लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन

प्रवेश:
प्रश्न उठाया जाता है, कि, हिन्दी की श्रेष्ठता और उपयोगिता प्रमाणित होने पर भी भारत की जनता और संचार माध्यम  हिन्दी  क्यों अपनाते नहीं ? कुछ मित्रों को लगता है; कानून बनानेसे हिन्दी प्रस्थापित हो जाएगी.
आज, ऐसे  कुछ पहलुओं के उत्तर खोजने का प्रयास करते हैं. विषय प्रश्नोत्तर मालिका द्वारा प्रस्तुत किया जाता है. प्रश्नोत्तरी की विधा में प्रस्तुति के चलते कुछ पुनरावृत्ति होगी;  पर, फिर भी अनुक्रम तर्कसंगत रखने का प्रयास किया है.

प्रश्न:(१) शब्द (या भाषा प्रयोग) रूढ कैसे होता है?
उत्तर:(१)
जैसे बालक घर में बोली जाने वाली भाषा का प्रयोग  -*बडों का अनुकरण*- कर  सीखता है. उसी प्रकार, जनता भी   -*समाज के बडों का अनुकरण*- कर  भाषा प्रयोग करती है. वास्तव में ऐसे *बडे  अनुकरणीय जन*, प्रतिष्ठाप्राप्त प्रभावी व्यक्तित्व होते हैं. उनकी प्रतिष्ठा के कारण ही समाज अनुकरण के लिए, प्रेरित होता है.

प्रश्न:(२) तो ऐसी रूढि प्रस्थापित करना *समाज के बडों* का दायित्व है; आज की स्थिति  में  *समाज के बडे* कौन माने जाएंगे?
उत्तर:(२)
आज प्रतिष्ठाप्राप्त  और अनुकरणीय वर्ग है:
==>  शिक्षक, प्राध्यापक, आदरप्राप्त प्रतिष्ठित व्यक्ति, विभिन्न पक्षों के नेता, प्रतिष्ठा प्राप्त समाचार पत्र, मासिक, साप्ताहिक संचार माध्यम  और चित्रपट उद्योग के अभिनेता इत्यादि.

ये लोग, यदि शुद्ध शब्द प्रयोजेंगे तो पाठक भी उन्हीं शब्दों का प्रयोग करने प्रेरित होंगे. यह दीर्घ प्रक्रिया है. प्रक्रिया के अंत में बोल चाल की भाषा में शब्द रूढ होने तक कुछ बरस  निकल  जाएंगे. पर ऐसी प्रक्रिया को उचित  शासकीय प्रबंधन से शीघ्रता प्रदान की जा सकती है.

विशेष:  जब सामान्य जन श्रेष्ठ जनों का ही अनुकरण करते हैं. ऐसा स्पष्ट संदेश भगवान कृष्ण के शब्दों से  भी व्यक्त होता है.

प्रश्न(३) भगवान कृष्ण के शब्दों का उद्धरण देने की कृपा करेंगे?

उत्तर:(३)
भगवान कृष्ण गीता के ३रे अध्याय के २१ वे  श्लोक में कहते हैं:
—————————— —————–
*यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्‌  प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ २१॥*
—————————— —————–
कि,’श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, सामान्य  जन भी वैसा आचरण (अपनाते) करते हैं.  आगे कहते हैं, श्रेष्ठ जन अपने आचरण से  जो प्रमाणित कर देता है उसीके अनुसार समाज भी बरतने लगता है.
अर्थात, ऐसा  आचरण कर, प्रमाणित करना श्रेष्ठ जनों का ही काम है.

(४) ऐसे शब्द प्रयोग के, कुछ उदाहरण दे सकते हैं?

उत्तर(४):
बॉम्बे के बदले *मुम्बई*,  सिलोन के बदले *श्री लंका*, टेलिविजन के बदले *दूर दर्शन*  न्यूज के बदले  *समाचार*  और उसी प्रकार लोक सभा, संसद, विधान सभा, राज्यसभा, प्रधान मन्त्री, राष्ट्रपति, वित्त मन्त्री, ऐसे  कई प्रयोग, जिनकी कुल संख्या १०० से ऊपर है; दिखाए जा सकते हैं. एक पूरा अलग आलेख बन सकता है.

एक विशेष उदाहरण लीजिए.

प्रतिष्ठा प्राप्त अभिनेता  श्री.  अमिताभ बच्चन अपने करोडपति कार्यक्रम में  शुद्ध हिन्दी का प्रयोग  बडी सहजता से करते हैं.
ऐसे कार्यक्रमों का भी शुद्ध हिन्दी को प्रोत्साहित करने में कम योगदान नहीं है. उसी प्रकार विभिन्न  प्रतिष्ठित हिन्दी संस्थाएँ अपने सम्मेलनों में  विशेष बल देकर  शुद्ध भाषा के प्रयोगसे भाषा शुद्धि  में अपना योगदान दे सकती है.

प्रश्न;(५)भाषा की गुणवत्ता बढाएँ  ऐसी भाषा लक्ष्यी पुस्तकें भी होनी चाहिए.

उत्तर:(५)
अवश्य; प्रत्येक क्षेत्र विशेष की छोटी छोटी पुस्तिकाएँ छापकर वितरित की जानी चाहिए.
उदाहरणार्थ (१) शासन के शब्द (२) न्यायालय के शब्द (३) नागरिक-सभ्यता के शब्द, (४) परिवहन के शब्द, (५) अर्थ शास्त्र के शब्द, ऐसे कम से कम ७५ विषय होंगे जिन के शब्दों की पुस्तिकाएँ छापकर विनामूल्य वितरित की जाएँ.

प्रश्न:(६) और क्या किया जा सकता है?

उत्तर(६):
हिन्दी का शब्दकोश भी हर देशवासी को लागत मूल्य पर वितरित किया जाए.
प्रत्येक  शिक्षित भारतीय परिवार में ऐसा कोष होना (ही) चाहिए.

अंग्रेज़ी का शब्दार्थ कोष जिन्हें खरीदना हो वे  स्वयं मूल्य देकर खरीद सकते हैं.  पर हिन्दी के प्रादेशिक अर्थोवाले, शब्दकोष शासन द्वारा लागत मूल्य पर वितरित किए जाने चाहिए.  लिपि का ही अंतर होगा. बहुत सारे शब्द संस्कृतजन्य होनेके कारण बहुतेरी भाषाओं में शब्द समान ही होते हैं.

प्रश्न:(७) और मासिक, साप्ताहिक, त्रैमासिक इत्यादि  सामयिक किस प्रकार शुद्ध भाषा को प्रोत्साहित करें?

उत्तर(७)
सामयिकों में  शुद्ध शब्दावलियों  के लिए, एक-दो पृष्ठ समर्पित  करें. प्रत्येक अंक में  २५-३० अंग्रेज़ी शब्दों के हिन्दी प्रतिशब्द देकर,  अर्थ समझाया जाए. संस्कृत  शब्द अर्थवाचक तो होता ही है, और उसे समझना बडा आसान होता है.

प्रश्न: (८) कानून बनाकर  क्या किया जा सकता है?

उत्तर:(८)
कानून बनाकर हमारे शब्दों को प्रोत्साहित किया जा सकता है; पर शब्द रूढ नहीं किया जा सकता. उसे रूढ करने के लिए समाज के अग्रणी सुशिक्षित और विद्वत जन  नेता अध्यापक शिक्षक  सामज के श्रेष्ठ जन जितना योगदान दे पाएंगे, उतना योगदान कानून से नहीं दिया जा सकता. कानून केवल प्रोत्साहित कर सकता है.

 

प्रश्न:(९)
क्या संस्कृत ऐसे शब्द देने में समर्थ हैं, कुछ विस्तार से समझाइए.

उत्तर:(९)
संस्कृत में  अतुलनीय शब्द रचना सामर्थ्य है. साथ  संस्कृत  शब्द अर्थ सहित अवतरित होता है; संस्कृत आपको जिस अर्थ का शब्द चाहिए उस अर्थका  शब्द देने की सामर्थ्य रखती है. पर अर्थ आप को देना होगा.
बिना अर्थ का संस्कृत शब्द  नहीं दिया जा सकता. इस पहलुपर पहले भी कुछ आलेख डाल चुका हूँ.

बंधुओं,  सारे संसार में ऐसी  कोई अन्य भाषा नहीं है. आज मैं कुछ अध्ययन के बल पर यह बात कह रहा रहा हूँ.

आप प्रश्न पूछिए, मैं उत्तर देने का प्रयास करूँगा

11 Responses to “भाषा रूढ कैसे की जाए?”

  1. दीनबन्‍धु चंदेरा

    आतिसुन्दर,
    धन्यवाद,
    दीनबन्‍धु चंदेरा

    Reply
  2. Mohan Gupta

    स्वतन्त्रता के ७० वर्ष पस्चात एक भारतीया भाषा को वह दर्जा नहीं मिला जो अंग्रेजी को मिला है। यह दर्शाता हैं के भारत अभी भी एक गुलाम / दास देश हैं. श्री मधुसूदन जी हिंदी के सम्बंद में समय, समय पर कई लेख लिख चुके हैं। इस लेख में मधुसूदन जी ने हिंदी प्रचार प्रसार के लिए कई सुझाब दिये हैं. यदि इन सुझाबो को स्वीकार किया जाए तो निश्चित से भारत में हिंदी की स्थिति सुधेरगी और हिंदी को अच्छा दर्जा मिल सकता हैं।

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  3. इंसान

    डॉ. मधुसूदन जी, सदैव की भांति आपका यह आलेख भी भारतीयों में चेतना जगाने का उत्कृष्ट प्रयास है| मेरा दृढ़ विश्वास है कि स्वच्छ भारत के साथ साथ हिंदी भाषा का प्रचलन व आधुनिक संसाधनों के बीच भारतीय रहन सहन मात्र अपना लेने से सामाजिक व आर्थिक प्रगति की नींव डाली जा सकती है| हिंदी भाषा को लोकप्रिय बनाने के अन्य उपायों में एक उपाय यह भी है कि हिंदी भाषी प्रांतों में खुदरा व्यापार व धार्मिक स्थलों पर हिंदी भाषा के प्रयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए| ऐसा कुछ राष्ट्रीय हित कार्यों में लगी संस्थाएं कर सकती है और उसी पल अन्य सामाजिक संस्थाएं खुदरा व्यापार में स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार दिलाने में सहायक हो सकती हैं| कार्य-स्थल से घर तक हिंदी बोलते भारतीय समाज का एक बड़ा पक्ष देखते देखते अन्य भारतीयों को प्रभावित कर सकता है| मेरे पंजाब के छोटे छोटे शहरों में भारी संख्या में बिहार प्रांत के श्रमिक आ जाने से स्थानीय लोग स्वतः हिंदी बोलने लग गए हैं| जब कभी मैं अपने साला साहिब से पंजाबी में बात करता हूँ तो वर्षों से बिहारी श्रमिकों के संग मिल काम करते वे स्वभाव-वश मुझे हिंदी में उत्तर देते हैं!

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    • डॉ. मधुसूदन

      Dr. Madhusudan

      आ. इन्सान जी धन्यवाद समय निकालकर आलेख पढकर अपनी टिप्पणी देने के लिए.
      (१) अध्ययन और वैचारिक मनोऽमन्थन के उपरान्त ही, कुछ लिखने का प्रयास करता हूँ. आपके सुझाव बिलकुल सही हैं. (२) पढा है, कि, कुम्भ मेलो में समस्त भारत से पधारे हुए, सभी साधु सन्यासी इत्यादि बहुशः हिन्दी का ही प्रयोग करते हैं.
      (३) गुजरात में एक कहावत भी है, कि “साधु बन्या है; तो हिन्दी बोल्या विना सुटक्या है?” अर्थात “साधु बने हो तो हिन्दी बोले बिना छूट कैसे सकते हो?” (४) मुरारी बापु भी उनकी (अन्य त्रुटियों को उपेक्षित करता हूँ ) अवधी की तुलसी रामायण का ही प्रचार करते हैं.(५) मराठी शालाओ में जहाँ हिन्दी शब्द ना मिले वहाँ संस्कृत शब्द प्रयोग करने का परामर्श मेरे हिन्दी शिक्षक भी दिया करते थे. मुझे अचरज होता था; कि संस्कृत वाली हिन्दी लिखने पर गुणांक (नम्बर)भी ऊंचे मिल जाते थे. (६) अब तमिलनाडु में बहुसंख्य युवा हिन्दी पढना चाहते हैं. यह भौमिक वास्तविकता है. –फिर से आप की टिप्पनि के लिए और जानकारी के लिए धन्यवाद.

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  4. डॉ. राजेश कपूर

    Rajesh Kapoor

    सुविचारित, सारगर्भित, सार्थक, सशक्त, सुलेख हेतु साधुवाद।

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    • इंसान

      कार्य-स्थल पर हिंदी भाषा का प्रयोग भाषा के रूढ़ हो पाने हेतु बहुत महत्वपूर्ण कदम है| तनिक राजनैतिक ढंग से सोचें तो देखते हैं क़ि तथाकथित स्वतंत्रता उपरान्त तब के राजनीतिज्ञों ने विदेशी अंग्रेजी भाषा को अपनाने में कोई संकोच नहीं किया लेकिन भारतीय मूल की हिंदी भाषा के “थोपे जाने“ को एक घिनौनी गाली बना हिंदी को राष्ट्रभाषा इस लिए नहीं बनने दिया क्योंकि भाषा में पिरो कर संगठित हुए सभी भारतीय कांग्रेस-राज के लिए चिनौती बन उठेंगे! भारतीयों को न केवल जाति धर्म अथवा विभिन्न राजनीतिक दलों में बांटा हुआ है उन्हें भाषा के चक्रव्यूह में धकेल उनके सामान्य जीवन में भी उथलपुथल मचाए उन्हें अपना अच्छा-बुरा सोचने को असमर्थ किया हुआ है|

      उदाहरणार्थ, बैंकों में बही-खाता अथवा सामान्य कार्य अंग्रेजी में होता है जबकि कार्यकर्ता स्थानीय भाषा बोलते काम करते हैं! स्वयं मेरा अनुभव है कि अंग्रेजी में हाथ तंग होने के कारण आज सूचना-उद्द्योगिकी के युग में कार्यकर्ता अंग्रज़ी में पत्राचार नहीं कर पाते लेकिन ग्राहक द्वारा बैंक में स्वयं उपस्थित होने पर स्थानीय भाषा बोलते अंग्रेजी बही-खाते में आँख झपकते काम कर देते हैं! एक भाषा होते पाश्चात्य बैंको में कार्यकर्ता निर्विघ्न काम में लगे रहते हैं तो अपने यहां बैंकों में ग्राहकों का मेला ही लगा रहता है|

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    • डॉ. मधुसूदन

      Dr. Madhusudan

      आ. डॉ. कपूर साहेब.
      बडे अंतराल के उपरान्त आप की टिप्पणी आयी है. ऐसे कृपा करते रहिए. आप का प्रोत्साहन मेरा पारितोषिक है. स्वस्थ रहिए लिखते रहिए.
      धन्यवाद.

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  5. Rekha Singh

    लेख में सुझाई गई बाते उपयुक्त है | लेखक हिंदी मे लिखकर बता रहे है | अमिताभ बच्चन जी का करोड़पति शो एक पारिवारिक और ज्ञान वर्धक शो बन गया है | परिवार के बूढ़े से बच्चे तक इस शो को देखकर आनंद लेते है | अमिताभ बच्चन जी की यही तो खासियत है | सबसे पहले हमे हिंगलिश लिखना बंद करना पड़ेगा | हिंगलिश का मतलब हम हिंदी के शब्दों को इंग्लिश के अल्फाबेट से लिखते है | हम या तो पूरा हिंदी लिखे या इंग्लिश लेकिन हिंगलिश न लिखे | सबसे पहले हम अपनी हिंदी यहाँ से शुरू करे | इस पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए बहुत सारे स्मार्ट फ़ोन यह सुविधा नहीं देते यह भी एक कारण हो सकता है | मै तो IPHONE रखती हूँ और उसकी सबसे बड़ी विषेशता यह है की बहुत पहले से ही उसमे विश्व की अनेक भाषाए हिंदी संस्कृत अवधी गुजराती बँगला आदि आदि भी है | मै अपने बच्चों को हिंदी में भी सन्देश (मैसेज) करती हूँ | अपने मित्रों और फेस बुक पर भी हिंदी में भी लिखती हूँ |

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    • डॉ. मधुसूदन

      Dr. Madhusudan

      बहन रेखा जी, धन्यवाद.
      आप जैसी सोच प्रत्येक परिवार रखे तो अमरिका में हिन्दी के साथ साथ हमारे संस्कार भी टिक जाएँ. संस्कृति भी टिके, और अगली पीढी सुखी होने की संभावना काफी बढ जाए.
      फिरसे हृदयतल से धन्यवाद.

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  6. ARISH SAHANI

    FUTURE OF HINDU WILL DEPEND ONLY IF HINDUS HAVE A HINDU NATION . ALL HINDU TRADITION AND BHASHA WILL NOT EXIST IF HINDUS HAVE NO HINDU NATION .

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    • डॉ. मधुसूदन

      Dr. Madhusudan

      आ. सहानी जी—नमस्कार.
      भाषा, एक धर्म और संस्कृति की धुरी (धुरा) जैसी या Axis जैसी होती है. और इस लिए, भाषा को त्यजकर हिन्दू संस्कृति टिकाना, असंभव नहीं पर कठिन अवश्य है.
      उदाहरणार्थ, त्रिनिदाद, गयाना, और सुरीनाम में ऐसा अनुभव इस लेखक को हुआ है.
      भारत के विषय में आप जो कहते हैं, सच ही है. सारे घटक एक दूजे के पूरक हैं. सभी को विकसित भी होना होगा. और टिकना भी होगा. हिन्दू संस्कृति हिन्दू राष्ट्र और हिन्दी (संस्कृत भी) एक दूजे को सक्षम बनाती हैं. (और भी काफी घटक है )
      आलेख का विषय है, यह मात्र टिप्पणी में समाना सम्भव नहीं. इसी प्रवक्ता में डाला हुआ, संस्कृति है चक्रीय हिण्डोला और भाषा है, उसकी धुरी पढने का अनुरोध करता हूँ. टिपाणी के लिए धन्यवाद.

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