ब्रह्मा आचार्य रणजीत शास्त्री का सम्बोधन”

मनमोहन कुमार आर्य

वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून के यशस्वी मंत्री श्री प्रेम प्रकाश शर्मा जी द्वारा अपने निवास दून विहार, राजपुर रोड, देहरादून के समीप सनातन धर्म के राधाकृष्ण मन्दिर में आठ दिवसीय  यजुर्वेद पारायण यज्ञ एवं रामकथा का आयोजन किया गया है। यह आयोजन 4 अगस्त, 2018 को आरम्भ हुआ था जिसका समापन कल दिनांक 12 अगस्त, 2018 को प्रातः 8.00 बजे यज्ञ आरम्भ करके लगभग 12.30 बजे सामूहिक प्रीतिभोज के साथ होगा। आज आयोजन के सातवें दिन सायं 4.00 बजे से यजुर्वेद पारायण यज्ञ आचार्य रणजीत शास्त्री जी के ब्रह्मत्व में हुआ। यज्ञ में मन्त्रोच्चार द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल, देहरादून की चार कन्याओं कुमारी श्रद्धांजलि, कुमारी पुष्पांजलि, कुमारी प्रतिभा और कुमारी दीपाली ने किया। रामकथा का वाचन आर्यजगत के प्रसिद्ध भजनोपदेशक विद्वान पंडित सत्यपाल सरल जी द्वारा किया जा रहा है। वह गद्य में कथा करने के साथ पद्य में रामचरित मानस और अन्य कवियों के वचनों को गाकर भी प्रस्तुत करते हैं। ढोलक पर श्री मोहन लाल उन्हें संगति दे रहे हैं। श्री मोहन लाल भी निष्ठावान ऋषिभक्त है। वह जब भजन को दीर्घ स्वर से गाते हैं तो उनकी ऋषिभक्ति प्रत्यक्ष झलकती है।

 

यज्ञ के ब्रह्मा आचार्य रणजीत शास्त्री जी ने सत्व, रज व तम गुणों की चर्चा की और इसके मनुष्यों के स्वभाव से सम्बन्ध पर विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य सद् ग्रन्थों का स्वाध्याय, ईश्वरोपासना व यज्ञ आदि करते है अथवा ऐसे आयोजनों में भाग लेते हैं, तब वह सत्व गुण प्रधान होते हैं। इसी प्रकार से उन्होंने रज व तम गुणों वाले मनुष्यों के आचरण व व्यवहार पर भी प्रकाश डाला। आचार्य जी ने मनुष्य जीवन में आने वाली आपत्तियों का उल्लेख कर कहा कि इन विषम परिस्थितियों में विद्या, ज्ञान, शिक्षा, विनम्रता, बुद्धि, ईश्वर विश्वास आदि गुण काम आते हैं। संकट की घड़ी में संकल्प लेने व संकल्प पर अडिग रहने से ईश्वर में विश्वास बढ़ता है। उन्होंने कहा कि जीवन का कल्याण यज्ञ से होगा। आचार्य जी ने कहा कि यज्ञ की अग्नि में वेद मन्त्रों से घृत और साकल्य की आहुति डालने से कल्याण होगा। उन्होंने कहा जिस परिवार में नियमित यज्ञ होता है वह परिवार सुखी व सम्पन्न होने के साथ समस्याओं से मुक्त होता है। श्री रणजीत शास्त्री ने कहा कि विद्वानों की संगति और यज्ञ में जाने से हमारी सोच सकारात्मक होती है।

 

आर्यसमाज के विद्वान आचार्य रणजीत शास्त्री ने राजा रणजीत सिंह के जीवन की एक घटना सुनाई और कहा कि एक बार राजा कहीं जा रहे थे। एक बुढ़िया मां अपने भूखे बेटे के लिए आम तोड़ रही थी। उसने जो पत्थर आम पर मारा, वह राजा रणजीत सिंह जी को जा लगा। राजा के कर्मचारियों द्वारा उस बुढ़िया को पकड़ लिया गया। घटना की पूरी पृष्ठ भूमि सुनकर राजा ने उस बुढ़िया मां को धन आदि देकर रिहा कर दिया और कहा कि जब सुषुप्ति अवस्था में रहने वाला एक वृक्ष उसको पत्थर मारने वालों को फल देता है और उनका विरोध नहीं करता तो हम तो जीते जागते मनुष्य हैं। हम इस माता को दण्ड क्यों दें? आचार्य रणजीत शास्त्री जी ने राजा के इस निर्णय की प्रशंसा की। आचार्य जी ने ऋषि याज्ञवल्क्य और राजा जनक के जीवन की यज्ञ विषयक एक घटना भी सुनाई। उन्होंने कहा कि राजा जनक ने ऋषि को बताया था कि यदि मनुष्य के पास यज्ञ करने के लिए घृत, सामग्री आदि कुछ भी हो तो वह श्रद्धा की अग्नि में सत्य की आहुति देकर यज्ञ कर सकता है। आचार्य जी ने श्रोताओं को अपने जीवन को समिधा बनकर अग्नि के गुणों को धारण करने को कहा। आचार्य जी ने कहा कि मनु महाराज ने भी कहा कि जिस मनुष्य में उदारता, दया, सहानुभूति और यज्ञ के प्रति श्रद्धा आदि गुण होते हैं उस मनुष्य को स्वर्ग मिलता है। उन्होंने इसका अर्थ समझाते हुए कहा कि जिस परिवार में दैनिक यज्ञ होता वह घर व परिवार स्वर्ग होता है। आचार्य जी ने ऋषि बाण भट्ट का उल्लेख कर बताया कि मनुष्य को गोलाकार थाली में भोजन करना चाहिये और जल भी गोलाकार लोटे में लेकर पीना चाहिये। उन्होंने कहा कि इससे मनुष्य को तनाव व क्रोध आदि न करने व रोगों से बचाव व उन्हें दूर करने में सहायता मिलती है। पंडित रणजीत शास्त्री जी ने कहा कि ऐसा करने से अहंकार व मस्तिष्क रोगों से भी छुटकारा मिलता है। बाल झड़ना भी इससे बन्द हो सकते हैं और चश्मा भी उतर सकता। अपनी बात के समर्थन में शास्त्री जी ने कुछ उदाहरण भी दिये।

 

आचार्य रणजीत शास्त्री ने कहा कि राम पर माता-पिता व गुरुओं का आशीर्वाद था। रावण के माता-पिता व आचार्यों का आशीर्वाद उन पर नहीं था। इस कारण राम को सफलता मिली और रावण को पराजय मिली। आचार्य जी ने श्री कृष्ण जी की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि श्री कृष्ण जी का कारावास में जन्म हुआ। उनके संस्कार अच्छे थे। माता-पिता का आशीर्वाद उनको प्राप्त था। आचार्य सान्दीपनी उनके गुरु थे। सुदामा नाम के एक निर्धन व्यक्ति से उनकी घनिष्ठ मित्रता थी। उन्होंने कहा कि सान्दीपनी जी के सभी सहपाठी तेजस्वी थे परन्तु सान्दीपनी जी पढ़ने में कमजोर थे। गुरू सेवा में वह अपने सहपाठियों से बहुत आगे थे। आचार्य सान्दीपनी को अपने इस शिष्य के आचरण से कभी कष्ट नहीं हुआ। उन्होंने उनकी आशा से अधिक सेवा की। अनेक अवसरों पर उन्होंने गुरु के उचित व अनुचित सभी आदेशों का पालन किया। जब गुरु जी की मृत्यु का समय आया तो उनके सभी शिष्य उनके निकट आये। उन सबको गुरु जी ने अपनी वस्तुयें भेंट की। सान्दीपनी जी विलम्ब से वहां आये। तब तक गुरु जी अपनी सभी वस्तुयें बांट चुके थे। वह बोल सान्दीपनी तुमने मेरी सबसे अधिक सेवा की है। मैं तुम्हें कुछ देना चाहता था परन्तु मेरे पास देने के लिए कुछ नहीं है। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं। तुम्हें एक अत्यन्त योग्य शिष्य प्राप्त होगा जिससे तुम्हारा यश बढ़ेगा। आचार्य जी ने कहा कि सान्दीपनी जी को कृष्ण के समान शिष्य प्राप्त हुआ। यह उनकी गुरु की सच्चे मन से की गई सेवा का परिणाम था।

 

आचार्य जी ने यज्ञ एवं रामकथा के आयोजक श्री प्रेमप्रकाश शर्मा जी के गुणों की भी खुले हृदय से प्रशंसा की और कहा कि देहरादून में वह आर्यसमाज के लोकप्रिय व प्रसिद्ध नेता है। उन्होंने कहा कि शर्मा जी की आत्मा में तेज है। सभी आर्यजन इनके प्रशंसक हैं और इनका सम्मान करते हैं। शर्मा जी महर्षि दयानन्द और आर्यसमाज का काम लगन से कर रहे हैं। उन्होंने शर्मा जी को यज्ञ के ब्रह्मा के रूप में अपनी शुभकामनायें भी दीं। इसके बाद सभी यजमानों को आशीर्वाद दिया गया। यज्ञ सम्पन्न होने के बाद रामकथा आरम्भ हुई जिसको हम एक अलग लेख के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं।

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