चुनौतियों के बीच विक्रमसिंघे सरकार

 

अरविंद जयतिलक

आम चुनाव में श्रीलंका की जनता ने रानिल विक्रमसिंघे के हाथ भविष्य की कमान सौंप दी है। उन्हें चौथी बार देश का प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त हुआ हैं। संपन्न हुए आम चुनाव में रानिल विक्रमसिंघे की नेतृत्ववाली यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) को कुल 225 में से 106 सीटें मिली है जो कि सरकार बनाने के लिए जरुरी पूर्ण बहुमत से सात कम है। लेकिन 95 सीटें हासिल करने वाली राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना की फ्रीडम पार्टी (एसएलपीएफ) के समर्थन से यूएनपी को सरकार बनाने में कठिनाई नहीं हुई। आठ महीने पहले राष्ट्रपति चुनाव में बुरी तरह परास्त हुए पूर्व राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे को संसदीय चुनाव में भी करारी शिकस्त मिली है। उन्हें उम्मीद थी कि आमचुनाव में विरोधियों को धुल चटा देंगे। लेकिन साम, दाम, दंड और भेद की नीति के बावजूद भी वे सत्ता-सिंहासन हासिल करने में विफल रहे। चुनाव के दौरान उन्होंने सिंहल बौद्ध मतदाताओं को भड़काते हुए कहा था कि अगर कहीं रानिल विक्रमसिंघे की सरकार बनी तो उन्हें तमिल लिट्टे उग्रवादियों का कहर फिर झेलना होगा। लेकिन श्रीलंका की जनता उनकी एक न सुनी और रानिल विक्रमसिंघे के हाथ सत्ता की बागडोर सौंप दी। सत्ता-संरचना पर गौर करें तो सरकार में शामिल यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) और फ्रीडम पार्टी (एसएलपीएफ) दोनों ही सैद्धांतिक रुप से दशकों से एकदूसरे के विरोधी रहे हैं। लेकिन जिस तरह दोनों दल सभी मतभेदों को भुलाकर सरकार का गठन किया है वह श्रीलंका की राजनीतिक में एक मिसाल है। माना जा रहा है कि इस युगलबंदी से श्रीलंका में तमिलों और सिंहलियों के बीच प्रगाढ़ता बढे़गी और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे तथा राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना दोनों आपसी सुझबुझ से राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं से निपटने में सफल रहेंगे। फिलहाल सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती श्रीलंकाई समाज को एकजुट रखते हुए अर्थव्यवस्था को मजबूती देना, जातीय उन्माद की आग को पसरने से रोकना और पड़़ोसी देशों से मधुर संबंध बनाना है। गौरतलब है कि श्रीलंका के तमिल पूर्व राष्ट्रपति राजपक्षे के सिंहली राष्ट्रवादी शासन के विरुद्ध रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने श्रीलंका पर युद्ध अपराध और नरसंहार के आरोप लगाए हैं और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय जांच को कहा है। देखना दिलचस्प होगा कि नई सरकार का रुख क्या रहता है। वैसे माना जा रहा है कि राष्ट्रपति सिरीसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की जोड़ी जनता के भरोसे की कसौटी पर खरा उतरेगी और तमिलों और मुसलमानों जैसे भाषायी-धार्मिक अल्पसंख्यकों के हितों को नुकसान नहीं पहुंचेगा। हालांकि यह कहना अभी कठिन है कि भारत को लेकर प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे का रुख क्या होगा। इसलिए कि गत मार्च में मछुआरों के मुद्दे पर उन्होंने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए कहा था कि श्रीलंका की जल सीमा में प्रवेश करने वाले मछुआरों को गोली मार देनी चाहिए। वस्तुतः रानिल विक्रमसिंघे की छवि एक सुझबुझ वाले नेता की है और माना जा रहा है कि उनका सत्ता में आना भारतीय हितों के अनुकूल ही होगा। काफी कुछ इस पर निर्भर करेगा कि चीन और पाकिस्तान को लेकर उनका रुख क्या रहता है। किसी से छिपा नहीं है कि भारत पर दबाव बनाने के लिए पूर्व राष्ट्रपति राजपक्षे ने चीन और पाकिस्तान से निकटता बढ़ाए थे। दूसरी ओर वे तमिलों पर अत्याचार भी जारी रखा। आज हालत यह है कि तमिल बहुल उत्तरी और पूर्वी श्रीलंका में सेना का खौफ बना हुआ है। राजपक्षे सरकार ने तमिलों के घर-बार व खेत-जमीनों को नष्ट कर सेना के हवाले कर दिया और तमिलों से कब्जाई जमीन को अमीरों के हित संवर्धन और उनके उपयोग हेतु आवंटित कर दिया। इससे तमिलों में नाराजगी है। अब मौजूदा सरकार को तमिलों को उनका हक दिलाना होगा। सुकुन की बात यह है कि राष्ट्रपति चुने जाने के तत्काल बाद ही मैत्रीपाला सिरीसेना ने भारत से बेहतर संबंधों की इच्छा जतायी और कहा कि चीन के साथ किए गए पुराने समझौतों की समीक्षा करेंगे। भारत को उम्मीद है कि प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे भी चीन से प्रगाढ़ता के साथ-साथ भारतीय हितों की संवेदनशीलता को भी समझेंगे। किसी से छिपा नहीं है कि चीन श्रीलंका के जरिए भारत को घेरने में जुटा है। वह श्रीलंका में इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भरपूर मदद दे रहा है। इसके तहत उसने नोरोच्चोलाई विद्युत संयन्त्र के लिए मदद दी है। चीन हाम्बनटोटा बंदरगाह के निर्माण में भी मदद दे रहा है।

ranil-vikramsinghe-srilankaइस बंदरगाह के निर्माण से श्रीलंका व्यस्त समुद्री मार्ग से जुड़ जाएगा। साथ ही चीन का हिंद महासागर में एक बड़ा ठिकाना हो जाएगा। इस ठिकाने से उसकी दक्षिणी चीनसागर पर निर्भरता कम हो जाएगी। इसके अलावा चीन श्रीलंका को लड़ाकू जैट विमान, परिष्कृत राडार व विमानभेदी तोपों समेत बड़ी तादाद में हथियार दे रहा है। अभी गत वर्ष ही चीन-श्रीलंका के बीच 3 करोड़ 76 लाख डाॅलर का सौदा हुआ। गौरतलब है कि राजपक्षे सरकार ने यह सौदा लिट्टे से चल रहे युद्ध को ध्यान में रखकर किया था। ऐसी भी सूचनाएं हैं कि चीन ने युद्ध के दौरान श्रीलंका को 6 लड़ाकू युद्ध विमान मुफ्त उपलब्ध कराए थे। याद होगा राजपक्षे सरकार द्वारा लिट्टे के खिलाफ संघर्ष के दौरान उठाए गए कठोर कदमों पर सुरक्षा परिषद में चर्चा रोकने के लिए चीन ने वीटो का इस्तेमाल भी किया। दरअसल इन सबके पीछे चीन की मंशा भारत को घेरने की रही है। लेकिन आज की तारीख में श्रीलंका चीन की चालबाजी को अच्छी तरह समझ गया है। चीन की ओर से श्रीलंका को दी गयी मददरुपी महंगा कर्ज अब उसकी अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ने लगा है। गौर करें तो इसके लिए पूर्णतः राजपक्षे सरकार ही दोषी है। इसलिए कि उसने भारत की ओर से चल रही योजनाओं की अनदेखी कर चीन से महंगे कर्ज लेना स्वीकार किया। बहरहाल संसदीय चुनाव ने श्रीलंका में लोकतंत्र को मजबूती दी है और तानाशाही ताकतों को एक बार फिर नकार दिया है। उम्मीद है कि नई सरकार के सत्ता में आने से परिस्थितियां बदलेगी और भारत-श्रीलंका संबंध मजबूत होंगे। भारत और श्रीलंका औपनिवेशिक दासता के लंबे समय तक शिकार रहे हैं। दोनों ही देश लगभग साथ-साथ आजाद हुए। श्रीलंका की सरकार ने भारत की गुटनिरपेक्षता नीति को स्वीकार किया। आज जरुरत इस बात की है कि दोनों देश विवादित मसले को सुलझाकर सांस्कृतिक-आर्थिक संबंधों को ऊंचाई दे। भारत और श्रीलंका के बीच विवाद का मुख्य मसला भारतीय प्रवासियों को लेकर है। श्रीलंका के अधिकांश भारतीय प्रवासी चाय और रबड़ की खेती पर काम के लिए लाए गए थे। 1948 में श्रीलंका के स्वतंत्र होने तक यह ब्रिटिश नागरिकों के रुप में समान अधिकारों और मताधिकारों का लाभ उठाते थे। लेकिन 1948 के सिलोन नागरिकता अधिनियम एवं सीलोन संसदीय अधिनियम 1949 के द्वारा इन्हें मताधिकार से वंचित कर दिया गया। अक्टुबर 1964 में भारतीय प्रधानमंत्री लालबहादूर शास्त्री और श्रीमती भण्डारनायके के बीच समझौता हुआ और श्रीलंका में प्रवासी भारतीयों की नागरिकता का मसला सुलझा। लेकिन 1982-83 में श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहली और अल्पसंख्यक तमिल जाति संघर्ष ने दोनों देशों के बीच कटुता बढ़ा दी। 1987 में भारत व श्रीलंका के बीच समझौता हुआ जिससे दोनों देशों के बीच कटुता समाप्त हुई। इसी समझौते के तहत भारत ने ‘भारतीय शांति रक्षक बल’ श्रीलंका भेजकर वहां शांति स्थापित करायी। बेहतर होगा कि रानिल विक्रमसिंघे की सरकार श्रीलंकाई तमिलों की पीड़ा को समझे और युद्ध की चपेट में रह रहे इलाकों के तमिलों के पुनर्वास की प्रक्रिया में तेजी लाए। इसके अलावा भारत की घेराबंदी में जुटे चीन की नीयत को भी समझे। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता किसी भी लिहाज से भारत व श्रीलंका के हित में नहीं है।

 

 

 

 

Leave a Reply

%d bloggers like this: