बलात्कर और नाबालिग उम्र

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-प्रमोद भार्गव-
gang-rape

माहिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने ‘किशोर आपराधिक न्याय‘ (देखभाल एवं बाल सरंक्षण) कानून 2000 के स्थान पर नया कानून ‘किशोर न्याय विधेयक-2014‘ लाने का संकल्प लिया है। उन्होंने इस बाबत समाचार चैनलों पर बयान भी दिए और प्रस्तावित विधेयक का प्रारूप इंटरनेट पर भी लोगों के सुझाव के लिए डाल दिया है। सब जानते हैं कि इस कानून में संशोधन बहुचर्चित 23 वर्शीय फिजियोथैरेपिस्ट छात्रा से दूराचार व हत्या की पृश्ठभूमि से जुड़ा है। इसे हम निर्भया बलात्कार कांड के नाम से भी जानते हैं। दरअसल इस सामूहिक बर्बरता में एक नाबालिग अभियुक्त भी षामिल था। इस कारण उसे इस जघन्य अपराध से जुड़े होने के बावजूद, अन्य अरोपियों की तरह न्यायालय मौत की सजा नहीं दे पाई। हमारे वर्तमान कानूनी प्रावधानों के अनुसार 18 साल तक की उम्र के किशोरों को नाबालिग माना जाता है। नतीजतन नाबालिग मुजरिम के खिलाफ अलग से मुकदमा चला और उसे कानूनी मजबूरी के चलते तीन साल के लिए सुधार-गृह में भेज दिया गया। अब केंद्र में काबिज नरेंद्र मोदी सरकार नाबालिग की उम्र 18 से घटाकर 16 करने का नया कानून ला रही है। लेकिन क्या अकेली उम्र घटा देने से बलात्कारों पर अंकुश लग जाएगा ? दरअसल बलात्कार को उकसाने के लिए समाज में जो वातावरण बन रहा है, उसे भी सुधारने की जरूरत है, वरना इस कानून में संशोधित प्रास्ताव भी वही ढाक के तीन पात रहेंगे ?
कानून बदले जाने की भूमिका स्पष्ट करते हुए मेनका गांधी ने कहा है, ‘दुष्कर्म जैसे अपराधों के किशोर आरोपियों को व्यस्क मानना चाहिए। उनसे व्यस्क दोषियों जैसा ही बर्ताव किया जाना चाहिए। मेनका का दावा है कि सभी यौन अपराधियों में से 50 फीसदी अपराधों के दोशी 16 साल या इसी उम्र के आसपास के होते हैं। अधिकतर आरोपी किशोर न्याय अधिनियम के बारे में जानते हैं। लिहाजा उसका दुरूपयोग करते हैं। इसलिए यदि हम उन्हें साजिशन हत्या और दुष्कर्म के लिए वयस्क आरोपियों की तरह सजा देने लग जाएंगे तो उनमें कानून का डर पैदा होगा‘।

निर्भया कांड के बाद कमोवेश इसी प्रकृति के दुष्कर्म से जुड़े मामलों में किशोरों का लिप्त होना पाया गया है। मुंबई की शक्ति मिल घटना तो इस कांड के तत्काल बाद घटी थी और इसमें किशोर शामिल थे। इन कांडों की पृष्ठभूमि में देशभर में जबरदस्त जनाक्रोश सामने आया। नतीजतन संप्रग सरकार ने यौन हिंसा से संबंधित कानूनों की समीक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायमूर्ति जेएस वर्मा की अध्यक्षता में एक समीति का गठन किया। समीति की सिफाारिषों पर संषोधन विधेयक भी संसद के दोनों सदनों से परित हो गया। लेकिन किशोर अपराधियों की दंड प्रक्रिया से जुड़ा कानून जस की तस रखा गया। बालिग माने जाने वाले की उम्र 18 साल ही रखी गई। इस प्रावधान को बदलने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में सामाजिक कार्यकताओं ने सात जनहित याचिकाएं भी दायर की थीं, जिनमें किशोर की उम्र 16 करने की पुरजोरी से मांग की गई थी। लेकिन न्यायालय की खंडपीठ ने यह दलील देकर कि मौजूदा किशोर अधिनियम 2000 अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक है, इसलिए इनमें बदलाव का कोई औचित्य नहीं है।
हालांकि दुनिया भर में बालिग और नाबालिगों के लिए अपराध दंड प्रक्रिया संहिता अलग अलग है। किंतु अनेक विकसित देशों में अपराध की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, किशोर न्याय कानून वजूद में लाए गए हैं। नाबालिग यदि हत्या और बलात्कर जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त पाए जाते हैं तो उनके साथ उम्र के आधार पर कोई उदारता नहीं बरती जाती है। कई देशों में नाबालिग की उम्र भी 18 साल से नीचे है। बावजूद सरकार को जल्दबाजी में बालिग की उम्र घटाने की बजाय बदलाव से जुड़े पहलुओं का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। मेनका गांधी भले ही यह दावा कर रही हैं कि ज्यदातर आरोपी किषोर न्याय आधिनियम के बारे में समझ रखते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में पहले तो मेनका गांधी को खुद आत्ममंथन करने की जरूरत है। दरअसल बाल अपराधियों से विषेश व्यावहार के पीछे सामाजिक दर्शन की लंबी परंपरा है। दुनिया के सभी सामाजिक दर्शन मानते हैं कि बालकों को अपराध की दहलीज पर पहुंचाने में एक हद तक समाज की भूमिका अंतर्निहित रहती है। आधुनिकता, शहरीकरण और उद्योग, बड़े बांध, राजमार्ग व राष्ट्रीय उद्यानों के लिए किया गया विस्थापन भी बाल अपराधियों की संख्या बढ़ा रहा है। हाल ही में कर्नाटक विधानसभा समीति कि रिपोर्ट आई है, जिसमें दुष्कर्म और छेड़खानी की बढ़ी घटनाओं के लिए मोबाइल फोन को जिम्मेदार माना गया है। इससे निजात के लिए समीति ने स्कूल व कॉलेजों में इस डिवाइस पर पांबदी लगाने की सिफारिश की है। इस समीति की अध्यक्ष महिला विधायक शंकुनतला शेट्टी है। जाहिर है, विषमता आधारित विकास और संचार तकनीक यौनिक अपरोधों को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं।

इस संदर्भ में गंभीरता से सोचने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लगभग 95 प्रतिशत बाल अपराधी गरीब और वंचित तबकों के होते हैं। हाल ही में झारखंड के बोकारो जिले के एक गांव में बलात्कार की एक दिल दहलाने वाली घटना सामने आई है। यह बलात्कार 13 साल की बालिका के साथ जाति पंचायत के आदेश पालन में किया गया। खबर है कि इस लड़की के भाई ने रात्रि में सो रही पड़ोसी महिला के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की थी। अगले दिन महिला और उसके पति ने सामुदायिक पंचायत में इस मामले को उठाया। पंचायत के विचलित कर देने वाले फैसले में हुक्म दिया गया कि वह बदसलूकी के दोषी युवक की नाबालिग बहन के साथ दुष्कर्म करके उस छेड़खानी का बदला ले। तत्काल महिला का पति उस किषोरी बाला को जंगल में घसीट कर ले गया और पंचायत के इस फरमान को अंजाम तक पहुंचा दिया। यहां गौरतलब है कि एक पूरे गांव की पंचायत को किषोर न्याय कानून के अस्तिव में होने की जानकारी नहीं है तो आम अनपढ़ ग्रामीण किशोर को कैसे हो सकती है ? दिल्ली से महज 11 किलोमीटर दूर हरियाणा के दनोदा कला की खाप पंचायत ने दुष्कर्म के लिए लड़कियों को जल्दी यौन संतुष्टि की जरूरत पड़ती हैं, इसलिए उनकी शादी की उम्र घटाकर 16 कर देने की पैरवी की थी। तय है, समाज की यह मानसिकता कड़े कानूनी उपायों से बदलने वाली नहीं है।

सरकारी आंकड़े भले ही गरीब तबकों से आने वाले बाल अपराधियों की संख्या 95 फीसदी बताते हों,लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि आर्थिक रूप से संपन्न या उच्च शिक्षित तबकों से आने वाले महज पांच फीसदी ही बाल अपराधी हैं। सच्चाई यह है कि इस वर्ग में यौन अपराध बड़ी संख्या में घटित हो रहे हैं। क्योंकि इस तबके के बच्चों के माता-पिता बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहते हैं। इन्हें पौश्टिक आहार भी खूब मिलता है। घर की आर्थिक संपन्नता और खुला महौल भी इन बच्चों को जल्दी व्यस्क बनाने का काम करता है। ये बच्चे छोटी उम्र में ही अश्लील साहित्य और फिल्में देखने लग जाते हैं, क्योंकि इनके पास उच्च गुणवत्ता के मोबाइल फोन सहज सुलभ रहते हैं। यही कारण है कि इस तबके की किशोरियों में गर्भ धारण के मामले बढ़ रहे हैं। इसी उम्र से जुड़े अविवाहित मातृत्व के मामले भी निरंतर सामने आ रहे हैं। बड़ी संख्या में ये मामले कानून के दायरे में इसलिए नहीं आ पाता, क्योंकि ज्यादातर शारीरिक संबंध रजामंदी से बनते हैं और संबंध बनााने के दौरान गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल कर लिया जाता है। लिवरपूल के जॉन मूव्स विश्वविद्यालय के अध्ययन ने तो यह रिपोर्ट दी है कि सौ साल में बच्चों के व्यस्क होने की उम्र औसतन तीन साल घटी है। मसलन संपन्न तबके किशोर-किशोरियों के बालिग होने की उम्र यानी 15 साल मानी जानी चाहिए। बहरहाल सरकार और संसद कुछ जल्दबाजी के आवेग में ऐसा निर्णय न लें, जो असमानता से जुड़े समाज की व्यापक कसौटियों पर खरा न उतरे ? लिहाजा वंचित किशोर अपराध में लिप्त पाएं जाते हैं तो भी उन्हें सुधरने का अवसर मिलना चाहिए। अभावग्रस्त बच्चों को कठोर दंड देने की मानसिकता केवल यथास्थितिवादी अथवा रूढ़िवादी सोच के व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूहों की ही हो सकती है ?

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