मगर ‘राक्षसी कृत्य’ समर्थक इस भीड़ का क्या करेंगे?

निर्मल रानी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों मध्यप्रदेश में ग्राम पंचायतों के एक सम्मेलन  को संबोधित करते हुए देश में महिलाओं व बेटियों के साथ हो रहे अत्याचार तथा उनके शारीरिक शोषण व बलात्कार जैसी घृणित घटनाओं पर चिंता व्यक्त की। पहले भी प्रधानमंत्री इस विषय पर अपने यह उद्गार व्यक्त कर चुके हैं कि प्रत्येक परिवार में बेटियों पर नज़र रखने के साथ-साथ बेटों की गतिविधियों पर भी नज़र रखने की ज़रूरत है। निश्चित रूप से यदि देश के सभी बेटों व युवाओं को पारिवारिक रूप से अच्छे संस्कार दिए जाएंगे,लड़कियों के प्रति उनकी सही अच्छी व सकारात्मक सोच विकसित की जाएगी तो समाज में महिलाओं के प्रति बनता जा रहा भय तथा यौन हिंसा का वातावरण स्वयं ही नियंत्रित हो जाएगा। परंतु प्रधानमंत्री ने इस विषय पर पहली बार अपने लहजे को से  कहते हुए यह भी कहा है कि-‘बेटियों के साथ जो भी राक्षसी काम करेगा उसको फांसी पर लटकाया जाएगा’। उन्होंने इतना कठोर वक्तव्य ऐसे समय में दिया है जबकि भारत में 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों के साथ बलात्कार करने के जुर्म में फांसी की सज़ा दिए जाने का प्रावधान कर दिया गया है। हालांकि मध्यप्रदेश सरकार नवंबर 2017 में ही 12 वर्ष तक की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वाले दोषियों को फांसी दिए जाने का कानून बना चुकी है। कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार ने भी मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार का अनुसरण करते हुए ही ऐसा कानून बनाए जाने की ज़रूरत महसूस की।
बलात्कारी को फांसी देने या न देने को लेकर देश में पहले भी राष्ट्रीय स्तर पर बहस होती रही है। मृत्युदंड का विरोध करने वाले मानवाधिकार संगठन से जुड़े लोग तो किसी भी अपराध के लिए फांसी दिए जाने के पक्ष में कभी भी नहीं रहे। महिला यौन उत्पीड़न में अपनाई जाने वाली बर्बर हिंसा तथा नाबालिग़ बच्चियों के साथ होने वाली राक्षसीय घटनाओं ने तो समाज को इस बात के लिए आमादा ज़रूर किया कि ऐसे घिनौने काम करने वालों को कठोरतम सज़ा दी जानी चाहिए। निश्चित रूप से इस संबंध में राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों में भी तमाम प्रदर्शनकारी बलात्कारी को फांसी दो की मांग करते तथा ऐसे नारे लगाते देखे जाते हैं। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्षा स्वाति मालीवाल ने तो बलात्कारियों को फांसी दिए जाने की मांग को लेकर बाकायदा अपना अनिश्चित कालीन अनशन भी राजघाट पर शुरु कर दिया था जो उन्होंने तभी समाप्त किया जब केंद्र सरकार की ओर से 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों के साथ बलात्कार करने वालों को फांसंी की सज़ा दिए जाने का कानून बनाने की घोषणा कर दी गई। अब इस विषय पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है कि क्या फांसी की सज़ा के डर से देश में होने वाली ऐसी घटनाओं पर नियंत्रण पाया जा सकेगा? या इस कानून के बाद बलात्कार पीड़ित किशोरियों की जान का ख़तरा और अधिक बढ़ जाएगा?
इस बहस के अतिरिक्त हमें यह भी महसूस करने की ज़रूरत है कि क्या बलात्कार के आरोपियों या दोषियों के विरुद्ध पूरा का पूरा भारतीय समाज लामबंद होता है या इन राक्षसी शक्तियों को जिन्हें प्रधानमंत्री फांसी पर लटकाने का भय दिखा रहे हैं,उनके समर्थन में भी खड़ा होता है? इसमें कोई शक नहीं कि हमारे देश के लिए गत् एक दशक से बढ़ती जा रही बलात्कार की घटनाएं किसी बड़े कलंक या बदनुमा दाग़ से कम नहीं हैं। ख़ासतौर पर जब हमें यह सुनाई देता है कि किसी तथाकथित स मानित,माननीय अथवा विशिष्ट या स्वयंभू पूजनीय हस्ती पर बलात्कार अथवा महिलाओं के यौन शोषण के आरोप लगे हैं या वह इसमें दोषी पाया गया है। परंतु यह स्थिति इससे भी अधिक ख़तरनाक उस समय हो जाती है जबकि ऐसे दुराचारी व बलात्कारी व राक्षसी कृत्य करने वाले किसी व्यक्ति के समर्थन में लोगों की भीड़ सड़कों पर उतर आती है और ऐसे आरोपी को सज़ा देने की मांग करने के बजाए उसके पक्ष में आंदोलनरत हो जाती है। हमारे देश में बलात्कार की घटनाओं के विरोध में धरने-प्रदर्शन होते तो ज़रूर सुने गए हैं परंतु अब यह एक नया ट्रेड का है कि ऐसे आरोपी के समर्थक भी सड़कों पर उतरकर अपने नेता,गुरू घंटाल अथवा किसी अन्य शुभचिंतक को ऐसे आरोपों से मुक्त कराने के लिए भीड़ का सहारा लेने लगे हैं। ऐसे प्रयास सीधेतौर पर अदालत की कार्रवाई को प्रभावित करने के लिए तथा शासन पर दबाव डालने की ग़रज़ से किए जाते हैं।
बलात्कार के आरोपी के समर्थन में खड़े होने व धरना-प्रदर्शन तथा जुलूस आदि का सहारा लेने का चलन वैसे तो सर्वप्रथम डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह राम रहीम व बापू आसाराम के अनुयाईयों द्वारा शुरु किया गया था। परंतु इन ‘धर्मात्माओं’ की रणनीति का अनुसरण करते हुए अब बलात्कार समर्थकों की भीड़ कभी कठुआ में 8 वर्षीय आसिफ़ा के बलात्कारियों व हत्यारों को बचाने के लिए न केवल सड़कों पर उतर आती है बल्कि इस भीड़ को वोट बैंक के रूप में देखने वाले जम्मू -कश्मीर राज्य के कई मंत्रीगण भी इस प्रकार की रैली व प्रदर्शन में शामिल होते व इसे समर्थन देते दिखाए देते हैं। यदि यह मान लिया जाए कि कठुआ का ‘राक्षसों’ को दिया जाने वाला समर्थन धर्म आधारित था तथा मतों के धर्म आधारित ध्रुवीकरण के उद्देश्य से किया गया था फिर आख़िर उन्नाव में बलात्कार व हत्या के आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के समर्थन में उतरने वाली भीड़ क्या संदेश देना चाह रही थी? यहां तो पीड़िता भी कठुआ की तरह मुस्लिम लड़की आसिफ़ा नहीं बल्कि कोई हिंदू बेटी ही थी? आख़िर क्यों और किस प्रकार के प्रबंधन के तहत उन्नाव की सड़कों पर सैकड़ों लोग-‘हमारा विधायक निर्दोश  है नारे लिखी हुई  लेकर सड़कों पर उतर आए? कठुआ में तो हिंदू एकता नामक मंच के बैनर तले राक्षसों को संरक्षण देने की कोशिश की जा रही थी परंतु उन्नाव की भीड़ आख़िर किस बैनर के तहत व किस उद्देश्य के साथ ऐसा प्रदर्शन कर रही थी?
प्रधानमंत्री द्वारा ‘राक्षसी काम’ करने वालों को फांसी पर लटकाए जाने जैसे कठोर संदेश की मूल भावना पर संदेह हरगिज़ नहीं किया जाना चाहिए। निश्चित रूप से जब पूरा देश इस समस्या को लेकर चिंतित व दुःखी हो और पूरे विश्व में इस घिनौने व राक्षसी कृत्य को लेकर देश की बदनामी हो रही हो ऐसे में प्रधानमंत्री का चिंतित होना,उनके द्वारा ऐसे राक्षसी काम करने वालों को फांसी पर लटकाए जाने जैसा कठोर संदेश देना स्वाभाविक है। परंतु साथ-साथ यह सवाल उठना भी लाज़िमी है कि यदि सरकार की मंशा वास्तव में ऐसे दुराचारियों व ऐसी राक्षसी प्रवृति के लोगों को सचमुच फांसी दिए जाने की है ऐसे में आख़िर इस भीड़ का क्या किया जाए जो बड़े ही नियोजित तरीके से एक साज़िश के तहत सड़कों पर केवल इसीलिए उतारी जाती है ताकि अपने राक्षस रूपी ‘आदर्श व्यक्ति’ को बचाने व उसे निर्दोष जताने के लिए वह शासन-प्रशासन यहां तक कि अदालत पर अपना दबाव बना सके? समय,क्षेत्र तथा परिस्थितियों के अनुसार कभी यह भीड़ अपने तथाकथित भगवान रूपी गुरु को बचाना चाहती है तो कभी कठुआ में यही भीड़ बलात्कारियों व हत्यारों की आड़ में ‘धर्म रक्षा’ का ढोंग करने लगती है और जब इसी राक्षस समर्थक भीड़ को उन्नाव में कुछ समझ नहीं आता तो वह किसी विशेष झंडे या तथाकथित हिंदू एकता मंच के झंडे व बैनर का भी सहारा नहीं लेती बल्कि सिर्फ़ अपने ‘आदर्श’ विधायक को निर्दोष बताने पर ही तुली रहती है?

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