समान कानून संविधान की मूल भावना

प्रमोद भार्गव

मान नागरिक संहिता पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात से नाराजगी जताई है कि आजादी के 71 साल बाद और संविधान की इच्छा के बावजूद देश में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून नहीं हैं। अदालत की टिप्पणी ने केंद्र सरकार की राह इस नजरिए से थोड़ी आसान कर दी है कि अब यदि वह इस कानून को संसद में पेश करती है तो इसका विरोध करते रहे दलों के लिए सीधा विरोध करना मुश्किल होगा। वैसे भी जनसंघ और भाजपा के एजेंडे में राम मंदिर और अनुच्छेद-370 की तरह यह मुद्दा भी अहम रहा है। 370 का हल तो नरेन्द्र मोदी सरकार ने संविधान के दायरे में निकाल लिया है और राम मंदिर पर शीर्ष न्यायालय में सुनवाई अंतिम चरण में है। समान नागरिक संहिता की दृष्टि से तीन तलाक मुद्दे पर भाजपा ने सफलता प्राप्त कर ली है। दरअसल, समान कानून एक तरह से लैंगिक समानता का भी मुद्दा है, जो संविधान की मूल भावना है। इस मुद्दे पर भी उच्च न्यायालय दिल्ली में अश्विनी उपाध्याय द्वारा लगाई गई जनहित याचिका विचाराधीन है, जिस पर जल्द फैसला आने की उम्मीद है। उम्मीद है, शीत सत्र में इस मुद्दे का भी समाधान हो जाए। दरअसल, संविधान में दर्ज नीति-निर्देशक सिद्धांत भी यही अपेक्षा रखता है कि समान नागरिक संहिता लागू हो। जिससे देश में रहने वाले हर व्यक्ति के लिए एक ही तरह का कानून वजूद में आ जाए, जो सभी धर्मों, संप्रदायों और जातियों पर लागू हो। इसमें बड़ी चुनौती बहुधर्मों के व्यक्तिगत कानून और वे जातीय मान्यताएं हैं, जो विवाह, परिवार, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे अधिकारों को दीर्घकाल से चली आ रही क्षेत्रीय, सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को कानूनी स्वरूप देती हैं। इनमें सबसे ज्यादा भेद महिलाओं से बरता जाता है। एक तरह से ये लोक प्रचलित मान्यताएं महिला को समान हक देने से खिलवाड़ करती हैं। लैंगिक भेद भी इनमें परिलक्षित रहता है। मुस्लिमों के विवाह व तलाक कानून महिलाओं की अनदेखी करते हुए पूरी तरह पुरुषों के पक्ष में है। ऐसे में इन विरोधाभासी कानूनों के तहत न्यायपालिका को सबसे ज्यादा चुनौती का सामना करना पड़ता है। अदालत में जब पारिवारिक विवाद आते हैं तो अदालत को देखना पड़ता है कि पक्षकारों का धर्म कौन-सा है। फिर उनके धार्मिक कानून के आधार पर विवाद का निराकरण करती है। इससे व्यक्ति का मानवीय पहलू तो प्रभावित होता ही है, अनुच्छेद 44 की भावना का भी अनादर होता है। ब्रिटिशकाल में सभी धार्मिक समुदायों के लिए विवाह, तलाक और संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़े अलग-अलग कानून बने थे, जो आजादी के बाद भी अस्तित्व में हैं। हालांकि अब तीन तलाक खत्म कर दिया गया है।वैसे तो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का बुनियादी मूल्य समानता है। लेकिन बहुलतावादी संस्कृति, पुरातन परंपराएं और धर्मनिरपेक्ष राज्य अंततः कानूनी असमानता को अक्षुण्ण बनाए रखने का काम करते रहे हैं। इसलिए समाज लोकतांत्रिक प्रणाली से सरकारें तो बदल देता है, लेकिन सरकारों को समान कानूनों के निर्माण में दिक्कतें आती हैं। इस जटिलता को सरकारें समझती हैं। संविधान के भाग-4 में उल्लेखित राज्य-निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत अनुच्छेद-44 में समान नागरिक संहिता लागू करने का लक्ष्य निर्धारित है। लेकिन, यह प्रावधान विरोधाभासी है, क्योंकि संविधान के ही अनुच्छेद-26 में विभिन्न धर्मावलंबियों को अपने व्यक्तिगत प्रकरणों में ऐसे मौलिक अधिकार मिले हुए हैं, जो धर्म-सम्मत कानून और लोक में प्रचलित मान्यताओं के हिसाब से मामलों के निराकरण की सुविधा धर्म संस्थाओं को देते हैं। इसलिए समान नागरिक संहिता की डगर कठिन है। इस्लाम और ईसाइयत से जुड़े लोग इस परिप्रेक्ष्य में यह आशंका भी व्यक्त करते हैं कि यदि कानूनों में समानता आती है तो इससे बहुसंख्यकों, मसलन हिंदुओं का दबदबा कायम हो जाएगा। यह परिस्थिति तब निर्मित हो सकती है, जब बहुसंख्यक समुदाय के कानूनों को एकपक्षीय नजरिया अपनाते हुए अल्पसंख्यकों पर थोप दिया जाए। जो पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था में कतई संभव नहीं है। विभिन्न पर्सनल कानून बनाए रखने के पक्ष में यह तर्क भी दिया जाता है कि समान कानून उन्हीं समाजों में चल सकता है, जहां एक धर्म के लोग रहते हों। भारत जैसे बहुधर्मी देश में यह व्यवस्था इसलिए मुश्किल है, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता के मायने हैं कि विभिन्न धर्म के अनुयायियों को उनके धर्म के अनुसार जीवन जीने की छूट हो। इसीलिए धर्मनिरपेक्ष शासन पद्धति, बहुधार्मिकता और बहुसांस्कृतिकता समाज के अंग माने गए हैं। इस विविधता के अनुसार समान अपराध प्रणाली तो हो सकती है, किंतु समान नागरिक संहिता संभव नहीं है। इस दृष्टि से देश में ‘समान दंड प्रक्रिया सांहिता’ तो बिना किसी विवाद के आजादी के बाद से लागू है, लेकिन समान नागरिकता संहिता के प्रयास अदालत के बार-बार निर्देश के बावजूद संभव नहीं हुए हैं। अब कई सामाजिक और महिला संगठन अर्से से मुस्लिम पर्सनल लॉ पर पुनर्विचार की जरूरत जता रहे हैं। इसी मांग का परिणाम तीन तलाक का समापन है। मुस्लिमों में बहुविवाह पर रोक की मांग भी उठ रही है। यह अच्छी बात है कि शीर्ष न्यायालय ने भी इस मसले पर बहस और कानून की समीक्षा की जरूरत को अहम माना है। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि खुद मुस्लिम समाज के भीतर पर्सनल लॉ को लेकर बेचैनी बढ़ी है। मुस्लिम संगठनों की प्रतिनिधि संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ये-मुशावरात ने भी अपील की थी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उलेमा मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाएं। इस्लाम के अध्येता असगर अली इंजीनियर मानते थे कि भारत में प्रचलित मुस्लिम पर्सनल लॉ दरअसल ‘ऐंग्लो मोहम्मडन लॉ’ है, जो फिरंगी हुकूमत के दौरान अंग्रेज जजों द्वारा दिए फैसलों पर आधारित है। लिहाजा इसे संविधान की कसौटी पर परखने की जरूरत है।  देश में जितने भी धर्म व जाति आधारित निजी कानून हैं, उनमें से ज्यादातर महिलाओं के साथ लैंगिक भेद बरतते हैं। मान लीजिए यदि किसी व्यक्ति की चार बेटियां हैं तो शादी से पहले चारों के समान अधिकार होते हैं। वहीं यदि एक बेटी हिन्दू, दूसरी मुस्लिम, तीसरी पारसी और चौथी ईसाई से विवाह करती है तो चारों के अधिकार भिन्न-भिन्न हो जाएंगे। तय है, यह कानूनी विषमता है और संविधान में दिए गए धर्म निरपेक्षता व समानता के सिद्धांत की अवज्ञा है। ईसाई समाज में युवक-युवती ने यदि चर्च में शादी की है, तो उनको चर्च में आपसी सहमति से संबंध-विच्छेद का अधिकार है। लेकिन यही सुविधा ‘हिन्दू विवाह अधिनियम’ में नहीं है। यदि हिन्दू युगल मंदिर में स्वयंवर रचाते हैं और कालांतर में उनमें तालमेल नहीं बैठता है तो वे मंदिर में जाकर आपसी सहमति से तलाक नहीं ले सकते। उन्हें परिवार न्यायालय में कानूनी प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही तलाक मिलता है। बहरहाल, समान नागरिक संहिता का प्रारूप तैयार करते वक्त व्यापक राय-मशविरे की जरूरत तो है ही, लोक-परंपराओं और मान्यताओं में समानताएं तलाशते हुए, उन्हें भी विधि-सम्मत एकरूपता में ढालने की जरूरत है। 

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