातम तू हुआ न मिरा पल भर इंसानियत सराब है फ़िकरों की सहूलियत में आदमियत तबाह हुई पता हुआ ‘राहत’ जहाँ का यही लुब्बे-लुबाब है Read more » यकीं का यूँ बारबां टूटना ये आह ये जख़्म ये लहू
कविता एक दिन तो मुस्कुरा ले September 24, 2018 | Leave a Comment राकेश कुमार पटेल एक दिन तो मुस्कुरा ले कब तक याद रखेगा। इस गम को, कभी तो भुला ले एक दिन तो मुस्कुरा ले। देखी है ,कभी तूने दुनिया कितनी खुबसूरत है। कभी तो अपने आखों को जगा ले एक दिन तो मुस्कुरा ले। भटकता रहता है प्यार की चाह में तेरे अंदर ही प्यार […] Read more » इस गम को एक दिन तो मुस्कुरा ले कभी तो भुला ले
समाज ‘श्री गणेश’ की आवश्यकता September 22, 2018 | Leave a Comment डॉ कविता कपूर गणेश उत्सव आयोजन के इतिहास पर यदि नजर डालें तो हम पाते हैं कि महाराष्ट्र में इसकी शुरुआत आजादी से पूर्व बाल गंगाधर तिलक ने की थी। इस उत्सव का मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता आंदोलन को गति देना तथा अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंक कर गणेश पूजा के बहाने सभी स्वतंत्रता सेनानी […] Read more » 'श्री गणेश' की आवश्यकता उत्तराखंड त्रास केरल बाढ़ जल प्रदूषण दिग्भ्रमित युवा वर्ग दी प्रदूषण बेरोजगार
गजल न रख इतना नाजुक दिल September 19, 2018 | Leave a Comment डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’ इश्क़ किया तो फिर न रख इतना नाज़ुक दिल माशूक़ से मिलना नहीं आसां ये राहे मुस्तक़िल तैयार मुसीबत को न कर सकूंगा दिल मुंतकिल क़ुर्बान इस ग़म को तिरि ख़्वाहिश मिरि मंज़िल मुक़द्दर यूँ सही महबूब तिरि उल्फ़त में बिस्मिल तसव्वुर में तिरा छूना हक़ीक़त में हुआ दाख़िल कोई हद नहीं बेसब्र दिल जो कभी था मुतहम्मिल गले जो लगे अब हिजाब कैसा हो रहा मैं ग़ाफ़िल तिरे आने से हैं अरमान जवाँ हसरतें हुई कामिल हो रहा बेहाल सँभालो मुझे मिरे हमदम फ़ाज़िल नाशाद न देखूं तुझे कभी तिरे होने से है महफ़िल कैसे जा सकोगे दूर रखता हूँ यादों को मुत्तसिल Read more » इश्क तसव्वुर न रख इतना नाज़ुक दिल
समाज राष्ट्रीय—एकता एक चिंतन September 19, 2018 | 1 Comment on राष्ट्रीय—एकता एक चिंतन शिवदेव आर्य, किसी भी राष्ट्र के लिये राष्ट्रीय एक ता का होना अत्यन्त आवश्यक है। राष्ट्रीय एकता राष्ट्र को सशक्त व संगठित बनाये रखने की अनन्य साधिका है। राष्ट्रीय एकता विभिन्नताओं में एकता स्थापित करने की व्यवस्थापिका है। प्रायः कहा जाता है कि वर्तमान में भारत की राष्ट्रीयएकता सर्वमत समभाव पर आश्रित है। […] Read more » क्षेत्रवाद जातिवाद भाषावाद राष्ट्रिय—एकता एक चिंतन साम्प्रदायिकता