कला-संस्कृति राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण का गठन हो। February 10, 2025 / February 10, 2025 by डॉ .सुधाकर कुमार मिश्रा | Leave a Comment रामाशीष प्रकृति के पंचभूतों में से एक जल, जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक परम आवश्यक अवयव है। विज्ञान,प्रौद्योगिकी और औद्योगिक क्षेत्र के विकास और उन्नयन हेतु जल एक अत्यावश्यक संसाधन है। समकालीन मानवीय प्रवृत्ति में जल की हर बूंद से धन बनाने का लोभ बढ़ता जा रहा है। आज हमारी नदियों के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं: १. एक निर्मलता की, और २. अविरलता की। ये दोनों एक दूसरे से संबद्ध हैं। अविरलता के अभाव में नदियों की निर्मलता संभव नहीं है । नदियां हमें पानी ही नहीं देतीं अपितु वे हमारी समग्र जीवन प्रणाली की रीढ़ हैं। जैव विविधता, मिट्टी-रेत , जल और अविरल प्रवाह ये सब मिल कर ही किसी नदी की गुणवत्ता निर्धारित करते हैं। नदी को स्वयं को साफ कर लेने का सामर्थ्य भी यही देते हैं। जितना महत्व प्राणियों के शरीर में ऑक्सीजन का है, उतना ही नदी के लिए इन सूक्ष्म से लेकर विशाल धाराओं के जाल का है। जैव- विविधता नदियों के लिए प्राणवायु के समान है,जो इनके जल को शुद्ध करके ऑक्सीजन से भरते हैं इसलिए नदी में कम से कम इतना पानी हो कि हम कह सकें नदी में जीवटता है, परंतु बिजली, सिंचाई, पेयजल और आबादियों को बाढ़ से बचाने के नाम पर नदियों के रास्तों और किनारों पर अनेक अवरोध खड़े कर दिए गए हैं जिससे नदी में उचित न्यूनतम प्रवाह, जिसे पर्यावरणीय प्रवाह या ई-फ्लो कहते हैं, नहीं बचा है। पर्यावरणीय प्रवाह के अभाव में नदी के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक जलीय जीवों जैसे मछलियां, घड़ियाल, डॉलफिन आदि के साथ ही जलीय वनस्पति के जीवन पर खतरा पैदा हो रहा है। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) ने 12 वर्षों के शोध के बाद अभी हाल में गंगाजल को विशिष्ट बनाने वाले तीन तत्व खोजे हैं जो अविरल बहती गंगा को स्वच्छ करते रहते हैं। पहला है गंगा के पानी में घुली प्रचुर ऑक्सीजन। यह प्रति लीटर 20 मिमी तक होती है। दूसरा तत्व है गोमुख से हरिद्वार तक गंगा के मार्ग में पड़ने वाली वनस्पतियों से उत्पन्न रसायन टरपीन एवं तीसरा तत्व है दूषित जीवाणुओं को नष्ट करने वाला बैक्टीरियोफाज। ये तीनों तत्व गंगा की तलहटी में भारी मात्रा में मिले हैं। इन तत्त्वों के संपर्क में आकर पानी अपने आप निर्मल हो जाता है। प्रवाह धीमा होने और मार्ग में अवरोध होने से यह क्षमता कम होती जाती है। वर्तमान सरकार और राज्य सरकार ने इस दिशा में थोड़ी पहल की है । वर्ष 2018 में पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) के लिए देवप्रयाग से हरिद्वार तक अलग-अलग महीनों में 20 से 30 फीसदी तक पानी छोड़ने का प्रावधान हुआ था लेकिन यह मात्रा न तो पर्याप्त है और न ही तार्किक। नदी की निर्मलता के लिए पहली शर्त अविरलता है। 2015 में विभिन्न विभागों, आईआईटी और विशेषज्ञों ने मंथन के बाद गंगा के लिए हिमालय स्थित प्रवाह के लिए दिसंबर-मार्च के बीच 42 से 83 फीसदी, अप्रैल और मई के बीच 37 से 71 फीसदी और जून से अक्टूबर के बीच 35 से 59 फीसदी पर्यावरणीय प्रवाह की आवश्यकता बताई थी लेकिन यह रिपोर्ट सरकारी तंत्र में ही फंसी रह गई जबकि तत्कालीन जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री ने भी इस पर सहमति जताई थी। प्रवाह बनाने में सबसे बड़ी रुकावट जल विद्युत परियोजनाएं हैं, क्योंकि इनका पक्ष है कि अगर हम इतना जल छोड़ेंगे तो विद्युत संयंत्र बंद हो जाएंगे। हमें यह समझना होगा कि नदियां हमारी बिजली, सिंचाई और पेयजल की आपूर्ति भर के लिए ही नहीं हैं अपितु इस पर अन्य जीव-जंतुओं का भी अधिकार है। विशेषज्ञों के कई दलों ने अपनी रिपोर्ट में सूखा, सामान्य एवं बारिश के लिए पानी की गहराई क्रमश: 0.5-0.8-3.41 मीटर बताई है लेकिन इतने पानी में डॉल्फिन समेत कई जलचरों का पर्यावास सम्भव नहीं है। इसे भी ध्यान में रखना होगा। इसी को ध्यान में रखकर एनजीटी ने 2017 में गंगा की ऊपरी धाराओं पर बनी बिजली परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रवाह का मानक तैयार करते समय हरिद्वार से कानपुर के बीच बने सिंचाई बैराजों के लिए भी नियम बनाने का निर्देश दिया है। पर्यावरणविद 50 फीसदी से अधिक ई- फ्लो का समर्थन करते हैं। इंटरनेशनल वॉटर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट 67%प्रवाह की सिफारिश करता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट भी अपने एक आदेश में उत्तर प्रदेश के सिंचाई बैराजों के लिए 50 % पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करने का निर्देश दे चुका है। अविरल गंगा और निर्मल गंगा के ध्येय वाक्य को सिद्ध करने के लिए तीन शर्तें आवश्यक हैं। पानी की प्रचुरता बनी रहे और प्रदूषण व अतिक्रमण पर रोक लगे। ई-फ्लो के लिए भूमिगत जल दोहन को भी नियन्त्रित करना पड़ेगा और वर्षा जल संभरण के लिए कड़े नियम बनाने होंगे, क्योंकि अद्यतन परिस्थितियों में सिर्फ ग्लेशियर के पानी से ई-फ्लो को बनाए रखना सम्भव नहीं है। नदी को ढांचे नहीं, ढांचों से मुक्ति चाहिए। नदी को शासन के बजाय अनुशासन चाहिए। इस तरह नदी का पर्यावरणीय प्रवाह या ई-फ्लो तय करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है- 1. नदी में रहने वाले जीव-जंतुओं (मछलियां और कछुए आदि) के लिए पर्याप्त जलस्तर और प्रवाह बना रहे। ऑक्सीजन का स्तर समेत पानी की गुणवत्ता संतुलित रहे; […] Read more » राष्ट्रीय नदी प्राधिकरण का गठन
कला-संस्कृति भारतीय संस्कृति में बसंत पंचमी का महत्व February 3, 2025 / February 3, 2025 by डॉ.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी | Leave a Comment डॉ.नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी बसंत पंचमी या श्री पंचमी भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण पर्व है जिसे हर साल माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। बसंत पंचमी पूरे भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ‘ऋषि पंचमी’ के नाम से भी जाना जाता है। […] Read more » Importance of Basant Panchami in Indian culture बसंत पंचमी का महत्व
कला-संस्कृति महा कुंभ से सामाजिक समरसता को मिलेगी “संजीवनी” February 3, 2025 / February 3, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment प्रदीप कुमार वर्मा नीले आसमान में भगवा रंगों की लहराती ध्वज पताकाएँ। लगातार बजते घड़ी-घंटाल और संत ओर महात्माओं द्वारा गूंजते मंत्रोच्चार। चौबीस घंटे पवित्र गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम में स्नान करते असंख्य लोग। यज्ञशालाओं से निकलती हवन कुंड की अग्नि। भजन-कीर्तन के साथ प्रवचनों और हेलीकॉप्टरों द्वारा की जा रही पुष्प वर्षा। गंगा,यमुना और सरस्वती […] Read more » Maha Kumbh Maha Kumbh will provide "sanjeevani" to social harmon
कला-संस्कृति शांति, संस्कृति एवं शिक्षा का महापर्व है बसंत पंचमी January 31, 2025 / January 31, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment बसंत पंचमी – 2 फरवरी, 2025-ः ललित गर्ग:-बसंत पंचमी या श्री पंचमी हिन्दुओं का प्रमुख सांस्कृतिक एवं धार्मिक त्यौहार है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती, कामदेव और विष्णु की पूजा की जाती है। यह प्रकृति के सौंदर्य, नई शुरुआत, और सकारात्मकता का उत्सव भी है। इस दिन देवी सरस्वती की पूजा से मन में […] Read more » Basant Panchami is a great festival of peace culture and education. बसंत पंचमी
कला-संस्कृति हिंदू परंपराओं में महाकुंभ मेले का महत्त्व January 30, 2025 / January 30, 2025 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment — डॉo सत्यवान सौरभ इस वर्ष, महाकुंभ मेला पौष पूर्णिमा की शुभ तिथि पर शुरू हुआ, जो 13 जनवरी, 2025 को हुआ और 26 फरवरी, 2025 तक चलेगा। इस वर्ष का महाकुंभ मेला विशेष रूप से विशेष है क्योंकि नक्षत्रों का संरेखण ऐसा कुछ है जो हर 144 वर्षों में केवल एक बार होता है। […] Read more » Importance of Mahakumbh Mela in Hindu traditions.
कला-संस्कृति गुप्त नवरात्रि आज 30 जनवरी से, 8 दिन तक चलेगी विशेष साधना, देवी उपासना का मिलेगा पांच गुना फल January 30, 2025 / January 30, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment पं. शैलेन्द्र उपाध्याय आध्यात्मिक उन्नति और धार्मिक प्रगति का प्रभाव पूरे भारतवर्ष में देखने को मिलेगा – पं. शैलेन्द्र उपाध्याय माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक माघी गुप्त नवरात्रि मनाई जाती है। इस वर्ष गुप्त नवरात्रि 30 जनवरी से 6 फरवरी तक रहेगी। यह नवरात्रि देवी उपासकों और साधकों के […] Read more »
कला-संस्कृति पांडव देवों के अंशावतार होने से प्रकृतिसिद्ध थे January 27, 2025 / January 27, 2025 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment आत्माराम यादव पीव सत्य स्वयं प्रतिष्ठित होता है ओर सब कुछ सत्य का आधार पाकर प्रतिष्ठित होता है। आज विश्व में प्रतिष्ठित होने वाला यह मनुष्य दुखी क्यों है? चारों युगों में सुख दुख असमान रूप से प्रतिष्ठित रहा है जिसमें अगर द्वापरयुग का प्रकरण लिया जाए तो यह सभी के लिए प्रासंगिक होगा। […] Read more »
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म महाकुम्भ : दक्षिण एशिया में भारतीय सॉफ्ट पावर का प्रतीक January 17, 2025 / January 17, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment गजेंद्र सिंहसामाजिक चिंतक एवं सामाजिक निवेश विशेषज्ञ दुनिया की सबसे बड़ी धार्मिक सभा, महाकुंभ मेला, 13 जनवरी 2025 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में शुरू हो गया है। कुंभ मेला दक्षिण एशिया में भारतीय सॉफ्ट पावर का अद्वितीय उदाहरण है। यह विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक सभा होने के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और आर्थिक शक्ति का प्रतीक है। कुंभ […] Read more » भारतीय सॉफ्ट पावर का प्रतीक महाकुम्भ
कला-संस्कृति वर्त-त्यौहार पतंग, पुण्य और स्नान, दान का पर्व – मकर संक्रांति January 14, 2025 / January 14, 2025 by डॉ घनश्याम बादल | Leave a Comment डॉ घनश्याम बादल सारा देश 14 जनवरी को शीत ऋतु के अंत और वसंत ऋतु के आगमन के प्रतीक मकर संक्रांति का पर्व मना रहा है । मकर संक्रांति का पर्व ऐसा अकेला पर्व है जो सौर चक्र पर आधारित आंग्ल वर्ष की निश्चित तिथि पर मनाया जाता है। मकर संक्रांति केवल धार्मिक और सांस्कृतिक […] Read more » दान का पर्व - मकर संक्रांति पतंग पुण्य और स्नान मकर संक्रांति
कला-संस्कृति धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक महत्व भी है मकर संक्रांति का ! January 14, 2025 / January 13, 2025 by सुनील कुमार महला | Leave a Comment 14 जनवरी को स्नान और दान का पर्व मकर संक्रांति है। वास्तव में, यह शीत ऋतु की समाप्ति और नई फसल ऋतु के आरंभ का प्रतीक तथा भारतीय संस्कृति का प्रमुख त्योहार है, जो पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि यह पुण्य अर्जित करने और पापों से […] Read more » Makar Sankranti has not only religious but also scientific importance. मकर संक्रांति
कला-संस्कृति संगम धरा पर लगाइये आस्था की महाकुंभ डुबकी! January 14, 2025 / January 14, 2025 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment डा श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट प्रयागराज महाकुंभ के मीडिया सेंटर का उदघाटन हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया है।उन्होंने महाकुंभ की विशेषताओं का वर्णन करते हुए महाकुंभ में डेढ़ लाख टॉयलेट,70 हजार बिजली के खम्बे,बेहिसाब लाइटिंग,800 बसों का संचालन और मां की रसोई में मात्र 9 रुपये में शुद्ध सात्विक भरपेट खाने जैसे व्यवस्था गिनाई है।उत्तर प्रदेश सूचना एवं लोकसंपर्क विभाग ने महाकुंभ 2025 की भव्य लाइव कवरेज के लिए यहां एक ऐसा दिव्य मीडिया सेंटर बनाया है जो न सिर्फ पूरी तरह से सुसज्जित है बल्कि देश विदेश से आने वाले मीडियाकर्मियों के लिए सुव्यवस्थित समाचार प्रेषण तकनीकी सुविधा उपलब्ध कराई गई है। महाकुंभ को अलौकिक, दिव्य व भव्य बताते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने माना कि सुरक्षित कुंभ हम सबके लिए एक चुनौती है।इस कुंभ में श्रद्धालुओं को शानदार सड़के,धर्म और आस्था से ओतप्रोत कलाकृतियां, विभिन्न वेशभूषाओं से सुसज्जित सन्तो के अखाड़े,संगम में दूर तक फैले रेगिस्तान पर योग साधना के बड़े बड़े वातानुकूलित कक्ष, प्रेरक उपदेश व प्रवचनों की श्रंखला को दिव्यता का रूप दे रही है। हिंदू धर्म का यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है। जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ का स्नान करने और अपनी आस्था लेकर आ रहे है। प्रयागराज, हरिद्वार,उज्जैन और नासिक में जब भी महाकुम्भ या कुंभ होता है, श्रद्धालु बड़ी संख्या कुंभ स्नान करते हैं। इन पांचो मे से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष महाकुम्भ का आयोजन होता है। हरिद्वार और प्रयागराज में दो महाकुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी होता है।प्रयागराज में इससे पूर्व सन 2013 में महाकुम्भ में हुआ था।फिर सन 2019 में प्रयागराज में अर्धकुंभ हुआ था और अब महाकुंभ की छटा हम सबको लुभा रही है। यह महाकुम्भ मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है।क्योंकि उस समय सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशी में और वृहस्पति, मेष राशी में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति के इस योग को “महाकुम्भ स्नान-योग” भी कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलिक पर्व माना जाता है। कहा जाता है कि पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन ही खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। महाकुंभ के आयोजन को लेकर कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है। इस कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इंद्रपुत्र ‘जयंत’ अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के निर्देश पर दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ लिया। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा।इस परस्पर मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक पर कलश से छलक कर अमृत बूँदें गिरी थीं। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया। चूंकि अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। इस कारण कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है,ऐसा माना जाता है। जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय महाकुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ महाकुंभ होता है। 600 ई पू के बौद्ध लेखों में नदी मेलों का उल्लेख मिलता है।400 ई पू के सम्राट चन्द्रगुप्त के दरबार में यूनानी दूत ने एक मेले को प्रतिवेदित किया ,ऐसा कहा जाता है। विभिन्न पुराणों और अन्य प्राचीन मौखिक परम्पराओं पर आधारित पाठों में पृथ्वी पर चार विभिन्न स्थानों पर अमृत गिरने का उल्लेख हुआ है। महाकुम्भ मे अखाड़ो के स्नान का भी विशेष महत्वहै।सर्व प्रथम आगम अखाड़े की स्थापना हुई कालांतर मे विखंडन होकर अन्य अखाड़े बने। 547 ईसवी में अभान नामक सबसे प्रारम्भिक अखाड़े का लिखित प्रतिवेदन हुआ था।600 ईसवी में चीनी यात्री ह्यान-सेंग ने प्रयाग में सम्राट हर्ष द्वारा आयोजित महाकुम्भ में स्नान किया था।904 ईसवी मे निरन्जनी अखाड़े का गठन हुआ था जबकि 1146 ईसवी मे जूना अखाड़े का गठन हुआ। 1398 ईसवी मे तैमूर, हिन्दुओं के प्रति सुल्तान की सहिष्णुता के विरुद्ध दिल्ली को ध्वस्त करता है और फिर हरिद्वार मेले की ओर कूच करता है और हजा़रों श्रद्धालुओं का नरसंहार करता है। जिसके तहत 1398 ईसवी मे हरिद्वार महाकुम्भ नरसंहार को आज भी याद किया जाता है।1565 ईसवी मे मधुसूदन सरस्वती द्वारा दसनामी व्यवस्था की गई और लड़ाका इकाइयों का गठन किया गया । 1678 ईसवी मे प्रणामी संप्रदायके प्रवर्तक श्री प्राणनाथजी को विजयाभिनन्द बुद्ध निष्कलंक घोषित किया गया ।1684 ईसवी मे फ़्रांसीसी यात्री तवेर्निए नें भारत में 12 लाख हिन्दू साधुओं के होने का अनुमान लगाया था।1690 ईसवी मे नासिक में शैव और वैष्णव साम्प्रदायों में संघर्ष की कहानी आज भी रोंगटे खड़े करती है, जिसमे60 हजार लोग मरे थेे।1760 ईसवी मे शैवों और वैष्णवों के बीच हरिद्वार मेलें में संघर्ष के तहत 18 सौ लोगो के मरने का इतिहास है।1780 ईसवी मे ब्रिटिशों द्वारा मठवासी समूहों के शाही स्नान के लिए व्यवस्था की स्थापना हुई।सन 1820 मे हरिद्वार मेले में हुई भगदड़ से 430 लोग मारे गए जबकि 1906 मे ब्रिटिश कलवारी ने साधुओं के बीच मेला में हुई लड़ाई में बीचबचाव किया ओर अनेको की जान बचाई।1954 मे चालीस लाख लोगों अर्थात भारत की उस समय की एक प्रतिशत जनसंख्या ने प्रयागराज में आयोजित महाकुम्भ में भागीदारी की थी।उस समय वहां हुई भगदड़ में कई सौ लोग मरे थे।सन1989 मे गिनिज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने 6 फ़रवरी के प्रयागराज मेले में डेढ़ करोड़ लोगों की मौजूदगी प्रमाणित की थी, जो कि उस समय तक किसी एक उद्देश्य के लिए एकत्रित लोगों की सबसे बड़ी भीड़ थी।जबकि सन 1995 मे इलाहाबाद के “अर्धकुम्भ” के दौरान 30 जनवरी के स्नान दिवस में 2 करोड़ लोगों की उपस्थिति बताई गई थी।सन 1998 मे हरिद्वार महाकुम्भ में 5 करोड़ से अधिक श्रद्धालु चार महीनों के दौरान पधारे थे। 14 अप्रैल के दिन एक करोड़ लोगो की उपस्थिति ने सबको चौंका दिया था ।सन 2001मे इलाहाबाद के मेले में छः सप्ताहों के दौरान 7 करोड़ श्रद्धालु आने का दावा किया गया था। 24 जनवरी 2001 के दिन 3 करोड़ लोग के महाकुंभ में पहुंचने की बात की गई थी।सन 2003 मे नासिक मेले में मुख्य स्नान दिवस पर 60 लाख लोगो की उपस्थिति महाकुम्भ के प्रति व्यापक जनआस्था का प्रमाण है। महाकुंभ में अलौकिकता का बोध लौकिक सुंदरता को देखकर सहज ही हो जाता है,तो आप भी आइए और लगा लीजिए इस महाकुंभ में आस्था की डुबकी । डा श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट Read more » Take a Mahakumbh dip of faith at the Sangam Dhara महाकुंभ संगम धरा
कला-संस्कृति मधु कैटभ को दिए वरदान को पूरा करने मकर संक्रांति के दिन मंदार आते हैं भगवान भधुसूदन January 14, 2025 / January 13, 2025 by कुमार कृष्णन | Leave a Comment कुमार कृष्णन अनेक पौराणिक किंवदंतियों से जूझता मंदार पर्वत शांत, अविचल खड़ा है। काले पहाड़ पर उकेरी हुई कलाकृतियाँ सहज ही अतीत में खो जाने को विवश करती हैं। मधुकैटभ का विशाल चेहरा, जिस पर नजर पड़ते ही कल्पना तेज उड़ान भरने लगती है। पपहरणी यानी पापहारिणी मैली हो चुकी है, लेकिन पाप का हरण […] Read more » Lord Bhadhusudan comes to Mandar on the day of Makar Sankranti to fulfill the boon given to Madhu Kaitabh. भगवान भधुसूदन