सांसद भागीरथ प्रसाद का हवाई यात्रा के दौरान उखड़ना ?  

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

जनप्रतिनिधि से देश की जनता क्‍या आशा करती है? यही की उसके आचरण में सबसे अधिक शालीनता होनी चाहिए, उसके विचार एवं भाव इतने उत्‍कृष्‍ट और उच्‍चश्रेणी के हों कि वे अपने सहयोगियों एवं उन सभी को विश्‍वास से भर सकें जो उनके नेतृत्‍व में अपना विश्‍वास व्‍यक्‍त करते हैं। किंतु जब कोई सामान्‍य जनप्रति नहीं देश की संसद का प्रतिनिधित्‍व करनेवाला सांसद संवाद करते में उखड़ जाए तो निश्‍चि‍त ही इस विषय पर बोलना बनता है। कांग्रेस से भाजपा में आए मध्‍यप्रदेश के भिण्‍ड संसदीय क्षेत्र के सांसद भागीरथ प्रसाद ने जिस तरह से राजाभोज एयरपोर्ट पर दिल्ली जाने वाली एयर इंडिया की फ्लाइट में अपने पुराने साथी और मध्‍यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को देखकर उत्‍तेजनापूर्ण व्‍यवहार किया, वह अवश्‍य ही सोचने पर विवश करता है कि क्‍या आम जनता को अपने जनप्रतिनिधि से ऐसी उम्‍मीद रखनी चाहिए?

माना कि एयर इंडिया ने भूलवश भागीरथ प्रसाद को श्री सिंह के नजदीक की सीट आवंटित कर दी हो, लेकिन क्‍या सांसद महोदय का इतनेभर के कारण वहां बैठने से साफ इनकार करते हुए एकदम से उखड़ जाना उचित माना जाए? वे एयर इंडिया स्टाफ पर नाराज हो गए।  उनके इस हंगामे की वजह से एयर इंडिया की दिल्ली फ्लाइट करीब 15 मिनट लेट हो गई। यह ठीक है कि बाद में एयर इंडिया प्रबंधन ने उनके लिए बिजनेस क्लास में सीट का इंतजाम कर दिया और एयर इंडिया प्रबंधन ने अपने रीजनल मैनेजर विश्रुत आचार्य के माध्‍यम से यहां तक कहा कि गलती से भागीरथ प्रसाद की सीट इकोनॉमी क्लास में आवंटित कर दी गई थी। किसी तरह का कोई विवाद नहीं हुआ। पर जो लोग उस समुचे सफर के साक्षी हैं, वह तो सच बता ही रहे हैं। वास्‍तव में जो आचरण हुआ उससे यह तो साफ हो ही गया कि श्रेष्‍ठ लोगों से श्रेष्‍ठतम उत्‍तम आचरण की अपेक्षा की जाती है।

एक राजनीतिक पार्टी के स्‍तर पर भारतीय जनता पार्टी अपने को श्रेष्‍ठ आचरण युक्‍त राजनीतिक पार्टी कहती एवं मानती आई है। इसलिए भी इस पार्टी के संसद भवन तक पहुँचे सांसद महोदय से इतनी तो अपेक्षा देश में की ही जाएगी कि वे अपने आचरण से शुद्ध हों अर्थात् उनके कार्य व्‍यवहार दूसरों को प्रेम और आनंद दें न कि क्रोध और विद्वेष की धारणा। इसके अलावा सांसद भागीरथ प्रसाद जैसे श्रेष्‍ठ जन जो दायित्‍वों का वहन कर रहे महानुभाव हैं उन्‍हें इस पर भी ध्‍यान देना चाहिए कि हमारी भारतीय परंपरा एवं वांग्‍मय श्रेष्‍ठ‍ियों के विषय में अपना क्‍या मत रखता है।

भारत की प्राचीन परंपरा एवं साहित्‍य में उच्‍च पदों पर बैठे आम जन का मर्गदर्शन करनेवालों के लिए कई स्‍तर पर बहुत कुछ विवेक सम्‍मत दिशा निर्देश दिए गए हैं। इस संदर्भ में श्रीमद्भगवत गीता के अध्‍याय तीन में इक्‍कीस वें श्‍लोक में कहा गया है कि यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।3.21।। इसे शंकराचार्य इस तरह से व्‍याख्‍यायित करते हैं, यद्यत् कर्म आचरति करोति श्रेष्ठः प्रधानः तत्तदेव कर्म आचरति इतरः अन्यः जनः तदनुगतः। किञ्च सः श्रेष्ठः यत् प्रमाणं कुरुते लौकिकं वैदिकं वा लोकः तत् अनुवर्तते तदेव प्रमाणीकरोति इत्यर्थः।। यदि अत्र ते लोकसंग्रहकर्तव्यतायां विप्रतिपत्तिः तर्हि मां किं न पश्यसि। लोकसंग्रह किसको करना चाहिये और किसलिये करना चाहिये सो कहते हैं श्रेष्ठ पुरुष जोजो कर्म करता है अर्थात् प्रधान मनुष्य जिसजिस कर्म में बर्तता है दूसरे लोग उसके अनुयायी होकर उसउस कर्मका ही आचरण किया करते हैं। तथा वह श्रेष्ठ पुरुष जिसजिस लौकिक या वैदिक प्रथाको प्रामाणिक मानता है लोग उसीके अनुसार चलते हैं अर्थात् उसीको प्रमाण मानते हैं। इसे स्‍वामी रामसुखदास के अर्थ से देखें तो यहां कहा गया है, श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं। अभिनव गुप्‍त की भी इस श्‍लोक पर अपनी व्‍याख्‍या है, यद्यदाचरतीति। न मे इति। प्राप्तप्रापणीयस्य परिपूर्णमनसोऽपि कर्मप्रवृत्तौ लोकानुग्रहः प्रयोजनमित्यत्र श्रीभगवान् आत्मानमेव दृष्टान्तीकरोति।

इसी प्रकार स्‍वामी विवेकानन्‍द भर्तहरि के नीति शतक के एक श्‍लोक के आधार पर लोक सेवकों के लिए कहते हैं कि लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग में, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो। वस्‍तुत: इस तरह से देखें तो भारत का प्राचीन साहित्‍य एवं वांग्‍मय स्‍थान-स्‍थान पर लोकसेवकों का मार्ग प्रशस्‍त करता एवं उन्‍हें सकारात्‍मक दिशा देता मिलता है। यह सर्वविदित है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां लोक यानि कि‍ जन समुदाय अपने बीच से श्रेष्‍ठ आचरण युक्‍त नेता का चुनाव अपने नेतृत्‍व के लिए करता है। संसद इस लोक की सर्वोच्‍च संस्‍था है, उसके साथ ही न्‍यायपालिका, कार्यपालिका एवं आज के वक्‍त में खबर पालिका है। वस्‍तुत: इन सभी के कंधों पर गुरूत्‍तर भार समाज और अपने राष्‍ट्र को सही दिशा देना है। साथ में इस बात की भी चिंता करना है कि किसी के साथ अन्‍याय न हो सके और यदि कहीं कुछ गलत है भी तो उसकी समाप्‍ति की जा सके।

हो सकता है कि भागीरथ प्रसादजी ने इस हवाई यात्रा में इतना बवाल न मचाया हो जितना कि मीडिया ने या एयर इंडिया के कर्मचारियों ने उसे तूल दिया हो, जैसा कि पूर्व में शिवसेना से संसद तक पहुंचे रविंद्र गायकवाड़ पर इसी साल में मार्च माह में एयर इंडिया के कर्मचारी पर हमला करने का आरोप लगा था और उसके बाद एयर इंडिया और फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस (एफआईए) ने उनकी हवाई यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया था । जिसमें कि लोकसेवकों की काफी किरकिरी हुई थी। यह बात अलग है कि उस केस में भी बहुत तथ्‍य रखने और बार-बार यह बताने के बाद कि जिस एअर इंडिया के कर्मचारी से सांसद का झगड़ा हुआ, उस पर पहले से ही झगड़ा करने के ऐसे 8 केस दर्ज हैं। इसके बाद जब देशभर से सांसद के समुचे प्रकरण में माफी मांगने की बात उठी तो उन्‍होंने मामले की शांति के लिए सदन में माफी मांगी थी। उस बार की तरह यह मामला भी एयरइंडिया से ही जुड़ा है।

iआज देश के हर सांसद को हवाई यात्रा का 25 प्रतिशत ही देना पड़ता है। इस छूट के साथ एक सांसद सालभर में 34 हवाई यात्राएं कर सकता है। यह सुविधा सांसद के पति और पत्नी दोनों के लिए है। इतना ही नहीं तो इनकी ओर से इनके पति या पत्‍नी या कोई भी रिश्‍तेदार अकेले साल में आठ बार हवाई सफर कर सकते हैं। वो भी बिल्‍कुल मुफ्त। इस तरह से हवाई यात्रा की तरह ही रेल तथा अन्‍य यात्राओं के साथ तमाम सुविधाएं सभी सांसदों को मिली हुई हैं। यह समस्‍त सुविधाएं निश्‍चित तौर पर एक व्‍यक्‍ति को नहीं मिली हैं, यह सभी कुछ उसके लिए हैं जो लोकसेवक है। अत: अपेक्षाएं भी उसी लोकसेवक से अपार हैं, उसके आचरण, कर्तव्‍य निष्‍ठा वगैरह-वगैरह को लेकर, अच्‍छा हो यह बात देश के प्रत्‍येक लोकसेवक को हमेशा ध्‍यान रहे ।

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