कला-संस्कृति खोने लगे हैं मूल्य और संस्कार June 6, 2015 by डॉ. दीपक आचार्य | 1 Comment on खोने लगे हैं मूल्य और संस्कार -डॉ. दीपक आचार्य- जब तक मूल्यों का दबदबा था तब तक सभी प्रकार की अच्छाइयों का मूल्य था। जब से मूल्यहीनता का दौर आरंभ हुआ है सभी प्रकार के मूल्यों में गिरावट आयी है। मूल्यों में जब एक बार गिरावट आ जाती है तब यकायक इसका पारा ऊपर नहीं चढ़ पाता। यह कोई सेंसेक्स […] Read more » Featured खोने लगे हैं मूल्य और संस्कार जिंदगी जीवन संस्कार
कला-संस्कृति विविधा समाज की प्राचीन और सर्वमान्य रीति विवाह May 16, 2015 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -अशोक “प्रवृद्ध”- मानव की शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक उन्नति के लिए जन्म से मृत्युपर्यन्त भिन्न-भिन्न समय पर अलग-अलग संस्कारों की व्यवस्था प्राचीन ऋषि-मुनियों ने की है। मानव-जीवन की उन्नति मेंं विशिष्ट महत्व रखने वाली सोलह संस्कारों में से एक तेरहवाँ और अतिमहत्वपूर्ण संस्कार विवाह है। विवाह एक धार्मिक संस्कार है, जो धर्म की रक्षा करता […] Read more » Featured विवाह समाज की प्राचीन और सर्वमान्य रीति विवाह सामाजिक रीति
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म दक्षिण भारत के संत (8) साध्वीअंडाल May 12, 2015 / May 12, 2015 by बी एन गोयल | 7 Comments on दक्षिण भारत के संत (8) साध्वीअंडाल -बीएन गोयल- पांचवीं और नवीं शताब्दियों के बीच दक्षिण भारत के तमिल भाषी क्षेत्र में आलवार संतों ने भक्तिभाव की एक ऐसी दीपशिखा प्रज्वलित की कि उस से न केवल भारत वरन पूरा महाद्वीप आलोकित हो उठा । आलवार शब्द का तमिल अर्थ है – एक ऐसा व्यक्ति जो ईश्वर भक्ति में सराबोर हो गया […] Read more » Featured दक्षिण भारत दक्षिण भारत के संत (8) साध्वीअंडाल मंदिर
कला-संस्कृति जन-जागरण तीन माताएं: May 12, 2015 / May 12, 2015 by डॉ. मधुसूदन | 1 Comment on तीन माताएं: -डॉ. मधुसूदन- जावे त्याच्या वंशा तेव्हां कळे।-(मराठी) -सन्त तुकाराम जन्मोगे उस वंश में तो ही समझ पाओगे।–सन्त तुकाराम सुना होगा आपने, कि, भगवान हर व्यक्ति के जीवन में प्रकट होना चाहता था, पर, जब नहीं पहुंच पाया, तो प्रत्येक के जीवन में उसने एक एक माँ को भेज दिया। माँ की करुणा और प्रेम की […] Read more » Featured तीन माताएं: मां माता मौसी
कला-संस्कृति व्यंग्य ये कार्टून बोलता है ! May 7, 2015 / May 7, 2015 by प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो | Leave a Comment -गर्वित बंसल- रात्रि को सोने से पहले फेसबुक अकाउंट की हलचल का जायजा लेते हुए अचनाक से दृष्टि एक कार्टून पर पड़ी ! लगा कि ये कार्टून कुछ बता रहा है, कुछ बोल रहा है! कार्टून का बारीकी से जायजा लेते हुए समझ आया कि यह तो आज़ाद हिंदुस्तान की उस तथाकथित महान परम्परा का बखान कर […] Read more » Featured ये कार्टून बोलता है ! राजनीतिक व्यंग्य व्यंग्य सोनिया गांधी
कला-संस्कृति विविधा नर्मदा के संतानों की रूहें May 6, 2015 / May 6, 2015 by जावेद अनीस | Leave a Comment –जावेद अनीस- कई सालों से देश के किसान मुसलसल आत्महत्या कर रहे हैं लेकिन किसानों के इस देश में यह एक मुद्दा तब बन पाया जब एक किसान का बेटा लुटियंस की दिल्ली में ठीक हुक्मरानों के सामने खुदकशी कर लेता है। इसके बाद देश भर में भूमि अधिग्रहण कानून और किसान आत्महत्या से जुड़े […] Read more » Featured नर्मदा नर्मदा के संतानों की रूहें नर्मदा नदी
कला-संस्कृति मनुवाद से मुक्ति, शुरूआत कैसे ? April 20, 2015 / April 20, 2015 by डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' | Leave a Comment -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा- मनुवादी-धार्मिक-अंधविश्वासों के चलते हर दिन सैकड़ों लोग बेमौत मारे जा रहे हैं! सोशल मीडिया के मार्फ़त देशभर में मनुवाद के खिलाफ एक बौद्धिक मुहिम शुरू हो चुकी है। जिसका कुछ-कुछ असर जमीनी स्तर पर भी नजर आने लगा है! लेकिन हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विचारणीय सवाल यह है कि यदि हमें […] Read more » Featured मनुवाद से मुक्ति शुरूआत कैसे ? मनुवाद सोशल मीडिया पर मनुवाद
कला-संस्कृति विविधा आर्य बनाम द्रविण April 3, 2015 / April 4, 2015 by वीरेंदर परिहार | 5 Comments on आर्य बनाम द्रविण बहुत दिनों तक निष्पक्ष यूरोपीय विद्वान संस्कृति को लैटिन, ग्रीक आदि सभी भाषाओं की जननी मानते थे। मैक्समूलर ने एक विशेष योजना के तहत कहा कि संस्कृत, लेैटिन ग्रीक आदि भाषाए बहनें हैं और इन भाषाओं की जननी प्राचीन भाषा थी, जिस उसने आर्य भाषा कहा। आगे रायल एशियाटिक सोसाइटी की अप्रैल 1866 को हुई […] Read more » arya vs dravin language aryan vs dravin civilisation Featured आर्य बनाम द्रविण वीरेन्द्र सिंह परिहार
कला-संस्कृति साहित्य नाटक पर मंडराता खतरा March 26, 2015 by प्रवक्ता ब्यूरो | 1 Comment on नाटक पर मंडराता खतरा रंगमंच की जब भी हम बात करते हैं तो हमारे जेहन में नाटक, संगीत, तमाशा आदि घूमने लगती है। वास्तव में रंगमंच ‘रंग’ और ‘मंच’ शब्द से मिलकर बना है यानि कि किसी मंच/फर्श से अपनी कला, साज-सज्जा, संगीत आदि को दृश्य के रूप में प्रस्तुत करना। जहां इसे नेपाल, भारत सहित पूरे एशिया में […] Read more » ओपेरा नाटक पर खतरा साहित्य
कला-संस्कृति ज्योतिष लुप्त होती राष्ट्रीय पंचांग की पहचान March 20, 2015 / March 20, 2015 by प्रमोद भार्गव | Leave a Comment संदर्भ-नवसंवत्सर 21 मार्च के अवसर पर लुप्त होती राष्ट्रीय पंचांग की पहचान कालमान एवं तिथिगणना किसी भी देश की ऐतिहासिकता की आधारशिला होती है। किंतु जिस तरह से हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओँ को विदेशी भाषा अंग्रेजी का वर्चस्व धूमिल रहा है, कमोवेश यही हश्र हमारे राष्ट्रीय पंचांग, मसलन कैलेण्डर का है। […] Read more » प्रमोद भार्गव राष्ट्रीय पंचांग राष्ट्रीय संवत विक्रम संवत शक संवत
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म पर्व - त्यौहार महिला-जगत वर्त-त्यौहार साहित्य गणगौर: महिलाओं के सौभाग्य का लोकपर्व March 17, 2015 / March 18, 2015 by ललित गर्ग | Leave a Comment राजस्थान अपने यहां आयोजित होने वाले सांस्कृतिक एवं धार्मिक मेलांे एवं उत्सवों के लिये प्रसिद्ध है। गणगौर इसे और विशिष्ट रूप प्रदान करता है। गणगौर का त्यौहार सदियों पुराना हैं। हर युग में कुंआरी कन्याओं एवं नवविवाहिताओं का ही नहीं अपितु संपूर्ण मानवीय संवेदनाओं का गहरा संबंध इस पर्व से जुड़ा रहा है। यद्यपि इसे […] Read more » गणगौर गणगौर: महिलाओं के सौभाग्य का लोकपर्व महिलाओं का लोकपर्व लोकपर्व
कला-संस्कृति चिंतन धर्म-अध्यात्म शख्सियत स्वामी विवेकानन्द जी के उद्बोधक प्रशंसनीय विचार March 14, 2015 / March 14, 2015 by मनमोहन आर्य | 1 Comment on स्वामी विवेकानन्द जी के उद्बोधक प्रशंसनीय विचार मनमोहन कुमार आर्य स्वामी विवेकानन्द जी के हिन्दू जाति को जीवित जागृत करने वाले विचार इस लेख में प्रस्तुत किए जा रहे हैं। दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक आर्यजगत पत्र के 19 अक्तूबर, 1980 विशेषांक में लगभग 35 वर्ष पूर्व इन विचारों को “मोहभंग का स्वर” शीर्षक दिया गया था। हमें यह विचार हृदय को […] Read more » swami vivekanand Vivekanand vivekanand in new age vivekanand thoughts