कला-संस्कृति जन-जागरण पशु बलि ,संस्कृति और न्यायालय – डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री October 19, 2014 / November 15, 2014 by डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री | Leave a Comment संस्कृति दरअसल मानव प्रगति की यात्रा का ही दूसरा नाम है । जीव जीव का भोजन है , यह आदिम प्रवृति की सब से बड़ी पहचान है । आदिम प्रवृत्तियों पर नियंत्रण ही सांस्कृतिक उत्थान की पहचान है । सभी जीवों में से मानव को ही सबसे ज़्यादा बुद्धिमान माना जाता है । अब देखना […] Read more » पशु बलि
कला-संस्कृति वर्त-त्यौहार दीपावली का रामकथा से संबंध – एक भ्रम October 13, 2014 by डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री | Leave a Comment डा, रवीन्द्र अग्निहोत्री, प्रतिवर्ष हम आश्विन शुक्ल दशमी को दशहरा मनाते हैं . इस अवसर पर रामलीला में श्री राम के द्वारा रावणवध का कार्यक्रम प्रमुखता से आयोजित किया जाता है. इसके लगभग बीस दिन बाद कार्तिक अमावस्या को दीपावली मनाई जाती है. यह प्रसिद्ध है कि इसी दिन श्री राम अपना वनवास पूरा करके […] Read more » दीपावली का रामकथा से संबंध
कला-संस्कृति विजय का पर्व दशहरा October 2, 2014 / October 4, 2014 by सुरेश हिन्दुस्थानी | Leave a Comment नवरात्रि और दशहरा यानि विजयादशमी एक दूसरे गुंथित त्यौहार हैं। दोनों में सत्य की विजय की प्रधानता है। कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपनी पुस्तक ”राम की शक्ति पूजाÓÓ के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और शक्ति स्वरूपा दुर्गा के संबंध को अभिव्यक्त किया है- होगी जय होगी जय हे पुरुषोत्तम नवीन। यह कह महाशक्ति […] Read more » विजय का पर्व दशहरा
कला-संस्कृति जन-जागरण “भाषा, भाषा से बनती है और आदि व मूल भाषा ईश्वर से प्राप्त होती है” October 1, 2014 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment आज संसार में जितनी भी भाषायें हैं इनका अस्तित्व अपनी पूर्व भाषा में अपभ्रंशों, विकारों, सुधारों व भौगोलिक कारणों से हुआ है। हम बचपन में जो भाषा बोलते थे उसमें और हमारे द्वारा वर्तमान में बोली जाने वाली भाषा में शब्दों के प्रयोग व उच्चारण की दृष्टि से काफी अन्तर आया है। कुछ भाषायें हमने […] Read more » मूल भाषा ईश्वर से प्राप्त होती है
कला-संस्कृति ‘बौद्ध-जैनमत, स्वामी शंकराचार्य और महर्षि दयानन्द के कार्य’ September 29, 2014 by मनमोहन आर्य | 15 Comments on ‘बौद्ध-जैनमत, स्वामी शंकराचार्य और महर्षि दयानन्द के कार्य’ ओ३म् -मनमोहन कुमार आर्य महाभारत काल के बाद देश-विदेश में सर्वत्र अज्ञान फैल गया था। शुद्ध वैदिक धर्म शुद्ध न रह सका और उसमें अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, कुरीतियां आदि अनेक हानिकारक मत व बातें सम्मिलित हो गयीं। वेद के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को पंच-महायज्ञों का करना अनिवार्य था जिसमें प्रथम ईश्वरोपासना तथा उसके पश्चात दैनिक […] Read more » ‘बौद्ध-जैनमत स्वामी शंकराचार्य और महर्षि दयानन्द के कार्य’
कला-संस्कृति हनुमान जी की गदा September 24, 2014 by बी एन गोयल | 5 Comments on हनुमान जी की गदा बी एन गोयल गत कुछ दिनों से हमारी मित्र मंडली में हनुमान जी के बारे में काफ़ी चर्चा चल रही है। इस का कारण है – श्री लंका में एक खुदाई के दौरान एक भारी भरकम गदा मिली है जिसे हनुमान जी की गदा माना जा रहा है। इस का वज़न इतना अधिक है इसे उठाने के […] Read more » हनुमान जी की गदा
कला-संस्कृति श्राद्ध क्या है, पितृपक्ष क्यों ??? September 20, 2014 by शिवेश प्रताप सिंह | Leave a Comment “श्रद्धया इदं श्राद्धम्” भावार्थ है प्रेत और पित्त्तर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाए वह श्राद्ध है। “भरत किन्ही दशगात्र विधाना” ऐसा रामचरित मानस में भी वर्णन आता है | जो इस धार्मिक क्रिया का सबसे सटीक प्रमाण है | हिन्दू धर्म में पितरों को एक पक्ष क्यों […] Read more » पितृपक्ष
कला-संस्कृति ‘ईश्वर व ऋषियों के प्रतिनिधि व योग्यतम् उत्तराधिकारी महर्षि दयानन्द सरस्वती’ September 18, 2014 / September 18, 2014 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment ओ३म् क्या कोई ईश्वर तथा सृष्टि की आदि व महाभारत काल से सन् 1883 तक हुए ऋषियों का कोई प्रतिनिधि व योग्यतम् उत्तराधिकारी हुआ है? इसका उत्तर है कि हां, इनका उत्तराधिकारी हुआ है और वह केवल महर्षि दयानन्द सरस्वती हैं। इसका क्या प्रमाण है कि महर्षि दयानन्द इन सबके और मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम […] Read more » महर्षि दयानन्द सरस्वती
कला-संस्कृति राष्ट्रभक्ति सनातन की मूल वैदिक परंपरा है September 18, 2014 by शिवेश प्रताप सिंह | Leave a Comment भारतीय सांस्कृतिक वैभव और दर्शन की मन्दाकिनी “श्री दक्षिणेश्वर मंदिर” के दीवारों पर वेद शास्त्रों के सुभाषित अंकित हैं उनमे से एक वैदिक ऋचा ने मुझे आकर्षित किया; ये यजुर्वेद का “राष्ट्राभिवर्द्धन मन्त्र” है जो इस प्रकार है —– आ ब्रह्यन् ब्राह्मणो बह्मवर्चसी जायताम् आ राष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्यः अति व्याधी महारथो जायताम् दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः […] Read more » राष्ट्रभक्ति सनातन की मूल वैदिक परंपरा है
कला-संस्कृति ‘विकासवाद बनाम् वैदिक धर्म (वेदों का त्रैतवाद)’ September 16, 2014 by मनमोहन आर्य | 1 Comment on ‘विकासवाद बनाम् वैदिक धर्म (वेदों का त्रैतवाद)’ ओ३म् –सत्यासत्य का विचार व चिन्तन – मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून। विकासवाद का सिद्धान्त संसार में ऐसे समय पर आया जब विज्ञान विकासशील अवस्था में था। विकासवाद का सिद्धान्त इंग्लैण्ड में जन्में चार्ल्स राबर्ट डारविन (जन्म 12 फरवरी, 1809 तथा मृत्यु 19 अप्रैल, 1882) ने दिया। इसका आधार क्या था? इसका उत्तर यही है कि […] Read more » ‘विकासवाद बनाम् वैदिक धर्म (वेदों का त्रैतवाद)’
कला-संस्कृति ‘वेद और धर्म’ September 15, 2014 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment ओ३म् मनमोहन कुमार आर्य संसार की अधिकांश जनसंख्या धर्म पारायण या धर्म को मानने वाली है। धर्म क्या है? धर्म सत्य व असत्य के ज्ञान, असत्य को छोड़ने व सत्य को ग्रहण करने, उसका पालन, आचरण व धारण करने को कहते हैं। संसार के सभी धार्मिक ग्रन्थों में धर्म व सत्य का ज्ञान पूर्ण रूप […] Read more » ‘वेद और धर्म’
कला-संस्कृति ‘वेदालोचन के बिना संस्कृत शिक्षा व मनुष्य जीवन व्यर्थ है September 15, 2014 / September 15, 2014 by मनमोहन आर्य | Leave a Comment ओ३म् मनमोहन कुमार आर्य कहा जाता है कि ज्ञान की पराकाष्ठा वैराग्य है। इसका अर्थ यह लगता है कि जिस व्यक्ति को जितना अधिक ज्ञान होगा वह उतना ही अधिक वैराग्य को प्राप्त होगा। अब विचार करते हैं कि एक व्यक्ति के अन्दर ज्ञान बहुत ही कम है। इस पहली परिभाषा के अनुसार कहना होगा […] Read more »